भारतीय स्वरूप संवाददाता कानपुर के श्यामनगर क्षेत्र स्थित होटल गोविन्दम इलाइट में सुर सारथी परिवार ने नए पुराने गीतों की सुमधुर महफिल सजाई, ऐसे संगीतमय वातावरण में बरबस लोग झूमने को मजबूर हो गए, अवसर था सुर सारथी संगीत परिवार की ओर से आयोजित म्यूजिकल मीट 2026 का,
सभी कलाकारों (जिनमें से अधिकांश का शौक है गायन) की एक से बढ़कर एक धमाकेदार संगीतमय प्रस्तुतियों के साथ साथ वहां का शालीन ,पारिवारिक और अनुशासित वातावरण देख के लगा कि यही सुर सारथी परिवार की खासियत है और यही उसे अन्य सांस्कृतिक आयोजनों से अलग छवि प्रदान करती है। कार्यक्रम का शुभारंभ सभी के द्वारा माता सरस्वती जी की प्रतिमा के सम्मुख दीप प्रज्वलन और उनका आशीष ग्रहण करके हुआ। उसके उपरांत कानपुर और लखनऊ से आए गायक/गायिकाओं की एक से बढ़ कर एक प्रस्तुतियों से सुबह १० बजे प्रारंभ हुआ कार्यक्रम की समाप्ति शाम 6.15 तक का था समय कैसे निकल गया किसी को पता ही नहीं चला। आयोजकों सर्व श्री आशीष अवस्थी, राजेंद्र श्रीवास्तव और अतुल दीक्षित ने बताया कि इस सांस्कृतिक कार्यक्रम का उद्देश्य संगीत प्रेमी लोगों को तनाव से दूर अपने गायकी के शौक पूरा करना के लिए एक मंच प्रदान करना है। पूरे दिन तक चले इस कार्यक्रम में सर्व श्री राजेंद्र श्रीवास्तव, सुषमा श्रीवास्तव, आशीष अवस्थी, अंजना अवस्थी, संध्या श्रीवास्तव, अतुल दीक्षित, भारती दीक्षित, आरती त्रिपाठी, रेनू अवस्थी, रेनू अग्रवाल, मोनिका दिवाकर, नीलम दीक्षित, आलोक वर्मा, गोविन्द सिंह, वैभव, अलका सिंह, बॉबी खान, जितेंद्र कुमार, दिवाकर शुक्ल, जितेंद्र श्रीवास्तव, प्रीति श्रीवास्तव, स्मिता श्रीवास्तव, अनिल श्रीवास्तव, संध्या मिश्रा, डी के निगम, सौरभ सिंह, विजय प्रजापति आदि की एक से बढ़कर एक धमाकेदार प्रस्तुतियों ने श्रोताओं को अंत तक बांधे रखा।
विविधा
भारतीय सुरक्षा बलों ने जम्मू और कश्मीर में खुफिया जानकारी आधारित ऑपरेशन में लश्कर-ए-तैयबा के सीनियर कमांडर मूसा (उर्फ आसिफ फौजी) को मार गिराया
भारतीय सुरक्षा बलों द्वारा मूसा को मार गिराया जाना जम्मू और कश्मीर केंद्रशासित प्रदेश में लश्कर के नेटवर्क के लिए एक बहुत बड़ा झटका है। मूसा के मारे जाने के साथ ही, 2022 से केंद्रशासित प्रदेश में सक्रिय LeT के चार सीनियर कमांडरों का पूरा समूह खत्म हो गया है। ये कमांडर कई सनसनीखेज हमलों के लिए जिम्मेदार थे, जैसे हालन हमला (अगस्त 2023), DKG हमला (दिसंबर 2023), कंडी हमला (मई 2023), शाहसीतार हमला (मई 2024), शिव खोरी हमला (जून 2024), गगनगीर हमला (अक्टूबर 2024), बूटापथरी हमला (अक्टूबर 2024) और बैसरण हमला (अप्रैल 2025)। इस ग्रुप के बाकी तीन आतंकियों को सुरक्षाबलों ने अलग-अलग मुठभेड़ों में मार गिराया था: जुनैद भट (3 दिसंबर 2024, दाचीगाम), सुलेमान (28 जुलाई 2025, ऑपरेशन महादेव) और यासिर (4 सितंबर 2026, ऑपरेशन असधर)। मूसा को खत्म करने के लिए हुआ यह एनकाउंटर एक लंबे ऑपरेशन का हिस्सा था।
पिछले कुछ सालों में सभी सुरक्षा एजेंसियां जैसे कि जम्मू कश्मीर पुलिस, भारतीय सेना और CAPF एक तालमेल बनाकर आतंकरोधी अभियान चला रहे है जिसका यह सकारात्मक परिणाम है।
केन्द्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह ने कहा – ड्रग्स के खिलाफ लड़ाई में बड़ी सफलता प्राप्त करते हुए गुजरात ATS, भारतीय तटरक्षक बल और केन्द्रीय खुफिया एजेंसियों के संयुक्त अभियान में भारत के EEZ में एक ईरानी नाव से 526 किलोग्राम मेथम्फेटामाइन और हेरोइन ज़ब्त की और 5 पाकिस्तानी नागरिक गिरफ़्तार किया
केन्द्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री श्री अमित शाह ने आज कहा कि ड्रग्स के खिलाफ लड़ाई में बड़ी सफलता प्राप्त करते हुए गुजरात आतंकवाद निरोधक दस्ते (ATS), भारतीय तटरक्षक बल और केन्द्रीय खुफिया एजेंसियों के एक संयुक्त अभियान में भारत के EEZ (Exclusive Economic Zone) में एक ईरानी नाव से 526 किलोग्राम मेथम्फेटामाइन और हेरोइन ज़ब्त की गई है और 5 पाकिस्तानी नागरिकों को गिरफ़्तार किया गया है।
केन्द्रीय गृह मंत्री श्री अमित शाह ने X पर एक पोस्ट में कहा, “मोदी सरकार युवाओं को ड्रग्स की बुराई से बचाने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है। गुजरात ATS, भारतीय तटरक्षक बल और केन्द्रीय खुफिया एजेंसियों के एक संयुक्त अभियान में भारत के EEZ (एक्सक्लूसिव इकोनॉमिक ज़ोन) में एक ईरानी नाव से 526 किलोग्राम मेथम्फेटामाइन और हेरोइन ज़ब्त की गई है। यह नाव लक्षद्वीप से 160 नॉटिकल मील उत्तर-पश्चिम और मुंबई से 490 नॉटिकल मील दक्षिण-पश्चिम में थी। इस मामले में पांच पाकिस्तानी नागरिकों को गिरफ़्तार किया गया है और आगे की जांच जारी है ताकि इसके बड़े नेटवर्क और इसे प्राप्त करने जा रहे लोगों (intended receivers) का पता चल सके। एजेंसियों के बीच बेहतरीन तालमेल और सहयोग का उदाहरण पेश करते हुए 16 दिनों तक चले इस ऑपरेशन में एक ईरानी नाव को भी ज़ब्त किया गया।”
14 से 30 सितंबर तक चला यह अभियान भारत की समुद्री सीमाओं की सुरक्षा में खुफिया जानकारी पर आधारित और विभिन्न एजेंसियों के बीच आपसी तालमेल की मज़बूती को दर्शाता है। मोदी सरकार द्वारा जारी किया गया ड्रग कंट्रोल का विजन डॉक्यूमेंट (2026–2029) कानून लागू करने की व्यवस्था को मज़बूत करने, ड्रग नेटवर्क को तोड़ने और हमारे युवाओं व समाज को नशीले पदार्थों से बचाने के लिए एक व्यापक रूपरेखा प्रदान करता है।
एक सुरक्षित, स्वस्थ और नशा-मुक्त भारत हमारा साझा राष्ट्रीय संकल्प है।
विधि और न्याय मंत्रालय के विधायी विभाग ने कबाड़ से जुगाड़ – यानी बेकार चीजों से बेहतरीन चीजें बनाने – पर एक कार्यशाला आयोजित की
यह कार्यशाला इंडिया एड्स (एनजीओ) और एन. के. बागड़ोदिया पब्लिक स्कूल, द्वारका, सेक्टर-4 के विशेषज्ञों के साथ आयोजित की गई थी। विशेषज्ञों में श्रीमती अर्चना श्रीवास्तव (जनरल सेक्रेटरी, इंडिया एड्स एनजीओ), सुश्री अंजलि खरबंदा (प्राचार्या, एन.के. बागड़ोदिया पब्लिक स्कूल), सुश्री बैसाखी भट्टाचार्जी (टीजीटी-साइंस और स्कूल सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी कोऑर्डिनेटर), सुश्री श्वेता तुलस्यान (पीजीटी-भूगोल और हेल्थ एंड वेलनेस कोऑर्डिनेटर, एनकेबीपीएस), सुश्री विदुषी सिन्हा (पूर्व छात्रा-एनकेबीपीएस और वॉलंटियर, इंडिया एड्स एनजीओ) और आर्यन गुप्ता (पूर्व छात्र-एनकेबीपीएस और वॉलंटियर, इंडिया एड्स एनजीओ) शामिल थे।
इस कार्यशाला की अध्यक्षता विभाग के संयुक्त सचिव और विधायी परामर्शदाता (जेएसएंडएलसी) श्री जी. पानमेई ने की, जिसमें विभाग के अन्य वरिष्ठ अधिकारी और कर्मचारी भी शामिल हुए। कार्यशाला में विभाग और उससे जुड़े कार्यालयों-जैसे राजभाषा विंग और विधि साहित्य प्रकाशन-के अधिकारियों और कर्मचारियों ने पूरे उत्साह के साथ हिस्सा लिया।
कार्यशाला के दौरान, विशेषज्ञों ने बेकार और फेंकी गई चीजों को काम की और नई तरह की चीजों में बदलने के कई रचनात्मक और व्यावहारिक तरीके बताए और करके दिखाए। उन्होंने ऐसी चीजों को नया उद्देश्य देने के लिए आसान और असरदार आइडिया शेयर किए जिन्हें आम तौर पर कचरा समझा जाता है। प्रैक्टिकल डेमो के हिस्से के तौर पर, विशेषज्ञों और वॉलंटियर्स ने “कबाड़ से जुगाड़” थीम के तहत बेकार चीजों से नमूने के तौर पर कुछ वस्तुएं बनाईं। इससे यह दिखाया गया कि कैसे रचनात्मकता, नवाचार और समझदारी से बेकार चीजों को काम की और आकर्षक चीजों में बदला जा सकता है। इस डेमो में मौजूद चीजों को दोबारा इस्तेमाल करने और पर्यावरण के लिए जिम्मेदार तरीके अपनाने की अहमियत पर भी जोर दिया गया।
इस कार्यशाला का समापन जिम्मेदार तरीके से कचरा प्रबंधन, रीसाइक्लिंग और टिकाऊ जीवनशैली को बढ़ावा देने के संदेश के साथ हुआ। इस पहल ने इस बात पर जोर दिया कि रचनात्मकता और सामूहिक प्रयासों से कचरे को उपयोगी और सार्थक उत्पादों में बदला जा सकता है, जिससे एक साफ-सुथरे, हरे-भरे और टिकाऊ पर्यावरण में योगदान मिलता है।
श्री पानमेई (जेएसएंडएलसी) ने रोजमर्रा की जिंदगी में नए और टिकाऊ तरीकों को अपनाने के महत्व पर जोर दिया और प्रतिभागियों को कचरे का बेहतर इस्तेमाल करने के रचनात्मक तरीके खोजने के लिए प्रोत्साहित किया। उन्होंने प्रतिभागियों के उत्साह और भागीदारी की सराहना की और बताया कि दोबारा इस्तेमाल (रीयूज़), रीसाइक्लिंग और ज़िम्मेदार कचरा प्रबंधन की दिशा में छोटे-छोटे और लगातार किए गए प्रयास एक साफ-सुथरे और हरे-भरे पर्यावरण के लिए सार्थक योगदान दे सकते हैं।



पूर्णरूप से पुन: उपयोग योग्य अग्निबान प्रक्षेपण यान के विकास के लिए 200 करोड़ रुपये के अनुसंधान, विकास और नवाचार (आरडीआई) समर्थन हेतु टीडीबी-डीएसटी ने अग्निकुल कॉसमॉस के साथ समझौता किया

इस परियोजना का मुख्य उद्देश्य पुन: उपयोग योग्य प्रक्षेपण यान – अग्निबान आरएलवी – का विकास करना है, ताकि इस तकनीक को टीआरएल-4 के स्तर से टीआरएल-8 तक ले जाया जा सके। वित्तीय सहायता वैकल्पिक परिवर्तनीय डिबेंचर (ओसीडी) के माध्यम से प्रदान की जाएगी। यह परियोजना प्रक्षेपण यान के केवल पहले चरण को पुनर्प्राप्त करने के पारंपरिक दृष्टिकोण से आगे बढ़कर पूर्ण प्रणाली के पुन: उपयोग की दिशा में काम करना चाहती है। प्रस्तावित संरचना को उच्च आवृत्ति और दोहराव योग्य प्रक्षेपणों को सक्षम बनाने के साथ-साथ प्रक्षेपण और विनिर्माण लागत को कम करने और अंतरिक्ष मलबे के उत्पादन को सीमित करने के लिए डिज़ाइन किया गया है।
इस कार्यक्रम का मूल उद्देश्य एक पुन: उपयोग योग्य प्रक्षेपण संरचना है, जिसमें एक हल्का ऊपरी चरण, सटीक कक्षीय प्रवेश क्षमता और गहन थ्रॉटलिंग और पुनः आरंभ करने की क्षमता के लिए डिज़ाइन किया गया एक अर्ध-क्रायोजेनिक तरल प्रणोदन प्रणाली शामिल है। इस दृष्टिकोण का उद्देश्य प्रक्षेपण प्रणाली के बार-बार उपयोग की संभावना को बढ़ाते हुए मिशन संचालन में अधिक लचीलापन प्रदान करना है।
अग्निकुल ने अपने विकास और परीक्षण कार्यक्रमों के माध्यम से इस तकनीक के कई पहलुओं का प्रदर्शन पहले ही कर लिया है। कंपनी के पूर्व कार्यों में स्वदेशी कक्षीय श्रेणी के प्रक्षेपण यान अग्निबान का विकास और कंपनी द्वारा विकसित और निर्मित एकल-भाग 3डी-प्रिंटेड रॉकेट इंजन अग्निलेट इंजन शामिल हैं। प्रौद्योगिकी विकास बोर्ड ने इससे पहले छोटे उपग्रह मिशनों के लिए मॉड्यूलर कॉन्फ़िगर करने योग्य प्रक्षेपण यान के विकास और व्यावसायीकरण में अग्निकुल का समर्थन किया था।
अनुसंधान, विकास और नवाचार द्वारा समर्थित यह नया कार्यक्रम इस तकनीकी यात्रा को – प्रक्षेपण यान विकसित करने से लेकर पुन: उपयोग योग्य, दोहराव और परिचालन दक्षता को ध्यान में रखते हुए एक प्रणाली विकसित करने तक एक कदम और आगे ले जाता है। प्रस्तावित अग्निबान आरएलवी में पुन: उपयोग योग्य ऊपरी चरण संरचना और अवरोहण प्रणोदन प्रणाली शामिल है और परियोजना में नियंत्रित अवरोहण और पुनर्प्राप्ति में सहायक तकनीकों की परिकल्पना की गई है। कंपनी के विकास कार्यक्रम में पुनः आरंभ करने और डीप थ्रॉटलिंग में सक्षम प्रणोदन प्रणालियां भी शामिल हैं, जो अवरोहण और लैंडिंग संचालन के लिए महत्वपूर्ण क्षमताएं हैं।
इस परियोजना से पुन: उपयोग योग्य प्रक्षेपण प्रणाली के लिए आवश्यक तकनीकों के विकास और सत्यापन में सहायता मिलने की उम्मीद है, जिसमें प्रणोदन, आरोहण प्रणाली, कक्षीय प्रवेश, अवरोहण और पुनर्प्राप्ति शामिल हैं। यह कार्यक्रम अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी के अंतर्गत उन्नत और पुन: प्रयोज्य प्रक्षेपण वाहनों और प्रणोदन नवाचार के क्षेत्र में आरडीआई फंड द्वारा पहचाने गए प्राथमिकता वाले क्षेत्र के अनुरूप है।
प्रौद्योगिकी विकास बोर्ड के सचिव श्री राजेश कुमार पाठक ने कहा कि भारत की अंतरिक्ष यात्रा के अगले चरण में ऐसी तकनीकों की आवश्यकता होगी जो न केवल कक्षा तक पहुंच सकें, बल्कि अधिक आवृत्ति, लचीलेपन और दक्षता के साथ ऐसा कर सकें। इस संदर्भ में पुन: प्रयोज्यता एक महत्वपूर्ण तकनीकी क्षेत्र है। अनुसंधान, विकास और नवाचार फंड के माध्यम से, प्रौद्योगिकी विकास बोर्ड महत्वाकांक्षी स्वदेशी प्रौद्योगिकियों के विकास में सहयोग कर रहा है, जिन्हें उन्नत प्रौद्योगिकी चरणों से तैनाती की ओर बढ़ने के लिए निरंतर निवेश की आवश्यकता है। अग्निबान आरएलवी कार्यक्रम पुन: उपयोग योग्य प्रक्षेपण संरचना के विकास और उन्नत अंतरिक्ष परिवहन प्रणालियों में भारत की क्षमताओं को मजबूत करने पर ध्यान केंद्रित करके इसी दृष्टिकोण को दर्शाता है।
अग्निकुल कॉसमॉस प्राइवेट लिमिटेड के प्रमोटरों ने कहा कि पुन: प्रयोज्यता के लिए प्रणोदन, वाहन डिजाइन, मार्गदर्शन, पुनर्प्राप्ति और मिशन संचालन को एक अत्यंत विश्वसनीय प्रणाली में एकीकृत करना आवश्यक है। प्रौद्योगिकी विकास बोर्ड द्वारा इसके लिए दिया जा रहा सहयोग हमारे लिए अद्वितीय और विशेष है क्योंकि यह दर्शाता है कि सरकार भारत में मौलिक तकनीक विकास को बढ़ावा देने के लिए तत्पर है। इस तरह के सहयोग से हम अग्निबान को विश्वस्तरीय परिचालन वाहन के रूप में विकसित करने और अंतरिक्ष तक बार-बार पहुंच के लिए एक स्वदेशी मंच बनाने में सक्षम होंगे।
राष्ट्रीय संकल्प समारोह में देशभर के 1,000 से अधिक स्थानों पर 4 लाख से अधिक युवाओं ने भाग लिया
विकसित भारत के लिए नशा मुक्त युवा – 100 सप्ताह नशा मुक्त युवा अभियान के तहत राष्ट्रीय संकल्प समारोह का आयोजन देशभर में 1,000 से अधिक स्थानों पर किया गया, जिसमें 4 लाख से अधिक युवाओं और नागरिकों ने भाग लिया। इस देशव्यापी जनभागीदारी में युवाओं, साझेदार संगठनों और समुदायों ने नशा मुक्त भारत के निर्माण के प्रति सामूहिक प्रतिबद्धता व्यक्त की।

कार्यक्रम का आयोजन 460 माई भारत जिलों, माई भारत के साझेदार संगठनों के 240 स्थानों तथा आध्यात्मिक संगठनों, उद्योग संघों और विश्वविद्यालय संघों द्वारा 300 से अधिक स्थानों पर किया गया, जिससे युवाओं और नागरिकों को नशा मुक्त युवा आंदोलन में भाग लेने के लिए एक व्यापक मंच मिला।
राष्ट्रीय संकल्प समारोह सामूहिक संकल्प और युवाओं के नेतृत्व में भागीदारी की भावना पर केंद्रित था, जिसमें प्रतिभागियों ने नशा मुक्त शपथ और हस्ताक्षर अभियान के लिए एकजुट होकर भाग लिया। कार्यक्रम में युवाओं के नेतृत्व में चर्चाओं, जागरूकता गतिविधियों और अन्य स्थानीय पहलों सहित रचनात्मक एवं सहभागिता गतिविधियों को भी प्रोत्साहित किया गया, जिससे नशा मुक्त जीवनशैली का संदेश समुदायों तक और अधिक प्रभावी ढंग से पहुंचाया जा सके।

इस देशव्यापी जनभागीदारी से विकसित भारत के लिए नशा मुक्त युवा अभियान में युवाओं और साझेदार संगठनों की बढ़ती भागीदारी परिलक्षित होती है, जिसका उद्देश्य जागरूकता, रोकथाम, स्वस्थ विकल्पों और युवाओं की सकारात्मक भागीदारी को बढ़ावा देना है। संस्थानों, संगठनों और समुदायों को एक साथ लाकर, संकल्प समारोह ने युवाओं के बीच सूचित विकल्पों और स्वस्थ जीवनशैली के महत्व को और सुदृढ़ करने के लिए एक साझा मंच प्रदान किया।
यह कार्यक्रम 100 सप्ताह नशा मुक्त युवा अभियान का हिस्सा है, जिसे रोकथाम, जागरूकता, स्वास्थ्य, फिटनेस और जीवन कौशल पर केंद्रित एक सतत् युवा आंदोलन के रूप में परिकल्पित किया गया है। गतिविधियों का प्रारंभिक चक्र तीन विषयों—मेरा स्वास्थ्य, मेरा गौरव; फिट युवा, नशा मुक्त युवा; और जीवन कौशल माह—पर आधारित है, जिसके माध्यम से समुदाय-आधारित और युवा-केंद्रित गतिविधियों के जरिए युवाओं की भागीदारी को निरंतर प्रोत्साहित किया जाएगा।

20 सितंबर को हुई देशव्यापी भागीदारी 18 सितंबर को की गई जनभागीदारी के बाद हुई, जब अभियान के तहत विभिन्न संस्थानों और समुदायों में गतिविधियों का आयोजन किया गया। इस दो दिवसीय जनभागीदारी के माध्यम से शपथ, हस्ताक्षर, संवाद और सामुदायिक भागीदारी के जरिए युवाओं और नागरिकों को एक साथ लाया गया, जिससे सतत् अभियान की मजबूत शुरुआत हुई।
राष्ट्रीय संकल्प समारोह इस बात को रेखांकित करता है कि नशा मुक्त भारत का निर्माण एक सामूहिक प्रयास है, जिसके लिए युवाओं, संस्थानों और समुदायों की निरंतर जागरूकता, सकारात्मक विकल्पों और सक्रिय भागीदारी की आवश्यकता है।
युवा मामले और खेल मंत्रालय विकसित भारत के लिए नशा मुक्त युवा – 100 सप्ताह नशा मुक्त युवा अभियान के तहत युवाओं के नेतृत्व में सहभागिता को निरंतर सुगम बनाता रहेगा और युवाओं को निरंतर भागीदारी एवं सकारात्मक कार्रवाई के माध्यम से इस संदेश को आगे बढ़ाने के लिए प्रोत्साहित करेगा।
एनपीसीआई इंटरनेशनल और उज्बेकिस्तान के एनआईपीसी ने ‘यूजेडक्यूआर’ के माध्यम से पूरे उज्बेकिस्तान में यूपीआई भुगतान सक्षम करने के लिए साझेदारी की
यह घोषणा भारत के प्रधानमंत्री की उज्बेकिस्तान की द्विपक्षीय यात्रा के दौरान की गई। यह समझौता भारतीय रिज़र्व बैंक (आरबीआई) और उज्बेकिस्तान के केंद्रीय बैंक (सीबीयू) सहित संबंधित वित्तीय नियामकों से औपचारिक अनुमोदन प्राप्त होने के बाद किया गया है। इन नियामकों ने एचयूएमओ को सीमा-पार मर्चेंट भुगतान स्वीकार करने के लिए एनआईपीएल PL के अधिकृत साझेदार के रूप में नामित किया है।
समझौते की प्रमुख बातें
- व्यापारियों द्वारा सार्वभौमिक भुगतान स्वीकृति:
सीबीयू द्वारा अनिवार्य एकीकृत राष्ट्रीय क्यूआर अवसंरचना (यूजेडक्यूआर) के साथ एकीकरण से यूपीआई उपयोगकर्ताओं को उज्बेकिस्तान में खुदरा, आतिथ्य और सेवा क्षेत्र के व्यापारियों के यहां लगभग सर्वभौगिक भुगतान स्वीकृति की सुविधा मिलेगी।
- सुगम यात्रा अनुभव :
भारतीय पर्यटक, कारोबारी यात्री और विद्यार्थी अपने भारतीय बैंक खातों से सीधे व्यक्ति से व्यापारी (पी2एम) भुगतान कर सकेंगे। इससे विदेशी मुद्रा पर लगने वाले अतिरिक्त शुल्क की समस्या कम होगी तथा अंतरराष्ट्रीय कार्ड या नकदी पर निर्भरता भी घटेगी।
- द्विपक्षीय संबंधों को मजबूती:
यह पहल डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना (डीपीआईI) के क्षेत्र में दोनों देशों के सहयोग को आगे बढ़ाती है और दोनों देशों के व्यापक रणनीतिक एवं आर्थिक उद्देश्यों के अनुरूप है।
यूपीआई दस देशों में स्वीकार किया जाता है :
यूपीआई को वर्तमान में सिंगापुर, संयुक्त अरब अमीरात फ्रांस, मॉरीशस, नेपाल, भूटान, कतर, श्रीलंका, कंबोडिया और ग्रीस में स्वीकार किया जाता है।
इससे भारतीय यात्रियों को विदेशों में यूपीआई के माध्यम से निर्बाध भुगतान करने की सुविधा मिलती है।
ऊष्मा को विद्युत में परिवर्तित करने की सदी पुरानी सीमा को पार कर लिया गया है, जिससे अति संवेदनशील तापमान संवेदन संभव हो गया है।
उत्पन्न होने वाला थर्मोइलेक्ट्रिक वोल्टेज इतना अधिक होता है कि यह उन मानों के बराबर होता है जो आमतौर पर केवल तरल इलेक्ट्रोलाइट्स और आयनिक जैल में देखे जाते हैं, ठोस पदार्थों में नहीं, विशेष रूप से एकल-क्रिस्टलीय पदार्थों में।
इस खोज ने ठोस पदार्थों में इस प्रभाव की सीमा के बारे में दशकों पुरानी धारणा को बदल दिया है और अति संवेदनशील तापमान सेंसर, हीट डिटेक्टर और क्वांटम सेंसिंग उपकरणों की एक नई पीढ़ी के लिए मार्ग प्रशस्त किया है।
जब दो अलग अलग पदार्थों के बीच के जोड़ के एक सिरे को गर्म किया जाता है जबकि दूसरे सिरे को ठंडा रखा जाता है, तो गतिशील आवेश वाहक गर्म सिरे से ठंडे सिरे की ओर प्रवाहित होते हैं जिससे जोड़ के आर-पार वोल्टेज उत्पन्न होता है। इस घटना को सीबेक प्रभाव के नाम से जाना जाता है जिसकी खोज दो शताब्दी पहले हुई थी और यह तापमान सेंसर से लेकर अपशिष्ट ऊष्मा को बिजली में परिवर्तित करने वाले थर्मोइलेक्ट्रिक जनरेटर तक की तकनीकों का आधार है।
दशकों से, सीबेक गुणांक के रूप में मापी जाने वाली इस वोल्टेज की मात्रा, क्रिस्टलीय ठोस में इस प्रभाव की ऊपरी सीमा को केवल कुछ मिलीवोल्ट प्रति केल्विन तक ही सीमित रखती है। अधिकांश धातुएँ प्रति केल्विन केवल कुछ दहाई माइक्रोवोल्ट (µV/K) का वोल्टेज उत्पन्न करती हैं जबकि अच्छे अर्धचालक भी शायद ही कभी कुछ सौ माइक्रोवोल्ट प्रति केल्विन से अधिक उत्पन्न करते हैं। केवल तरल प्रणालियाँ, जैसे कि आयनिक जैल और इलेक्ट्रोलाइट्स, जिनमें इलेक्ट्रॉनों के बजाय आवेशित आयन ऊष्मा का संचरण करते हैं, मिलीवोल्ट प्रति केल्विन की सीमा को पार करती हुई पाई गई हैं।
विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग (डीएसटी) की एक स्वायत्त संस्थान, जवाहरलाल नेहरू उन्नत वैज्ञानिक अनुसंधान केंद्र (जेएनसीएएसआर) के शोधकर्ताओं के एक समूह ने ऑस्ट्रेलिया के सिडनी विश्वविद्यालय और बैंगलोर के भारतीय विज्ञान संस्थान (आईआईएससी) के साथ मिलकर अब यह दिखाया है कि ठोस, एपिटैक्सियल क्रिस्टल में इस सीमा को तोड़ा जा सकता है।
प्रोफेसर बिवास साहा के नेतृत्व वाली टीम ने रेणुका करंजे और धीमही राव के साथ-साथ जेएनसीएएसआर से दीक्षा दाधिच और सौरव रुद्र, सिडनी विश्वविद्यालय से आशालाथा इंदिरादेवी कमलासनन पिल्लई और डॉ. मैग्नस गारब्रेक्ट और आईआईएससी से प्रोफेसर सुब्रतो मुखर्जी के सहयोग से अल्ट्राहाई-वैक्यूम मैग्नेट्रॉन स्पटरिंग का उपयोग करके मैग्नीशियम ऑक्साइड सब्सट्रेट पर स्कैंडियम नाइट्राइड (एससीएन), एक दुर्दम्य संक्रमण-धातु नाइट्राइड की पतली फिल्में विकसित कीं।
उन्होंने इनमें मैग्नीशियम मिलाया ताकि ऑक्सीजन डोपेंट से उत्पन्न होने वाले स्वाभाविक रूप से मौजूद मुक्त इलेक्ट्रॉनों की भरपाई हो सके। इससे एक ऐसा अर्धचालक बना जिसे अत्यधिक डोप किया हुआ और अत्यधिक संतुलित (एचडीएचसी) अर्धचालक कहा जाता है, एक ऐसा पदार्थ जिसमें धनात्मक और ऋणात्मक आवेश वाले डोपेंट परमाणु क्रिस्टल में लगभग समान संख्या में बेतरतीब ढंग से बिखरे होते हैं।
एक्स-रे विवर्तन और परमाणु-रिज़ॉल्यूशन इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोपी ने पुष्टि की कि फिल्में एकल-क्रिस्टलीय और एपिटैक्सियल बनी रहीं, जिसमें डोपेंट परमाणु समान रूप से वितरित थे और कोई द्वितीयक चरण या अवक्षेप नहीं थे।
इन एचडीएचसी एससीएन फिल्मों में, टीम ने सीबेक गुणांक का मान अकार्बनिक अर्धचालकों में आमतौर पर देखे जाने वाले मान से कई सौ से लेकर एक हजार गुना अधिक मापा, और यह पहले से ज्ञात अधिकतम सीमा से लगभग सौ गुना अधिक था (लगभग 200 नैनोमीटर मोटी फिल्म में कमरे के तापमान के पास -124.6 मिलीवोल्ट प्रति केल्विन से अधिक)। यह इसे तरल इलेक्ट्रोलाइट्स और हाइड्रोजेल और आयनिक जिलेटिन जैसे आयनिक चालकों से भी पहले से जुड़े दायरे से काफी ऊपर रखता है।
शोधकर्ताओं ने इस परिणाम को पूरी तरह से क्रिस्टलीय अर्धचालक के अंदर इलेक्ट्रोलाइट जैसी ऊष्माशक्ति के ठोस-अवस्था अनुरूप के रूप में वर्णित किया है।
एचडीएचसी एससीएन फिल्मों को पतला करने पर यह प्रभाव और भी मजबूत हो गया।
इस अध्ययन का नेतृत्व करने वाले प्रोफेसर बिवास साहा ने कहा कि जब हमने यह काम शुरू किया था तब हमारा लक्ष्य कोई रिकॉर्ड तोड़ना नहीं था बल्कि हम यह समझने की कोशिश कर रहे थे कि अव्यवस्था और आवेश क्षतिपूर्ति स्कैंडियम नाइट्राइड में इलेक्ट्रॉनिक परिवहन को कैसे नया आकार देते हैं।इसके बजाय हमने पाया कि एक पूरी तरह से क्रिस्टलीय, एपिटैक्सियल, एकल-चरण अर्धचालक तरल इलेक्ट्रोलाइट की तरह ऊष्माविद्युत रूप से व्यवहार कर सकता है। यह वास्तव में आश्चर्यजनक था और इससे हमें पता चलता है कि ठोस पदार्थों में अत्यधिक ऊष्माविद्युत और संवेदन क्षमता प्राप्त करने के लिए इंजीनियर की गई अव्यवस्था एक काफी हद तक अनछुआ मार्ग है।

चित्र 1 : अत्यधिक डोपिंग और उच्च क्षतिपूर्ति वाले ScN के इलेक्ट्रॉनिक बैंड आरेख का योजनाबद्ध चित्रण, जो बोल्ट्जमैन सीमा से अधिक ऊष्माशक्ति प्रदर्शित करता है।
टीम ने दो क्रोमियम संपर्कों वाली एचडीएचसीएससीएन फिल्म का उपयोग करके एक प्रारंभिक प्रोटोटाइप फोटॉन सेंसर बनाया है। एक संपर्क को लेजर से प्रकाशित करने पर उपकरण में एक सूक्ष्म, स्थानीयकृत तापमान अंतर उत्पन्न हुआ और परिणामस्वरूप वोल्टेज -102.4 मिलीवोल्ट प्रति केल्विन के सीबेक प्रतिक्रिया में परिवर्तित हो गया जो प्रकाश पहचान के लिए पर्याप्त है और टीम का सुझाव है कि आगे अनुकूलन के साथ कमरे के तापमान के आसपास एकल-फोटॉन स्तर की पहचान के लिए भी उपयुक्त है। वोल्टेज प्रतिक्रिया तीव्र थी कई प्रकाश चक्रों में दोहराने योग्य थी और सामग्री को अपरिवर्तित छोड़ दिया। इस कार्य के आधार पर तापमान और फोटॉन पहचान के लिए थर्मोइलेक्ट्रिक पतली-फिल्म सामग्री और सेंसर पर टीम द्वारा एक भारतीय पेटेंट आवेदन दायर किया गया है।

चित्र 2 : (बाएं से दाएं) जेएनसीएएसआर टीम, प्रोफेसर बिवास साहा, सौरव रुद्र, दीक्षा दाधीच, रेणुका करंजे और धीमाही राव
राष्ट्रपति, राष्ट्रीय फैशन प्रौद्योगिकी संस्थान (निफ्ट) के 18 परिसरों के संयुक्त दीक्षांत समारोह में शामिल हुईं
राष्ट्रपति, श्रीमती द्रौपदी मुर्मु नई दिल्ली में राष्ट्रीय फैशन प्रौद्योगिकी संस्थान (निफ्ट) के 18 परिसरों के संयुक्त दीक्षांत समारोह में शामिल हुईं।
इस अवसर पर अपने संबोधन में राष्ट्रपति ने कहा कि वस्त्र और परिधान क्षेत्र केवल हमारी सांस्कृतिक विरासत का अंग नहीं है, बल्कि करोड़ों देशवासियों की आजीविका का भी आधार रहा है। यदि पारंपरिक कारीगरों को सहयोग और मार्गदर्शन मिले तो आने वाली पीढ़ियों को भी गर्व और विश्वास के साथ इस व्यवसाय से जुड़े रहने के लिए प्रोत्साहन मिलेगा। उन्होंने प्रसन्नता व्यक्त की, कि विभिन्न निफ्ट केंद्रों ने ‘क्राफ्ट क्लस्टर पहल’ जैसे कार्यक्रमों को लागू किया है, जिनके माध्यम से उनके संबंधित क्षेत्रों के बुनकरों और कारीगरों को वस्त्र एवं परिधान क्षेत्र की आधुनिक तकनीकों से अवगत कराया जा रहा है तथा बाजारों से जोड़ा जा रहा है।
राष्ट्रपति ने कहा कि आज हमारा देश पहले की तुलना में कहीं अधिक आत्मविश्वास के साथ विश्व पटल पर अपनी भूमिका को विस्तार दे रहा है। फैशन टेक्नोलॉजी एक ऐसा क्षेत्र है जिसमें विश्व स्तर पर भारत की भूमिका बढ़ाने की अपार संभावनाएं हैं। उन्होंने विद्यार्थियों से कहा कि वे इस अवसर का लाभ उठाएं। उन्होंने कहा कि इस प्रयास में सभी विद्यार्थी स्मरण रखें कि उनकी सोच वैश्विक हो, लेकिन उनकी जड़ें अपनी मिट्टी और देश के सांस्कृतिक मूल्यों से जुड़ी हों। इस तरह वे न केवल सफल पेशेवर बनेंगे, बल्कि भारत की सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण और संवर्धन में भी अपना योगदान दे सकेंगे।
राष्ट्रपति ने कहा कि विद्यार्थियों को विश्वस्तरीय उत्पाद बनाने चाहिए लेकिन साथ ही यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि वे पर्यावरण के अनुकूल हों। उन्होंने कहा कि अपने उत्पादों के लिए स्थानीय रूप से उपलब्ध कच्चे माल का प्रयोग करना पर्यावरण संरक्षण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम होगा। बचे हुए अंश को बेकार समझकर फेंकना नहीं चाहिए; बल्कि उसे नया रूप, नई उपयोगिता और नया मूल्य दिया जा सकता है। उन्होंने यह जानकर प्रसन्नता व्यक्त की कि निफ्ट के नीति-निर्माताओं ने संधारणीयता और सामाजिक दायित्व को संस्थान की कार्ययोजना में महत्वपूर्ण स्थान दिया है। उन्होंने यह विश्वास व्यक्त किया कि निफ्ट वस्त्र और परिधान के क्षेत्र में संघारणीय भविष्य के अपने प्रयासों के अन्तर्गत सर्कुलर इकोनॉमी की विधाओं को व्यापक और लाभदायक बनाने के लिए प्रभावी कदम उठायेगा।
राष्ट्रपति ने कहा कि वर्ष 2047 तक विकसित भारत के लक्ष्य को प्राप्त करने में युवा महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे। उन्होंने इस बात का उल्लेख किया कि निफ्ट जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों के प्रतिभाशाली युवा विद्यार्थियों से देश को बहुत अपेक्षाएं हैं। उन्होंने विद्यार्थियों से ऐसे समाज के निर्माण में सहयोग करने का आग्रह किया जिसमें प्रत्येक नागरिक को राष्ट्र की प्रगति में योगदान करने का उचित अवसर मिल सके। उन्होंने कहा कि उनकी सफलता इस बात में निहित है कि उनके प्रयासों से किसी शिल्पकार को अपने शिल्प की मूल पहचान को बनाये रखते हुए अपनी उत्पादकता और आय बढ़ाने में कितनी सहायता मिलती है।
सबसे बड़ा भ्रम दो शब्द—“सरकारी पैसा”!
एक गरीब पिता का बच्चा बाज़ार में खिलौना देखकर जिद करता है। पिता कीमत पूछता है, जेब टटोलता है, फिर बच्चे का हाथ पकड़कर आगे बढ़ जाता है। बच्चा सोचता है कि शायद पिताजी उसे खिलौना नहीं दिलाना चाहते। लेकिन पिता जानता है कि महीने की तनख्वाह अभी आधी भी नहीं बची और घर में राशन, बिजली का बिल, स्कूल की फीस और दवा के खर्च अभी बाकी हैं। उसी शहर में कोई माँ अपनी बेटी की कोचिंग का सपना टाल रही है, कोई बुज़ुर्ग डॉक्टर की पूरी पर्ची नहीं खरीद पा रहा, कोई परिवार बरसों से अपने घर की टूटी छत को प्लास्टिक से ढँककर मानसून निकाल रहा है। भारत के करोड़ों घरों में हर दिन इच्छाओं की हत्या होती है ताकि बजट जीवित रह सके।
लेकिन इसी कहानी का एक दूसरा पात्र भी है, जिसके बारे में बहुत कम बात होती है।
वही पिता जब पेट्रोल भरवाता है, टैक्स देता है। वही मजदूर जब मोबाइल रिचार्ज कराता है, टैक्स देता है। वही किसान जब डीज़ल खरीदता है, टैक्स देता है। वही गृहिणी जब साबुन, तेल, कपड़ा, दवा या बच्चों की कॉपी खरीदती है, तब भी टैक्स देती है। भारत में करोड़ों लोग आयकर न देते हों, लेकिन कर-मुक्त जीवन लगभग कोई नहीं जीता। वस्तु एवं सेवा कर, ईंधन कर, शुल्क, उपकर और अनेक अप्रत्यक्ष करों के माध्यम से हर दिन जनता का पैसा सरकारी खजाने तक पहुँचता है। यानी जो परिवार अपने घर का हर रुपया बचाने के लिए संघर्ष कर रहा है, वही परिवार हर दिन सरकार की तिजोरी भी भर रहा है।
यहीं से लोकतंत्र का सबसे बड़ा विरोधाभास शुरू होता है।
हम अपने घर में सौ रुपये के अतिरिक्त खर्च पर बहस कर लेते हैं। बच्चा महंगा खिलौना मांग ले तो उसे समझा देते हैं। घर में पुताई टाल देते हैं। पुरानी बाइक कुछ साल और चलाते हैं। शादी-ब्याह में खर्च काट देते हैं। लेकिन उसी समय लाखों करोड़ रुपये के सार्वजनिक खर्च पर लगभग मौन रहते हैं। जिस देश में एक परिवार पंखा बदलने से पहले दस बार सोचता है, उसी देश में सार्वजनिक धन के उपयोग पर नागरिक बहस कितनी होती है? शायद उतनी नहीं जितनी किसी क्रिकेट मैच, फिल्म या चुनावी नारे पर होती है।
सबसे बड़ा भ्रम दो शब्दों में छिपा है—“सरकारी पैसा”।
यह शब्द सुनते ही नागरिक और धन के बीच का रिश्ता टूट जाता है। जैसे वह पैसा किसी और का हो। जबकि वास्तविकता इसके ठीक विपरीत है। सरकार का अपना कोई खेत नहीं है जहाँ से फसल उगती हो। उसका कोई निजी कारखाना नहीं है जहाँ से मुनाफा आता हो। सरकार की तिजोरी में रखा लगभग हर रुपया किसी न किसी नागरिक की जेब से आया है। लेकिन जैसे ही वह रुपया सरकारी खजाने में पहुँचता है, जनता उससे अपना भावनात्मक और नैतिक स्वामित्व छोड़ देती है।
यही लोकतंत्र की सबसे महंगी भूल है।
भारत का केंद्रीय बजट अब दर्जनों लाख करोड़ रुपये के स्तर पर पहुँच चुका है। राज्यों के बजट जोड़ दिए जाएँ तो सार्वजनिक धन का आकार और भी विशाल हो जाता है। यह राशि इतनी बड़ी है कि सामान्य नागरिक उसकी कल्पना भी नहीं कर सकता। लेकिन समस्या राशि की विशालता नहीं है। समस्या यह है कि जिन लोगों की मेहनत से यह धन एकत्र होता है, वे ही अक्सर उसके उपयोग पर सबसे कम निगरानी रखते हैं।
ज़रा सोचिए, एक परिवार पाँच लोगों के साथ एक मोटरसाइकिल पर बैठकर बाज़ार जा रहा है। बच्चे बीच में दबे हुए हैं, माँ पीछे किसी तरह संतुलन बनाए हुए है। उसी सड़क पर एक चमचमाती सरकारी गाड़ी निकलती है। गाड़ी में एक बड़ा अधिकारी बैठा है, अपने पालतू कुत्ते को सेहला रहा है। गाड़ी गलत नहीं है। सरकारी कामकाज के लिए वाहन आवश्यक हैं। प्रश्न वाहन का नहीं है। प्रश्न उस मानसिक दूरी का है जो धीरे-धीरे नागरिक और व्यवस्था के बीच पैदा हो गई है। जिस व्यवस्था का खर्च नागरिक उठा रहा है, क्या वह व्यवस्था नागरिक के जीवन की कठिनाइयों को उसी गंभीरता से महसूस करती है?
कबीर ने लिखा था—“साईं इतना दीजिए, जामे कुटुम समाय।” यह केवल व्यक्ति का नहीं, शासन का भी आदर्श हो सकता है। किसी भी सभ्य शासन की महानता उसके खर्च की मात्रा से नहीं, बल्कि उसके खर्च की नैतिकता और उपयोगिता से मापी जानी चाहिए। क्योंकि सार्वजनिक धन केवल लेखांकन की इकाई नहीं होता; वह किसी की अधूरी पढ़ाई, किसी की छूटी हुई दवा, किसी का टला हुआ इलाज, किसी की स्थगित शादी और किसी बच्चे के अधूरे सपनों का संचित रूप होता है।
यहीं एक और असुविधाजनक प्रश्न सामने आता है। यदि जनता अपने पैसे की रखवाली नहीं करेगी, तो कौन करेगा?
सूचना का अधिकार कानून इसी प्रश्न का उत्तर देने का प्रयास था। RTI केवल कागज़ देखने का अधिकार नहीं है। वह लोकतंत्र का स्मरणपत्र है। वह नागरिक को याद दिलाता है कि वह केवल मतदाता नहीं, बल्कि सार्वजनिक संसाधनों का संरक्षक भी है। जब कोई व्यक्ति पूछता है कि सड़क निर्माण के लिए कितना बजट स्वीकृत हुआ, अस्पताल के लिए कितना धन आया, स्कूल की मरम्मत पर कितना खर्च हुआ, तब वह केवल सूचना नहीं मांग रहा होता; वह लोकतंत्र को उसकी मूल स्थिति में वापस लाने की कोशिश कर रहा होता है।
लेकिन यहाँ एक और विडंबना है। हम अपने बच्चों को बचत सिखाते हैं, पर नागरिकता नहीं। हम उन्हें गुल्लक देते हैं, पर यह नहीं बताते कि देश का बजट भी एक राष्ट्रीय गुल्लक है। हम उन्हें कमाना सिखाते हैं, पर यह नहीं सिखाते कि उनके नाम पर खर्च होने वाले धन का हिसाब मांगना भी लोकतांत्रिक जिम्मेदारी है। हम उन्हें अधिकार बताते हैं, लेकिन अधिकारों की रक्षा के लिए आवश्यक सजगता नहीं सिखाते।
कहावत है—“बूंद-बूंद से घड़ा भरता है।” लेकिन लोकतंत्र में एक और सच्चाई है—बूंद-बूंद से भरा घड़ा चुप्पी से खाली भी हो सकता है। सार्वजनिक धन हमेशा किसी एक बड़े घोटाले से नष्ट नहीं होता। वह कई बार नागरिक उदासीनता, कमजोर निगरानी, अधूरी परियोजनाओं, अनुत्तरदायी प्रशासन और उस सामूहिक मानसिकता से क्षीण होता है जो मान बैठती है कि यह सब उसका विषय नहीं है।
शायद इसलिए आज भारत के सामने सबसे बड़ा आर्थिक प्रश्न यह नहीं है कि सरकार कितना खर्च कर रही है, और न ही यह कि नागरिक कितना कमा रहा है।
सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या इस देश का नागरिक अपने नाम पर खर्च होने वाले धन को वास्तव में अपना मानता भी है या नहीं।
क्योंकि जिस दिन जनता यह समझ जाएगी कि सरकारी खजाना वास्तव में जनता की सामूहिक तिजोरी है, उस दिन लोकतंत्र केवल चुनावों की व्यवस्था नहीं रहेगा। वह वास्तविक जन-स्वामित्व की व्यवस्था बन जाएगा। उस दिन परिवर्तन किसी नए नेता, नई योजना या नए नारे से नहीं आएगा। वह उस साधारण नागरिक से आएगा जो पहली बार यह तय करेगा कि जैसे वह अपने घर के खर्च पर नज़र रखता है, वैसे ही अपने देश के खर्च पर भी रखेगा।
और तब इतिहास शायद हमसे यह नहीं पूछेगा कि हमने कितना कमाया।
वह यह पूछेगा कि हमने अपने बच्चों को कमाई की कला तो सिखा दी, लेकिन क्या हमने उन्हें यह भी सिखाया कि उनकी मेहनत से बनने वाले राष्ट्रीय खजाने का प्रहरी कौन होगा?
लेखक : सी एम जैन
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