Breaking News

लेख/विचार

गंधर्व विवाह

पता नहीं यह मंदिर मुझे क्यों अच्छा लगता था मुझे और यह भी नहीं जानती थी कि यहां बैठकर मुझे शांति क्यों मिलती है? यहीं पर गीत गुनगुनाते हुए भगवान के लिए फूलों की माला बनाना मुझे अच्छा लगता है। मां बाबूजी सुबह – सुबह आकर मंदिर की साफ सफाई में लग जाते हैं। आंगन साफ करना, पौधों में पानी डालना, फूलों का कचरा समेटना उनका यही काम था। मैं भी मां के साथ-साथ मंदिर चली आती थी। पहले पहल तो यूं ही साथ में आ जाती थी लेकिन अब यह बोलकर साथ आती हूं कि तुम्हारे काम में हाथ बंटा दूंगी तो काम जल्दी निपट जाएगा। यहीं पर काम करते-करते मैं छोटी से बड़ी हो गई थी। सभी से मेरी अच्छी जान पहचान हो गई थी। मंदिर में पुजारी मेरे हाथ की बनी माला सामने से मुझसे मांग कर चढ़ाते थे क्योंकि मैं माला बहुत सुंदर बनाती थी। मैं माला की टोकरी मंदिर के सीढ़ियों के पास रख देती थी। पंडित जी पानी के छींटे मारकर टोकरी अंदर ले लेते थे और भगवान को चढ़ा देते थे। यह मंदिर मुझे अब अपना घर जैसा ही लगने लगा था। एक दिन ना आऊं तो कुछ अधूरा सा लगता था।

मां:- “मीता, चलो जल्दी चलना है मंदिर में नए पुजारी आए हैं। अपना काम समय पर हो जाना चाहिए।
मीता:-  “ठीक है, मैं नहा कर आती हूं, फिर चलती हूं।” कुछ देर बाद मैं, मां और बाबू जी मंदिर पहुंच गए। बाबू जी पौधों में पानी डालने लगे और मां आंगन की साफ सफाई करने लगी और मैं फूल तोड़ने में व्यस्त हो गई। तभी नए पुजारी ने आवाज दी।
नया पुजारी:- “ऐ लड़की यहां क्या कर रही हो? चलो दूर जाओ मंदिर से।”
मीता:-  “जी! भगवान के लिए फूल तोड़ रही थी। वह पुराने पंडित जी मेरी बनाई माला भगवान को चढ़ाते हैं तो…।”
नया पुजारी:- “नहीं! कोई जरूरत नहीं है तुम्हारी माला की। भगवान अपवित्र हो जायेंगे।”
पुराने पुजारी:- अरे शंकर क्या बात है जो मीता को डांट रहे हो? जात की मालन है, फूल तो तोड़ कर दे ही सकती है। कोई बात नहीं भीतर रख दो मैं ले लूंगा बाद में।”
मीता:- “पंडित जी प्रणाम !
शंकर:- “आपकी वजह से ही यह लड़की सर चढ़ी हुई है तभी उसकी इतनी हिम्मत बढ़ जाती है।”
बात आई गई हो गई। मीता बचपन से आगे किशोरावस्था की ओर बढ़ रही थी। वो रोज फूल तोड़कर, मालाएं बनाकर मंदिर की सीढ़ियों पर रख देती थी। जिसे पंडित जी धोकर भगवान को चढ़ा देते थे। आज मीता को मंदिर पहुंचने में देर हो गई  थी।
पंडित जी:- “अरे मीता फूल कहां है ? मालाएं भी नहीं बनाई? आज भगवान को बिना श्रृंगार के ही रखने का इरादा है क्या?”
मीता:- “जी! आज देर हो गई, सिर धोना था इसलिए।”
पंडित जी:- “अच्छा… अच्छा ! जाओ जल्दी से फूल लेकर आओ।”
मीता:-  “जी!”
आज सुबह मीता फूल तोड़ते हुए गुनगुना रही थी। शंकर पंडित मीता को एकटक देखे जा रहा था। खुले घुंघराले बाल जो हवा के कारण उसके चेहरे पर बार-बार आ रहे थे और जिन्हें वह बार-बार अपने चेहरे से हटा रही थी। शंकर को यह देखकर बड़ा सुखद अहसास हो रहा था। अब वो मीता के प्रति जरा नरम व्यवहार रखने लगा था। कभी कभार बातचीत भी कर लेता था। मीता जरा आश्चर्यचकित थी कि पंडित जी में यह बदलाव कैसे और क्यों आ गया था लेकिन वो खुश थी कि चलो अब इनका स्वभाव अच्छा हो गया है तो अब डांट नहीं पड़ेगी।
शंकर:- “देखो मीता तू सब काम किया कर मगर मुझसे दूर रहा कर। पूजा-पाठ के समय तू छू लेगी तो मुझे फिर से नहाना पड़ेगा और पूजा में देर हो जाएगी फिर और बड़े पंडित जी मुझे डांटेंगे।”
मीता:- “अरे पंडित जी यह बातें अब कौन मानता है? यह भेद तो अब खत्म हो गया है।”
शंकर पंडित:- “मुझे नहीं पता और मुझसे मुंह मत लड़ा। मुझे भगवान को अपवित्र नहीं करना है। तुम छोटी जात के हो तो तुम्हें अपनी सीमा में रहना चाहिए।”
मीता कुछ बोली नहीं क्योंकि कुछ भी बोलने पर उसे डांट पड़ सकती थी फिर बाबूजी भी उसे ही डांटते यह सोचकर वो चुप रही। शंकर को मीता न जाने कबसे अच्छी लगने लगी थी। उसकी नजर जब तब मीता को खोजते रहती। मीता इन बातों से अनजान अपने काम में व्यस्त मस्त रहती थी।
शंकर:-  “मीता! आज फूल कुछ कम लग रहे हैं ! थोड़े तुलसी के पत्ते और फूल लेकर आओ।”
मीता:- “जी !”
फूल और तुलसी के पत्ते देते हुए मीता का हाथ शंकर के हाथों को छू गया।
शंकर:- “यह क्या किया ? अब फिर से नहाना पड़ेगा! सब खराब कर दिया!” मीता घबरा गई और दो कदम पीछे हट गई।
मीता का स्पर्श शंकर को रोमांचित कर गया। वह खुद को बहुत पुलकित महसूस कर रहा था और उसकी नजरें मीता को तलाश रही थी। इधर मीता डांट के डर से शंकर के सामने जाने से डर रही थी। अब शंकर किसी ना किसी बहाने से मीता को छूने का प्रयास करता और फिर उसे झिड़की देकर नहाने चला जाता। मीता अब उसके सामने जाने से बचती। उसके आने के पहले ही फूल सीढ़ियों पर रख कर चली जाती। एक दिन शंकर ने मीता को बुलाया और पूछा, “क्यों मीता आजकल दिखाई नहीं देती हो? जल्दी फूल रखकर चली जाती हो? फूल मुरझा जाते हैं ऐसे फूल भगवान को कैसे चढ़ाऊं?”
मीता कुछ बोली नहीं बस अपने पैर के अंगूठे को देखती रही।
शंकर:- “कल से ताजे फूल लाकर देना समझी।”
मीता ने सुकून की सांस ली कि पंडित जी ने डांटा नहीं।
अब रोज की दिनचर्या हो गई थी मीता फूल लाकर सीढ़ियों पर रख देती और शंकर फूल लेने के बहाने उससे बातें करता।
सुबह बगीचे में से फूल चुनकर सीढ़ियों पर रखते हुए मीता ने पंडित जी को आवाज लगाई लेकिन प्रत्युत्तर में कोई जवाब नहीं आया। वो सोच में पड़ गई कि फूल ऐसे रख कर जाऊंगी तो पंडित जी नाराज होंगे। वह कुछ देर तक रुकी रही फिर आवाज लगाई लेकिन कोई प्रतिक्रिया नहीं आई। थोड़ी देर में पुराने पंडित जी दिखाई दिए।
पंडित जी:- “अरे मीता! यहां क्या कर रही हो इस समय?”
मीता:- “जी, फूल देने आई थी मगर महाराज जी दिखे नहीं तो रुक गई।”
पंडित जी:- “अच्छा ठीक है, तुम जाओ मैं फूल ले लेता हूं।”
मीता:- “आज वह महाराज नहीं आये हैं क्या?”
पंडित जी:- “हां, शंकर को बुखार हो गया है, वो घर पर आराम कर रहा है।”
मीता:-  “जी !”
पंडित जी:- ” तेरी मां को शंकर के यहां भेज देना। घर गंदा पड़ा है तो वह साफ सफाई कर देगी।
मीता:- “जी !”
मीता:- “मां! बड़े पुजारी जी कह रहे थे कि आपको शंकर महाराज के घर की साफ सफाई के लिए जाना है।”
मां:- “नहीं, मैं नहीं जा पाऊंगी। आज काम के बाद बाजार से सब्जी और राशन लाना है और गैस का बाटला खत्म हो गया है तो वो भी लाना है। आज मेरे पास बिल्कुल भी समय नहीं है। ऐसा कर आज तू ही काम करके आ जा।”
मीता:-  “ठीक है।”
मीता शंकर के घर की ओर निकल जाती है। घर पहुंचते ही मीता शंकर को कंबल ओढ़े हुए देखती है।शंकर:- “कौन है?”
मीता:-  “महाराज जी मैं हूं मीता। घर की सफाई करने आई हूं।”
शंकर:- “ठीक है कर लो” और शंकर उसे काम करते हुए देखता रहता है। उसकी नजरें उसके चेहरे से हटकर उसके पूरे शरीर का मुआयना कर रही थी। मीता का ध्यान नहीं था शंकर पर। वह अपने काम में व्यस्त थी। शंकर के लिए अपने ऊपर नियंत्रण रख पाना मुश्किल हो गया था। वह उठा और मीता को पीछे से पकड़कर उठा लिया। मीता घबरा गई।
मीता:- “पंडित जी ! आप मुझे क्यों छू रहे हैं? ऐसे क्यों पकड़ रहे हैं?”
शंकर:- “कुछ नहीं, घबराओ मत! मैं कुछ नहीं कर रहा। तुम बहुत सुंदर हो, थक गई होगी लो पानी पियो” और उसने मीता को पानी दिया। मीता ने डरते हुए, सकुचाते हुए पानी का ग्लास हाथ में लिया।
शंकर:- “देखो! तुम मुझे बहुत अच्छी लगती हो लेकिन लोकलाज के डर से मैं तुम्हें कुछ नहीं कहता और इसी डर से मैं तुम्हें अपना भी नहीं सकता। क्या ही अच्छा हो कि तुम मेरी पत्नी बन जाओ। क्या तुमने गंधर्व विवाह का नाम सुना है?”
मीता:-  “वो क्या होता है?”
शंकर:-  “जिसमें दो लोग अपनी इच्छा से ईश्वर को साक्षी मानकर विवाह कर लेते हैं।”
मीता:- “जी, नहीं सुना है”।
शंकर:- “आओ हम दोनों गंधर्व विवाह कर लें।”
मीता कुछ सोच समझ नहीं पा रही थी। वह बाहर जाने के लिए मुड़ी तो शंकर उसका हाथ पकड़ लिया और उसके कान के पास जाकर फुसफुसा कर कहा, “आज से तुम मेरी पत्नी हो और महाराज की आज्ञा तुम्हें माननी पड़ेगी।”
मीता कुछ समझ नहीं पा रही थी और डर से विरोध भी नहीं कर पा रही थी। शंकर उसे अपने बाहुपाश में लेकर अपने जाल में फंसा रहा था और मूक जानवर की तरह मीता का वध हो रहा था। कुछ दिनों तक यही सिलसिला चलता रहा। वह उसे घर की साफ सफाई के बहाने बुलाते रहता और उसका शोषण करता रहा। कुछ दिनों बाद मीता के पैर भारी हो गए। उसे उल्टियां आने लगी और जी मिचलाने लगा। मां को चिंता हुई तो वह उसे डॉक्टर के पास ले गई।
डॉक्टर:- “आपकी बेटी की शादी हो गई है?
मीता की मां:- “नहीं! क्यों? आप ऐसा क्यों पूछ रही हैं?”
डॉक्टर:- “उम्र काफी कम है इसकी लेकिन आप लोगों में बेटियों की शादी जल्दी कर देते हैं इसीलिए पूछा। यह पेट से है।”
मीता की मां:- “क्या!”
मीता की मां के पैरों तले जमीन सरक गई। मां – बेटी दोनों घर लौट कर आ गईं।
मां:- “बता कौन है वह? कहां मुंह काला करती फिर रही है? बता! नहीं तो मार डालूंगी?
मीता:- “मां, वह मंदिर के पुजारी… उन्होंने मुझसे शादी की है।”
मां के तन बदन में आग लग गई और दो चार थप्पड़ रसीद दिये मीता को और सर पकड़ कर बैठ गई। दुख और क्रोध के कारण आंसू निकलने लगे। जब पिता को सब बात पता चली तो वह तनाव में आ गए। उन्हें कुछ सूझ नहीं रहा था कि क्या करें। दोनों पति – पत्नी ने शंकर पंडित के पास जाने का निश्चय किया। अगले दिन दोनों पति-पत्नी डरते हुए बड़े पुजारी के पास गये और उन्हें सारी बातें बताईं। पंडित जी को बहुत गुस्सा आया और उन्होंने मीता को बुलवाया।
बड़े पुजारी:- “क्यों मीता यह तेरे मां बाऊजी जो कह रहे हैं क्या वह सही है?”
(मीता सिर झुकाए हुए) “जी!”
पंडित जी:- “तुम्हें शर्म नहीं आती ऐसी ओछी बात करते हुए? तुम्हें अंदाजा है कि इसका नतीजा क्या होगा?”
मीता कुछ नहीं बोली। वह नीचे बैठ कर रोने लगी। पंडित जी ने शंकर को बुलवाया और उससे सारी हकीकत जाननी चाही।
बड़े पंडित:- “शंकर! मीता कह रही है कि तुमने उससे शादी की है? वह गर्भवती है, क्या यह सही है?”
शंकर:- “नहीं महाराज ! यह सरासर झूठ बोल रही है। मैं तो इसके हाथ का छुआ पानी भी नहीं ले सकता। इसके हाथ से फूल माला भी नहीं लेता। मैं तो इससे दूरी बनाकर रहता हूं फिर इससे शादी की बात कैसे सोच सकता हूं?”
मीता अवाक सी शंकर का मुंह देखती रह गई। मीता के माता-पिता दुखी हो गये। उन्हें पता था कि यही होने वाला है।
पंडित जी:- “देखो! शंकर झूठ नहीं बोल सकता, मैं उसे जानता हूं। तुम लोग मीता से ही पूछताछ करो कि कौन है वह व्यक्ति और मीता तुम मंदिर आना बंद कर दो अभी तुम्हारी जरूरत नहीं है।”
तीनों व्यक्ति दुखी मन से घर वापस आ गए। मीता की मां ने मीता को फिर से भला बुरा कहा और मारा। दुख और क्रोध कम नहीं हो रहा था और कुछ उपाय भी नहीं दिख रहा था। पिता ने बहुत सोच-विचार कर बड़ी हिम्मत करके अगले दिन पुलिस में शिकायत दर्ज करवाने की ठानी।
अगले दिन वह पुलिस चौकी पहुंच गए।
मीता के पिता:- “साब शिकायत लिखवानी है।” इंस्पेक्टर:- “किसके खिलाफ? क्या केस है?”
पिता:- “जी, मंदिर के पुजारी के खिलाफ।” इंस्पेक्टर चौंक गया फिर उसने पूछा कि क्या मामला है।
पिता:- “जी, शंकर पंडित ने बहला-फुसलाकर मेरी लड़की के साथ दुराचार किया है और अब वह अपनी बात से मुकर रहा है” और सारी घटना की जानकारी इंस्पेक्टर को दी।
इंस्पेक्टर जानता था कि पुजारी से पंगा लेना ठीक नहीं है। उसने मीता के पिता को डांट कर भगा दिया और शिकायत दर्ज नहीं की साथ ही धमकी भी दी यदि चुप नहीं रहे तो इसका नतीजा बुरा होगा।
इंस्पेक्टर:- “तुम जैसे लोग पैसा बनाने के लिए कितना नीचे गिर जाते हो! जाओ यहां से नहीं तो अंदर कर दूंगा। तुम्हें भी और तुम्हारे पूरे परिवार को भी।
मीता का पिता अपमानित होकर घर आ गय। कुछ ना कर पाने का दुख और माथे पर कलंक लेकर और बेटी के जीवन का सत्यानाश होते देख कर रोने लगा। कुछ ही दिनों में सबके सामने यह बात खुल जाने वाली थी। यह सोचकर वह अपना सामान बांधने लगा और दूसरे शहर जाने की तैयारी करने लगा क्योंकि इसके सिवा उसके पास कोई चारा नहीं था। – प्रियंका वर्मा महेश्वरी 

Read More »

भव्य समारोह आयोजित कर ‘कन्यादान सेवा संस्थान’ ने करवाया निर्धन कन्याओं का विवाह

कानपुरः अवनीश सिंह। समाजसेवी संस्था कन्यादान सेवा संस्थान के तत्वावधान में बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ उद्देश्य को पूरा करने के साथ-साथ उनका जीवन संवारने की दिशा में एक अभियान के तहत भव्य कार्यक्रम आयोजित करते हुए 6 कन्याओं का विवाह कराते हुए समाज के प्रति अपने कर्तव्य को लेकर एक सजग प्रहरी के रूप में एक उदाहरण पेश किया है। विगत वर्षों की तरह इस वर्ष भी 6 कन्याओं का विवाह कार्यक्रम बर्रा-8 स्थित चौधरी राम गोपाल यादव चौराहा में आयोजित किया। सामूहिक विवाह कार्यक्रम की रौनक देखने लायक रही जिसमें 6 दूल्हे घोड़ी में सवार होकर एक साथ बारात लेकर कार्यक्रम स्थल की तरफ बढ़ते हुए जा रहे थे। इस दौरान संस्थान के सदस्यों के साथ साथ वहां से गुजर रहे राहगीरों व क्षेत्रीय लोगों ने गर्मजोशी से स्वागत किया व दूल्हा और दुल्हन को शुभकामनाएं भी दी।

Read More »

जोशीमठ: प्रकृति के साथ खिलवाड़ या प्रशासन की लापरवाही ~ प्रियंका वर्मा महेश्वरी

जोशीमठ (उत्तराखंड) में पड़ती दरारें और बहता हुआ पानी लोगों में दहशत और लोगों का जनजीवन असामान्य बना रहा है। क्या ये मंजर लोगों द्वारा प्रकृति के साथ किये खिलवाड़ का नतीजा है या प्रशासन की लापरवाही का नतीजा है। 1976 में एक अट्ठारह सदस्यीय कमेटी ने जब इस क्षेत्र को संवेदनशील घोषित कर दिया था और निर्माण कार्यों पर प्रतिबंध, पेड़ों को काटने पर रोक और बारिश के पानी के निकासी की व्यवस्था की बात रखी थी तब इस बात को सरकार द्वारा गंभीरता से नहीं लिया गया था और आज लोग इस गल्ती का खामियाजा भुगत रहे हैं। इस कमेटी की रिपोर्ट में कहा गया है कि जोशीमठ बालू और पत्थर के ढेर पर बसा हुआ है, इस दृष्टि से यह किसी टाउनशिप के लिए उपयुक्त नहीं है। धमाकों और भारी यातायात से उत्पन्न होने वाले कंपन यहां पर प्राकृतिक असंतुलन पैदा करेंगे। भारी निर्माण कार्य की अनुमति केवल मिट्टी का भार वहन करने की क्षमता के दृष्टिगत ही दी जानी चाहिए। सड़कों की मरम्मत या अन्य किसी प्रकार के निर्माण कार्य किसी भी स्थिति में पहाड़ों को खोदकर अन्यथा विस्फोट करके नहीं किये जाने चाहिए। भूस्खलन प्रभावित इलाकों में पत्थरों और बड़े शिलाखंडों को पहाड़ी की तलहटी से नहीं हटाया जाना चाहिए क्योंकि इससे पहाड़ को मिलने वाली मजबूती खत्म होती है। 47 बरस पहले की इस रिपोर्ट को सरकार ने गंभीरता से नहीं लिया और आज जोशीमठ पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं।

चमोली जिला प्रशासन के अनुसार यहाँ 3900 आवासीय मकान और 400 व्यावसायिक भवन है। एक ऐतिहासिक और धार्मिक धरोहर का विध्वंस सरकार द्वारा बरती गई लापरवाही के कारण भुगत रहे हैं। फरवरी 2021 में इसी इलाके में भयंकर बाढ़ की आपदा को अभी तक लोग भूले नहीं है। जोशीमठ से मात्र 22 किलोमीटर की दूरी पर बसे गांव रैणी, जोशीमठ, नंदा देवी नेशनल पार्क और यहां बन रही तपोवन विष्णुगढ़ जल विद्युत परियोजना को इस बाढ़ ने तबाह कर दिया था। इस तबाही में 200 लोगों की जानें चली गई थी। पर्यावरणविद काफी समय से सरकार को इस क्षेत्र की भौगोलिक संवेदनशीलता को जताते रहे लेकिन सरकार नजरअंदाज करती रही।
आखिर क्यों रिपोर्ट की जानकारी होने के बावजूद निर्माण कार्य की मंजूरी दी गई? और रिपोर्ट पर प्रशासन ने संज्ञान क्यों नहीं लिया? क्यों लोगों की जीवन के साथ खिलवाड़ किया गया?
2014 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त की गई एक वैज्ञानिक कमेटी ने इस क्षेत्र के बड़े डैम और बड़ी विद्युत परियोजना पर रोक लगाने की सिफारिश की थी लेकिन केंद्र सरकार ने इस समिति की रिपोर्ट को स्वीकार नहीं किया। देहरादून स्थित “पीपल्स साइंस इंस्टीट्यूट” के निदेशक डॉ रवि चोपड़ा जो इस समिति के सदस्य थे इस बाबत लगातार अपना प्रतिरोध दर्ज कराते रहे हैं।

Read More »

रूह रोती है तो आंखों से लावा टपकता है

इतनी तेज गर्मी है आज, और ऊपर से गाड़ी बीच सड़क पर रूक गई।कोई मैकेनिक भी नज़र नहीं आ रहा। किसे कहूँ कि मेरी कोई मदद कर दे। कोई आस पास दिखाई भी नहीं दे रहा था।खुद पर ही झुनझुला उठी थी रेवा। रेवा ने टैक्सी ली और घर पहुँच
गई।रेवा पानी का गिलास ले कर निढाल सी सोफ़े पर बैठ गई।मन भर आया था उसका ,किस से कहे ,अपने मन की बात।
जब से होश सँभाला था तब से काम कर रही थी।बच्चे जब छोटे थे।अपनी माँ रेवा को इतना काम करते देखते तो कहते,बस माँ !तुम फ़िक्र न करो जब हम बड़े हो जायेगे।तुम्हें हम रानी बना कर रखेंगे।नौकर होंगे हमारी माँ के आसपास।
आँखे नम हो गई रेवा की ,सोचने लगी।कैसे जब उसके घुटनों में बहुत दर्द था सीढ़ियाँ भी नहीं चढ़ पाती थी तो कैसे उसके बेटे हाथ दे कर उसे ऊपर के फ़्लोर पर ले कर ज़ाया करते थे।अपने बच्चों को याद कर रेवा का धैर्य टूट गया और आँखे दरिया की तरह बह निकली। दोस्तों ! कभी-कभी हम जब रोते है तो सिसकियाँ सुनाई देती है मगर जब कभी रूह रोती है तो आवाज़ नहीं होती सिर्फ़ आँखों से लावा टपकने लगता है। सोचा करती थी कि कुछ सालों में बेटे बड़े हो जायेंगे तो ज़िन्दगी आसान हो जायेगी।थक कर घर आती ,तो भी ख़ुश रहती ,अपने बेटों को देख कर ,अपने पति को देख कर।दोनों बेंटो को पढ़ा लिखा कर रेवा ने उन्हें पैरों पर खड़ा कर दिया था।अब दोनों बेटे अलग रहते थे।एक बेटा तो शादी करके अलग हो गया था जिसके ऊपर रेवा को बहुत नाज़ था।रेवा हर वक़्त उसे छोटे -छोटे कह कर पूरा घर सिर पर उठा लिया करती।रेवा को यकीन था कि उसका वो बेटा उसके साथ कंधे से कंधा मिला कर उसकी ज़िन्दगी को आसान कर देगा मगर विधाता को कुछ और मंज़ूर था। क्या वजह रही होगी ,रेवा आज तक नहीं समझ पाई।उसके बाद दुख हो या सुख,कभी उसके बेटे का फ़ोन तक नहीं आया ।
अब रेवा अकेली रहती हैं अपने किराये के मकान में ,ज़िन्दगी का सफ़र हँस कर गुज़ार रही है बिना किसी शिकायत के।किस से कहे,कि वो अब थक चुकी है काम करते करते मानसिक रूप से और शारीरिक रूप से।रेवा का बड़ा बेटा बहुत ध्यान रखता था उसका।हर रोज़ मिलने भी आ जाया करता।रेवा का हर दुख समझता था,जितनी हिम्मत होती ,उतनी मदद भी कर देता।यूँ तो रेवा अपनी रोटी कमाने में संक्षम थी मगर कभी-कभी उसका भी मन करता उसके बच्चे भी उसे उतना प्यार करें जैसे वो किया करती थीं।
देखते ही देखते एक दम से बाहर बादल घिरने लगे,अन्धेरा छाने लगा था,जैसे बारिश बरसने को बेक़रार थी।बिजली गरजने के साथ तेज बरसात शुरू हो गई।रेवा खिड़की के पास खड़ी ,बाहर बरसात को देख कर ,
यादों के समुद्र में डूब कर सुनहरी यादो के मोती चुनने लगी।ठीक ऐसी ही बरसात थी।जब वो कालेज के बाहर खड़ी बस का इंतज़ार कर रही थी।बसों की स्ट्राइक की वजह से परेशान और ऊपर से बारिश,अभी सोच ही रही थी कि क्या करें।तभी शरद ने मोटर बाईक उसके पास रोक दी।हर रोज़ रेवा को देखा करता मगर बात करने की हिम्मत कभी नहीं हुई थी उसकी। शरद ने कहा ! मैं घर छोड़ देता हूँ आप को। आइये ! इतनी बारिश में कब तक भीगतीं रहेगी।रेवा भी उस दिन न नही कर पाई थीं।उसके बाद मुलाक़ातों का सिलसिला शुरू हो गया था।जल्दी ही दोनों की शादी हो गई।बहुत खुश भी थे दोनो अपने घर संसार में ,उनके बच्चे हुये मगर कुछ सालों बाद शरद बिमार रहने लगे थे और वही बीमारी फिर वजह बन गई उन दोनों के बिछड़ने की।आज रेवा शरद को बहुत याद कर रही थी कि हालात कोई भी रहे शरद ने उसका पूरा साथ दिया।उसे याद आ रहा था कि कैसे जब वो काम से वापस आती ,तो उसका पति उसे ख़ुश करने के लिये गाना गाया करता और रेवा भी उसके सुर में अपना सुर मिला देती और इस तरह रेवा की सारी थकान उतर जाती।
सोच रही थी, कितना सुंदर संसार था उसका ..रौनक़ शोर शराबा , हंसी के ठहाकों से भरा घर,जो आज ख़ाली था,ठीक उसके “दिल की तरह”।
रेवा के पास बहुत पैसा बेशक नहीं था मगर दिल की अमीरीयत बहुत थी। वो सब को प्यार देती।तवज्जो देती। सब का करती मगर अब शरीर काम कर कर के जर्जर हो चुका था उसका।अब सिर्फ़ उसके पास था तो बस “इक इन्तज़ार “कि शायद वो भी कभी सुख की साँस ले सके, वो भी आम लोगों की तरह अपने पोते पोतीयो के साथ वक़्त बिता सके।रेवा बाहर से बहुत स्ट्रोंग बताती थी खुद को मगर अन्दर से बिखर चुकी थी रेवा।इसी उम्मीद पर ही जी रही थी ,कि काश ..कोई उसे भी कह दे कि तुम फ़िक्र न करो ,
हम है न !!तुम्हें समेट लेंगे अपनी आग़ोश में। ये कहानी घर घर की हो सकती है दोस्तों ! ये बात मैं अपने लेखों में लिख बार बार लिखती ही रहूँगी।जिसने माँ बाप को पूज लिया फिर उसे किसी देवता को पूजने की कोई ज़रूरत रह ही नहीं जाती। मगर अफ़सोस हमारा समाज किस और जा रहा है। प्राईवसी के नाम पर ,माडर्नेटी के नाम पर,कहीं न कहीं हम सब ही कितना ग़लत कर रहे हैं।बाहर के देशों का ये चलन हो सकता है मगर हमारे भारत की संस्कृति ये कभी नही हो सकती है। दोस्तों! सोचो !अगर माँ बाप भी लापरवाह हो कर अपने बच्चों को बचपन मे ही छोड़ कर अपना ही स्वार्थ देखते ,तो बच्चों का क्या होता ? अगर माँ बाप ने अपने मुँह से रोटी का निवाला निकाल कर बचपन मे अपने बच्चों का पेट भरा है तो आज बच्चों का भी फ़र्ज़ बनता है कि वो बड़े हो कर अपने माँ बाप को भी सँभाले
यही असली पूजा है भगवान मंदिर में ही नहीं बल्कि सारे देवी देवता हमारे आस पास ही रहते है भिन्न भिन्न रूपों मे। बस देखने का नज़रिया ही चाहिए होता है
लेखिका स्मिता ✍️

Read More »

जेब्राफिश में पाया जाने वाला प्रोटीन, मानव के मेरुदण्ड अस्थिखण्ड में उम्रदराज डिस्क को फिर से पैदा कर सकता है

जेब्राफिश की रीढ़ की हड्डी में पाया जाने वाला एक प्रोटीन, जो डिस्क रखरखाव में सकारात्मक भूमिका निभाता है और मेरुदण्ड अस्थिखण्ड में उम्रदराज डिस्क को फिर से पैदा करने को बढ़ावा देता है, में कमजोर पड़ चुके मानव डिस्क फिर से पैदा करने की प्रक्रिया को बढ़ावा देने संबंधी चिकित्सीय प्रभाव के मौजूद होने की संभावना हो सकती है।

मनुष्यों में, डिस्क स्वाभाविक रूप से कमजोर पड़ जाती है, जिससे पीठ के निचले हिस्से, गर्दन और उपांग में दर्द सहित कई संबंधित स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं होती हैं। वर्तमान में, कमजोर पड़ चुके डिस्क के लिए केवल रोगसूचक उपचार उपलब्ध हैं, जिनमें दर्द निवारक या सूजन-रोधी दवाएं शामिल हैं। गंभीर मामलों में डिस्क विस्थापन या डिस्क फ्यूजन सर्जरी की जाती है। इस प्रकार, कमजोर होते डिस्क की गति को कम करने या मनुष्यों में डिस्क को फिर से पैदा करने पर आधारित एक उपचार प्रक्रिया को विकसित करने की तत्काल आवश्यकता है। चिकित्सा परीक्षण मानव डिस्क के कमजोर होते जाने के चरणों से सम्बंधित आवश्यक जानकारी प्रदान करते हैं, लेकिन डिस्क के रखरखाव में भूमिका निभाने वाली कोशिका और आणविक प्रक्रियाओं के बारे में सीमित जानकारी उपलब्ध है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि कमजोर होते डिस्क की गति को कम करने या मनुष्यों में डिस्क को फिर से पैदा करने पर आधारित कोई चिकित्सा प्रक्रिया या उपचार ज्ञात नहीं है।

IMG_256

विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग के स्वायत्त संस्थान, आगरकर रिसर्च इंस्टीट्यूट (एआरआई), पुणे द्वारा किए गए एक अध्ययन में पता चला है कि अंतर-मेरुदंड डिस्क कोशिकाओं से स्रावित कोशिका कम्युनिकेशन नेटवर्क फैक्टर 2ए (सीसीएन2ए) नामक एक प्रोटीन, कमजोर व उम्रदराज होते डिस्क में डिस्क को फिर से पैदा करने को उत्प्रेरित करता है तथा इसके लिए एफजीएफआर 1-एसएचएच (फाइब्रोब्लास्ट ग्रोथ फैक्टर रिसेप्टर-सोनिक हेजहोग) पाथवे नामक तरीके को संशोधित करके कोशिका प्रसार करता है और कोशिका को संरक्षित करता है।

एक मॉडल जीव के रूप में ज़ेब्राफिश का उपयोग करने वाला यह अध्ययन विवो अध्ययन में पहला है, जो दिखाता है कि अन्तःविकसित सिग्नलिंग कैस्केड को सक्रिय करके कमजोर व उम्रदराज होते डिस्क में डिस्क को फिर से पैदा करने को उत्प्रेरित करना संभव है। वैज्ञानिकों ने यह भी पाया कि सीसीएन2ए- एफजीएफआर 1-एसएचएच, सिग्नलिंग कैस्केड डिस्क के रखरखाव और डिस्क को फिर से पैदा करने की प्रक्रिया में सकारात्मक भूमिका निभाता है। जर्नल, डेवलपमेंट में प्रकाशित इस अध्ययन में आनुवांशिकी और जैव-रसायन दृष्टिकोण का उपयोग किया गया है और यह डिस्क के कमजोर होती प्रक्रिया की गति को धीमा करने या कमजोर हो चुके मानव डिस्क में डिस्क को फिर से पैदा करने की प्रक्रिया को उत्प्रेरित करने के लिए एक नई रणनीति तैयार करने में मदद कर सकता है।

Read More »

नई सुबह नई रोशनी नया आग़ाज़ नये साल की हार्दिक बधाई

तेरी बेपनहा मोहब्बत तेरी बेशुमार मेहरबानियाँ..

तेरी बरसती हुई रहमते.. तुम्हारी हर बात के लिए शुक्रगुज़ार हूँ ..
मेरे साईं 🌹
तू रोशनी है मेरी .. तू सकून है मेरा ..
तेरे ही नूर से महकती है रूह मेरी …
तुझ से ही तो ,मैं हूँ … तुझ से ही तो ,ये वजूद है मेरा …
आँखों को इन्तज़ार , बस अब तेरा ही है …🙏🌹
दिन गुजरे ,महीने गुजरे,साल गुजरे

कुछ भी रूकता नहीं यहाँ दोस्तों।
न गम ..न ही ख़ुशी रूकेगी कभी।
कोई लम्हा जो गुज़र गया।कभी लौट कर आता नहीं है यहाँ। अब नया साल आया है ..

बहुत सी ख़ुशियाँ ,बहुत सी यादें ,हर साल की तरह ,कुछ पढ़ा कर ..कुछ लिखा कर ,

मिलाजुला सा अनुभव दे कर ..ये भी गुज़र ही जायेगा।
वक़्त हमे कुछ न कुछ सिखाने की कोशिश में लगा रहता है, जो हम सभी अपनी मंदबुद्धि ,

अहंकार अपनी ही चालाकियों की वजह से सीख नहीं पाते और फिर वक़्त खुद अपने ही

ढंग से सिखाता है हमे और कई बार वक़्त के सिखाने का वो ढंग या तरीक़ा हमें क़तई पसंद नहीं आता
“ये जहान इक मुसाफ़िर घर हैं दोस्तों “
इसे भूल कर अपना घर न समझ बैठईये..
लेखिका स्मिता केंथ ✍️

Read More »

तुम जीतते रहे और मैं हारती रही

रिश्तो की बाज़ियाँ चलती रही… तुम जीतते रहे और मैं हारती रही ….मगर अफ़सोस नहीं था मुझे इस हार का..जितनी बार मै हारती गई, भीतर से जीत का अहसास होता चला गया।”

ज़िन्दगी इक शतरंज ही है दोस्तों। हार जीत तो तय है “कभी मेरी कभी तेरी”…
खेल चलता रहे ,तो ज़ाहिर है ,चाले भी चलनी पड़ती है ,मगर खेल को चलाते वक़्त कई बार शय और कई बार मात मिलती है और हर बार खुद को बचाया जाता है यही ज़िंदगी है दोस्तों !हार हो जाये कभी तो घबराना नहीं,जीत हो जाये तो इतराना नही !! बस इतना याद रखिए।
ज़िन्दगी बस इक खेल ही है।खेल में “हार जीत”…खेल के साथ ही ख़त्म हो जाती ..जब खेल ख़त्म होगा.. तो न आप होंगे . न आपकी जीत होगी ,न ही आप की हार .. इस लिए ज़िन्दगी को बहुत गंभीरता से न ले कर ज़रा हल्के से लीजिए जनाब।
छोड़िये सब झंझट और वक़्त के साथ चलिए ,जो मिल रहा है उसी में ख़ुश रहिये।बहुतो को तो ये भी नसीब नहीं…और मैं अच्छे से ये भी जानती हूँ।तुम हर बाज़ी जीत जाओगे और सब मुश्किलों को बेहतर से मात दे पाओगे।
🌹यू भी दोस्तों !
जीतने वाला सिकन्दर तो हो सकता है मगर जिसे ये पता हो “कहाँ पर क्या हारना है “वो ही असल में बादशाह कहलाता है और सब के दिलों पर हकूमत भी वही कर पाता है।हार को कभी कम मत आंकिए।कई बार हम हार कर बहुत कुछ जीत लेते हैं बस यही याद रखने की बात है
लेखिका स्मिता ✍️

Read More »

टाटा कैंसर हॉस्पिटल के अध्‍ययन के अनुसार स्‍तन कैंसर के मरीजों के इलाज में योग को शामिल करना बहुत लाभकारी है

टाटा मेमोरियल हॉस्पिटल के एक अध्ययन के अनुसार स्तन कैंसर के रोगियों के उपचार में योग को शामिल करना बहुत लाभकारी है। कैंसर के इलाज में योग को शामिल करने से रोग मुक्त उत्तरजीविता (डीएफएस) में 15 प्रतिशत और समग्र उत्तरजीविता (ओएस) में 14 प्रतिशत सुधार देखा गया है।

https://static.pib.gov.in/WriteReadData/userfiles/image/yoga-1Z6VN.jpg

योग परामर्शदाताओं, चिकित्सकों के साथ-साथ फिजियोथेरेपिस्ट से प्राप्‍त जानकारी के साथ-साथ योग उपायों को स्तन कैंसर के रोगियों और इस रोग से मुक्‍त हुए लोगों की जरूरतों के अनुसार, उनके उपचार और रोगमुक्ति के विभिन्न चरणों को ध्यान में रखते हुए तैयार किया गया था। योग प्रोटोकॉल में विश्राम और प्राणायाम की नियमित अवधि के साथ आसान और स्‍वास्‍थ्‍यकर आसनो को शामिल किया गया। इन आसनों को योग्य और अनुभवी योग प्रशिक्षकों द्वारा कक्षाओं के माध्यम से लागू किया गया। इसके अलावा, अनुपालन बनाए रखने के लिए प्रोटोकॉल के हैंडआउट्स और सीडी भी उपलब्‍ध कराये गए।

स्तन कैंसर में योग का उपयोग सबसे बड़ी नैदानिक परीक्षण वाली महत्वपूर्ण उपलब्धि है क्योंकि यह भारतीय परंपरागत उपचार का ऐसा पहला उदाहरण है जिसका मजबूत नमूनों के आकार के साथ रैन्डमाइज़्ड अध्ययन के मजबूत पश्चिमी ढांचे में परीक्षण किया जा रहा है। स्तन कैंसर न केवल भारत में बल्कि वैश्विक स्‍तर पर महिलाओं को प्रभावित करने वाला आमतौर पर होने वाला कैंसर है। इससे महिलाओं में अधिक चिंता व्‍याप्‍त रहती है। इस कारण महिलाओं को पहले कैंसर के डर से जीवन समाप्‍त होने का खतरा और दूसरे इस खतरे के साथ-साथ इस रोग के उपचार के दुष्प्रभाव और उससे निपटने की चिंता के कारण दोहरी मार झेलनी पड़ती है। यह देखकर अत्‍यंत प्रसन्नता हो रही है कि परिश्रम और मजबूती के साथ योग की प्रक्टिस ने जीवन की उत्कृष्ट गुणवत्ता को बनाए रखने में अपनी श्रेष्ठता सिद्ध कर दी है और योग ने इस रोग की पुनरावृत्ति और इससे होने वाली मृत्यु के जोखिम को संख्यात्मक रूप से 15 प्रतिशत तक कम कर दिया है।

डॉ. नीता नायर ने अमरीका में वार्षिक रूप से आयोजित किए जाने वाले विश्‍व के सबसे प्रतिष्ठित स्तन कैंसर सम्मेलनों में से एक, सैन एंटोनियो स्तन कैंसर संगोष्ठी (एसएबीसीएस) में एक स्पॉटलाइट प्रस्तुति के रूप में प्रस्‍तुत स्पॉटलाइट शोध-पत्र प्रस्‍तुत किया। जिसमें स्‍तर कैंसर पर योग के ऐतिहासिक प्रशिक्षण प्रभाव प्रस्‍तुत किए गए हैं। इस सम्मेलन में प्रस्तुत किए गए हजारों शोध-पत्रों में से कुछ को स्पॉटलाइट विचार-मिमर्श के लिए चुना गया है और उपायों की नवीनता तथा स्तन कैंसर के परिणामों को प्रभावित करने वाले पहले भारतीय उपाय के कारण हमारा अध्ययन सर्वथा इसके योग्य है।

Read More »

टूटे जब मन के धागे घायल तब संबंध हुए

टूटे जब मन के धागे घायल तब संबंध हुए, जब लगे मन में पिड़ा आंखो से जल नीर बहे। अधरों की खामोशी जब चीखे दूर खड़ी मरियादा सीचे अवशाद हुए। घायल आशु की भाषा से बिसरी यादो का श्रृंगार हुए। स्वर देकर झनकृत कराती बिरहा प्रेम के छंद हुए। जो अंकित हैं हृदय के बिंदु पर धूमिल सारे अनुबंध हुए। टूटे जब धागे घायल तब संबंध हुए। मैंने जीवन को बंध लिया पीड़ा के अंतस लहेरो में तुम सरस रागनी बह निकले हम तो टूटे तटबंध हुए। टूटे जब मन के धागे.. वंदना बाजपेई

Read More »

लिव इन कितना सही?

ऐसा कहने सुनने में आता है कि अब जो अपराध होते हैं वह सोशल मीडिया की वजह से जल्दी सामने आ जाते हैं। अपराध पहले भी होते थे लेकिन खबरों में नहीं आ पाते थे और जब तक समाचार पत्रों के जरिए सामने आते थे तब तक मामला पुराना हो जाता था। वैसे यह सही भी है सोशल मीडिया की वजह से अपराध जल्दी ही लोगों के सामने आ जाता है लेकिन यदि महिला अपराध के आंकड़ों पर गौर किया जाए तो इन आंकड़ों में बढ़ोतरी ही हुई है और लगातार बढ़ते जा रहे हैं और महिला अपराध समाज में दहशत फैलाने का कार्य कर रहे हैं। हमारे समाज में घरेलू हिंसा, दुष्कर्म, लव जिहाद और एसिड अटैक जैसे मामले बहुत तेजी से उभर रहे हैं। आखिर क्या कारण है कि इस तरह के अपराध बढ़ रहे हैं? यदि ध्यान दिया जाये तो सबसे बड़ी वजह तो सोशल मीडिया ही है जहां अश्लीलता को बुरी तरह से परोसा जा रहा है और जिसे बड़ों से लेकर बच्चे तक उस अश्लीलता को देखते और पोसते आ रहे हैं। महिलाएं, लड़कियां अजीबोगरीब कपड़े पहनकर, बेहूदा अंग संचालन करके वीडियो पोस्ट कर रही हैं। छोटे-छोटे बच्चे भी जिन्हें ठीक से बात करनी भी नहीं आती जिनकी उम्र खेलने और पढ़ने की है वह भी कमर मटका कर ऊलजलूल हरकतें करते दिख जाएंगे और उनकी ऐसी हरकतों पर माता-पिता बड़े गौरवान्वित होते हैं। उनके लिए उनका बच्चा स्टार से कम नहीं होता। इन्हीं रील्स वीडियो पर ही लोगों के भद्दे कमेंट भी पढ़ने को मिल जाते हैं। मतलब यह कि महिला और पुरुष दोनों का ही ओछापन दिखाई देता है। आज सबसे बड़ी समस्या सोशल मीडिया पर बनने वाली रील्स, वीडियो है जिस पर सख्त नियम लागू होने चाहिए। सभ्य घर की महिलाएं भी इससे अछूती नहीं रह गई हैं और कुछ स्त्रियों ने तो बेहूदेपन की हदें पार कर दी है।
लिव इन  का बढ़ता हुआ ट्रेंड  हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि हम हमारी सभ्यता, संस्कृति को कहां ले जा रहे हैं। हमारे देश में विवाह जैसी संस्था समाज की व्यवस्था को बनाए रखने के लिए ही है। यह लिव इन रिलेशनशिप को मान्यता देना सही नहीं है। इसके दुष्परिणाम लव जिहाद के रूप में सामने आता है। जहां धर्म परिवर्तन ना करने के कारण, जबरदस्ती रिश्ते बनाए रखने के कारण या आपस में सामंजस्य ना रहने के कारण अपराधिक कृत्य सामने आते हैं। जिसमें बाद में पछताने के सिवा कुछ नहीं हासिल नहीं होता। हम भौतिक रूप से बहुत खुले विचार वाले हो गए हैं लेकिन हमारी सोच अभी भी वही रूढ़िवादी है। हम अभी भी इस तरह की परंपराओं को मन से स्वीकार नहीं कर पाये हैं। पाश्चात्य सभ्यता वैसे भी हमें परिवार से अलग-थलग रहना सिखाती है जोड़कर नहीं। इस सब पर रोकथाम जरूरी है। समाज को सही दिशा देने के लिए आजादी के नाम पर ऐसी उच्श्रृंखलता लिव इन जैसी प्रथा को खत्म किया जाना चाहिए। पाश्चात्य सभ्यता में संबंधों का टूटना-बिखरना एक आम बात है, वहीं अब भारत में भी रिश्तों का औचित्य खोने लगा है और व्यक्तिगत हितों के सामने आपसी रिश्तों का कद दिनोंदिन बौना होता जा रहा है और महानगरों में यह प्रथा (लिव इन) ज्यादा प्रचलित हो रही है। लिव इन की प्रथा उन लोगों के लिए सही है जिनके रिश्ते में दरार पैदा हो गई हो या विवाह विच्छेद में दिक्कतें आ रही हो क्योंकि हमारी कानून व्यवस्था बहुत लचर है जिसके कारण न्याय मिलने में काफी समय लग जाता है। लिव इन की प्रथा भारतीय समाज में नयी नहीं है। वैदिक काल में हमारे यहाँ मान्य विवाह की आठ पद्धतियों में से एक ‘गंधर्व विवाह पद्धति’ प्रचलित थी। जिसे समाज मन से स्वीकार नहीं करता,, क्योंकि यह रिश्ता सामाजिक मर्यादाओं और दायित्वों को अमान्य करता है।
लिव इन रिलेशनशिप के लिए सरकार ने कुछ नियम बनायें हैं जिनका उल्लंघन खुलेआम होता है।
महिला अपराधों में घरेलू हिंसा को भी अनदेखा नहीं किया जा सकता है। ऐसे कई मामले सामने आए हैं जहां स्त्री परिवार, समाज, दबाव और शर्म के कारण आवाज नहीं उठा पाती है। परिवार का सहयोग ना मिलना, बच्चों का भविष्य ध्यान में रखकर उसके पास चुप रहने के अलावा कोई पर्याय नहीं होता है। देखा गया है कि ऐसी स्त्रियां मानसिक स्तर पर और निर्णय लेने की क्षमता में खुद को अक्षम पातीं हैं। उनका व्यक्तित्व दबा दिया जाता है।
आजकल बच्चों के हाथों में मोबाइल होना आम बात है और वह भी सोशल मीडिया से अछूते नहीं है। इन सब का असर उनके मानसिक स्वास्थ्य और मानसिक स्तर पर क्या असर होगा यह सोचने का विषय है? हिंसा से भरपूर सीरियल, मूवीज़ देखकर ही लोग अपराधिक प्रवृत्ति की ओर प्रवृत्त हो रहे हैं। इस सब पर रोकथाम जरूरी है। सबसे बड़ी समस्या तो यही है कि आपराधिक प्रवृत्ति वाले लोगों के मन से कानून का डर खत्म हो गया है। आज जरूरत है स्मार्ट पुलिस व्यवस्था की और पुलिस को भी अपना रवैया बदलना होगा उसे सकारात्मक रवैया अपनाना होगा ताकि पीड़ित व्यक्ति शिकायत दर्ज करा सके और न्याय के लिए आवाज उठा सके।
लिव इन जैसे रिश्तो में भरोसा कम रहता है और अलगाव की स्थिति ज्यादा रहती है जिसमें पुरुष से ज्यादा महिलाओं को दिक्कतों का सामना ज्यादा करना पड़ता है साथ ही उत्पीड़न और सामाजिक उपेक्षा भी ज्यादा सहनी पड़ती है अगरचे इनसे कोई संतान रही तो उसकी मानसिक स्वास्थ्य और उसके भविष्य पर भी बुरा असर पड़ता है। लिव इन रिलेशनशिप दायित्वों से मुंह छिपाना ही है जिसमें कोई बंधन नहीं होता है। आज बहुत जरुरी हो गया है कि सरकार इस पर सख्त कानून बनाये। लिव इन प्रगतिवाद की अनिवार्य बुराई है। सामाजिक व्यवस्था की जड़ता और कट्टरता को दूर कर लिव इन रिलेशनशिप को संस्कारपरक परिवार बनाने की दिशा में प्रयास होने चाहिए। ~ प्रियंका वर्मा महेश्वरी 

Read More »