एक गरीब पिता का बच्चा बाज़ार में खिलौना देखकर जिद करता है। पिता कीमत पूछता है, जेब टटोलता है, फिर बच्चे का हाथ पकड़कर आगे बढ़ जाता है। बच्चा सोचता है कि शायद पिताजी उसे खिलौना नहीं दिलाना चाहते। लेकिन पिता जानता है कि महीने की तनख्वाह अभी आधी भी नहीं बची और घर में राशन, बिजली का बिल, स्कूल की फीस और दवा के खर्च अभी बाकी हैं। उसी शहर में कोई माँ अपनी बेटी की कोचिंग का सपना टाल रही है, कोई बुज़ुर्ग डॉक्टर की पूरी पर्ची नहीं खरीद पा रहा, कोई परिवार बरसों से अपने घर की टूटी छत को प्लास्टिक से ढँककर मानसून निकाल रहा है। भारत के करोड़ों घरों में हर दिन इच्छाओं की हत्या होती है ताकि बजट जीवित रह सके।
लेकिन इसी कहानी का एक दूसरा पात्र भी है, जिसके बारे में बहुत कम बात होती है।
वही पिता जब पेट्रोल भरवाता है, टैक्स देता है। वही मजदूर जब मोबाइल रिचार्ज कराता है, टैक्स देता है। वही किसान जब डीज़ल खरीदता है, टैक्स देता है। वही गृहिणी जब साबुन, तेल, कपड़ा, दवा या बच्चों की कॉपी खरीदती है, तब भी टैक्स देती है। भारत में करोड़ों लोग आयकर न देते हों, लेकिन कर-मुक्त जीवन लगभग कोई नहीं जीता। वस्तु एवं सेवा कर, ईंधन कर, शुल्क, उपकर और अनेक अप्रत्यक्ष करों के माध्यम से हर दिन जनता का पैसा सरकारी खजाने तक पहुँचता है। यानी जो परिवार अपने घर का हर रुपया बचाने के लिए संघर्ष कर रहा है, वही परिवार हर दिन सरकार की तिजोरी भी भर रहा है।
यहीं से लोकतंत्र का सबसे बड़ा विरोधाभास शुरू होता है।
हम अपने घर में सौ रुपये के अतिरिक्त खर्च पर बहस कर लेते हैं। बच्चा महंगा खिलौना मांग ले तो उसे समझा देते हैं। घर में पुताई टाल देते हैं। पुरानी बाइक कुछ साल और चलाते हैं। शादी-ब्याह में खर्च काट देते हैं। लेकिन उसी समय लाखों करोड़ रुपये के सार्वजनिक खर्च पर लगभग मौन रहते हैं। जिस देश में एक परिवार पंखा बदलने से पहले दस बार सोचता है, उसी देश में सार्वजनिक धन के उपयोग पर नागरिक बहस कितनी होती है? शायद उतनी नहीं जितनी किसी क्रिकेट मैच, फिल्म या चुनावी नारे पर होती है।
सबसे बड़ा भ्रम दो शब्दों में छिपा है—“सरकारी पैसा”।
यह शब्द सुनते ही नागरिक और धन के बीच का रिश्ता टूट जाता है। जैसे वह पैसा किसी और का हो। जबकि वास्तविकता इसके ठीक विपरीत है। सरकार का अपना कोई खेत नहीं है जहाँ से फसल उगती हो। उसका कोई निजी कारखाना नहीं है जहाँ से मुनाफा आता हो। सरकार की तिजोरी में रखा लगभग हर रुपया किसी न किसी नागरिक की जेब से आया है। लेकिन जैसे ही वह रुपया सरकारी खजाने में पहुँचता है, जनता उससे अपना भावनात्मक और नैतिक स्वामित्व छोड़ देती है।
यही लोकतंत्र की सबसे महंगी भूल है।
भारत का केंद्रीय बजट अब दर्जनों लाख करोड़ रुपये के स्तर पर पहुँच चुका है। राज्यों के बजट जोड़ दिए जाएँ तो सार्वजनिक धन का आकार और भी विशाल हो जाता है। यह राशि इतनी बड़ी है कि सामान्य नागरिक उसकी कल्पना भी नहीं कर सकता। लेकिन समस्या राशि की विशालता नहीं है। समस्या यह है कि जिन लोगों की मेहनत से यह धन एकत्र होता है, वे ही अक्सर उसके उपयोग पर सबसे कम निगरानी रखते हैं।
ज़रा सोचिए, एक परिवार पाँच लोगों के साथ एक मोटरसाइकिल पर बैठकर बाज़ार जा रहा है। बच्चे बीच में दबे हुए हैं, माँ पीछे किसी तरह संतुलन बनाए हुए है। उसी सड़क पर एक चमचमाती सरकारी गाड़ी निकलती है। गाड़ी में एक बड़ा अधिकारी बैठा है, अपने पालतू कुत्ते को सेहला रहा है। गाड़ी गलत नहीं है। सरकारी कामकाज के लिए वाहन आवश्यक हैं। प्रश्न वाहन का नहीं है। प्रश्न उस मानसिक दूरी का है जो धीरे-धीरे नागरिक और व्यवस्था के बीच पैदा हो गई है। जिस व्यवस्था का खर्च नागरिक उठा रहा है, क्या वह व्यवस्था नागरिक के जीवन की कठिनाइयों को उसी गंभीरता से महसूस करती है?
कबीर ने लिखा था—“साईं इतना दीजिए, जामे कुटुम समाय।” यह केवल व्यक्ति का नहीं, शासन का भी आदर्श हो सकता है। किसी भी सभ्य शासन की महानता उसके खर्च की मात्रा से नहीं, बल्कि उसके खर्च की नैतिकता और उपयोगिता से मापी जानी चाहिए। क्योंकि सार्वजनिक धन केवल लेखांकन की इकाई नहीं होता; वह किसी की अधूरी पढ़ाई, किसी की छूटी हुई दवा, किसी का टला हुआ इलाज, किसी की स्थगित शादी और किसी बच्चे के अधूरे सपनों का संचित रूप होता है।
यहीं एक और असुविधाजनक प्रश्न सामने आता है। यदि जनता अपने पैसे की रखवाली नहीं करेगी, तो कौन करेगा?
सूचना का अधिकार कानून इसी प्रश्न का उत्तर देने का प्रयास था। RTI केवल कागज़ देखने का अधिकार नहीं है। वह लोकतंत्र का स्मरणपत्र है। वह नागरिक को याद दिलाता है कि वह केवल मतदाता नहीं, बल्कि सार्वजनिक संसाधनों का संरक्षक भी है। जब कोई व्यक्ति पूछता है कि सड़क निर्माण के लिए कितना बजट स्वीकृत हुआ, अस्पताल के लिए कितना धन आया, स्कूल की मरम्मत पर कितना खर्च हुआ, तब वह केवल सूचना नहीं मांग रहा होता; वह लोकतंत्र को उसकी मूल स्थिति में वापस लाने की कोशिश कर रहा होता है।
लेकिन यहाँ एक और विडंबना है। हम अपने बच्चों को बचत सिखाते हैं, पर नागरिकता नहीं। हम उन्हें गुल्लक देते हैं, पर यह नहीं बताते कि देश का बजट भी एक राष्ट्रीय गुल्लक है। हम उन्हें कमाना सिखाते हैं, पर यह नहीं सिखाते कि उनके नाम पर खर्च होने वाले धन का हिसाब मांगना भी लोकतांत्रिक जिम्मेदारी है। हम उन्हें अधिकार बताते हैं, लेकिन अधिकारों की रक्षा के लिए आवश्यक सजगता नहीं सिखाते।
कहावत है—“बूंद-बूंद से घड़ा भरता है।” लेकिन लोकतंत्र में एक और सच्चाई है—बूंद-बूंद से भरा घड़ा चुप्पी से खाली भी हो सकता है। सार्वजनिक धन हमेशा किसी एक बड़े घोटाले से नष्ट नहीं होता। वह कई बार नागरिक उदासीनता, कमजोर निगरानी, अधूरी परियोजनाओं, अनुत्तरदायी प्रशासन और उस सामूहिक मानसिकता से क्षीण होता है जो मान बैठती है कि यह सब उसका विषय नहीं है।
शायद इसलिए आज भारत के सामने सबसे बड़ा आर्थिक प्रश्न यह नहीं है कि सरकार कितना खर्च कर रही है, और न ही यह कि नागरिक कितना कमा रहा है।
सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या इस देश का नागरिक अपने नाम पर खर्च होने वाले धन को वास्तव में अपना मानता भी है या नहीं।
क्योंकि जिस दिन जनता यह समझ जाएगी कि सरकारी खजाना वास्तव में जनता की सामूहिक तिजोरी है, उस दिन लोकतंत्र केवल चुनावों की व्यवस्था नहीं रहेगा। वह वास्तविक जन-स्वामित्व की व्यवस्था बन जाएगा। उस दिन परिवर्तन किसी नए नेता, नई योजना या नए नारे से नहीं आएगा। वह उस साधारण नागरिक से आएगा जो पहली बार यह तय करेगा कि जैसे वह अपने घर के खर्च पर नज़र रखता है, वैसे ही अपने देश के खर्च पर भी रखेगा।
और तब इतिहास शायद हमसे यह नहीं पूछेगा कि हमने कितना कमाया।
वह यह पूछेगा कि हमने अपने बच्चों को कमाई की कला तो सिखा दी, लेकिन क्या हमने उन्हें यह भी सिखाया कि उनकी मेहनत से बनने वाले राष्ट्रीय खजाने का प्रहरी कौन होगा?
लेखक : सी एम जैन
संपर्क : +91 9408887777
भारतीय स्वरुप दैनिक ई-पेपर
भारत में बाल विवाह एक ऐसी सामाजिक और भौगोलिक चुनौती है, जो आधुनिक विकास और शिक्षा विस्तार के बावजूद आज भी अनेक समुदायों में गहराई तक जड़ें जमाए हुए है। यह प्रथा विशेष रूप से लड़कियों के जीवन को प्रभावित करती है—उनकी शिक्षा, स्वास्थ्य, सुरक्षा, अवसर, क्षमता और आत्मनिर्भर भविष्य, सभी पर इसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-5 (2019–21) के अनुसार 20–24 वर्ष आयु-वर्ग की 23.3% महिलाओं का विवाह 18 वर्ष से पहले ही हो चुका था। यह तथ्य इस बात का संकेत है कि कानूनी निषेध और नीति-हस्तक्षेपों के बावजूद सामाजिक-जड़ता, परंपरा और असमान विकास के कारण बाल विवाह अब भी पूरी तरह समाप्त नहीं हो पाया है। इसके स्थानिक पैटर्न भी विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं—पूर्वी और मध्य भारत के कई राज्य, जैसे बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल, असम और छत्तीसगढ़, अभी भी बाल विवाह की उच्चतम दर वाले क्षेत्रों में आते हैं। इन राज्यों में शिक्षा और स्वास्थ्य अवसंरचना का कमजोर होना, ग्रामीण निर्धनता का व्यापक होना, सामाजिक-पितृसत्तात्मक मान्यताओं का प्रबल होना और महिलाओं की निम्न साक्षरता दर जैसे कारक इस कुप्रथा को बनाए रखते हैं। कम आयु में विवाह लड़कियों को शारीरिक और मानसिक दोनों स्तरों पर अनेक जोखिमों के सामने ला देता है—कम उम्र में गर्भधारण से मातृ एवं नवजात मृत्यु दर बढ़ती है, कुपोषण और एनीमिया की समस्याएँ गंभीर रूप ले लेती हैं और प्रजनन स्वास्थ्य पर दीर्घकालिक असर पड़ता है। शिक्षा रुक जाने से लड़कियों के कौशल-विकास, रोजगार और आजीविका के अवसर भी सीमित हो जाते हैं, जिससे उनकी सामाजिक-आर्थिक प्रगति बाधित होती है। भारतीय न्याय संहिता (2023) ने 18 वर्ष से कम आयु की पत्नी के साथ यौन संबंध को बलात्कार की श्रेणी में रखा है, जबकि सर्वोच्च न्यायालय ने भी विभिन्न याचिकाओं में राज्यों को बाल विवाह पर कड़ा नियंत्रण लागू करने के निर्देश दिए हैं। भारत सरकार द्वारा 2025 तक बाल विवाह की दर को 23.3% से घटाकर 10% तक लाने और 2030 तक देश को बाल विवाह-मुक्त बनाने का लक्ष्य भी इसी दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए विवाह पंजीकरण को अनिवार्य रूप से बढ़ावा देना, समुदायों और धार्मिक संस्थानों को जागरूकता अभियानों में शामिल करना, महिलाओं को नेतृत्वकारी भूमिकाओं में सक्षम बनाना, तथा बाल संरक्षण एजेंसियों की क्षमता को मजबूत करना जैसे बहुआयामी उपाय लागू किए जा रहे हैं। समग्रतः, बाल विवाह केवल एक कानूनी उल्लंघन नहीं, बल्कि शिक्षा, स्वास्थ्य, लैंगिक समानता और क्षेत्रीय विकास से जुड़ी एक गहरी सामाजिक-संरचनात्मक समस्या है, जिसका समाधान तभी संभव है जब सरकार, समाज और परिवार—तीनों स्तरों पर सतत और सामूहिक प्रयास किए जाएँ।~डॉ रश्मि गोयल
दोस्तों ! महकता हुआ मखमली गुलाब कुदरत की दी हुई बेहतरीन सौग़ात हमें फूल के रूप में मिली है जिसे वेलेंटाइन के मौक़े पर बहुत से चाहने वाले अपने प्यार का इज़हार करने के लिये ढेरों,
क्लाउड सीडिंग, यानी कृत्रिम वर्षा उत्पन्न करने की एक वैज्ञानिक तकनीक। जब बादल मौजूद होते हुए भी वर्षा नहीं होती, तब वैज्ञानिक उनमें कुछ रासायनिक तत्वों का छिड़काव करते हैं, जिससे जलवाष्प संघनित होकर वर्षा की बूंदों में बदल जाती है।आमतौर पर इसमें सिल्वर आयोडाइड, पोटेशियम आयोडाइड या ड्राई आइस जैसे पदार्थों का प्रयोग किया जाता है।आज बढ़ते तापमान, घटते जलस्तर, पिघलते ग्लेशियर और जल–विनाश की वजह से सूखे की स्थिति गंभीर होती जा रही है। ऐसे में क्लाउड सीडिंग को एक आशाजनक समाधान के रूप में देखा जा रहा है।यह तकनीक कई देशों में लंबे समय से सफलतापूर्वक अपनाई जा रही है, जबकि भारत में अभी यह सीमित स्तर पर ही प्रयोग में है।हाल के वर्षों में भारत सरकार और कई राज्य सरकारें सूखे से निपटने के लिए इस तकनीक को अपनाने की दिशा में कदम बढ़ा रही हैं।महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और उत्तर प्रदेश के कुछ क्षेत्रों में इसका प्रयोग हो चुका है।हालाँकि यह भी सच है कि हर जगह या हर मौसम में क्लाउड सीडिंग कारगर नहीं होती।अगर बादलों में नमी का स्तर या तापमान अनुकूल न हो, तो वर्षा की संभावना कम हो जाती है।इस प्रक्रिया के लिए वायुमंडलीय परिस्थितियाँ, ऊर्जा और नमी का सही संतुलन होना जरूरी है।इसी कारण बिना मौसम अनुमान के क्लाउड सीडिंग करना महंगा और व्यर्थ साबित हो सकता है।दिल्ली–एनसीआर, हरियाणा, उत्तर प्रदेश और गंगा के मैदानी इलाकों में यह तकनीक वायु प्रदूषण घटाने के उपाय के रूप में भी चर्चा में रही है।ठंड के मौसम में जब वायुमंडलीय परतें नीचे बैठ जाती हैं और प्रदूषक कण ऊपर नहीं जा पाते, तब हवा की गुणवत्ता “खराब” या “बहुत खराब” स्तर पर पहुँच जाती है।ऐसे में यदि मौसम अनुकूल हो तो क्लाउड सीडिंग प्रदूषण कम करने का एक संभावित उपाय हो सकता है।
भारतीय स्वरूप संवाददाता
भारतीय स्वरूप संवाददाता