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सबसे बड़ा भ्रम दो शब्द—“सरकारी पैसा”!

एक गरीब पिता का बच्चा बाज़ार में खिलौना देखकर जिद करता है। पिता कीमत पूछता है, जेब टटोलता है, फिर बच्चे का हाथ पकड़कर आगे बढ़ जाता है। बच्चा सोचता है कि शायद पिताजी उसे खिलौना नहीं दिलाना चाहते। लेकिन पिता जानता है कि महीने की तनख्वाह अभी आधी भी नहीं बची और घर में राशन, बिजली का बिल, स्कूल की फीस और दवा के खर्च अभी बाकी हैं। उसी शहर में कोई माँ अपनी बेटी की कोचिंग का सपना टाल रही है, कोई बुज़ुर्ग डॉक्टर की पूरी पर्ची नहीं खरीद पा रहा, कोई परिवार बरसों से अपने घर की टूटी छत को प्लास्टिक से ढँककर मानसून निकाल रहा है। भारत के करोड़ों घरों में हर दिन इच्छाओं की हत्या होती है ताकि बजट जीवित रह सके।

लेकिन इसी कहानी का एक दूसरा पात्र भी है, जिसके बारे में बहुत कम बात होती है।

वही पिता जब पेट्रोल भरवाता है, टैक्स देता है। वही मजदूर जब मोबाइल रिचार्ज कराता है, टैक्स देता है। वही किसान जब डीज़ल खरीदता है, टैक्स देता है। वही गृहिणी जब साबुन, तेल, कपड़ा, दवा या बच्चों की कॉपी खरीदती है, तब भी टैक्स देती है। भारत में करोड़ों लोग आयकर न देते हों, लेकिन कर-मुक्त जीवन लगभग कोई नहीं जीता। वस्तु एवं सेवा कर, ईंधन कर, शुल्क, उपकर और अनेक अप्रत्यक्ष करों के माध्यम से हर दिन जनता का पैसा सरकारी खजाने तक पहुँचता है। यानी जो परिवार अपने घर का हर रुपया बचाने के लिए संघर्ष कर रहा है, वही परिवार हर दिन सरकार की तिजोरी भी भर रहा है।

यहीं से लोकतंत्र का सबसे बड़ा विरोधाभास शुरू होता है।

हम अपने घर में सौ रुपये के अतिरिक्त खर्च पर बहस कर लेते हैं। बच्चा महंगा खिलौना मांग ले तो उसे समझा देते हैं। घर में पुताई टाल देते हैं। पुरानी बाइक कुछ साल और चलाते हैं। शादी-ब्याह में खर्च काट देते हैं। लेकिन उसी समय लाखों करोड़ रुपये के सार्वजनिक खर्च पर लगभग मौन रहते हैं। जिस देश में एक परिवार पंखा बदलने से पहले दस बार सोचता है, उसी देश में सार्वजनिक धन के उपयोग पर नागरिक बहस कितनी होती है? शायद उतनी नहीं जितनी किसी क्रिकेट मैच, फिल्म या चुनावी नारे पर होती है।

सबसे बड़ा भ्रम दो शब्दों में छिपा है—“सरकारी पैसा”।

यह शब्द सुनते ही नागरिक और धन के बीच का रिश्ता टूट जाता है। जैसे वह पैसा किसी और का हो। जबकि वास्तविकता इसके ठीक विपरीत है। सरकार का अपना कोई खेत नहीं है जहाँ से फसल उगती हो। उसका कोई निजी कारखाना नहीं है जहाँ से मुनाफा आता हो। सरकार की तिजोरी में रखा लगभग हर रुपया किसी न किसी नागरिक की जेब से आया है। लेकिन जैसे ही वह रुपया सरकारी खजाने में पहुँचता है, जनता उससे अपना भावनात्मक और नैतिक स्वामित्व छोड़ देती है।

यही लोकतंत्र की सबसे महंगी भूल है।

भारत का केंद्रीय बजट अब दर्जनों लाख करोड़ रुपये के स्तर पर पहुँच चुका है। राज्यों के बजट जोड़ दिए जाएँ तो सार्वजनिक धन का आकार और भी विशाल हो जाता है। यह राशि इतनी बड़ी है कि सामान्य नागरिक उसकी कल्पना भी नहीं कर सकता। लेकिन समस्या राशि की विशालता नहीं है। समस्या यह है कि जिन लोगों की मेहनत से यह धन एकत्र होता है, वे ही अक्सर उसके उपयोग पर सबसे कम निगरानी रखते हैं।

ज़रा सोचिए, एक परिवार पाँच लोगों के साथ एक मोटरसाइकिल पर बैठकर बाज़ार जा रहा है। बच्चे बीच में दबे हुए हैं, माँ पीछे किसी तरह संतुलन बनाए हुए है। उसी सड़क पर एक चमचमाती सरकारी गाड़ी निकलती है। गाड़ी में एक बड़ा अधिकारी बैठा है, अपने पालतू कुत्ते को सेहला रहा है।   गाड़ी गलत नहीं है। सरकारी कामकाज के लिए वाहन आवश्यक हैं। प्रश्न वाहन का नहीं है। प्रश्न उस मानसिक दूरी का है जो धीरे-धीरे नागरिक और व्यवस्था के बीच पैदा हो गई है। जिस व्यवस्था का खर्च नागरिक उठा रहा है, क्या वह व्यवस्था नागरिक के जीवन की कठिनाइयों को उसी गंभीरता से महसूस करती है?

कबीर ने लिखा था—“साईं इतना दीजिए, जामे कुटुम समाय।” यह केवल व्यक्ति का नहीं, शासन का भी आदर्श हो सकता है। किसी भी सभ्य शासन की महानता उसके खर्च की मात्रा से नहीं, बल्कि उसके खर्च की नैतिकता और उपयोगिता से मापी जानी चाहिए। क्योंकि सार्वजनिक धन केवल लेखांकन की इकाई नहीं होता; वह किसी की अधूरी पढ़ाई, किसी की छूटी हुई दवा, किसी का टला हुआ इलाज, किसी की स्थगित शादी और किसी बच्चे के अधूरे सपनों का संचित रूप होता है।

यहीं एक और असुविधाजनक प्रश्न सामने आता है। यदि जनता अपने पैसे की रखवाली नहीं करेगी, तो कौन करेगा?

सूचना का अधिकार कानून इसी प्रश्न का उत्तर देने का प्रयास था। RTI केवल कागज़ देखने का अधिकार नहीं है। वह लोकतंत्र का स्मरणपत्र है। वह नागरिक को याद दिलाता है कि वह केवल मतदाता नहीं, बल्कि सार्वजनिक संसाधनों का संरक्षक भी है। जब कोई व्यक्ति पूछता है कि सड़क निर्माण के लिए कितना बजट स्वीकृत हुआ, अस्पताल के लिए कितना धन आया, स्कूल की मरम्मत पर कितना खर्च हुआ, तब वह केवल सूचना नहीं मांग रहा होता; वह लोकतंत्र को उसकी मूल स्थिति में वापस लाने की कोशिश कर रहा होता है।

लेकिन यहाँ एक और विडंबना है। हम अपने बच्चों को बचत सिखाते हैं, पर नागरिकता नहीं। हम उन्हें गुल्लक देते हैं, पर यह नहीं बताते कि देश का बजट भी एक राष्ट्रीय गुल्लक है। हम उन्हें कमाना सिखाते हैं, पर यह नहीं सिखाते कि उनके नाम पर खर्च होने वाले धन का हिसाब मांगना भी लोकतांत्रिक जिम्मेदारी है। हम उन्हें अधिकार बताते हैं, लेकिन अधिकारों की रक्षा के लिए आवश्यक सजगता नहीं सिखाते।

कहावत है—“बूंद-बूंद से घड़ा भरता है।” लेकिन लोकतंत्र में एक और सच्चाई है—बूंद-बूंद से भरा घड़ा चुप्पी से खाली भी हो सकता है। सार्वजनिक धन हमेशा किसी एक बड़े घोटाले से नष्ट नहीं होता। वह कई बार नागरिक उदासीनता, कमजोर निगरानी, अधूरी परियोजनाओं, अनुत्तरदायी प्रशासन और उस सामूहिक मानसिकता से क्षीण होता है जो मान बैठती है कि यह सब उसका विषय नहीं है।

शायद इसलिए आज भारत के सामने सबसे बड़ा आर्थिक प्रश्न यह नहीं है कि सरकार कितना खर्च कर रही है, और न ही यह कि नागरिक कितना कमा रहा है।

सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या इस देश का नागरिक अपने नाम पर खर्च होने वाले धन को वास्तव में अपना मानता भी है या नहीं।

क्योंकि जिस दिन जनता यह समझ जाएगी कि सरकारी खजाना वास्तव में जनता की सामूहिक तिजोरी है, उस दिन लोकतंत्र केवल चुनावों की व्यवस्था नहीं रहेगा। वह वास्तविक जन-स्वामित्व की व्यवस्था बन जाएगा। उस दिन परिवर्तन किसी नए नेता, नई योजना या नए नारे से नहीं आएगा। वह उस साधारण नागरिक से आएगा जो पहली बार यह तय करेगा कि जैसे वह अपने घर के खर्च पर नज़र रखता है, वैसे ही अपने देश के खर्च पर भी रखेगा।

और तब इतिहास शायद हमसे यह नहीं पूछेगा कि हमने कितना कमाया।

वह यह पूछेगा कि हमने अपने बच्चों को कमाई की कला तो सिखा दी, लेकिन क्या हमने उन्हें यह भी सिखाया कि उनकी मेहनत से बनने वाले राष्ट्रीय खजाने का प्रहरी कौन होगा?

लेखक :  सी एम जैन
संपर्क : +91 9408887777
 

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“थिएटर बनाम फिल्म एक्टिंग” विषय पर वेबिनार आयोजित

भारतीय स्वरूप संवाददाता कानपुर, 23 अगस्त: क्राइस्ट चर्च कॉलेज, कानपुर द्वारा द इंडी फिल्म स्कूल, नोएडा के सहयोग से अभिनय की विभिन्न विधाओं एवं तकनीकों को समझने के उद्देश्य से “Theatre vs Film Acting – Understanding the Difference” विषय पर एक विशेष वेबिनार का आयोजन किया गया। वेबिनार का मुख्य उद्देश्य थिएटर और फिल्म अभिनय के बीच के अंतर को समझना तथा दोनों माध्यमों में अभिनय की तकनीक, अभिव्यक्ति, भावनाओं और प्रदर्शन की आवश्यकताओं पर प्रकाश डालना था। कार्यक्रम के माध्यम से प्रतिभागियों को मंच और कैमरे के सामने अभिनय करते समय अपनाई जाने वाली विभिन्न तकनीकों एवं दृष्टिकोणों की जानकारी प्रदान की गई।

इस अवसर पर सुनील राज ने मुख्य वक्ता एवं मार्गदर्शक के रूप में प्रतिभागियों को संबोधित किया। वे एक अनुभवी निर्देशक, लेखक एवं थिएटर प्रैक्टिशनर हैं तथा उन्हें टेलीविजन, थिएटर और फिल्म निर्माण के क्षेत्र में 30 से अधिक वर्षों का अनुभव है। उन्होंने लगभग 1,000 टेलीविजन एपिसोड का निर्देशन किया है, जिनमें ETV’s Sooroma Bhopale और Maahaul Garam Hai जैसे कार्यक्रम शामिल हैं। इसके अतिरिक्त उन्होंने वेब सीरीज़ Main Bhi Maa Ban Gaya का लेखन एवं निर्देशन किया है तथा 25 से अधिक डॉक्यूमेंट्री और 35 से अधिक फिल्मों/प्रोजेक्ट्स पर भी कार्य किया है।

कार्यक्रम में थिएटर एवं फिल्म अभिनय के बीच के अंतर, अभिनय की तकनीकों, भावनात्मक अभिव्यक्ति, प्रदर्शन शैली तथा कैमरे और मंच के लिए कलाकारों की तैयारी जैसे महत्वपूर्ण पहलुओं पर चर्चा की गई। वेबिनार ने अभिनय के क्षेत्र में रुचि रखने वाले विद्यार्थियों एवं प्रतिभागियों को व्यावहारिक दृष्टिकोण से सीखने और अपने प्रदर्शन को बेहतर बनाने का अवसर प्रदान किया।

कार्यक्रम का आयोजन प्रो. विनय जॉन सेबेस्टियन, प्रधानाचार्य, क्राइस्ट चर्च कॉलेज, कानपुर के मार्गदर्शन में किया गया। कार्यक्रम के समन्वय में प्रो. मीत कमल की महत्वपूर्ण भूमिका रही। कॉलेज की ओर से डॉ. रुक्मिणी देवी एवं डॉ. एरिक विल्सन सह-समन्वयक रहे।

वहीं, द इंडी फिल्म स्कूल, नोएडा की ओर से इसके संस्थापक श्री संक्षय बाब्बर तथा सह-संस्थापक शिवेंद्र त्रिवेदी का भी सहयोग रहा।

यह वेबिनार विद्यार्थियों एवं उभरते कलाकारों के लिए एक उपयोगी एवं ज्ञानवर्धक पहल रहा, जिसने उन्हें “From Stage to Screen” अभिनय की यात्रा को समझने तथा अपने अभिनय कौशल को निखारने की दिशा में प्रेरित किया।

वालंटियर के रूप में – आदर्श चौहान, जागृति गुप्ता, इल्मा तबस्सुम, खुशबू गौतम, ऐश सोनकर, आद्या गुप्ता, मरियम फातिमा, अलीशा नाज, शुभंकित दुबे, श्वेता सिंह, दीपसी श्रीवास्तव उपस्थित रहेंl

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वर्ष 2024 और 2025 के लिए संगीत नाटक अकादमी फेलोशिप (अकादमी रत्न) और संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार (अकादमी पुरस्कार) तथा वर्ष 2024 और 2025 के लिए उस्ताद बिस्मिल्लाह खान युवा पुरस्कार की घोषणा

नई दिल्ली स्थित संगीत नाटक अकादमी (संगीत, नृत्य और नाटक की राष्ट्रीय अकादमी) की जनरल काउंसिल ने 22 से 26 मार्च 2026 तक नई दिल्ली में आयोजित बैठक में प्रदर्शन कला के क्षेत्र की सात प्रतिष्ठित हस्तियों को सर्वसम्मति से अकादमी फेलो (अकादमी रत्न) के लिए चुना है। अकादमी फेलोशिप एक अत्यंत प्रतिष्ठित और दुर्लभ सम्मान है। इसकी संख्या किसी भी समय 40 तक ही सीमित रहती है।

जनरल काउंसिल ने वर्ष 2024 और 2025 के लिए संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार (अकादमी पुरस्कार) के लिए संगीत, नृत्य, थिएटर, पारंपरिक/लोक/आदिवासी संगीत/नृत्य/थिएटर/कठपुतली कला, और प्रदर्शन कला के क्षेत्र में समग्र योगदान/स्कॉलरशिप क्षेत्रों से 108 कलाकारों का चयन भी किया।

चुने गए फेलो और पुरस्कार विजेता पूरे देश का प्रतिनिधित्व करते हैं और देश के विभिन्न राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से आते हैं। इसके अलावा ये प्रतिष्ठित कलाकार संगीत, नृत्य, नाटक, लोक और आदिवासी कला, कठपुतली कला और संबद्ध थिएटर कला रूपों के माध्यम से व्यक्त की जाने वाली प्रदर्शन कला की विविध विधाओं का प्रतिनिधित्व करते हैं।

अकादमी की जनरल काउंसिल ने वर्ष 2024 और 2025 के लिए संगीत नाटक अकादमी ‘उस्ताद बिस्मिल्लाह खान युवा पुरस्कार’ के लिए 106 युवा कलाकारों का भी चयन किया है। ये पुरस्कार संगीत नाटक अकादमी के अध्यक्ष द्वारा एक विशेष समारोह में प्रदान किए जाएंगे।

अकादमी पुरस्कार 1952 से प्रदान किए जा रहे हैं। ये सम्मान केवल उत्कृष्टता और उपलब्धि के उच्चतम मानक का प्रतीक हैं, बल्कि निरंतर व्यक्तिगत कार्य और योगदान को भी मान्यता देते हैं। अकादमी फेलो के सम्मान के साथ तीन लाख रुपये का नकद और अकादमी पुरस्कार में एक लाख रुपये की नकद राशि दी जाती है। साथ ही एक ताम्रपत्र और अंगवस्त्रम भी दिया जाता है।

उस्ताद बिस्मिल्लाह खान युवा पुरस्कार में पच्चीस हजार रुपये की पुरस्कार राशि के अलावा एक ताम्रपत्र और एक अंगवस्त्रम दिया जाता है।

संगीत नाटक अकादमी फ़ेलोशिप और पुरस्कार माननीय राष्ट्रपति द्वारा एक विशेष अलंकरण समारोह में प्रदान किए जाएंगे।

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संगीत को जीने वालों ने सजाई सुरों की शानदार महफिल

भारतीय स्वरूप संवाददाता कानपुर , गीत संगीत सुनने और जीने का शौक रखने वालों के लिए रविवार का दिन अत्यंत खूबसूरत रहा कार्यक्रम में कानपुर और आस पास के शहरों के संगीत में रुचि रखने वालों के लिए खुशनुमा त्यौहार जैसा था। कार्यक्रम के आयोजन का विचार रेलबाजार निवासी गोविंद सिंह का था, जिसे अति अल्प समय में बेहद खूबसूरत तरीके से क्रियान्वित करने का कार्य उनकी टीम खासकर बॉबी खान, टेक्निकल टीम के चौधरी भाई आदि ने बखूबी निभाया, मंच संचालन कर रहे बॉबी खान की फुलझड़ियों और माही के अंदाज ने सबका मन मोह लियामाँ शारदे का आशीर्वाद लेकर और विघ्न विनाशक श्री गणेश जी की कृपा पाकर कार्यक्रम का शुभारंभ सुमधुर बांसुरी वादन और गोविंद जी के गायन से हुआ,

समाज के विभिन्न क्षेत्रों जैसे समाजसेवा, मीडिया आदि से भी लोगों की सहभागिता रही।  म्यूजिकल किसी भी कार्यक्रम की सफलता के दो मुख्य घटक गायक/गायिका और श्रोता होते है, और कहना पड़ेगा कि इस मामले में सारे श्रोता बेहद शालीन और अनुशासित दिखे । पूरे कार्यक्रम के दौरान मौजूद सभी श्रोताओं ने गायक गायिकाओं का जोरदार उत्साहवर्धन किया।. इस मंच के तत्वावधान में पहला आयोजन होने के कारण आयोजकों में पहले जो असमंजस और डर था , थोड़ी ही देर में सभी के परफॉर्मेंस और सहयोग से दूर हो गया। पूरे दिन एक से बढ़कर एक नए और पुराने गीतों की वो स्वर लहरी बही कि कोई भी उससे अछूता नहीं रह गया।

कार्यक्रम में राजेंद्र श्रीवास्तव , आशीष अवस्थी , दिवाकर शुक्ला, अतुल दीक्षित , गिरीश मारवाह ,आरती त्रिपाठी , अंजना अवस्थी , रेनू अग्रवाल , रेनू अवस्थी ,सुषमा श्रीवास्तव , प्रीति श्रीवास्तव, भारती दीक्षित, नीलम दीक्षित, स्मिता श्रीवास्तव आदि की धमाकेदार गीतों की प्रस्तुति को सबने खूब सराहा।

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राष्ट्रीय प्राणी उद्यान ने अंतर्राष्ट्रीय वन दिवस के अवसर पर शैक्षिक जागरूकता एवं वृक्षारोपण कार्यक्रम का आयोजन किया

राष्ट्रीय प्राणी उद्यान ने शनिवार को अंतर्राष्ट्रीय वन दिवस उत्साहपूर्ण जनभागीदारी के साथ मनाया, जिसमें लगभग 18,000 आगंतुकों की उपस्थिति दर्ज की गई तथा लगभग 1,500 लोगों ने संरक्षण विषयक गतिविधियों में भाग लिया।

कार्यक्रम की शुरुआत प्राणी उद्यान के एक निर्देशित शैक्षिक भ्रमण के साथ हुई, जिसमें भास्कराचार्य कॉलेज ऑफ एप्लाइड साइंसेज, दिल्ली विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों को प्राणी उद्यान के कर्मचारियों द्वारा विभिन्न पशु बाड़ों तथा उनके पारिस्थितिक महत्व के संबंध में जानकारी प्रदान की गई।

इस पहल का उद्देश्य वन पारितंत्रों के प्रति जागरूकता बढ़ाना तथा वन्यजीव संरक्षण की भूमिका को रेखांकित करना था। भास्कराचार्य कॉलेज ऑफ एप्लाइड साइंसेज के 60 विद्यार्थियों ने प्राणी उद्यान भ्रमण के उपरांत एक रोचक प्रस्तुति सत्र में भाग लिया। इस सत्र में वन्यजीव संरक्षण, पर्यावरण शिक्षा तथा जैव विविधता के संरक्षण में प्राणी उद्यानों की महत्वपूर्ण भूमिका पर विशेष बल दिया गया।

कार्यक्रम का समापन प्राणी उद्यान के निदेशक के साथ एक संवादात्मक सत्र के साथ हुआ, जिसमें उन्होंने चल रहे संरक्षण प्रयासों तथा राष्ट्रीय प्राणी उद्यान के कार्यप्रणाली के संबंध में महत्वपूर्ण जानकारी साझा की।

इस अवसर को चिह्नित करते हुए प्राणी उद्यान परिसर में वृक्षारोपण गतिविधियाँ भी आयोजित की गईं। बीट संख्या 11 के नवीनीकृत पक्षी बाड़े में बीट कीपर तथा प्राणी उद्यान के कर्मचारियों द्वारा विभिन्न प्रजातियों के कुल 58 पौधे लगाए गए, जिससे आवास समृद्धि तथा हरित आवरण को सुदृढ़ करने में योगदान मिला।

ईद-उल-फ़ित्र के उत्सव के अवसर पर प्राणी उद्यान में लगभग 18,000 आगंतुकों की उल्लेखनीय उपस्थिति दर्ज की गई, जिससे वातावरण अत्यंत उत्साहपूर्ण एवं जीवंत रहा। लगभग 1,500 आगंतुकों ने विशेष रूप से आयोजित चित्रांकन गतिविधि में सक्रिय भागीदारी की, जिसमें उन्होंने वन संरक्षण तथा जैव विविधता पर अपने विचारों एवं अभिव्यक्तियों को रचनात्मक रूप से प्रस्तुत किया।

इस आयोजन ने आगंतुकों एवं विद्यार्थियों के बीच वनों के महत्व, जैव विविधता संरक्षण तथा सतत पर्यावरणीय प्रथाओं के प्रति जागरूकता को प्रभावी रूप से सुदृढ़ किया।

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पर्यटन मंत्रालय ने देश में पर्यटन अवसंरचना और अनुभवों के उन्नयन सहित गंतव्य आधारित विकास को बढ़ावा देने के लिए कई कदम उठाए हैं।

पर्यटन मंत्रालय की स्वदेश दर्शन 2.0 (स्वदेश दर्शन योजना का संशोधित संस्करण) पर्यटन गंतव्यों के सतत विकास पर केंद्रित है और इस योजना के तहत मंत्रालय ने 53 परियोजनाओं को 2208.31 करोड़ रुपये की स्वीकृति प्रदान की है। इसके अलावा, स्वदेश दर्शन योजना के तहत चुनौती आधारित गंतव्य विकास (सीबीडीडी) के अंतर्गत पर्यटन अवसंरचना के विकास के लिए 38 परियोजनाओं को 697.94 करोड़ रुपये की स्वीकृति दी गई है।

‘तीर्थ यात्रा पुनरुज्जीवन एवं आध्यात्मिक धरोहर संवर्धन अभियान (प्राशाद)’ योजना के तहत मंत्रालय ने 54 परियोजनाओं को 1726.74 करोड़ रुपये की स्वीकृति प्रदान की है। एसडी2.0, सीबीडीडी और प्राशाद योजनाओं के तहत परियोजनाओं की स्वीकृति देते समय क्षेत्रीय संतुलन बनाए रखा जाता है, जबकि परियोजनाओं की स्वीकृति संबंधित राज्य सरकारों/केंद्र शासित प्रदेश प्रशासनों द्वारा योजना दिशानिर्देशों, सरकारी निर्देशों, बजट उपलब्धता, परस्पर प्राथमिकता आदि के अनुरूप परियोजना प्रस्ताव प्रस्तुत करने के अधीन प्रदान की जाती है।

इन परियोजनाओं का कार्यान्वयन, संचालन और प्रबंधन भी संबंधित राज्य सरकार/केंद्र शासित प्रदेश प्रशासन द्वारा किया जाता है। उपरोक्त योजनाओं के तहत स्वीकृत घटक मुख्य रूप से पर्यटकों और आगंतुकों की सुविधा से संबंधित हैं, जिनमें डिजिटल हस्तक्षेप शामिल हैं।

ये घटक परियोजना आवश्यकता के अनुसार स्वीकृति के लिए विचार किए जाते हैं और पर्यटन मुख्य उत्पादों से संबंधित हो सकते हैं जैसे पर्यटक सुविधा केंद्र, व्याख्या केंद्र, पर्यटन गतिविधियां, स्वास्थ्य स्वच्छता एवं सुरक्षा, कनेक्टिविटी, पार्किंग, सामान्य स्थल विकास, सॉफ्ट हस्तक्षेप आदि।

पर्यटन मंत्रालय ने स्वदेश दर्शन 2.0 के योजना दिशानिर्देशों में पर्यटन क्षमता बढ़ाने वाले घटकों की एक उदाहरणात्मक सूची भी शामिल की है।

एसडी2.0, सीबीडीडी और प्राशाद के तहत परियोजनाएं पूरे भारत स्तर पर स्वीकृत की गई हैं और ये स्थानीय रोजगार के अवसरों के सृजन तथा पर्यटकों के लिए बेहतर सुविधाओं और साधनों के सृजन में सहायता प्रदान करती हैं, जिससे आगंतुकों की संख्या में वृद्धि होती है। चूंकि इन योजनाओं के माध्यम से सृजित संपत्तियां राज्य सरकारों/केंद्र शासित प्रदेश प्रशासनों द्वारा स्वामित्व, संचालन और प्रबंधन की जाती हैं, इसलिए मंत्रालय ने उन्हें फुटफॉल, रोजगार, उत्पन्न राजस्व और अन्य मापदंडों के संबंध में डेटा कैप्चर करने की सलाह दी है।मंत्रालय अपनी चल रही प्रचार गतिविधियों के हिस्से के रूप में अपनी वेबसाइट, सोशल मीडिया गतिविधियों, आयोजनों आदि के माध्यम से देश के विभिन्न पर्यटन गंतव्यों और उत्पादों का भी प्रचार करता है।

यह जानकारी आज राज्यसभा में लिखित उत्तर में पर्यटन एवं संस्कृति मंत्री  गजेंद्र सिंह शेखावत द्वारा दी गई।

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छत्रपति शाहू जी महाराज विश्वविद्यालय में दो दिवसीय अंतर महाविद्यालय ताइक्वांडो प्रतियोगिता आयोजित

भारतीय स्वरूप संवाददाता कानपुर एस एन सेन बा वि पी जी कॉलेज कानपुर ने अंतर महाविधालयी ताइक्वांडो प्रतियोगिता का भव्य एवं सफल आयोजन विश्व विद्यालय के बहु उद्देशयीय सभागार में आयोजित किया गया। यह प्रतियोगिता कुलपति प्रो. विनय कुमार पाठक एवं प्राचार्या प्रो सुमन के मार्गदर्शन एवं संरक्षण में सम्पन्न हुई।

मुख्य अतिथि के रूप में अंतरराष्ट्रीय पदक विजेता पूमसे खिलाड़ी राम गोपाल एवं बलराम यादव उपस्थित रहे। उन्होंने खिलाड़ियों को तकनीकी दक्षता, आत्मसंयम और निरंतर अभ्यास के महत्व पर प्रेरणादायी विचार साझा किए।

कार्यक्रम में विश्वविद्यालय के शारीरिक शिक्षा विभाग के खेल सचिव डॉ. निमिषा सिंह कुशवाहा, सह-प्राध्यापक डॉ. प्रभाकर पांडे, की गरिमामयी उपस्थिति रही।

प्रतियोगिता में विश्वविद्यालय से संबद्ध विभिन्न महाविद्यालयों की टीमों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया और क्योरुगी एवं पूमसे दोनों वर्गों में उत्कृष्ट प्रदर्शन किया।

प्रतियोगिता परिणाम इस प्रकार रहे — पूमसे (व्यक्तिगत) वर्ग में श्वेता तिवारी (CSJMU) ने प्रथम, ऋषिका (DAV) ने द्वितीय, दुर्गा त्रिवेदी (BND) ने तृतीय तथा शालिनी गुप्ता (DGPG) ने चतुर्थ स्थान प्राप्त किया। टीम पूमसे में CSJMU की श्रृष्टि वर्मा, श्वेता तिवारी एवं सानिया गौतम की टीम ने प्रथम स्थान अर्जित किया, जबकि दुर्गा त्रिवेदी (BND), दिव्या मौर्य (DAV) एवं रिया सुदर्शन (BND) की टीम द्वितीय रही। क्योरुगी के अंडर 46 किग्रा वर्ग में प्रभा सिंह (KSDDD PG) प्रथम एवं पायल (PD महिला) द्वितीय रहीं; अंडर 49 किग्रा वर्ग में सानिया गौतम (CSJMU) प्रथम एवं अर्चिता बिरहा (PPN) द्वितीय रहीं; तथा अंडर 53 किग्रा वर्ग में शिमरन कनौजिया ( बाबू सिंह) प्रथम एवं ऋषिका (DAV) द्वितीय स्थान पर रहीं। समग्र प्रदर्शन के आधार पर CSJMU को ओवरऑल चैंपियन तथा बाबू सिंह महाविद्यालय को रनर-अप घोषित किया गया।

प्रतियोगिता अत्यंत उत्साहपूर्ण एवं अनुशासित वातावरण में सम्पन्न हुई। विश्वविद्यालय परिवार ने सभी विजेताओं एवं प्रतिभागियों को हार्दिक बधाई देते हुए उनके उज्ज्वल भविष्य की कामना की ।

सम्पूर्ण कार्यक्रम की आयोजन सचिव प्रो प्रीती पाण्डेय ने सभी ‘ अतिथियो, खिलाडियो, मिर्णायक मण्डल का आभार व्यक्त किया ।

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युवा कार्यक्रम एवं खेल मंत्रालय ने अगली पीढ़ी के खेल पेशेवरों को तैयार करने हेतु व्यापक इंटर्नशिप नीति की शुरुआत की

युवा कार्यक्रम एवं खेल मंत्रालय (एमओवाईएएस) ने आज युवा प्रतिभाओं को निखारने और   भारत के खेल इकोसिस्टम को मजबूत करने हेतु एक व्यवस्थित एवं बड़े पैमाने का प्लेटफॉर्म बनाने के उद्देश्य से एक व्यापक इंटर्नशिप नीति की शुरुआत की।

‘युवा कार्यक्रम एवं खेल मंत्रालय (एमओवाईएएस) और उसके स्वायत्त निकायों के लिए व्यापक इंटर्नशिप नीति’ कॉलेज व विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों को मंत्रालय और उसके स्वायत्त निकायों में सार्थक इंटर्नशिप के अवसर प्रदान करेगी, जिससे उन्हें खेलों से जुड़े शासन एवं  प्रशासन और संबंधित पेशेवर क्षेत्रों का सीधा अनुभव हासिल हो सकेगा।

केन्द्रीय  युवा कार्यक्रम एवं खेल मंत्री डॉ. मनसुख मांडविया ने कहा कि यह पहल युवा प्रतिभाओं  को भारत की खेल यात्रा में सार्थक योगदान देने हेतु सशक्त बनाएगी।

डॉ. मांडविया ने कहा, “भारत के खेल इकोसिस्टम को बदलने के लिए कुशल पेशेवरों और युवा प्रतिभाओं के साथ-साथ मजबूत संस्थागत समर्थन की जरूरत है। इस इंटर्नशिप कार्यक्रम के जरिए, हम अपने युवाओं के लिए खेलों से जुड़े शासन एवं प्रशासन के दरवाजे खोल रहे हैं, जिससे उन्हें व्यावहारिक अनुभव मिल सके और वे खेल के जरिए राष्ट्र निर्माण में दीर्घकालिक असर डाल पायें।”

नई नीति के तहत, युवा कार्यक्रम एवं खेल मंत्रालय (एमओवाईएएस) और भारतीय खेल प्राधिकरण (साई), राष्ट्रीय डोप-रोधी एजेंसी (नाडा) और राष्ट्रीय डोप परीक्षण प्रयोगशाला (एनडीटीएल) जैसे इसके मुख्य संस्थानों में हर वर्ष 452 इंटर्नशिप प्रदान की जायेंगी।

इस पहल का उद्देश्य खेलों से जुड़े शासन एवं प्रशासन, खेल विज्ञान, डोपिंग-रोधी, प्रतियोगिता  प्रबंधन और एथलीट खेल सेवाओं के क्षेत्र में प्रतिभाओं का एक मजबूत समूह तैयार करना है।

यह कार्यक्रम राष्ट्रीय खेल नीति और खेलो भारत नीति 2025 के उद्देश्यों के साथ जुड़ा हुआ है, जिसमें युवा सशक्तिकरण, क्षमता विकास और खेल प्रशासन को पेशेवर बनाने पर जोर दिया गया है।

यह नीति भारत के उस दीर्घकालिक विजन का भी समर्थन करती है, जिसमें भविष्य की जरूरतों के अनुरूप एक ऐसा खेल इकोसिस्टम विकसित करना है जो बेहतरीन प्रदर्शन को बनाए रख सके और बड़ी अंतरराष्ट्रीय खेल प्रतियोगिताओं का आयोजन कर सके।

डॉ. मांडविया ने आगे कहा कि यह कार्यक्रम पेशेवर रूप से प्रशिक्षित जनशक्ति की बढ़ती जरूरत को पूरा करता है, क्योंकि भारत अपने खेल अवसंरचना का विस्तार कर रहा है, शासन संबंधी सुधारों को मजबूत कर रहा है और वैश्विक स्तर पर खेल के क्षेत्र में अपनी पहचान बढ़ा रहा है।

प्रशिक्षुओं को व्यवस्थित ऑनबोर्डिंग, संबंधित क्षेत्र के विशेषज्ञों से मार्गदर्शन और नीतियां  बनाने एवं उन्हें लागू करने का वास्तविक अनुभव मिलेगा। वे खेलो इंडिया, टारगेट ओलंपिक पोडियम स्कीम (टॉप्स), टारगेट एशियन गेम्स ग्रुप (टैग) जैसी प्रमुख पहलों में सीधे योगदान देंगे और साई स्टेडियम, क्षेत्रीय केन्द्रों (आरसी) और राष्ट्रीय उत्कृष्टता केन्द्रों (एनसीओई) में अनुभव प्राप्त करेंगे।

ये इंटर्नशिप खेल प्रबंधन, खेल विज्ञान, प्रतियोगिता संचालन, मीडिया एवं संचार, कानूनी मामले, आईटी प्रणाली, अंतरराष्ट्रीय खेल प्रशासन और डोपिंग-रोधी सहित 20 कार्यात्मक क्षेत्रों में होंगी। खेल विज्ञान अनुसंधान, प्रयोगशाला परीक्षण, आंकड़ों के विश्लेषण और एथलीटों को वैज्ञानिक सहायता प्रदान करने पर विशेष ध्यान दिया जाएगा। नाडा में रखे गए इंटर्न डोपिंग-रोधी  जागरूकता, कानूनी अनुपालन, मामलों का प्रबंधन और नीतिगत सहायता में सहयोग करेंगे, जबकि एनडीटीएल में काम करने वालों को नमूनों का विश्लेषण एवं शोध सहित उन्नत प्रयोगशाला-आधारित डोपिंग-रोधी प्रक्रियाओं का अनुभव मिलेगा।

इस कार्यक्रम का उद्देश्य युवाओं की भागीदारी, डिजिटल जानकारी, रचनात्मकता और उद्यमिता  को बढ़ावा देना है। साथ ही, ऐसे प्रशिक्षित पेशेवरों की एक टीम तैयार करना है जो नीति, अवसंरचना विकास, मीडिया संपर्क, वैधानिक ढांचे, खेल विज्ञान और खेल प्रबंधन में योगदान दे सकें।

एक केन्द्रीकृत ऑनलाइन पोर्टल के जरिए हर वर्ष भर्ती के दो चक्र होंगे; जनवरी और जुलाई में, जिससे पारदर्शिता, समावेशन और योग्यता पर आधारित चयन सुनिश्चित होगा।

यह व्यापक इंटर्नशिप कार्यक्रम स्वच्छ खेल, पारदर्शी शासन और वैज्ञानिक प्रगति को बढ़ावा देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है, जो निष्पक्ष खेल, एथलीटों के कल्याण और खेल प्रशासन में उत्कृष्टता के प्रति भारत की प्रतिबद्धता को मजबूत करेगा।

इस व्यापक इंटर्नशिप नीति के बारे में विस्तृत जानकारी के लिए यहां क्लिक करें

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प्यार की महक

प्यार की महक कुछ भीनी-सी, गहरी-सी,

जो हृदय को दे अद्भुत स्पंदन।

ऐसा स्पर्श, जो पूरे जीवन को

नव-सृजन की ओर ले जाए।

कार्य की नई लय से

जीवन महके—बिखरे नहीं।

महकते कदमों के संग

उच्च दिशाओं की ओर बढ़ते हुए,

पूरा करने के दृढ़ संकल्प में

रास्ता अपना बनता है।

पथ पर आगे बढ़ते हुए

प्यार का उजाला फैलता है,

राहें सरल होती जाती हैं।

बाधाओं के बीच उभरता एक सरोवर,

जो सुन्दर कर्मों से

और गहरी आशाओं से भर जाता है।

मन की कल्पनाओं को मिलता है आकार,

कल्पना—जो भीतर की शाश्वत ज्योति है।

यही है प्यार का रंग।

और इस रंग को संजोकर रखना हमारी जिम्मेदारी।

~डॉ रश्मि गोयल

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भारत और सऊदी अरब ने सांस्कृतिक सहयोग समझौता पर हस्ताक्षर किए

संस्कृति एवं पर्यटन मंत्री गजेन्द्र सिंह शेखावत और सऊदी अरब के संस्कृति मंत्री प्रिंस बद्र बिन अब्दुल्ला बिन फरहान अल सऊद ने 9 नवंबर 2025 को रियाद में सांस्कृतिक सहयोग पर द्विपक्षीय समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए।

इस समझौता ज्ञापन का उद्देश्य कला, विरासत, संगीत और साहित्य सहित विभिन्न सांस्कृतिक क्षेत्रों में सहयोग को बढ़ावा देकर दोनों देशों के बीच सांस्कृतिक संबंधों को मज़बूत करना है। यह सांस्कृतिक आदान-प्रदान को बढ़ावा देने, नियामक और नीतिगत अनुभवों को साझा करने और त्योहारों एवं आयोजनों में भागीदारी को सुगम बनाने पर आधारित है। यह समझौता सांस्कृतिक संस्थानों के बीच संचार को भी प्रोत्साहित करता है और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण से संबंधित ज्ञान और व्यवहार के आदान-प्रदान को बढ़ावा देता है।

दोनों मंत्रियों ने, हस्ताक्षर समारोह से पहले द्विपक्षीय वार्ता के दौरान, विभिन्न क्षेत्रों में सांस्कृतिक सहयोग को आगे बढ़ाने और सांस्कृतिक क्षेत्र में संयुक्त सहयोग गतिविधियों को बढ़ावा देने की अपनी प्रतिबद्धता की पुष्टि की। भारत और सऊदी अरब के बीच दीर्घकालिक सांस्कृतिक संबंधों और लोगों के बीच आपसी संपर्क पर आधारित गहरे ऐतिहासिक संबंधों का सम्मान करते हुए दोनों मंत्री इस बात पर सहमत हुए कि सांस्कृतिक सहयोग पर समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर से दोनों देशों के बीच सांस्कृतिक संबंधों में बढ़ती गति को और बल मिलेगा।

दोनों संस्कृति मंत्री भारत-सऊदी अरब सामरिक भागीदारी परिषद (एसपीसी) के अंतर्गत पर्यटन और सांस्कृतिक सहयोग की नवगठित मंत्रिस्तरीय समिति के सह-अध्यक्ष भी हैं। इस समिति की घोषणा अप्रैल 2025 में प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी की सऊदी अरब के जेद्दा की राजकीय यात्रा के दौरान की गई थी। ध्यान रहे, पर्यटन और सांस्कृतिक सहयोग पर मंत्रिस्तरीय समिति के गठन के बाद से दोनों संस्कृति मंत्रियों की यह पहली द्विपक्षीय बैठक है।

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