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एनपीसीआई इंटरनेशनल और उज्बेकिस्तान के एनआईपीसी ने ‘यूजेडक्यूआर’ के माध्यम से पूरे उज्बेकिस्तान में यूपीआई भुगतान सक्षम करने के लिए साझेदारी की

नेशनल पेमेंट्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (एनपीसीआई) की अंतरराष्ट्रीय शाखा एनपीसीआई इंटरनेशनल पेमेंट्स लिमिटेड (एनआईपीएल) ने 30 अगस्त 2026 को उज्बेकिस्तान की राष्ट्रीय भुगतान प्रणाली एचयूएमओ के संचालक ‘नेशनल इंटरबैंक प्रोसेसिंग सेंटर जेएससी’ (एनआईपीसी) के साथ एक वाणिज्यिक समझौते पर हस्‍ताक्षर किए हैं। यह साझेदारी भारतीय यात्रियों को उज्बेकिस्तान के राष्ट्रीय अंतर-संचालनीय क्यूआर कोड ‘यूजेडक्यूआर’ को अपने परिचित यूपीआई-सक्षम ऐप का उपयोग करके स्कैन करने और देशभर में व्यापारियों को त्‍वरित भुगतान करने की सुविधा देती है।

यह घोषणा भारत के प्रधानमंत्री की उज्बेकिस्तान की द्विपक्षीय यात्रा के दौरान की गई। यह समझौता भारतीय रिज़र्व बैंक (आरबीआई) और उज्बेकिस्तान के केंद्रीय बैंक (सीबीयू) सहित संबंधित वित्तीय नियामकों से औपचारिक अनुमोदन प्राप्त होने के बाद किया गया है। इन नियामकों ने एचयूएमओ को सीमा-पार मर्चेंट भुगतान स्वीकार करने के लिए एनआईपीएल PL के अधिकृत साझेदार के रूप में नामित किया है।

समझौते की प्रमुख बातें

  1. व्‍यापारियों द्वारा सार्वभौमिक भुगतान स्वीकृति:

सीबीयू द्वारा अनिवार्य एकीकृ‍त राष्‍ट्रीय क्‍यूआर अवसंरचना (यूजेडक्‍यूआर) के साथ एकीकरण से यूपीआई उपयोगकर्ताओं को उज्बेकिस्तान में खुदरा, आतिथ्‍य और सेवा क्षेत्र के व्‍यापारियों के यहां लगभग सर्वभौगिक भुगतान स्‍वीकृति की सुविधा मिलेगी।

  1. सुगम यात्रा अनुभव :

भारतीय पर्यटक, कारोबारी यात्री और विद्यार्थी अपने भारतीय बैंक खातों से सीधे व्यक्ति से व्यापारी (पी2एम) भुगतान कर सकेंगे। इससे विदेशी मुद्रा पर लगने वाले अतिरिक्त शुल्क की समस्या कम होगी तथा अंतरराष्ट्रीय कार्ड या नकदी पर निर्भरता भी घटेगी।

  1. द्विपक्षीय संबंधों को मजबूती:

यह पहल डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना (डीपीआईI) के क्षेत्र में दोनों देशों के सहयोग को आगे बढ़ाती है और दोनों देशों के व्यापक रणनीतिक एवं आर्थिक उद्देश्यों के अनुरूप है।

यूपीआई दस देशों में स्वीकार किया जाता है :

यूपीआई को वर्तमान में सिंगापुर, संयुक्त अरब अमीरात फ्रांस, मॉरीशस, नेपाल, भूटान, कतर, श्रीलंका, कंबोडिया और ग्रीस में स्‍वीकार किया जाता है।

इससे भारतीय यात्रियों को विदेशों में यूपीआई के माध्यम से निर्बाध भुगतान करने की सुविधा मिलती है।

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ऊष्मा को विद्युत में परिवर्तित करने की सदी पुरानी सीमा को पार कर लिया गया है, जिससे अति संवेदनशील तापमान संवेदन संभव हो गया है।

वैज्ञानिकों को एक ऐसा क्रिस्टलीय अर्धचालक मिला है जो तापमान के अंतर को विद्युत वोल्टेज में परिवर्तित करता है जो भौतिकी की पाठ्यपुस्तकों में वर्णित वोल्टेज से लगभग एक हजार गुना अधिक है।

उत्पन्न होने वाला थर्मोइलेक्ट्रिक वोल्टेज इतना अधिक होता है कि यह उन मानों के बराबर होता है जो आमतौर पर केवल तरल इलेक्ट्रोलाइट्स और आयनिक जैल में देखे जाते हैं, ठोस पदार्थों में नहीं, विशेष रूप से एकल-क्रिस्टलीय पदार्थों में।

इस खोज ने ठोस पदार्थों में इस प्रभाव की सीमा के बारे में दशकों पुरानी धारणा को बदल दिया है और अति संवेदनशील तापमान सेंसर, हीट डिटेक्टर और क्वांटम सेंसिंग उपकरणों की एक नई पीढ़ी के लिए मार्ग प्रशस्त किया है।

जब दो अलग अलग  पदार्थों के बीच के जोड़ के एक सिरे को गर्म किया जाता है जबकि दूसरे सिरे को ठंडा रखा जाता है, तो गतिशील आवेश वाहक गर्म सिरे से ठंडे सिरे की ओर प्रवाहित होते हैं जिससे जोड़ के आर-पार वोल्टेज उत्पन्न होता है। इस घटना को सीबेक प्रभाव के नाम से जाना जाता है जिसकी खोज दो शताब्दी पहले हुई थी और यह तापमान सेंसर से लेकर अपशिष्ट ऊष्मा को बिजली में परिवर्तित करने वाले थर्मोइलेक्ट्रिक जनरेटर तक की तकनीकों का आधार है।

दशकों से, सीबेक गुणांक के रूप में मापी जाने वाली इस वोल्टेज की मात्रा, क्रिस्टलीय ठोस में इस प्रभाव की ऊपरी सीमा को केवल कुछ मिलीवोल्ट प्रति केल्विन तक ही सीमित रखती है। अधिकांश धातुएँ प्रति केल्विन केवल कुछ दहाई माइक्रोवोल्ट (µV/K) का वोल्टेज उत्पन्न करती हैं जबकि अच्छे अर्धचालक भी शायद ही कभी कुछ सौ माइक्रोवोल्ट प्रति केल्विन से अधिक उत्पन्न करते हैं। केवल तरल प्रणालियाँ, जैसे कि आयनिक जैल और इलेक्ट्रोलाइट्स, जिनमें इलेक्ट्रॉनों के बजाय आवेशित आयन ऊष्मा का संचरण करते हैं, मिलीवोल्ट प्रति केल्विन की सीमा को पार करती हुई पाई गई हैं।

विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग (डीएसटी) की एक स्वायत्त संस्थान, जवाहरलाल नेहरू उन्नत वैज्ञानिक अनुसंधान केंद्र (जेएनसीएएसआर) के शोधकर्ताओं के एक समूह ने ऑस्ट्रेलिया के सिडनी विश्वविद्यालय और बैंगलोर के भारतीय विज्ञान संस्थान (आईआईएससी) के साथ मिलकर अब यह दिखाया है कि ठोस, एपिटैक्सियल क्रिस्टल में इस सीमा को तोड़ा जा सकता है।

प्रोफेसर बिवास साहा के नेतृत्व वाली टीम ने रेणुका करंजे और धीमही राव के साथ-साथ जेएनसीएएसआर से दीक्षा दाधिच और सौरव रुद्र, सिडनी विश्वविद्यालय से आशालाथा इंदिरादेवी कमलासनन पिल्लई और डॉ. मैग्नस गारब्रेक्ट और आईआईएससी से प्रोफेसर सुब्रतो मुखर्जी के सहयोग से अल्ट्राहाई-वैक्यूम मैग्नेट्रॉन स्पटरिंग का उपयोग करके मैग्नीशियम ऑक्साइड सब्सट्रेट पर स्कैंडियम नाइट्राइड (एससीएन), एक दुर्दम्य संक्रमण-धातु नाइट्राइड की पतली फिल्में विकसित कीं।

उन्होंने इनमें मैग्नीशियम मिलाया ताकि ऑक्सीजन डोपेंट से उत्पन्न होने वाले स्वाभाविक रूप से मौजूद मुक्त इलेक्ट्रॉनों की भरपाई हो सके। इससे एक ऐसा अर्धचालक बना जिसे अत्यधिक डोप किया हुआ और अत्यधिक संतुलित (एचडीएचसी) अर्धचालक कहा जाता है, एक ऐसा पदार्थ जिसमें धनात्मक और ऋणात्मक आवेश वाले डोपेंट परमाणु क्रिस्टल में लगभग समान संख्या में बेतरतीब ढंग से बिखरे होते हैं।

एक्स-रे विवर्तन और परमाणु-रिज़ॉल्यूशन इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोपी ने पुष्टि की कि फिल्में एकल-क्रिस्टलीय और एपिटैक्सियल बनी रहीं, जिसमें डोपेंट परमाणु समान रूप से वितरित थे और कोई द्वितीयक चरण या अवक्षेप नहीं थे।

इन एचडीएचसी एससीएन फिल्मों में, टीम ने सीबेक गुणांक का मान अकार्बनिक अर्धचालकों में आमतौर पर देखे जाने वाले मान से कई सौ से लेकर एक हजार गुना अधिक मापा, और यह पहले से ज्ञात अधिकतम सीमा से लगभग सौ गुना अधिक था (लगभग 200 नैनोमीटर मोटी फिल्म में कमरे के तापमान के पास -124.6 मिलीवोल्ट प्रति केल्विन से अधिक)। यह इसे तरल इलेक्ट्रोलाइट्स और हाइड्रोजेल और आयनिक जिलेटिन जैसे आयनिक चालकों से भी पहले से जुड़े दायरे से काफी ऊपर रखता है।

शोधकर्ताओं ने इस परिणाम को पूरी तरह से क्रिस्टलीय अर्धचालक के अंदर इलेक्ट्रोलाइट जैसी ऊष्माशक्ति के ठोस-अवस्था अनुरूप के रूप में वर्णित किया है।

एचडीएचसी एससीएन फिल्मों को पतला करने पर यह प्रभाव और भी मजबूत हो गया।

इस अध्ययन का नेतृत्व करने वाले प्रोफेसर बिवास साहा ने कहा कि जब हमने यह काम शुरू किया था तब हमारा लक्ष्य कोई रिकॉर्ड तोड़ना नहीं था बल्कि हम यह समझने की कोशिश कर रहे थे कि अव्यवस्था और आवेश क्षतिपूर्ति स्कैंडियम नाइट्राइड में इलेक्ट्रॉनिक परिवहन को कैसे नया आकार देते हैं।इसके बजाय हमने पाया कि एक पूरी तरह से क्रिस्टलीय, एपिटैक्सियल, एकल-चरण अर्धचालक तरल इलेक्ट्रोलाइट की तरह ऊष्माविद्युत रूप से व्यवहार कर सकता है। यह वास्तव में आश्चर्यजनक था और इससे हमें पता चलता है कि ठोस पदार्थों में अत्यधिक ऊष्माविद्युत और संवेदन क्षमता प्राप्त करने के लिए इंजीनियर की गई अव्यवस्था एक काफी हद तक अनछुआ मार्ग है।

चित्र 1 : अत्यधिक डोपिंग और उच्च क्षतिपूर्ति वाले ScN के इलेक्ट्रॉनिक बैंड आरेख का योजनाबद्ध चित्रण, जो बोल्ट्जमैन सीमा से अधिक ऊष्माशक्ति प्रदर्शित करता है।

टीम ने दो क्रोमियम संपर्कों वाली एचडीएचसीएससीएन  फिल्म का उपयोग करके एक प्रारंभिक प्रोटोटाइप फोटॉन सेंसर बनाया है। एक संपर्क को लेजर से प्रकाशित करने पर उपकरण में एक सूक्ष्म, स्थानीयकृत तापमान अंतर उत्पन्न हुआ और परिणामस्वरूप वोल्टेज -102.4 मिलीवोल्ट प्रति केल्विन के सीबेक प्रतिक्रिया में परिवर्तित हो गया जो  प्रकाश पहचान के लिए पर्याप्त है और टीम का सुझाव है कि आगे अनुकूलन के साथ कमरे के तापमान के आसपास एकल-फोटॉन स्तर की पहचान के लिए भी उपयुक्त है। वोल्टेज प्रतिक्रिया तीव्र थी कई प्रकाश चक्रों में दोहराने योग्य थी और सामग्री को अपरिवर्तित छोड़ दिया। इस कार्य के आधार पर तापमान और फोटॉन पहचान के लिए थर्मोइलेक्ट्रिक पतली-फिल्म सामग्री और सेंसर पर टीम द्वारा एक भारतीय पेटेंट आवेदन दायर किया गया है।

चित्र 2 : (बाएं से दाएं) जेएनसीएएसआर टीम, प्रोफेसर बिवास साहा, सौरव रुद्र, दीक्षा दाधीच, रेणुका करंजे और धीमाही राव

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राष्ट्रपति, राष्ट्रीय फैशन प्रौद्योगिकी संस्थान (निफ्ट) के 18 परिसरों के संयुक्त दीक्षांत समारोह में शामिल हुईं

राष्‍ट्रपति, श्रीमती द्रौपदी मुर्मु नई दिल्‍ली में राष्‍ट्रीय फैशन प्रौद्योगिकी संस्‍थान (निफ्ट) के 18 परिसरों के संयुक्‍त दीक्षांत समारोह में शामिल हुईं।

इस अवसर पर अपने संबोधन में राष्ट्रपति ने कहा कि वस्त्र और परिधान क्षेत्र केवल हमारी सांस्कृतिक विरासत का अंग नहीं है, बल्कि करोड़ों देशवासियों की आजीविका का भी आधार रहा है। यदि पारंपरिक कारीगरों को सहयोग और मार्गदर्शन मिले तो आने वाली पीढ़ियों को भी गर्व और विश्वास के साथ इस व्यवसाय से जुड़े रहने के लिए प्रोत्साहन मिलेगा। उन्होंने प्रसन्नता व्यक्त की, कि विभिन्न निफ्ट केंद्रों ने ‘क्राफ्ट क्लस्टर पहल’ जैसे कार्यक्रमों को लागू किया है, जिनके माध्यम से उनके संबंधित क्षेत्रों के बुनकरों और कारीगरों को वस्त्र एवं परिधान क्षेत्र की आधुनिक तकनीकों से अवगत कराया जा रहा है तथा बाजारों से जोड़ा जा रहा है।

राष्ट्रपति ने कहा कि आज हमारा देश पहले की तुलना में कहीं अधिक आत्मविश्वास के साथ विश्व पटल पर अपनी भूमिका को विस्तार दे रहा है। फैशन टेक्नोलॉजी एक ऐसा क्षेत्र है जिसमें विश्व स्तर पर भारत की भूमिका बढ़ाने की अपार संभावनाएं हैं। उन्होंने विद्यार्थियों से कहा कि वे इस अवसर का लाभ उठाएं। उन्होंने कहा कि इस प्रयास में सभी विद्यार्थी स्मरण रखें कि उनकी सोच वैश्विक हो, लेकिन उनकी जड़ें अपनी मिट्टी और देश के सांस्कृतिक मूल्यों से जुड़ी हों। इस तरह वे न केवल सफल पेशेवर बनेंगे, बल्कि भारत की सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण और संवर्धन में भी अपना योगदान दे सकेंगे।

राष्ट्रपति ने कहा कि विद्यार्थियों को विश्वस्तरीय उत्पाद बनाने चाहिए लेकिन साथ ही यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि वे पर्यावरण के अनुकूल हों। उन्होंने कहा कि अपने उत्पादों के लिए स्थानीय रूप से उपलब्ध कच्चे माल का प्रयोग करना पर्यावरण संरक्षण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम होगा। बचे हुए अंश को बेकार समझकर फेंकना नहीं चाहिए; बल्‍कि उसे नया रूप, नई उपयोगिता और नया मूल्य दिया जा सकता है। उन्होंने यह जानकर प्रसन्नता व्यक्त की कि निफ्ट के नीति-निर्माताओं ने संधारणीयता और सामाजिक दायित्व को संस्थान की कार्ययोजना में महत्वपूर्ण स्थान दिया है। उन्‍होंने यह विश्‍वास व्‍यक्‍त किया कि निफ्ट वस्त्र और परिधान के क्षेत्र में संघारणीय भविष्‍य के अपने प्रयासों के अन्तर्गत सर्कुलर इकोनॉमी की विधाओं को व्यापक और लाभदायक बनाने के लिए प्रभावी कदम उठायेगा।

राष्ट्रपति ने कहा कि वर्ष 2047 तक विकसित भारत के लक्ष्य को प्राप्त करने में युवा महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे। उन्होंने इस बात का उल्‍लेख किया कि निफ्ट जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों के प्रतिभाशाली युवा विद्यार्थियों से देश को बहुत अपेक्षाएं हैं। उन्होंने विद्यार्थियों से ऐसे समाज के निर्माण में सहयोग करने का आग्रह किया जिसमें प्रत्येक नागरिक को राष्ट्र की प्रगति में योगदान करने का उचित अवसर मिल सके। उन्होंने कहा कि उनकी सफलता इस बात में निहित है कि उनके प्रयासों से किसी शिल्पकार को अपने शिल्प की मूल पहचान को बनाये रखते हुए अपनी उत्पादकता और आय बढ़ाने में कितनी सहायता मिलती है।

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सबसे बड़ा भ्रम दो शब्द—“सरकारी पैसा”!

एक गरीब पिता का बच्चा बाज़ार में खिलौना देखकर जिद करता है। पिता कीमत पूछता है, जेब टटोलता है, फिर बच्चे का हाथ पकड़कर आगे बढ़ जाता है। बच्चा सोचता है कि शायद पिताजी उसे खिलौना नहीं दिलाना चाहते। लेकिन पिता जानता है कि महीने की तनख्वाह अभी आधी भी नहीं बची और घर में राशन, बिजली का बिल, स्कूल की फीस और दवा के खर्च अभी बाकी हैं। उसी शहर में कोई माँ अपनी बेटी की कोचिंग का सपना टाल रही है, कोई बुज़ुर्ग डॉक्टर की पूरी पर्ची नहीं खरीद पा रहा, कोई परिवार बरसों से अपने घर की टूटी छत को प्लास्टिक से ढँककर मानसून निकाल रहा है। भारत के करोड़ों घरों में हर दिन इच्छाओं की हत्या होती है ताकि बजट जीवित रह सके।

लेकिन इसी कहानी का एक दूसरा पात्र भी है, जिसके बारे में बहुत कम बात होती है।

वही पिता जब पेट्रोल भरवाता है, टैक्स देता है। वही मजदूर जब मोबाइल रिचार्ज कराता है, टैक्स देता है। वही किसान जब डीज़ल खरीदता है, टैक्स देता है। वही गृहिणी जब साबुन, तेल, कपड़ा, दवा या बच्चों की कॉपी खरीदती है, तब भी टैक्स देती है। भारत में करोड़ों लोग आयकर न देते हों, लेकिन कर-मुक्त जीवन लगभग कोई नहीं जीता। वस्तु एवं सेवा कर, ईंधन कर, शुल्क, उपकर और अनेक अप्रत्यक्ष करों के माध्यम से हर दिन जनता का पैसा सरकारी खजाने तक पहुँचता है। यानी जो परिवार अपने घर का हर रुपया बचाने के लिए संघर्ष कर रहा है, वही परिवार हर दिन सरकार की तिजोरी भी भर रहा है।

यहीं से लोकतंत्र का सबसे बड़ा विरोधाभास शुरू होता है।

हम अपने घर में सौ रुपये के अतिरिक्त खर्च पर बहस कर लेते हैं। बच्चा महंगा खिलौना मांग ले तो उसे समझा देते हैं। घर में पुताई टाल देते हैं। पुरानी बाइक कुछ साल और चलाते हैं। शादी-ब्याह में खर्च काट देते हैं। लेकिन उसी समय लाखों करोड़ रुपये के सार्वजनिक खर्च पर लगभग मौन रहते हैं। जिस देश में एक परिवार पंखा बदलने से पहले दस बार सोचता है, उसी देश में सार्वजनिक धन के उपयोग पर नागरिक बहस कितनी होती है? शायद उतनी नहीं जितनी किसी क्रिकेट मैच, फिल्म या चुनावी नारे पर होती है।

सबसे बड़ा भ्रम दो शब्दों में छिपा है—“सरकारी पैसा”।

यह शब्द सुनते ही नागरिक और धन के बीच का रिश्ता टूट जाता है। जैसे वह पैसा किसी और का हो। जबकि वास्तविकता इसके ठीक विपरीत है। सरकार का अपना कोई खेत नहीं है जहाँ से फसल उगती हो। उसका कोई निजी कारखाना नहीं है जहाँ से मुनाफा आता हो। सरकार की तिजोरी में रखा लगभग हर रुपया किसी न किसी नागरिक की जेब से आया है। लेकिन जैसे ही वह रुपया सरकारी खजाने में पहुँचता है, जनता उससे अपना भावनात्मक और नैतिक स्वामित्व छोड़ देती है।

यही लोकतंत्र की सबसे महंगी भूल है।

भारत का केंद्रीय बजट अब दर्जनों लाख करोड़ रुपये के स्तर पर पहुँच चुका है। राज्यों के बजट जोड़ दिए जाएँ तो सार्वजनिक धन का आकार और भी विशाल हो जाता है। यह राशि इतनी बड़ी है कि सामान्य नागरिक उसकी कल्पना भी नहीं कर सकता। लेकिन समस्या राशि की विशालता नहीं है। समस्या यह है कि जिन लोगों की मेहनत से यह धन एकत्र होता है, वे ही अक्सर उसके उपयोग पर सबसे कम निगरानी रखते हैं।

ज़रा सोचिए, एक परिवार पाँच लोगों के साथ एक मोटरसाइकिल पर बैठकर बाज़ार जा रहा है। बच्चे बीच में दबे हुए हैं, माँ पीछे किसी तरह संतुलन बनाए हुए है। उसी सड़क पर एक चमचमाती सरकारी गाड़ी निकलती है। गाड़ी में एक बड़ा अधिकारी बैठा है, अपने पालतू कुत्ते को सेहला रहा है।   गाड़ी गलत नहीं है। सरकारी कामकाज के लिए वाहन आवश्यक हैं। प्रश्न वाहन का नहीं है। प्रश्न उस मानसिक दूरी का है जो धीरे-धीरे नागरिक और व्यवस्था के बीच पैदा हो गई है। जिस व्यवस्था का खर्च नागरिक उठा रहा है, क्या वह व्यवस्था नागरिक के जीवन की कठिनाइयों को उसी गंभीरता से महसूस करती है?

कबीर ने लिखा था—“साईं इतना दीजिए, जामे कुटुम समाय।” यह केवल व्यक्ति का नहीं, शासन का भी आदर्श हो सकता है। किसी भी सभ्य शासन की महानता उसके खर्च की मात्रा से नहीं, बल्कि उसके खर्च की नैतिकता और उपयोगिता से मापी जानी चाहिए। क्योंकि सार्वजनिक धन केवल लेखांकन की इकाई नहीं होता; वह किसी की अधूरी पढ़ाई, किसी की छूटी हुई दवा, किसी का टला हुआ इलाज, किसी की स्थगित शादी और किसी बच्चे के अधूरे सपनों का संचित रूप होता है।

यहीं एक और असुविधाजनक प्रश्न सामने आता है। यदि जनता अपने पैसे की रखवाली नहीं करेगी, तो कौन करेगा?

सूचना का अधिकार कानून इसी प्रश्न का उत्तर देने का प्रयास था। RTI केवल कागज़ देखने का अधिकार नहीं है। वह लोकतंत्र का स्मरणपत्र है। वह नागरिक को याद दिलाता है कि वह केवल मतदाता नहीं, बल्कि सार्वजनिक संसाधनों का संरक्षक भी है। जब कोई व्यक्ति पूछता है कि सड़क निर्माण के लिए कितना बजट स्वीकृत हुआ, अस्पताल के लिए कितना धन आया, स्कूल की मरम्मत पर कितना खर्च हुआ, तब वह केवल सूचना नहीं मांग रहा होता; वह लोकतंत्र को उसकी मूल स्थिति में वापस लाने की कोशिश कर रहा होता है।

लेकिन यहाँ एक और विडंबना है। हम अपने बच्चों को बचत सिखाते हैं, पर नागरिकता नहीं। हम उन्हें गुल्लक देते हैं, पर यह नहीं बताते कि देश का बजट भी एक राष्ट्रीय गुल्लक है। हम उन्हें कमाना सिखाते हैं, पर यह नहीं सिखाते कि उनके नाम पर खर्च होने वाले धन का हिसाब मांगना भी लोकतांत्रिक जिम्मेदारी है। हम उन्हें अधिकार बताते हैं, लेकिन अधिकारों की रक्षा के लिए आवश्यक सजगता नहीं सिखाते।

कहावत है—“बूंद-बूंद से घड़ा भरता है।” लेकिन लोकतंत्र में एक और सच्चाई है—बूंद-बूंद से भरा घड़ा चुप्पी से खाली भी हो सकता है। सार्वजनिक धन हमेशा किसी एक बड़े घोटाले से नष्ट नहीं होता। वह कई बार नागरिक उदासीनता, कमजोर निगरानी, अधूरी परियोजनाओं, अनुत्तरदायी प्रशासन और उस सामूहिक मानसिकता से क्षीण होता है जो मान बैठती है कि यह सब उसका विषय नहीं है।

शायद इसलिए आज भारत के सामने सबसे बड़ा आर्थिक प्रश्न यह नहीं है कि सरकार कितना खर्च कर रही है, और न ही यह कि नागरिक कितना कमा रहा है।

सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या इस देश का नागरिक अपने नाम पर खर्च होने वाले धन को वास्तव में अपना मानता भी है या नहीं।

क्योंकि जिस दिन जनता यह समझ जाएगी कि सरकारी खजाना वास्तव में जनता की सामूहिक तिजोरी है, उस दिन लोकतंत्र केवल चुनावों की व्यवस्था नहीं रहेगा। वह वास्तविक जन-स्वामित्व की व्यवस्था बन जाएगा। उस दिन परिवर्तन किसी नए नेता, नई योजना या नए नारे से नहीं आएगा। वह उस साधारण नागरिक से आएगा जो पहली बार यह तय करेगा कि जैसे वह अपने घर के खर्च पर नज़र रखता है, वैसे ही अपने देश के खर्च पर भी रखेगा।

और तब इतिहास शायद हमसे यह नहीं पूछेगा कि हमने कितना कमाया।

वह यह पूछेगा कि हमने अपने बच्चों को कमाई की कला तो सिखा दी, लेकिन क्या हमने उन्हें यह भी सिखाया कि उनकी मेहनत से बनने वाले राष्ट्रीय खजाने का प्रहरी कौन होगा?

लेखक :  सी एम जैन
संपर्क : +91 9408887777
 

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एक देश, अनेक शिक्षा प्रणालियाँ !

क्या समान अवसर केवल संविधान की किताबों तक सीमित है?
यदि भारत एक है, तो क्या उसके बच्चों की शिक्षा भी कम-से-कम एक जैसी नहीं होनी चाहिए?विशेष संपादकीय | खोजी विश्लेषण

भारत को अक्सर “विविधताओं का देश” कहा जाता है। भाषाएँ अलग हैं, पहनावे अलग हैं, संस्कृतियाँ अलग हैं और जीवन-शैली भी अलग-अलग है। यही विविधता भारत की सबसे बड़ी शक्ति मानी जाती है। लेकिन एक प्रश्न ऐसा है, जिसे हमने शायद कभी गंभीरता से पूछने की कोशिश ही नहीं की—क्या शिक्षा भी विविधता का विषय होनी चाहिए, या समान अवसर का?

आज भारत का हर बच्चा चाहे राजस्थान में जन्मा हो, बिहार में, गुजरात में, तमिलनाडु में या असम में—वह अंततः उसी भारत का नागरिक है। आगे चलकर वही बच्चा UPSC देगा, वही JEE और NEET देगा, वही सेना में भर्ती होगा, वही न्यायपालिका, प्रशासन, विज्ञान, उद्योग और राजनीति में अपनी जगह बनाएगा। राष्ट्रीय प्रतियोगिताएँ सबके लिए समान हैं, लेकिन उन प्रतियोगिताओं तक पहुँचने का रास्ता सबके लिए समान नहीं है। यही भारतीय शिक्षा व्यवस्था का सबसे बड़ा विरोधाभास है।

संविधान का अनुच्छेद 14 सभी नागरिकों को कानून के समक्ष समानता का अधिकार देता है। अनुच्छेद 21A प्रत्येक बच्चे को शिक्षा का अधिकार देता है। नीति-निर्देशक तत्व राज्य से अपेक्षा करते हैं कि वह समान अवसर उपलब्ध कराए। लेकिन व्यवहार में भारत की शिक्षा व्यवस्था अनेक परतों में बँटी हुई दिखाई देती है। कहीं राज्य बोर्ड, कहीं CBSE, कहीं ICSE, कहीं अलग-अलग क्षेत्रीय पाठ्यक्रम। परिणाम यह है कि एक ही कक्षा में पढ़ने वाले दो बच्चों का शैक्षणिक आधार केवल इसलिए अलग हो सकता है क्योंकि उनका जन्म अलग-अलग राज्यों में हुआ।

यहाँ प्रश्न यह नहीं है कि राज्यों को अपनी भाषा, संस्कृति या इतिहास पढ़ाने का अधिकार होना चाहिए या नहीं। होना चाहिए, और अवश्य होना चाहिए। भारत की विविधता का सम्मान लोकतंत्र की मूल भावना है। प्रश्न यह है कि क्या गणित, विज्ञान, संविधान, नागरिक शास्त्र, अर्थव्यवस्था, डिजिटल साक्षरता और बुनियादी जीवन-कौशल जैसे विषयों का न्यूनतम स्तर भी राज्य-राज्य में अलग होना चाहिए?

जब राष्ट्रीय प्रतियोगी परीक्षा में प्रश्नपत्र समान होता है, तब तैयारी की बुनियाद अलग क्यों है? यदि अंतिम दौड़ एक ही ट्रैक पर होनी है, तो शुरुआती रेखा अलग-अलग क्यों खींची गई है?

शिक्षा विशेषज्ञ वर्षों से इस ओर ध्यान दिलाते रहे हैं कि भारत में केवल पाठ्यक्रम ही नहीं, बल्कि शिक्षा की गुणवत्ता भी अत्यंत असमान है। कहीं प्रयोगशालाएँ हैं, कहीं केवल नाम मात्र की। कहीं प्रशिक्षित शिक्षक हैं, कहीं वर्षों से रिक्त पद। कहीं डिजिटल बोर्ड और कृत्रिम बुद्धिमत्ता की प्रयोगशालाएँ हैं, तो कहीं बच्चों के पास बैठने के लिए पर्याप्त बेंच तक नहीं। ऐसे में केवल “समान परीक्षा” की बात करना, समान अवसर की गारंटी नहीं बन जाता।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 ने शिक्षा सुधार की दिशा में कई महत्वपूर्ण प्रस्ताव रखे। बुनियादी साक्षरता, कौशल विकास, बहुभाषिकता और लचीले पाठ्यक्रम जैसे विचार स्वागतयोग्य हैं। लेकिन आज भी भारत में ऐसा कोई राष्ट्रीय न्यूनतम शैक्षणिक मानक नहीं है, जो यह सुनिश्चित करे कि देश के हर बच्चे ने कम-से-कम समान बुनियादी ज्ञान प्राप्त किया है। यही वह खाली स्थान है, जिस पर गंभीर चर्चा की आवश्यकता है।

समस्या केवल पाठ्यक्रम की नहीं है। किताबें अलग, उनकी कीमतें अलग, निजी विद्यालयों की फीस अलग, यूनिफॉर्म की व्यवस्था अलग, डिजिटल संसाधनों की उपलब्धता अलग। कई स्थानों पर अभिभावकों को विद्यालय द्वारा निर्धारित विशेष दुकानों से ही किताबें और यूनिफॉर्म खरीदनी पड़ती हैं। शिक्षा धीरे-धीरे अधिकार से अधिक बाज़ार का विषय बनती दिखाई देती है। यदि दो समान आय वाले परिवार अलग-अलग राज्यों में रहते हैं, तो संभव है कि उनके बच्चों की शिक्षा पर होने वाला खर्च और मिलने वाली गुणवत्ता दोनों अलग हों।

यहाँ एक महत्वपूर्ण आपत्ति भी सामने आती है। कई लोग कहते हैं कि भारत जैसा विविध देश एक समान शिक्षा व्यवस्था को स्वीकार नहीं कर सकता। राज्यों की अपनी ऐतिहासिक, भाषाई और सांस्कृतिक आवश्यकताएँ हैं। यह तर्क महत्वपूर्ण है और इसे नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। वास्तव में किसी भी सुधार का उद्देश्य राज्यों की पहचान समाप्त करना नहीं होना चाहिए।

इसीलिए समाधान “One Nation, One Syllabus” नहीं, बल्कि One Nation, One Minimum Education Standard” हो सकता है।

इसका अर्थ यह नहीं कि तमिलनाडु राजस्थान का इतिहास पढ़ाए या राजस्थान के विद्यालय मलयालम पढ़ाएँ। इसका अर्थ यह है कि देश का प्रत्येक बच्चा, चाहे वह किसी भी बोर्ड में पढ़ता हो, कम-से-कम गणित, विज्ञान, संविधान, नागरिक शास्त्र, भारतीय इतिहास की मूल रूपरेखा, अर्थव्यवस्था, डिजिटल साक्षरता, पर्यावरण और जीवन-कौशल का एक समान राष्ट्रीय स्तर प्राप्त करे। इसके ऊपर राज्य अपनी भाषा, साहित्य, संस्कृति, भूगोल और स्थानीय इतिहास पढ़ाएँ। विविधता भी बचे और समान अवसर भी।

ऐसी व्यवस्था केवल छात्रों के लिए नहीं, बल्कि पूरे राष्ट्र के लिए लाभकारी होगी। इससे राष्ट्रीय प्रतियोगी परीक्षाओं में आधारभूत असमानता कम होगी। राज्यों के बीच शैक्षणिक तुलना सरल होगी। शिक्षा की गुणवत्ता का मूल्यांकन अधिक वस्तुनिष्ठ हो सकेगा। और सबसे महत्वपूर्ण—किसी बच्चे का भविष्य उसके जन्मस्थान से कम और उसकी प्रतिभा व मेहनत से अधिक निर्धारित होगा।

इस चर्चा में फीस का प्रश्न भी उतना ही महत्वपूर्ण है। शिक्षा यदि अधिकार है, तो उसकी पहुँच भी समान होनी चाहिए। यह व्यावहारिक रूप से संभव नहीं कि देश के हर निजी विद्यालय की फीस एक जैसी हो, क्योंकि भूमि, वेतन और संचालन लागत अलग-अलग हैं। लेकिन यह अवश्य संभव है कि फीस निर्धारण के लिए पारदर्शी राष्ट्रीय मानक हों, मनमानी वृद्धि पर नियंत्रण हो और आर्थिक रूप से कमजोर छात्रों के लिए सहायता की प्रभावी व्यवस्था हो। शिक्षा का उद्देश्य लाभ कमाना नहीं, नागरिक बनाना होना चाहिए।

यूनिफॉर्म के प्रश्न पर भी बहस आवश्यक है। पूरे देश में एक जैसी पोशाक व्यावहारिक न हो, लेकिन कम-से-कम ऐसा ड्रेस कोड विकसित किया जा सकता है जो अनावश्यक आर्थिक बोझ कम करे। यूनिफॉर्म किसी एक विक्रेता से खरीदने की बाध्यता समाप्त हो और अभिभावकों को खुले बाज़ार से निर्धारित मानक के अनुसार वस्त्र खरीदने की स्वतंत्रता मिले। इससे शिक्षा से जुड़े अनेक छोटे-छोटे आर्थिक शोषण स्वतः समाप्त हो सकते हैं।

आज भारत “विश्वगुरु” बनने की आकांक्षा रखता है। लेकिन कोई भी राष्ट्र अपनी शिक्षा व्यवस्था से ऊपर नहीं उठ सकता। विश्व की अग्रणी अर्थव्यवस्थाओं ने पहले अपनी शिक्षा व्यवस्था को मजबूत किया, उसके बाद विज्ञान, उद्योग और नवाचार में नेतृत्व प्राप्त किया। यदि भारत को वास्तव में ज्ञान-आधारित अर्थव्यवस्था बनना है, तो सबसे पहले उसे अपने बच्चों के लिए समान प्रारंभिक अवसर सुनिश्चित करने होंगे।

यह लेख किसी राज्य के विरुद्ध नहीं है, किसी बोर्ड के विरुद्ध नहीं है और न ही किसी सरकार के विरुद्ध। यह केवल एक प्रश्न उठाता है—क्या भारत के बच्चों को कम-से-कम समान बुनियादी शिक्षा का अधिकार मिलना चाहिए?

यदि उत्तर “हाँ” है, तो अब बहस केवल शिक्षा नीति पर नहीं, बल्कि शिक्षा समानता पर होनी चाहिए। शायद समय आ गया है कि देश National Minimum Education Standard” पर गंभीर राष्ट्रीय विमर्श शुरू करे—ऐसा मानक जो राज्यों की विविधता का सम्मान करे, लेकिन बच्चों के भविष्य में असमानता न पैदा करे।

क्योंकि अंततः प्रश्न केवल शिक्षा का नहीं है। प्रश्न उस भारत का है, जहाँ एक बच्चे की सफलता उसकी प्रतिभा और परिश्रम से तय हो—न कि उसके पिन कोड, बोर्ड या राज्य से। और शायद लोकतंत्र में इससे बड़ा प्रश्न कोई नहीं हो सकता।

लेखक :  सी एम जैन
संपर्क : +91 9408887777
 

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पीएम-अजय आदर्श ग्राम कंपोनेंट के तहत देश भर में 47,328 गांवों का चयन, तेलंगाना में 435 गांव

भारत सरकार अनुसूचित जाति समुदायों के सामाजिक-आर्थिक विकास को बढ़ावा देने के लिए अपने आदर्श ग्राम कंपोनेंट के तहत गांवों के एकीकृत विकास के माध्यम से प्रधानमंत्री अनुसूचित जाति अभ्युदय योजना (पीएम-अजय) लागू कर रही है। इस योजना का उद्देश्य केंद्र और राज्य सरकार की योजनाओं के कनवर्जेंस और प्रमुख विकास कमियों को दूर करके प्रमुख सामाजिक-आर्थिक संकेतकों का सैचुरेशन सुनिश्चित करना है।

सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता राज्य मंत्री श्री रामदास अठावले ने राज्यसभा में श्री अनिल कुमार यादव मंडाडी को दिए एक लिखित जवाब में यह जानकारी साझा की। सदन को बताया गया कि पीएम-अजय के आदर्श ग्राम घटक के तहत देशभर में 47,328 गांवों का चयन किया गया है, जिनमें तेलंगाना के 435 गांव शामिल हैं। चयनित गांवों का राज्यवार विवरण सदन के पटल पर रख दिया गया है।

लिखित उत्तर में आगे कहा गया कि आदर्श ग्राम कंपोनेंट शिक्षा सहित 10 क्षेत्रों में 50 निगरानी योग्य सामाजिक-आर्थिक संकेतकों की पूर्णता के माध्यम से चयनित गांवों के एकीकृत विकास पर केंद्रित है। इन संकेतकों की बेसलाइन स्टेटस स्थापित करने के लिए एक नीड असेसमेंट सर्वे आयोजित किया जाता है। पहचानी गई कमियों को केंद्र व राज्य सरकार की योजनाओं के समन्वय से या पीएम-अजय के तहत सहायता प्राप्त हस्तक्षेपों द्वारा दूर किया जाता है। राज्यों द्वारा की गई प्रगति को पीएमएजीवाई पोर्टल पर नियमित रूप से अपडेट किया जाता है।

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सदन को यह भी सूचित किया गया कि इस योजना के अंतर्गत देशभर में 3,28,131 विकास कार्यों और 1,10,51,213 लाभार्थियों की पहचान की गई है। इनमें से अब तक 46,642 विकास कार्य पूरे हो चुके हैं, जिससे 47,59,399 लाभार्थी लाभान्वित हुए हैं।

तेलंगाना के संबंध में, लिखित उत्तर में कहा गया कि शिक्षा क्षेत्र के तहत 3,529 लाभार्थियों की पहचान की गई है, जिनमें से 472 लाभार्थियों को योजना के तहत लाभ प्राप्त हो चुका है।

थर्ड-पार्टी ऑडिट के संबंध में पूछे गए प्रश्न का उत्तर देते हुए सदन को बताया गया कि राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को पीएम-

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प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने ‘विकसित भारत के लिए नशा मुक्त युवा संकल्प अभियान’ का शुभारंभ किया; प्रत्येक नागरिक से इस अभियान से जुड़ने का आह्वान किया

प्रधानमंत्री  नरेन्द्र मोदी ने आज ‘विकसित भारत के लिए नशा मुक्त युवा संकल्प अभियान’ का शुभारंभ किया। इस अवसर पर आयोजित राष्ट्रव्यापी वीडियो कॉन्फ्रेंस को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री ने 28,000 से अधिक स्थानों से जुड़े एक करोड़ से अधिक युवा नागरिकों सहित विविध समूहों का औपचारिक रूप से स्वागत किया। इस अवसर के सामूहिक महत्व को रेखांकित करते हुए प्रधानमंत्री ने इसे राष्ट्र के एक महत्वपूर्ण सामूहिक संकल्प का अवसर बताया। श्री मोदी ने कहा, “आज हम सभी देशवासी एक महान और महत्वपूर्ण संकल्प के लिए एकजुट हुए हैं।”

प्रधानमंत्री ने इस पहल की व्यापक प्रकृति को रेखांकित करते हुए कहा कि यह अभियान केवल व्यक्ति के स्वास्थ्य तक सीमित नहीं है, बल्कि परिवार, समाज और पूरे राष्ट्र के व्यापक हितों से जुड़ा हुआ है।’विकसित भारत के लिए नशा मुक्त युवा संकल्प अभियान’ के मूल उद्देश्य पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने कहा कि विकसित भारत के लक्ष्य की प्राप्ति के लिए यह आवश्यक है कि देश की युवा पीढ़ी शारीरिक रूप से स्वस्थ, मानसिक रूप से सशक्त, आत्मविश्वास से परिपूर्ण और नशे जैसी आत्म विनाशकारी आदतों से पूरी तरह मुक्त हो। श्री मोदी ने कहा, “आज जब राष्ट्र ने विकसित भारत का लक्ष्य निर्धारित किया है, तब यह आवश्यक है कि देश का युवा शारीरिक और मानसिक रूप से स्वस्थ रहे, आत्मविश्वास से भरपूर हो और नशे जैसी विनाशकारी आदतों से हमेशा दूर रहे।”

अभियान की शुरुआत का उल्लेख करते हुए प्रधानमंत्री ने संतोष व्यक्त किया कि यह पहल पिछले वर्ष पवित्र भूमि काशी से एक प्रायोगिक परियोजना के रूप में शुरू की गई थी। उन्होंने कहा कि वैज्ञानिक स्पष्टता, आध्यात्मिक ऊर्जा और गहरे सांस्कृतिक समर्पण के अनूठे समन्वय से प्रेरित इस अभियान का व्यापक विस्तार हुआ है। श्री मोदी ने कहा, “काशी घोषणा के तहत 125 से अधिक आध्यात्मिक संगठनों और अनेक गैर-सरकारी संगठनों (एनजीओ) के सहयोग से शुरू हुई यह जन कल्याणकारी पहल अब सफलतापूर्वक एक राष्ट्रीय परियोजना बन गई है।”

प्रधानमंत्री का स्वागत करते हुए केंद्रीय युवा कार्यक्रम एवं खेल तथा श्रम एवं रोजगार मंत्री डॉ. मनसुख मांडविया ने कहा कि “विकसित भारत के लिए नशा मुक्त युवा संकल्प अभियान” का शुभारंभ, प्रधानमंत्री के विकसित भारत @2047 के विजन को साकार करने की दिशा में एक और महत्वपूर्ण पड़ाव है। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री ने राष्ट्र निर्माण के केंद्र में हमेशा भारत के युवाओं को रखा है और उन्हें अमृत काल की प्रेरक शक्ति के रूप में देखा है।

इस विजन से प्रेरित होकर सरकार ने युवाओं को स्वयंसेवा, नेतृत्व, मार्गदर्शन और राष्ट्र सेवा के अवसर उपलब्ध कराने के लिए मेरा युवा भारत (MY Bharat) को एकल खिड़की मंच के रूप में स्थापित किया है, जिसके माध्यम से देशभर के 2.23 करोड़ से अधिक युवा जुड़े हैं। लाल किले से प्रधानमंत्री द्वारा नशा मुक्त भारत के आह्वान का उल्लेख करते हुए डॉ. मांडविया ने कहा कि मेरा युवा भारत (MY Bharat) निरंतर युवा भागीदारी के माध्यम से इस मिशन को आगे बढ़ा रहा है।

उन्होंने आगे कहा कि 100 सप्ताह की कार्य योजना और प्रमुख आध्यात्मिक संगठनों के साथ विचार-विमर्श के माध्यम से तैयार काशी घोषणा ने मादक पदार्थों के दुरुपयोग के विरुद्ध देशव्यापी जन आंदोलन की नींव रखी है। अभियान के प्रति विश्वास व्यक्त करते हुए उन्होंने कहा कि जिस प्रकार प्रधानमंत्री के नेतृत्व में जन भागीदारी ने स्वच्छ भारत, फिट इंडिया और कई अन्य राष्ट्रीय अभियानों को जन आंदोलन की सफलता में परिवर्तित किया है, उसी प्रकार “विकसित भारत के लिए नशा मुक्त युवा संकल्प अभियान” भी लाखों-करोड़ों भारतीय युवाओं को स्वस्थ, नशा मुक्त और विकसित भारत के निर्माण में योगदान देने के लिए प्रेरित करेगा।

केंद्रीय युवा कार्यक्रम एवं खेल राज्य मंत्री श्रीमती रक्षा निखिल खडसे, 26 राज्यों के राज्यपालों और 11 राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने भी इस राष्ट्रव्यापी अभियान में भाग लिया।

नशा विरोधी शपथ लेने वाले लाखों युवाओं की सराहना करते हुए प्रधानमंत्री ने उनके नशामुक्त जीवन जीने के संकल्प और अपने विद्यालयों, महाविद्यालयों तथा समुदायों में नशा मुक्त जीवन का संदेश सक्रिय रूप से प्रसारित करने के प्रयासों की प्रशंसा की। अभियान की महत्वाकांक्षी 100 सप्ताह की कार्य योजना का उल्लेख करते हुए प्रधानमंत्री ने बताया कि प्रत्येक आगामी रविवार को कला, संस्कृति, खेल और ध्यान से संबंधित विशेष गतिविधियां आयोजित की जाएंगी, जिससे नए प्रतिभागियों को लगातार जोड़ा जा सकेगा।

श्री मोदी ने कहा, “आने वाले 100 रविवार निश्चित रूप से पूरी तरह नशा मुक्त भारत की दिशा में 100 सशक्त कदम साबित होंगे।”

छात्रों, राष्ट्रीय सेवा योजना (एनएसएस) के सदस्यों और मेरा युवा भारत (MY Bharat) के स्वयंसेवकों की विशाल ऑनलाइन सभा को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री ने देश के युवाओं द्वारा प्रदर्शित जागरूकता, संवेदनशीलता और गंभीर प्रतिबद्धता पर गर्व व्यक्त किया।

युवा पीढ़ी को भारत की ‘अमृत पीढ़ी’ बताते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि उनकी ऊर्जा, कल्पनाशक्ति और प्रतिभा वर्ष 2047 तक देश के विकास लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।

श्री मोदी ने कहा, “देश के उज्ज्वल भविष्य और अपने स्वयं के जीवन के लिए यह अत्यंत आवश्यक है कि आप स्वयं को नशे से पूरी तरह मुक्त रखें।”

संशोधन के बाद यह संस्करण PIB राजभाषा शैली के अनुरूप है। इसमें तकनीकी शब्दावली, सरकारी भाषा और मूल अंग्रेजी अर्थ का मिलान कर दिया गया है।

नशीले पदार्थों के दुरुपयोग के विनाशकारी प्रभावों की तुलना करते हुए प्रधानमंत्री ने आज के युवाओं की स्टार्टअप, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, खेल और अंतरिक्ष अन्वेषण के क्षेत्र में उत्कृष्ट उपलब्धियों का उल्लेख किया और चेतावनी दी कि नशे की लत किस प्रकार एकाग्रता को भटकाती है तथा सपनों को नष्ट कर देती है। परिवारों पर पड़ने वाले इसके गंभीर दुष्प्रभावों को रेखांकित करते हुए उन्होंने कहा कि इससे माता-पिता के सपने टूटते हैं और बुजुर्गों को प्रतिदिन पीड़ा का सामना करना पड़ता है। उन्होंने समाज पर पड़ने वाले इसके व्यापक प्रभावों पर भी प्रकाश डाला। श्री मोदी ने कहा, “जब किसी परिवार या समाज में यह विनाश होता है, तो पूरे राष्ट्र की समग्र शक्ति भी कमजोर हो जाती है।”

युवाओं को नशीले पदार्थों की भ्रामक प्रकृति से आगाह करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि नशीले पदार्थों से मिलने वाला क्षणिक नशे का प्रभाव अंततः उनके करियर और पारिवारिक जीवन के लिए स्थायी नुकसान का कारण बनता है। भारतीय संस्कृति और आध्यात्मिक गुरुओं के गहन ज्ञान, जिसमें श्री गुरु ग्रंथ साहिब की शिक्षाओं का भी उल्लेख शामिल है, का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि भारतीय समाज ने ऐतिहासिक रूप से चेतना को प्रभावित करने वाले पदार्थों को स्वीकार नहीं किया है। श्री मोदी ने कहा, “हमें किसी भी परिस्थिति में नशे को किसी भी प्रकार की सामाजिक स्वीकृति नहीं देनी चाहिए।”

नशे की लत से मुक्ति के लिए उपलब्ध व्यापक सहायता प्रणालियों का उल्लेख करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि सामाजिक सहयोग, योग, ध्यान और आधुनिक पुनर्वास केंद्र नशे की आदत को दूर करने में प्रभावी भूमिका निभा रहे हैं। उन्होंने परिवारों से सामाजिक प्रतिष्ठा से जुड़ी गलत चिंताओं के बजाय चिकित्सा सहायता को प्राथमिकता देने का आग्रह किया। साथ ही, उन्होंने घरों में खुले संवाद की संस्कृति को बढ़ावा देने की अपील की, ताकि संवेदनशील बच्चे नशे के जाल में फंसने से बच सकें। श्री मोदी ने कहा, “यदि कोई युवा गलती से नशे की लत में पड़ गया है, तो इसका अर्थ यह बिल्कुल नहीं है कि उसके सभी रास्ते हमेशा के लिए बंद हो गए हैं।”

शैक्षणिक क्षेत्र से जुड़े लोगों से विशेष अपील करते हुए प्रधानमंत्री ने कॉलेजों और विश्वविद्यालयों के शिक्षकों से आग्रह किया कि वे अपने नियमित पाठ्यक्रम में नशीले पदार्थों के खतरों से संबंधित चर्चाओं को सक्रिय रूप से शामिल करें और अपने परिसरों में नशा विरोधी विशेष अभियान शुरू करें। नशे की लत से उबर रहे लोगों का उल्लेख करते हुए उन्होंने समाज से उनके प्रति सम्मान और दूसरा अवसर देने का आह्वान किया तथा उनके अतीत से जुड़े कलंक को पूरी तरह अस्वीकार करने की बात कही। श्री मोदी ने कहा, “नशे की लत से संघर्ष कर बाहर आने वाले युवा कमजोर नहीं होते; वे सच्चे योद्धा होते हैं, जिनका अद्भुत साहस ही उनकी वास्तविक पहचान है।”

अपने संबोधन के समापन पर प्रधानमंत्री ने युवाओं को आश्वस्त किया कि इस महत्वपूर्ण लड़ाई में सरकार उनके साथ मजबूती से खड़ी है। उन्होंने देश भर में नशीले पदार्थों के खिलाफ की गई अभूतपूर्व कड़ी कार्रवाई, हजारों करोड़ रुपये मूल्य की जब्ती और नशीले पदार्थों के तस्करों तथा कारोबारियों के खिलाफ बढ़ती गिरफ्तारियों का उल्लेख किया। युवा पीढ़ी की दृढ़ता पर अटूट विश्वास व्यक्त करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि यह राष्ट्रीय अभियान अत्यंत सफल होगा। श्री मोदी ने कहा, “मुझे विश्वास है कि हमारे युवा नशे से मुक्त रहकर अपनी ऊर्जा की रक्षा करेंगे और विकसित भारत के संकल्पों को आगे बढ़ाएंगे।”

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योग दिवस पर विभिन्न कार्यक्रम आयोजित

भारतीय स्वरूप संवाददाता कानपुर दयानंद गर्ल्स पीजी कॉलेज के प्रांगण में योग शिविर का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का उद्घाटन सेल्फ फाइनेंस डायरेक्टर प्रोफेसर अर्चना वर्मा ने किया। योग शिविर का संचालन रेंजर प्रभारी प्रोफेसर स्वाति सक्सेना ने किया तथा बताया योग शरीर और मस्तिष्क को जोड़ने की एक सफल विधि है यदि स्वस्थ शरीर होगा तो मस्तिष्क भी स्वस्थ होगा और आम जीवन शैली में व्यक्ति बेहतर जीवन की पाएगा। विषय प्रवर्तन डॉ दीपाली सक्सेना ने किया की स्वस्थ वृद्धावस्था के लिए योग कितना आवश्यक है और थीम के विशिष्ट पहलुओं चर्चा कीl योगा फॉर ऑल और स्वस्थ वृद्धावस्था के लिए योग विषय पर कार्यक्रम में मुख्य प्रशिक्षक योग संस्थान हरिद्वार के प्रोफेसर सीडी यादव सर . ने छात्राओं को योग के महत्व को बताया कि कैसे योग को वर्तमान जीवन शैली में शामिल करके हम स्वस्थ जीवन जी सकते हैं छात्राओं को बताया कि अपने परिवार तथा आस पास पड़ोस में स्वस्थ वृद्धावस्था के लिए योग की थीम के अनुसार छात्राएं कैसे जागरूकता कर सकती हैं योग को हमें आम जनमानस तक कैसे पहुंचlना है.. छात्रों को प्राणायाम अनुलोम विलोम भ्रामरी उत्तानपादासन पद्मासन जैसे अनिवार्य आसनों के माध्यम से बताया गया शरीर के सभी अंगों को कैसे स्वस्थ रखा जा सकता है सर्वप्रथम प्रार्थना कराई गई और अंत में लाफिंग थेरेपी की गई की कैसे शारीरिक और मानसिक विकारों से मुक्ति पाई जा सकती है l धन्यवाद ज्ञापन डॉ विनीत श्रीवास्तव ने दिया l

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एसोसिएशन आफ स्माल एंड मीडियम न्यूज़ पेपर्स आफ इंडिया की राष्ट्रीय परिषद की बैठक दिल्ली के यूपी भवन में संपन्न

भारतीय स्वरूप संवाददाता कानपुर, एसोसिएशन आफ स्माल एंड मीडियम न्यूज़ पेपर्स आफ इंडिया के राष्ट्रीय परिषद की बैठक यूपी भवन मीटिंग रुम में बड़े उत्साह पूर्ण वातावरण में सम्पन्न हुई। बैठक में समाचार पत्र पंजीयक योगेश बवेजा और अतिरिक्त पंजीयक संतोश कुमार विशेष रूप से उपस्थित रहें तथा सदस्यों की समस्याओं को सुना और संतोष जनक कार्यवाही का आश्वासन भी दिया। सदस्यों ने पीआरजीआइ के पोर्टल संबधी समस्याएं उठाइ तथा एडिट का आप्शन देने की मांग की। जिसे समाचार पत्र पंजीयक ने स्वीकार कर लिया। बैठक में यूपी, उत्तराखण्ड, दिल्ली, मध्य प्रदेश, आंध्र प्रदेश, तैलंगाना, तमिलनाडु, राजस्थान महाराष्ट्र, गुजरात उडीसा से आए राष्ट्रीय पार्षदों ने भाग लिया और अपने विचार तथा छोटे समाचार पत्रों की समस्याएं उठाई। बैठक का संचालन महामंत्री शंकर कतीरा ने किया तथा अध्यक्षता राष्ट्रीय अध्यक्ष केशव दत्त चंदोला ने किया। बैठक में भगवती चन्दोला, निशा रस्तोगी, श्याम सिंह पंवार, अतुल दीक्षित, प्रवीण पाटिल, आलोक अग्निहोत्री, गोपाल गुप्ता, कुंडलराव सेंडी रेड्डी, के स्वयं प्रकाश, आदि ने अपने विचार व्यक्त किए बैठक के प्रारम्भ में समाचार पत्र पंजीयक योगेश बवेजा, अपर प्रेम पंजीयक संतोष कुमार, गौहाटी के सुरेश गारोदिया, और दिल्ली के सुरेश अग्रवाल को शाल उढ़ा कर उनका स्वागत सम्मान किया गया।

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संगीत को जीने वालों ने सजाई सुरों की शानदार महफिल

भारतीय स्वरूप संवाददाता कानपुर , गीत संगीत सुनने और जीने का शौक रखने वालों के लिए रविवार का दिन अत्यंत खूबसूरत रहा कार्यक्रम में कानपुर और आस पास के शहरों के संगीत में रुचि रखने वालों के लिए खुशनुमा त्यौहार जैसा था। कार्यक्रम के आयोजन का विचार रेलबाजार निवासी गोविंद सिंह का था, जिसे अति अल्प समय में बेहद खूबसूरत तरीके से क्रियान्वित करने का कार्य उनकी टीम खासकर बॉबी खान, टेक्निकल टीम के चौधरी भाई आदि ने बखूबी निभाया, मंच संचालन कर रहे बॉबी खान की फुलझड़ियों और माही के अंदाज ने सबका मन मोह लियामाँ शारदे का आशीर्वाद लेकर और विघ्न विनाशक श्री गणेश जी की कृपा पाकर कार्यक्रम का शुभारंभ सुमधुर बांसुरी वादन और गोविंद जी के गायन से हुआ,

समाज के विभिन्न क्षेत्रों जैसे समाजसेवा, मीडिया आदि से भी लोगों की सहभागिता रही।  म्यूजिकल किसी भी कार्यक्रम की सफलता के दो मुख्य घटक गायक/गायिका और श्रोता होते है, और कहना पड़ेगा कि इस मामले में सारे श्रोता बेहद शालीन और अनुशासित दिखे । पूरे कार्यक्रम के दौरान मौजूद सभी श्रोताओं ने गायक गायिकाओं का जोरदार उत्साहवर्धन किया।. इस मंच के तत्वावधान में पहला आयोजन होने के कारण आयोजकों में पहले जो असमंजस और डर था , थोड़ी ही देर में सभी के परफॉर्मेंस और सहयोग से दूर हो गया। पूरे दिन एक से बढ़कर एक नए और पुराने गीतों की वो स्वर लहरी बही कि कोई भी उससे अछूता नहीं रह गया।

कार्यक्रम में राजेंद्र श्रीवास्तव , आशीष अवस्थी , दिवाकर शुक्ला, अतुल दीक्षित , गिरीश मारवाह ,आरती त्रिपाठी , अंजना अवस्थी , रेनू अग्रवाल , रेनू अवस्थी ,सुषमा श्रीवास्तव , प्रीति श्रीवास्तव, भारती दीक्षित, नीलम दीक्षित, स्मिता श्रीवास्तव आदि की धमाकेदार गीतों की प्रस्तुति को सबने खूब सराहा।

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