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सबसे बड़ा भ्रम दो शब्द—“सरकारी पैसा”!

एक गरीब पिता का बच्चा बाज़ार में खिलौना देखकर जिद करता है। पिता कीमत पूछता है, जेब टटोलता है, फिर बच्चे का हाथ पकड़कर आगे बढ़ जाता है। बच्चा सोचता है कि शायद पिताजी उसे खिलौना नहीं दिलाना चाहते। लेकिन पिता जानता है कि महीने की तनख्वाह अभी आधी भी नहीं बची और घर में राशन, बिजली का बिल, स्कूल की फीस और दवा के खर्च अभी बाकी हैं। उसी शहर में कोई माँ अपनी बेटी की कोचिंग का सपना टाल रही है, कोई बुज़ुर्ग डॉक्टर की पूरी पर्ची नहीं खरीद पा रहा, कोई परिवार बरसों से अपने घर की टूटी छत को प्लास्टिक से ढँककर मानसून निकाल रहा है। भारत के करोड़ों घरों में हर दिन इच्छाओं की हत्या होती है ताकि बजट जीवित रह सके।

लेकिन इसी कहानी का एक दूसरा पात्र भी है, जिसके बारे में बहुत कम बात होती है।

वही पिता जब पेट्रोल भरवाता है, टैक्स देता है। वही मजदूर जब मोबाइल रिचार्ज कराता है, टैक्स देता है। वही किसान जब डीज़ल खरीदता है, टैक्स देता है। वही गृहिणी जब साबुन, तेल, कपड़ा, दवा या बच्चों की कॉपी खरीदती है, तब भी टैक्स देती है। भारत में करोड़ों लोग आयकर न देते हों, लेकिन कर-मुक्त जीवन लगभग कोई नहीं जीता। वस्तु एवं सेवा कर, ईंधन कर, शुल्क, उपकर और अनेक अप्रत्यक्ष करों के माध्यम से हर दिन जनता का पैसा सरकारी खजाने तक पहुँचता है। यानी जो परिवार अपने घर का हर रुपया बचाने के लिए संघर्ष कर रहा है, वही परिवार हर दिन सरकार की तिजोरी भी भर रहा है।

यहीं से लोकतंत्र का सबसे बड़ा विरोधाभास शुरू होता है।

हम अपने घर में सौ रुपये के अतिरिक्त खर्च पर बहस कर लेते हैं। बच्चा महंगा खिलौना मांग ले तो उसे समझा देते हैं। घर में पुताई टाल देते हैं। पुरानी बाइक कुछ साल और चलाते हैं। शादी-ब्याह में खर्च काट देते हैं। लेकिन उसी समय लाखों करोड़ रुपये के सार्वजनिक खर्च पर लगभग मौन रहते हैं। जिस देश में एक परिवार पंखा बदलने से पहले दस बार सोचता है, उसी देश में सार्वजनिक धन के उपयोग पर नागरिक बहस कितनी होती है? शायद उतनी नहीं जितनी किसी क्रिकेट मैच, फिल्म या चुनावी नारे पर होती है।

सबसे बड़ा भ्रम दो शब्दों में छिपा है—“सरकारी पैसा”।

यह शब्द सुनते ही नागरिक और धन के बीच का रिश्ता टूट जाता है। जैसे वह पैसा किसी और का हो। जबकि वास्तविकता इसके ठीक विपरीत है। सरकार का अपना कोई खेत नहीं है जहाँ से फसल उगती हो। उसका कोई निजी कारखाना नहीं है जहाँ से मुनाफा आता हो। सरकार की तिजोरी में रखा लगभग हर रुपया किसी न किसी नागरिक की जेब से आया है। लेकिन जैसे ही वह रुपया सरकारी खजाने में पहुँचता है, जनता उससे अपना भावनात्मक और नैतिक स्वामित्व छोड़ देती है।

यही लोकतंत्र की सबसे महंगी भूल है।

भारत का केंद्रीय बजट अब दर्जनों लाख करोड़ रुपये के स्तर पर पहुँच चुका है। राज्यों के बजट जोड़ दिए जाएँ तो सार्वजनिक धन का आकार और भी विशाल हो जाता है। यह राशि इतनी बड़ी है कि सामान्य नागरिक उसकी कल्पना भी नहीं कर सकता। लेकिन समस्या राशि की विशालता नहीं है। समस्या यह है कि जिन लोगों की मेहनत से यह धन एकत्र होता है, वे ही अक्सर उसके उपयोग पर सबसे कम निगरानी रखते हैं।

ज़रा सोचिए, एक परिवार पाँच लोगों के साथ एक मोटरसाइकिल पर बैठकर बाज़ार जा रहा है। बच्चे बीच में दबे हुए हैं, माँ पीछे किसी तरह संतुलन बनाए हुए है। उसी सड़क पर एक चमचमाती सरकारी गाड़ी निकलती है। गाड़ी में एक बड़ा अधिकारी बैठा है, अपने पालतू कुत्ते को सेहला रहा है।   गाड़ी गलत नहीं है। सरकारी कामकाज के लिए वाहन आवश्यक हैं। प्रश्न वाहन का नहीं है। प्रश्न उस मानसिक दूरी का है जो धीरे-धीरे नागरिक और व्यवस्था के बीच पैदा हो गई है। जिस व्यवस्था का खर्च नागरिक उठा रहा है, क्या वह व्यवस्था नागरिक के जीवन की कठिनाइयों को उसी गंभीरता से महसूस करती है?

कबीर ने लिखा था—“साईं इतना दीजिए, जामे कुटुम समाय।” यह केवल व्यक्ति का नहीं, शासन का भी आदर्श हो सकता है। किसी भी सभ्य शासन की महानता उसके खर्च की मात्रा से नहीं, बल्कि उसके खर्च की नैतिकता और उपयोगिता से मापी जानी चाहिए। क्योंकि सार्वजनिक धन केवल लेखांकन की इकाई नहीं होता; वह किसी की अधूरी पढ़ाई, किसी की छूटी हुई दवा, किसी का टला हुआ इलाज, किसी की स्थगित शादी और किसी बच्चे के अधूरे सपनों का संचित रूप होता है।

यहीं एक और असुविधाजनक प्रश्न सामने आता है। यदि जनता अपने पैसे की रखवाली नहीं करेगी, तो कौन करेगा?

सूचना का अधिकार कानून इसी प्रश्न का उत्तर देने का प्रयास था। RTI केवल कागज़ देखने का अधिकार नहीं है। वह लोकतंत्र का स्मरणपत्र है। वह नागरिक को याद दिलाता है कि वह केवल मतदाता नहीं, बल्कि सार्वजनिक संसाधनों का संरक्षक भी है। जब कोई व्यक्ति पूछता है कि सड़क निर्माण के लिए कितना बजट स्वीकृत हुआ, अस्पताल के लिए कितना धन आया, स्कूल की मरम्मत पर कितना खर्च हुआ, तब वह केवल सूचना नहीं मांग रहा होता; वह लोकतंत्र को उसकी मूल स्थिति में वापस लाने की कोशिश कर रहा होता है।

लेकिन यहाँ एक और विडंबना है। हम अपने बच्चों को बचत सिखाते हैं, पर नागरिकता नहीं। हम उन्हें गुल्लक देते हैं, पर यह नहीं बताते कि देश का बजट भी एक राष्ट्रीय गुल्लक है। हम उन्हें कमाना सिखाते हैं, पर यह नहीं सिखाते कि उनके नाम पर खर्च होने वाले धन का हिसाब मांगना भी लोकतांत्रिक जिम्मेदारी है। हम उन्हें अधिकार बताते हैं, लेकिन अधिकारों की रक्षा के लिए आवश्यक सजगता नहीं सिखाते।

कहावत है—“बूंद-बूंद से घड़ा भरता है।” लेकिन लोकतंत्र में एक और सच्चाई है—बूंद-बूंद से भरा घड़ा चुप्पी से खाली भी हो सकता है। सार्वजनिक धन हमेशा किसी एक बड़े घोटाले से नष्ट नहीं होता। वह कई बार नागरिक उदासीनता, कमजोर निगरानी, अधूरी परियोजनाओं, अनुत्तरदायी प्रशासन और उस सामूहिक मानसिकता से क्षीण होता है जो मान बैठती है कि यह सब उसका विषय नहीं है।

शायद इसलिए आज भारत के सामने सबसे बड़ा आर्थिक प्रश्न यह नहीं है कि सरकार कितना खर्च कर रही है, और न ही यह कि नागरिक कितना कमा रहा है।

सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या इस देश का नागरिक अपने नाम पर खर्च होने वाले धन को वास्तव में अपना मानता भी है या नहीं।

क्योंकि जिस दिन जनता यह समझ जाएगी कि सरकारी खजाना वास्तव में जनता की सामूहिक तिजोरी है, उस दिन लोकतंत्र केवल चुनावों की व्यवस्था नहीं रहेगा। वह वास्तविक जन-स्वामित्व की व्यवस्था बन जाएगा। उस दिन परिवर्तन किसी नए नेता, नई योजना या नए नारे से नहीं आएगा। वह उस साधारण नागरिक से आएगा जो पहली बार यह तय करेगा कि जैसे वह अपने घर के खर्च पर नज़र रखता है, वैसे ही अपने देश के खर्च पर भी रखेगा।

और तब इतिहास शायद हमसे यह नहीं पूछेगा कि हमने कितना कमाया।

वह यह पूछेगा कि हमने अपने बच्चों को कमाई की कला तो सिखा दी, लेकिन क्या हमने उन्हें यह भी सिखाया कि उनकी मेहनत से बनने वाले राष्ट्रीय खजाने का प्रहरी कौन होगा?

लेखक :  सी एम जैन
संपर्क : +91 9408887777
 

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एक देश, अनेक शिक्षा प्रणालियाँ !

क्या समान अवसर केवल संविधान की किताबों तक सीमित है?
यदि भारत एक है, तो क्या उसके बच्चों की शिक्षा भी कम-से-कम एक जैसी नहीं होनी चाहिए?विशेष संपादकीय | खोजी विश्लेषण

भारत को अक्सर “विविधताओं का देश” कहा जाता है। भाषाएँ अलग हैं, पहनावे अलग हैं, संस्कृतियाँ अलग हैं और जीवन-शैली भी अलग-अलग है। यही विविधता भारत की सबसे बड़ी शक्ति मानी जाती है। लेकिन एक प्रश्न ऐसा है, जिसे हमने शायद कभी गंभीरता से पूछने की कोशिश ही नहीं की—क्या शिक्षा भी विविधता का विषय होनी चाहिए, या समान अवसर का?

आज भारत का हर बच्चा चाहे राजस्थान में जन्मा हो, बिहार में, गुजरात में, तमिलनाडु में या असम में—वह अंततः उसी भारत का नागरिक है। आगे चलकर वही बच्चा UPSC देगा, वही JEE और NEET देगा, वही सेना में भर्ती होगा, वही न्यायपालिका, प्रशासन, विज्ञान, उद्योग और राजनीति में अपनी जगह बनाएगा। राष्ट्रीय प्रतियोगिताएँ सबके लिए समान हैं, लेकिन उन प्रतियोगिताओं तक पहुँचने का रास्ता सबके लिए समान नहीं है। यही भारतीय शिक्षा व्यवस्था का सबसे बड़ा विरोधाभास है।

संविधान का अनुच्छेद 14 सभी नागरिकों को कानून के समक्ष समानता का अधिकार देता है। अनुच्छेद 21A प्रत्येक बच्चे को शिक्षा का अधिकार देता है। नीति-निर्देशक तत्व राज्य से अपेक्षा करते हैं कि वह समान अवसर उपलब्ध कराए। लेकिन व्यवहार में भारत की शिक्षा व्यवस्था अनेक परतों में बँटी हुई दिखाई देती है। कहीं राज्य बोर्ड, कहीं CBSE, कहीं ICSE, कहीं अलग-अलग क्षेत्रीय पाठ्यक्रम। परिणाम यह है कि एक ही कक्षा में पढ़ने वाले दो बच्चों का शैक्षणिक आधार केवल इसलिए अलग हो सकता है क्योंकि उनका जन्म अलग-अलग राज्यों में हुआ।

यहाँ प्रश्न यह नहीं है कि राज्यों को अपनी भाषा, संस्कृति या इतिहास पढ़ाने का अधिकार होना चाहिए या नहीं। होना चाहिए, और अवश्य होना चाहिए। भारत की विविधता का सम्मान लोकतंत्र की मूल भावना है। प्रश्न यह है कि क्या गणित, विज्ञान, संविधान, नागरिक शास्त्र, अर्थव्यवस्था, डिजिटल साक्षरता और बुनियादी जीवन-कौशल जैसे विषयों का न्यूनतम स्तर भी राज्य-राज्य में अलग होना चाहिए?

जब राष्ट्रीय प्रतियोगी परीक्षा में प्रश्नपत्र समान होता है, तब तैयारी की बुनियाद अलग क्यों है? यदि अंतिम दौड़ एक ही ट्रैक पर होनी है, तो शुरुआती रेखा अलग-अलग क्यों खींची गई है?

शिक्षा विशेषज्ञ वर्षों से इस ओर ध्यान दिलाते रहे हैं कि भारत में केवल पाठ्यक्रम ही नहीं, बल्कि शिक्षा की गुणवत्ता भी अत्यंत असमान है। कहीं प्रयोगशालाएँ हैं, कहीं केवल नाम मात्र की। कहीं प्रशिक्षित शिक्षक हैं, कहीं वर्षों से रिक्त पद। कहीं डिजिटल बोर्ड और कृत्रिम बुद्धिमत्ता की प्रयोगशालाएँ हैं, तो कहीं बच्चों के पास बैठने के लिए पर्याप्त बेंच तक नहीं। ऐसे में केवल “समान परीक्षा” की बात करना, समान अवसर की गारंटी नहीं बन जाता।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 ने शिक्षा सुधार की दिशा में कई महत्वपूर्ण प्रस्ताव रखे। बुनियादी साक्षरता, कौशल विकास, बहुभाषिकता और लचीले पाठ्यक्रम जैसे विचार स्वागतयोग्य हैं। लेकिन आज भी भारत में ऐसा कोई राष्ट्रीय न्यूनतम शैक्षणिक मानक नहीं है, जो यह सुनिश्चित करे कि देश के हर बच्चे ने कम-से-कम समान बुनियादी ज्ञान प्राप्त किया है। यही वह खाली स्थान है, जिस पर गंभीर चर्चा की आवश्यकता है।

समस्या केवल पाठ्यक्रम की नहीं है। किताबें अलग, उनकी कीमतें अलग, निजी विद्यालयों की फीस अलग, यूनिफॉर्म की व्यवस्था अलग, डिजिटल संसाधनों की उपलब्धता अलग। कई स्थानों पर अभिभावकों को विद्यालय द्वारा निर्धारित विशेष दुकानों से ही किताबें और यूनिफॉर्म खरीदनी पड़ती हैं। शिक्षा धीरे-धीरे अधिकार से अधिक बाज़ार का विषय बनती दिखाई देती है। यदि दो समान आय वाले परिवार अलग-अलग राज्यों में रहते हैं, तो संभव है कि उनके बच्चों की शिक्षा पर होने वाला खर्च और मिलने वाली गुणवत्ता दोनों अलग हों।

यहाँ एक महत्वपूर्ण आपत्ति भी सामने आती है। कई लोग कहते हैं कि भारत जैसा विविध देश एक समान शिक्षा व्यवस्था को स्वीकार नहीं कर सकता। राज्यों की अपनी ऐतिहासिक, भाषाई और सांस्कृतिक आवश्यकताएँ हैं। यह तर्क महत्वपूर्ण है और इसे नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। वास्तव में किसी भी सुधार का उद्देश्य राज्यों की पहचान समाप्त करना नहीं होना चाहिए।

इसीलिए समाधान “One Nation, One Syllabus” नहीं, बल्कि One Nation, One Minimum Education Standard” हो सकता है।

इसका अर्थ यह नहीं कि तमिलनाडु राजस्थान का इतिहास पढ़ाए या राजस्थान के विद्यालय मलयालम पढ़ाएँ। इसका अर्थ यह है कि देश का प्रत्येक बच्चा, चाहे वह किसी भी बोर्ड में पढ़ता हो, कम-से-कम गणित, विज्ञान, संविधान, नागरिक शास्त्र, भारतीय इतिहास की मूल रूपरेखा, अर्थव्यवस्था, डिजिटल साक्षरता, पर्यावरण और जीवन-कौशल का एक समान राष्ट्रीय स्तर प्राप्त करे। इसके ऊपर राज्य अपनी भाषा, साहित्य, संस्कृति, भूगोल और स्थानीय इतिहास पढ़ाएँ। विविधता भी बचे और समान अवसर भी।

ऐसी व्यवस्था केवल छात्रों के लिए नहीं, बल्कि पूरे राष्ट्र के लिए लाभकारी होगी। इससे राष्ट्रीय प्रतियोगी परीक्षाओं में आधारभूत असमानता कम होगी। राज्यों के बीच शैक्षणिक तुलना सरल होगी। शिक्षा की गुणवत्ता का मूल्यांकन अधिक वस्तुनिष्ठ हो सकेगा। और सबसे महत्वपूर्ण—किसी बच्चे का भविष्य उसके जन्मस्थान से कम और उसकी प्रतिभा व मेहनत से अधिक निर्धारित होगा।

इस चर्चा में फीस का प्रश्न भी उतना ही महत्वपूर्ण है। शिक्षा यदि अधिकार है, तो उसकी पहुँच भी समान होनी चाहिए। यह व्यावहारिक रूप से संभव नहीं कि देश के हर निजी विद्यालय की फीस एक जैसी हो, क्योंकि भूमि, वेतन और संचालन लागत अलग-अलग हैं। लेकिन यह अवश्य संभव है कि फीस निर्धारण के लिए पारदर्शी राष्ट्रीय मानक हों, मनमानी वृद्धि पर नियंत्रण हो और आर्थिक रूप से कमजोर छात्रों के लिए सहायता की प्रभावी व्यवस्था हो। शिक्षा का उद्देश्य लाभ कमाना नहीं, नागरिक बनाना होना चाहिए।

यूनिफॉर्म के प्रश्न पर भी बहस आवश्यक है। पूरे देश में एक जैसी पोशाक व्यावहारिक न हो, लेकिन कम-से-कम ऐसा ड्रेस कोड विकसित किया जा सकता है जो अनावश्यक आर्थिक बोझ कम करे। यूनिफॉर्म किसी एक विक्रेता से खरीदने की बाध्यता समाप्त हो और अभिभावकों को खुले बाज़ार से निर्धारित मानक के अनुसार वस्त्र खरीदने की स्वतंत्रता मिले। इससे शिक्षा से जुड़े अनेक छोटे-छोटे आर्थिक शोषण स्वतः समाप्त हो सकते हैं।

आज भारत “विश्वगुरु” बनने की आकांक्षा रखता है। लेकिन कोई भी राष्ट्र अपनी शिक्षा व्यवस्था से ऊपर नहीं उठ सकता। विश्व की अग्रणी अर्थव्यवस्थाओं ने पहले अपनी शिक्षा व्यवस्था को मजबूत किया, उसके बाद विज्ञान, उद्योग और नवाचार में नेतृत्व प्राप्त किया। यदि भारत को वास्तव में ज्ञान-आधारित अर्थव्यवस्था बनना है, तो सबसे पहले उसे अपने बच्चों के लिए समान प्रारंभिक अवसर सुनिश्चित करने होंगे।

यह लेख किसी राज्य के विरुद्ध नहीं है, किसी बोर्ड के विरुद्ध नहीं है और न ही किसी सरकार के विरुद्ध। यह केवल एक प्रश्न उठाता है—क्या भारत के बच्चों को कम-से-कम समान बुनियादी शिक्षा का अधिकार मिलना चाहिए?

यदि उत्तर “हाँ” है, तो अब बहस केवल शिक्षा नीति पर नहीं, बल्कि शिक्षा समानता पर होनी चाहिए। शायद समय आ गया है कि देश National Minimum Education Standard” पर गंभीर राष्ट्रीय विमर्श शुरू करे—ऐसा मानक जो राज्यों की विविधता का सम्मान करे, लेकिन बच्चों के भविष्य में असमानता न पैदा करे।

क्योंकि अंततः प्रश्न केवल शिक्षा का नहीं है। प्रश्न उस भारत का है, जहाँ एक बच्चे की सफलता उसकी प्रतिभा और परिश्रम से तय हो—न कि उसके पिन कोड, बोर्ड या राज्य से। और शायद लोकतंत्र में इससे बड़ा प्रश्न कोई नहीं हो सकता।

लेखक :  सी एम जैन
संपर्क : +91 9408887777
 

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उपराष्ट्रपति सी. पी. राधाकृष्णन ने कॉफी टेबल बुक ‘अटल बिहारी वाजपेयी: द इटरनल स्टेट्समैन’ का विमोचन किया

उपराष्ट्रपति  सी. पी. राधाकृष्णन ने आज नई दिल्ली के डॉ. अंबेडकर इंटरनेशनल सेंटर में श्री विजय गोयल द्वारा लिखित कॉफी टेबल बुक ‘अटल बिहारी वाजपेयी: द इटरनल स्टेट्समैन’ का विमोचन किया।

अपने संबोधन में उपराष्ट्रपति ने इस अवसर को सम्मानजनक और भावनात्मक क्षण बताया और कहा कि यह पुस्तक भारत के एक महानतम नेताओं में से एक, भारत रत्न श्री अटल बिहारी वाजपेयी को अर्पित उपयुक्त श्रद्धांजलि है। उन्होंने कहा कि यह प्रकाशन केवल तस्वीरों का संग्रह नहीं है, बल्कि एक ऐसे राजनेता का उत्सव है, जिनका जीवन और विरासत राष्ट्र को निरन्तर प्रेरणा देती है।

श्री वाजपेयी के साथ अपने व्यक्तिगत संबंधों को याद करते हुए उपराष्ट्रपति ने कहा कि उन्हें श्री वाजपेयी के प्रधानमंत्री कार्यकाल के दौरान 12वें और 13वें लोकसभा के सदस्य के रूप में सेवा देने का अवसर प्राप्त हुआ। उन्होंने कहा कि 1974 में कोयंबटूर में उन्होंने एक जनसभा का आयोजन किया था, जिसे श्री वाजपेयी ने संबोधित किया था, इस स्मरण को साझा करते हुए उन्होंने इसे अपने सार्वजनिक जीवन के प्रारंभिक वर्षों का अत्यंत प्रेरणादायक अनुभव बताया।

उपराष्ट्रपति ने कहा कि संसद सदस्य से प्रधानमंत्री तक श्री वाजपेयी की यात्रा भारतीय लोकतंत्र की ताकत को प्रतिबिंबित करती है। तीव्र राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता के दौरान भी, उन्होंने अपनी निष्ठा, समावेशी दृष्टिकोण और गरिमापूर्ण आचरण के लिए सभी राजनीतिक दलों के बीच सम्मान अर्जित किया।

श्री वाजपेयी के नेतृत्व की प्रमुख उपलब्धियों पर प्रकाश डालते हुए उपराष्ट्रपति ने पोखरण परमाणु परीक्षण और दिल्ली मेट्रो जैसी दूरदर्शी अवसंरचना पहलों का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि श्री वाजपेयी ने यह दिखाया कि ताकत और संवेदनशीलता साथ-साथ चल सकती हैं और वे हमेशा संवाद, लोकतंत्र और विकास को मार्गदर्शक सिद्धांत मानते थे।

श्री वाजपेयी को एक उत्कृष्ट कवि, दूरदर्शी और संसद सदस्य के रूप में वर्णित करते हुए, उपराष्ट्रपति ने कहा कि उनके भाषण संसद और देश दोनों को प्रभावित करते थे और उनमें बिना अप्रिय हुए असहमति जताने की दुर्लभ क्षमता थी — एक ऐसा गुण, जो सार्वजनिक जीवन में आवश्यक है।

कॉफी टेबल बुक की रचना के लिए श्री विजय गोयल की सराहना करते हुए उपराष्ट्रपति ने कहा कि यह कार्य दुर्लभ तस्वीरों, व्यक्तिगत किस्सों और अभिलेखीय सामग्री के माध्यम से इतिहास को जीवंत स्मृति के रूप में संरक्षित करता है। उन्होंने आशा व्यक्त करते हुए कहा कि यह पुस्तक देशभर में घरों और संस्थानों तक पहुंचेगी, विशेष रूप से नई पीढ़ी को राष्ट्रीय एकता, लोकतंत्र और सामाजिक सद्भाव के आदर्शों को आत्मसात करने के लिए प्रेरित करेगी।

इस अवसर पर बिहार के राज्यपाल श्री आरिफ मोहम्मद खान; हरियाणा के राज्यपाल प्रो. अशिम कुमार घोष; राजस्थान के राज्यपाल श्री हरिभाऊ किसनराव बागड़े; पूर्व केंद्रीय मंत्री डॉ. मुरली मनोहर जोशी; और गांधी स्मृति एवं दर्शन समिति के उपाध्यक्ष श्री विजय गोयल सहित अन्य विशिष्ट अतिथि उपस्थित थे।

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बाल विवाह: भारतीय समाज की स्थानिक-सामाजिक चुनौती

भारत में बाल विवाह एक ऐसी सामाजिक और भौगोलिक चुनौती है, जो आधुनिक विकास और शिक्षा विस्तार के बावजूद आज भी अनेक समुदायों में गहराई तक जड़ें जमाए हुए है। यह प्रथा विशेष रूप से लड़कियों के जीवन को प्रभावित करती है—उनकी शिक्षा, स्वास्थ्य, सुरक्षा, अवसर, क्षमता और आत्मनिर्भर भविष्य, सभी पर इसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-5 (2019–21) के अनुसार 20–24 वर्ष आयु-वर्ग की 23.3% महिलाओं का विवाह 18 वर्ष से पहले ही हो चुका था। यह तथ्य इस बात का संकेत है कि कानूनी निषेध और नीति-हस्तक्षेपों के बावजूद सामाजिक-जड़ता, परंपरा और असमान विकास के कारण बाल विवाह अब भी पूरी तरह समाप्त नहीं हो पाया है। इसके स्थानिक पैटर्न भी विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं—पूर्वी और मध्य भारत के कई राज्य, जैसे बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल, असम और छत्तीसगढ़, अभी भी बाल विवाह की उच्चतम दर वाले क्षेत्रों में आते हैं। इन राज्यों में शिक्षा और स्वास्थ्य अवसंरचना का कमजोर होना, ग्रामीण निर्धनता का व्यापक होना, सामाजिक-पितृसत्तात्मक मान्यताओं का प्रबल होना और महिलाओं की निम्न साक्षरता दर जैसे कारक इस कुप्रथा को बनाए रखते हैं। कम आयु में विवाह लड़कियों को शारीरिक और मानसिक दोनों स्तरों पर अनेक जोखिमों के सामने ला देता है—कम उम्र में गर्भधारण से मातृ एवं नवजात मृत्यु दर बढ़ती है, कुपोषण और एनीमिया की समस्याएँ गंभीर रूप ले लेती हैं और प्रजनन स्वास्थ्य पर दीर्घकालिक असर पड़ता है। शिक्षा रुक जाने से लड़कियों के कौशल-विकास, रोजगार और आजीविका के अवसर भी सीमित हो जाते हैं, जिससे उनकी सामाजिक-आर्थिक प्रगति बाधित होती है। भारतीय न्याय संहिता (2023) ने 18 वर्ष से कम आयु की पत्नी के साथ यौन संबंध को बलात्कार की श्रेणी में रखा है, जबकि सर्वोच्च न्यायालय ने भी विभिन्न याचिकाओं में राज्यों को बाल विवाह पर कड़ा नियंत्रण लागू करने के निर्देश दिए हैं। भारत सरकार द्वारा 2025 तक बाल विवाह की दर को 23.3% से घटाकर 10% तक लाने और 2030 तक देश को बाल विवाह-मुक्त बनाने का लक्ष्य भी इसी दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए विवाह पंजीकरण को अनिवार्य रूप से बढ़ावा देना, समुदायों और धार्मिक संस्थानों को जागरूकता अभियानों में शामिल करना, महिलाओं को नेतृत्वकारी भूमिकाओं में सक्षम बनाना, तथा बाल संरक्षण एजेंसियों की क्षमता को मजबूत करना जैसे बहुआयामी उपाय लागू किए जा रहे हैं। समग्रतः, बाल विवाह केवल एक कानूनी उल्लंघन नहीं, बल्कि शिक्षा, स्वास्थ्य, लैंगिक समानता और क्षेत्रीय विकास से जुड़ी एक गहरी सामाजिक-संरचनात्मक समस्या है, जिसका समाधान तभी संभव है जब सरकार, समाज और परिवार—तीनों स्तरों पर सतत और सामूहिक प्रयास किए जाएँ।~डॉ रश्मि गोयल 

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मेरी ज़िंदगी का खूबसूरत गुलाब हो तुम

दोस्तों ! महकता हुआ मखमली गुलाब कुदरत की दी हुई बेहतरीन सौग़ात हमें फूल के रूप में मिली है जिसे वेलेंटाइन के मौक़े पर बहुत से चाहने वाले अपने प्यार का इज़हार करने के लिये ढेरों,

लाल गुलाब देंगे और लेंगे,और बहुत कुछ कहा भी जाएगा जैसे कि “मेरी ज़िंदगी का खूबसूरत गुलाब हो तुम..,एक नाज़ुक सा एहसास ,महकता हुआ जज़्बात हो तुम “🌺…. और कुछ लोग ऐसा भी कहेंगे । “ज़िन्दगी की मेरी ज़रूरत हो तुम ,गुलाब तो खूबसूरत हैं ही मगर गुलाब से भी हसीन हो तुम”… 🌺 और कुछ तो प्रेमी को खुदा का ही ख़िताब दे डालेंगे।

“ सोचते हैं गुलाब दे कर दिल का हाल दिखा दें उन्हें..तुम ख़ुदा हो हमारे लिए ,ये भी बता दें उन्हें…

🌺 वगैरह वगैरह ….!!ढेरों कविताएँ, ढेरों शायरी कही जायेगी…मेरी शुभकामनाएँ है उन के लिए जो अपने अपने पार्टनर या प्रेम की तालाश में है .. कुछ का इंतज़ार आज ख़त्म होगा ,कईयो की तालाश अभी जारी रहने वाली होगी।ये सिलसिला तो सालों से चलता आ रहा है और आगे भी चलता रहेगा…. पर दोस्तों ! गुलाब उसी को देना ,जिसको आप दिल से चाहते है..जिसके साथ आप हर दुख सुख बाँटना चाहते है। ये बहुत ही महत्वपूर्ण, संवेदनशील नाजुक पल होता है .. इसकी मर्यादा को बनाए रखना ज़रूरी है.. ये फ़ैसला कुछ पलों का नहीं बल्कि उम्र का होना चाहिए । पर अफ़सोस तो ये है !!असल में हमें पता ही नहीं कि प्रेम क्या है। चलिए पहले समझते है प्रेम को …प्रेम जीवन में बहुतो से होता है जैसे कि मांबाप बहन भाई.. अपने दोस्त ,सहेलियों ,अपने सहयोगियों से ,पड़ोसियों से ..रिश्तेदारों से ,देश से ,यहाँ तक की कथा कहानियों से प्रेम हो जाता है ,और तो और भगवान से भी सभी प्रेम ही करते हैं इश्क़ नही ।

🌺प्रेम का मतलब है (लगाव )

…याद रखे अगर एक से ज़्यादा लोगों से आप इश्क़ का दावा करते है समझ जाईये …ये सिर्फ़ लगाव या प्रेम हो सकता है “इश्क़ नही।” इश्क़ तो किसी विरले के हिस्से में आता है। इश्क़ अलग अहसास है .. वो सिर्फ़ एक से ही होगा ,दूसरे से नही .. जब इश्क़ मिलता है तो किसी दूसरे का कोई स्थान रह ही नही जाता। न ही उसकी जगह कोई ओर ले सकता है। इश्क़ तो वो शय है ,वो मिले न मिले पर हम उसी के हो कर रह जाते है अपनी ही मर्ज़ी से। उसे हासिल करना कोई मायने नहीं रखता।वो पास न होकर भी करीब ही महसूस होता है।जहाँ आशिक़ की सिर्फ़ इक झलक पर ही अपनी सारी ज़िंदगी गुज़ार दी जाती है। इसका उदाहरण कृष्ण दीवानी मीरा बाई जी थी.. “जहाँ रूह कह उठती है कि हम उसके बग़ैर संसार को विरान लिखते है ,”और हम कितनी आसानी से कह देते है कि हमें इश्क़ हुआ है ,मगर सच यही है कि हम सब अभी प्रेम में ही है। कोई विरला आशिक ही इस इश्क़ की पाकीज़ा गली से गुज़रता हैं ।आमतौर पर होता क्या है .. बस जवान हुए ,कालेज मे कोई लड़की या लड़का अच्छा लगा तो सोच लिया कि हमे प्रेम हो गया है .. बस गुलाब दे दो और अपने मन की बात कह दो .. और फिर कुछ देर के बाद शादी… और दूसरी ओर इश्क़ जो इतना सस्ता नहीं कि हर किसी को,और किसी से भी हो जाए..न ही इतना आसान है कि इसे हर कोई पा सके।ये मिलेगा उसे ही जिसमे शिद्दत होगी ,गहराई होगी ,सब्र होगा,..इश्क़ खुद तुमसे तुमको माँगता है। क्या कर सकते हो खुद को किसी के हवाले ? दोस्तों!! ये कोई टाइम पास या मस्ती करना नहीं होता।इश्क़ नाईट क्लबों या चकाचौंध से भरी दुनिया में नहीं मिल सकता। इश्क़ गहरा इसीलिए है क्योंकि वो मर्यादित है ,सीमाबद्ध है ,उसके अपने दायरे है और वो दायरों को तोड़ना नही जानता,अपनी या सामाज की खींची हुई लकीर में ही रहता है। इश्क़ आनन्दमय भी हो सकता है और उदासी,बैचेनी बिछोह का भी रूप हो सकता है। प्रेम अगर आसानी से मिल जाये, तो

उसमें गहराई नहीं होगी। मुश्किल से मिला प्रेम मूल्यवान होगा और वही प्रेम धीरे धीरे इश्क़ का रूप होने लगता है….

“इश्क़ बँधता नहीं, न ही इसे

बांधने की कोशिश ही नही करनी चाहिए …जो बाँधा जाये वो इश्क़ नही .…वो तो क़ैद होगी ..इश्क़ तो खुद ब ख़ुद बंध जाता है और खुद को किसी से बांधें रखना

ही इश्क़ है “इश्क़ बिल्कुल भगवान और भक्त जैसा है भगवान चाहे दिखे न दिखे.. बात करे न करे .. मिले ना मिले..चाहे जो भी दे दे .. भक्त उसकी हर रज़ा में राज़ी रहता है। ऐसी इश्क़ की अवस्था में भगवान के देह स्वरूप की भक्त को कोई ज़रूरत महसूस नही होती।वो उसे अपना मान चुका होता है..भक्त कहता है कि आप कहीं भी हो ..दुनिया के किसी भी कोने मे हो …हे भगवन ! मैं तुम्हारा हूँ ।हर इंसान जो प्रेम की तलाश मे है उसे सोचना होगा कि क्या वो ज़िम्मेदारियों के लिए तैयार है,क्योंकि प्रेम अकेला नहीं आता ..बहुत कुछ अपने साथ लेकर आता है।हमारी माँ बाप की जब शादी हुई थी उन लोगों ने प्रेम को निभाया .. संसार को आगे बढ़ाया …संस्कारों को बांटा …क्या हम संस्कारों को आगे बढ़ा पाएंगे .. नई जनरेशन से मैं यही कहूँगी अगर शादी करनी है तो पहले सोचिये।

लडकियों से भी कह रही हूँ कि शादी सिर्फ़ लाखों का लहंगा पहनना नहीं होता ,महंगा मेकअप करवाना नहीं होता ..शादी के साथ बहुत सी ज़िम्मेदारियाँ आती हैं जो हमें निभानी होती हैं।पहले उसके लिए खुद को तैयार करे .. फिर गुलाब का फूल देने और लेने की सोचे।आज की जनरेशन को अगर आज प्यार होता है तो दो चार दिनों में अपनी सहूलियत के हिसाब से एक दूसरे को बलोक भी कर देते है .. ये कैसा प्रेम है जो मात्र बलोक करने से सब ख़त्म हो जाता है..जो लड़को की जेब को पहले देखता है..उसकी कौन सी गाड़ी है .. उसका कामकाज क्या है …उसका क्या कोई अपना घर है भी या नहीं …ये प्रेम कैसे हो सकता है।

ये तो एक व्यापार ही कह सकते है और हम कह देते है कि हम प्यार मे है ।

हमारे बुजुर्गों ने भी शादी के बाद मिल कर घर बनाये थे।पहले इस तरह के सवाल नहीं हुआ करते थे।अगर पहले ही आप को बना बनाया सब कुछ मिल जाएगा तो आप क्या करेंगे। ..

लड़के भी लड़की की ब्यूटी को ही देखते है ,गोरे रंग पर मर मिटते है चाहे लड़की मे घर सँभालने का कोई भी गुण न हो …चेहरे से ज़्यादा सीरत पर ध्यान देना ज़रूरी है

अंतर्मन को पढ़ना ज़रूरी है

रूप आज है कल नहीं रहेगा…

तो फिर क्या होगा.प्रेम भी दो चार महीने ..सालो में हवा में कहीं उड़ जायेगा..नई जनरेशन को जरा सोच विचार करना होगा।

जब लड़कियां आजकल कमा रही है तो क्यों आप लड़कों से इतनी अपेक्षाएँ रखती है..क्यों लड़को पर इतना बोझ डालती है।अगर प्रेम करे तो तैयार भी रहे, मिल जुल कर जीवन जीने के लिये।

गुलाब देने से या लेने से पहले सोचिये ज़रूर…,

पहचाने खुद को ,परखें अपने प्रेम को …क्या वाक़ई में आप प्रेम में हैं ? क्या सामने वाले में भी आप के लिए वही चाहत है जो आप उसके लिए महसूस करते है ?क्या सच में आप उम्र भर प्रेम निभा पाएंगे ?

या फिर आप सिर्फ़ ट्रेंड के साथ चल रहे है। सोचियेगा ज़रूर …..आप की दोस्त ✍️ स्मिता

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जलवायु परिवर्तन: पिघलते हिमनद और डूबता भविष्य

धरती का तापमान धीरे-धीरे नहीं, बल्कि खतरनाक गति से बढ़ रहा है। वैज्ञानिक अध्ययनों के अनुसार, बीसवीं सदी में भूमंडलीय औसत तापमान में लगभग 0.6 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि दर्ज की जा चुकी है। यदि तापमान वृद्धि की यही प्रवृत्ति जारी रही, तो 21वीं सदी के अंत तक वैश्विक तापमान में लगभग 6 डिग्री सेल्सियस तक की बढ़ोतरी हो सकती है। यह परिवर्तन केवल आँकड़ों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका प्रभाव मानव जीवन, प्राकृतिक संसाधनों और पारिस्थितिकी तंत्र पर प्रत्यक्ष रूप से दिखाई देने लगा है। ग्लोबल वार्मिंग के कारण हो रहे जलवायु परिवर्तन का सबसे गंभीर प्रभाव हिमालयी हिमनदों पर पड़ रहा है। अनुमान है कि यदि वर्तमान स्थिति बनी रही, तो सन् 2040 तक हिमाचल प्रदेश की अधिकांश हिमनदियाँ पिघलकर समाप्त हो सकती हैं। गंगोत्री हिमनद, जो गंगा नदी का प्रमुख स्रोत है, प्रतिवर्ष लगभग 23 मीटर की दर से संकुचित हो रही है। इस हिमनद का तीव्र क्षरण भविष्य में गंगा नदी के अस्तित्व के लिए गंभीर संकट उत्पन्न कर सकता है, जिससे करोड़ों लोगों का जीवन प्रभावित होगा।

जलवायु परिवर्तन का प्रभाव केवल हिमालय तक सीमित नहीं है। ग्लेशियरों की बर्फ तेजी से पिघलकर नदियों के माध्यम से समुद्र तक पहुँच रही है, जिसके परिणामस्वरूप समुद्री जलस्तर में निरंतर वृद्धि हो रही है। वैज्ञानिक अनुमानों के अनुसार, 2100 तक समुद्र का जलस्तर 9 से 88 सेंटीमीटर तक बढ़ सकता है। यह वृद्धि कई तटीय क्षेत्रों और द्वीपों के लिए विनाशकारी सिद्ध हो सकती है।

समुद्री जलस्तर में हो रही वृद्धि के कारण अनेक द्वीपीय और तटीय क्षेत्र जलमग्न होने के खतरे का सामना कर रहे हैं। मॉरीशस, मालदीव, अंडमान और निकोबार जैसे द्वीप समूह इस संकट के प्रति विशेष रूप से संवेदनशील हैं। यदि समय रहते प्रभावी नीतियाँ और पर्यावरणीय संरक्षण उपाय नहीं अपनाए गए, तो इन क्षेत्रों की भौगोलिक पहचान और जनजीवन पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है।

स्पष्ट है कि जलवायु परिवर्तन अब भविष्य की चेतावनी नहीं, बल्कि वर्तमान की वास्तविकता बन चुका है। इसके दुष्प्रभावों को कम करने के लिए ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में कमी, सतत विकास, और प्राकृतिक संसाधनों के विवेकपूर्ण उपयोग की तत्काल आवश्यकता है। जब तक मानव और प्रकृति के बीच संतुलन स्थापित नहीं किया जाता, तब तक पिघलते हिमनद और बढ़ता समुद्री जलस्तर हमारे भविष्य के लिए निरंतर खतरा बने रहेंगे। ~रश्मि गोयल

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आकाश से बरसात तक : क्लाउड सीडिंग का विज्ञान और प्रभावशीलता

क्लाउड सीडिंग, यानी कृत्रिम वर्षा उत्पन्न करने की एक वैज्ञानिक तकनीक। जब बादल मौजूद होते हुए भी वर्षा नहीं होती, तब वैज्ञानिक उनमें कुछ रासायनिक तत्वों का छिड़काव करते हैं, जिससे जलवाष्प संघनित होकर वर्षा की बूंदों में बदल जाती है।आमतौर पर इसमें सिल्वर आयोडाइड, पोटेशियम आयोडाइड या ड्राई आइस जैसे पदार्थों का प्रयोग किया जाता है।आज बढ़ते तापमान, घटते जलस्तर, पिघलते ग्लेशियर और जल–विनाश की वजह से सूखे की स्थिति गंभीर होती जा रही है। ऐसे में क्लाउड सीडिंग को एक आशाजनक समाधान के रूप में देखा जा रहा है।यह तकनीक कई देशों में लंबे समय से सफलतापूर्वक अपनाई जा रही है, जबकि भारत में अभी यह सीमित स्तर पर ही प्रयोग में है।हाल के वर्षों में भारत सरकार और कई राज्य सरकारें सूखे से निपटने के लिए इस तकनीक को अपनाने की दिशा में कदम बढ़ा रही हैं।महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और उत्तर प्रदेश के कुछ क्षेत्रों में इसका प्रयोग हो चुका है।हालाँकि यह भी सच है कि हर जगह या हर मौसम में क्लाउड सीडिंग कारगर नहीं होती।अगर बादलों में नमी का स्तर या तापमान अनुकूल न हो, तो वर्षा की संभावना कम हो जाती है।इस प्रक्रिया के लिए वायुमंडलीय परिस्थितियाँ, ऊर्जा और नमी का सही संतुलन होना जरूरी है।इसी कारण बिना मौसम अनुमान के क्लाउड सीडिंग करना महंगा और व्यर्थ साबित हो सकता है।दिल्ली–एनसीआर, हरियाणा, उत्तर प्रदेश और गंगा के मैदानी इलाकों में यह तकनीक वायु प्रदूषण घटाने के उपाय के रूप में भी चर्चा में रही है।ठंड के मौसम में जब वायुमंडलीय परतें नीचे बैठ जाती हैं और प्रदूषक कण ऊपर नहीं जा पाते, तब हवा की गुणवत्ता “खराब” या “बहुत खराब” स्तर पर पहुँच जाती है।ऐसे में यदि मौसम अनुकूल हो तो क्लाउड सीडिंग प्रदूषण कम करने का एक संभावित उपाय हो सकता है।

क्लाउड सीडिंग की संभावनाएँ और सीमाएँ

ठंड और गंगा–यमुना के मैदानी क्षेत्रों में सर्दियों के दौरान प्रदूषण की स्थिति बेहद गंभीर रहती है।यह तब और बढ़ जाती है जब हवा की गति कम हो जाती है और धूल तथा धुआँ वातावरण में फँस जाता है।क्लाउड सीडिंग को इस स्थिति में संभावित समाधान के रूप में देखा गया है, क्योंकि कृत्रिम वर्षा से हवा में मौजूद धूल के कण नीचे बैठ सकते हैं और प्रदूषण का स्तर घट सकता है।हालाँकि यह प्रक्रिया पूरी तरह मौसम और नमी पर निर्भर करती है।भारत में इसका प्रयोग पहली बार 1945 में अमेरिका के उदाहरण से प्रेरित होकर किया गया था।इसके बाद 1983, 1984 और 1993–94 में भारत के कई राज्यों में इस पर कार्य हुआ।आईआईटी कानपुर ने भी 2003–06 के बीच क्लाउड सीडिंग पर शोध किया।आईआईटी कानपुर के डायरेक्टर मनीन्द्र अग्रवाल ने कहा कि बादलों में 15 फ़ीसदी नमी के चलते कृत्रिम बारिश का प्रयोग सफल नहीं हो सका , लेकिन उन्होंने माना कि भविष्य में यह तकनीक उपयोगी साबित हो सकती है।दिल्ली की जलवायु को देखते हुए सर्दियों में क्लाउड सीडिंग की संभावना कम रहती है, क्योंकि ठंड तो होती है लेकिन पर्याप्त नमी नहीं होती।जब तक कोई मजबूत पश्चिमी विक्षोभ (Western Disturbance) न आए, तब तक यहाँ बादलों का बनना मुश्किल होता है।यानी, तकनीकी तौर पर जब तक वातावरण अनुकूल न हो, क्लाउड सीडिंग संभव नहीं ~डॉ. रश्मि गोयल

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कानपुर की शिक्षिका अंजनी अग्रवाल को मिला राष्ट्रीय शिक्षक सम्मान

भारतीय स्वरूप संवाददाता कानपुर नगर की शिक्षिका अंजनी अग्रवाल को मिला राष्ट्रीय शिक्षक सम्मान पुस्तक की भेंट अंतर्राष्ट्रीय शिक्षक दिवस के अवसर पर चौधरी केहर सिंह एजुकेशन ट्रस्ट द्वारा बड़ौत बागपत द्वारा मेडिसिटी हॉस्पिटल बड़ौत के सभागार में आयोजित राष्ट्रीय शिक्षक सम्मान समारोह का आयोजन किया गया।कार्यक्रम में उत्कृष्ट कार्य करने हेतु विभिन्न राज्यों से आए 111 शिक्षकों को सम्मानित किया गया। उत्तर प्रदेश के कानपुर जिले से आमंत्रित उच्च प्राथमिक विद्यालय सेमरुआ सरसौल की सहायक अध्यापिका शिक्षिका अंजनी अग्रवाल को प्रदेश के राज्य मंत्री कृष्ण पाल मालिक के द्वारा अंग वस्त्र , स्मृति चिन्ह , प्रशस्ति पत्र पोर्टफोलियो एवं पौधा देकर सम्मानित किया गया कार्यक्रम में श्री धर्मेंद्र कुमार आईएएस विनीत राठी उपनिदेशक प्रवर्तन निर्देशालय, राघवेंद्र सिंहजिला विद्यालय निरीक्षक बागपत, मनोज मालिक, नवनीत पाठक, डॉक्टर राजेंद्र कुमार, विजय तोमर सीओ बड़ौत, एवं डॉ. रघुनाथ सिंह जी की गरिमामाई उपस्थिति रही।
डॉ. अंजनी अग्रवाल ने अपनी लिखित पुस्तक,” प्रेरक द्वार” (बाल कहानी संग्रह) भी भेट की। जिसकी सभी ने भूरी भूरी प्रशंसा की।

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हिंदी दिवस

हिंदी से है जुड़ा हमारा अभिमान,

हिंदी से रोशन है हिंदुस्तान।

सरल, सहज और मीठी बोली,

संस्कृति की है यह अनमोल डोली।

मातृभाषा का मान बढ़ाएँ,

हर दिल में हिंदी को अपनाएँ।

ज्ञान, साहित्य, संस्कृति का संगम,

हिंदी ही है भारत का अनुपम।

विद्या की गंगा हिंदी बहाती,

मन की बातों को स्वर दे जाती।

एकता का संदेश सुनाती,

दूरियों को भी पास कराती।

यही है हमारी पहचान की शान,

यही है भविष्य, यही है वरदान।

आओ मिलकर शपथ उठाएँ,

हिंदी को विश्व शिखर तक ले जाएँ।

डॉ अंजनी अग्रवाल कानपुर नगर उत्तर प्रदेश

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“सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ सोसाइटी एंड पॉलिटिक्स” (सी एस एस पी) ने बेटियों को राजनीति में लाने का संदेश दिया

भारतीय स्वरूप संवाददाता कानपुर “सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ सोसाइटी एंड पॉलिटिक्स” (सी एस एस पी)की ओर से घर की बेटियों को राजनीति में लाने का संदेश दिया गया।
सिविल लाइंस स्थित मर्चेंट चेंबर सभागार में कार्यक्रम को संबोधित करते हुए मुख्य अतिथि उत्तर प्रदेश विधान सभा अध्यक्ष सतीश महाना ने कहा कि राजनीति अब राजनैतिक घरानों के बेटियों के लिए नहीं रहेगी इसका स्वरूप बदलेगा,
अब राजनीति में रुचि रखने वाली गैर राजनैतिक परिवार की बेटियों की भागीदारी बढ़ेगी। संस्थान ने गैर राजनैतिक पृष्ठभूमि वाले परिवार की महिलाओं को प्रेरित प्रशिक्षित और शिक्षित करने का बीड़ा उठाया है ताकि वो राजनीति में आने से न हिचकें और राजनीतिक में अपनी भूमिका निभा सकें।
कार्यक्रम में के डी जी सी लखनऊ की प्राचार्या प्रो सारिका दुबे ने इस विषय अपनी राय रखी उन्होंने कहा राजनैतिक सशक्तिकरण के लिए सीएसएसपी द्वारा की गई पहल से महिलाओं का राजनीत में आने का मार्ग सुलभ होगा। संस्थान के निदेशक डॉ ए के वर्मा ने अपनी पौत्री श्रेया की स्मृति में बेटियों को श्रेया स्कॉलरशिप देने की घोषणा की, इस अवसर पर डॉ ए के वर्मा की दो पुस्तकों “ए ग्रामर ऑफ प्रोफेशनल पॉलिटिक्स,इंटर पॉलिटिक्स,विन इलेक्शन” और व्यावसायिक राजनीति का व्याकरण राजनीतिज्ञ बने चुनाव जीतें” का विमोचन भी किया गया। कार्यक्रम में मुख्य रूप से प्रो नलिन कुमार, डॉ नीता जैन, डॉ शिप्रा श्रीवास्तव, डॉ संजय कुमार, डॉ सूफिया शहाब, डॉ आशुतोष सक्सेना, डॉ मितकमल डॉ नीरज शुक्ला, अजय दीक्षित, प्रभात तिवारी, ज़ैनब आदि उपस्थित रहे।

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