चिंतन शिविर श्रृंखला, जिसे प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के मार्गदर्शन में आगे बढ़ाया जा रहा है, के अंतर्गत “स्केलिंग अप फार्मा एक्सपोर्ट्स” विषय पर एक उद्योग संवाद आयोजित किया गया। यह संवाद उद्योग और नियामकों के साथ घनिष्ठ समन्वय के माध्यम से भारत के निर्यात दायरे को विस्तार देने की सरकार की प्राथमिकता को प्रतिबिंबित करता है।
भारत का औषधि निर्यात प्रदर्शन निरंतर स्थिर वृद्धि दर्शा रहा है। वित्त वर्ष 2024–25 में औषधि निर्यात 30.47 अरब अमेरिकी डॉलर का रहा, जो इसके पिछले वर्ष की तुलना में 9.4 प्रतिशत की वृद्धि दर्शाता है। वर्तमान में लगभग 60 अरब अमेरिकी डॉलर मूल्य के इस क्षेत्र का वर्ष 2030 तक 130 अरब अमेरिकी डॉलर तक पहुँचने का अनुमान है। मात्रा के आधार पर भारत वैश्विक स्तर पर तीसरे स्थान पर है तथा 200 से अधिक बाज़ारों में दवाओं का निर्यात करता है। कुल निर्यात का 60 प्रतिशत से अधिक हिस्सा कठोर नियामक मानकों वाले बाज़ारों को जाता है। भारत के औषधि निर्यात में 34 प्रतिशत की हिस्सेदारी संयुक्त राज्य अमेरिका की तथा 19 प्रतिशत की हिस्सेदारी यूरोप की है। संवाद में निरंतर निर्यात त्वरण हेतु अनुकूल परिस्थितियाँ सुनिश्चित करने पर सरकार के विशेष बल को रेखांकित किया गया, जबकि उद्योग ने 2026–27 में द्विअंकीय वृद्धि का लक्ष्य प्राप्त करने के लिए अपनी तत्परता व्यक्त की।
कार्यक्रम का शुभारंभ वाणिज्य विभाग के वाणिज्य सचिव के वीडियो संदेश से हुआ, जिसमें उन्होंने निर्यातकों और विनिर्माताओं के साथ सतत् संवाद बनाए रखने तथा विनियमित बाज़ारों में उत्पन्न चुनौतियों पर समयबद्ध प्रतिक्रिया देने के महत्व पर बल दिया। संदेश में एक विश्वसनीय व्यापार भागीदार के रूप में भारत की स्थिति को सुदृढ़ करने, वैश्विक औषधि बाज़ारों में अपनी हिस्सेदारी का विस्तार करने तथा भारत से सस्ती और उच्च गुणवत्ता वाली दवाओं की विश्वभर में निरंतर उपलब्धता सुनिश्चित करने पर प्रधानमंत्री द्वारा दिए गए विशेष जोर को पुनः रेखांकित किया गया।
उद्घाटन सत्र में वाणिज्य विभाग, विदेश व्यापार महानिदेशालय, केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन तथा खाद्य एवं औषधि नियंत्रण प्रशासन सहित उद्योग से जुड़े हितधारकों की प्रतिभागिता रही। चर्चाएँ नियामकीय प्रक्रियाओं, निर्यात सुगमता तथा नीतिगत उपायों और क्षेत्र की आगामी विकास अवस्था के बीच समन्वय पर केंद्रित रहीं, विशेषकर सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों के संदर्भ में, जिन्हें प्रायः अनुपालन, प्रलेखन तथा निरीक्षण संबंधी आवश्यकताओं का महत्वपूर्ण सामना करना पड़ता है।
संवाद में केंद्रीय बजट 2026–27 में निर्धारित दिशा को भी संज्ञान में लिया गया, जिसमें बायोफार्मा और जैविक औषधियों को भारत की भावी स्वास्थ्य तथा विनिर्माण प्राथमिकताओं के केंद्र में रखा गया है। प्रस्तावित ₹10,000 करोड़ की बायोफार्मा शक्ति पहल, जिसे पाँच वर्षों में क्रियान्वित किया जाना है, का उद्देश्य जैविक औषधियों और बायोसिमिलर्स के लिए भारत की संपूर्ण पारितंत्र क्षमता को सुदृढ़ करना, आयात निर्भरता को कम करना तथा वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं में प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ाना है, जिससे वैश्विक बायोफार्मास्यूटिकल बाज़ार में 5 प्रतिशत हिस्सेदारी प्राप्त करने के लक्ष्य के अनुरूप प्रगति की जा सके।
इस संदर्भ में तीन नए राष्ट्रीय औषधि शिक्षा एवं अनुसंधान संस्थान स्थापित करने, सात मौजूदा संस्थानों का उन्नयन करने, 1,000 से अधिक मान्यता प्राप्त क्लिनिकल परीक्षण स्थलों का विकास करने तथा केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन की क्षमता को विशेषज्ञ वैज्ञानिक एवं तकनीकी कार्मिकों की नियुक्ति के माध्यम से सुदृढ़ करने के प्रस्ताव पर चर्चा की गई। इन उपायों को जटिल उत्पादों के त्वरित मूल्यांकन को सक्षम बनाने तथा भारत की नियामकीय व्यवस्था में विश्वास को सुदृढ़ करने की दृष्टि से महत्वपूर्ण बताया गया।
पैनल चर्चाओं और विषयगत सत्रों में विनिर्माण अनुशासन से बाज़ार स्वीकृति तक की निर्यात यात्रा का परीक्षण किया गया। “स्केलिंग एक्सिलेंस थ्रू एंटरप्रेन्योरियल जर्नी,” “फ्रॉम कमोडिटी सप्लायर टु ट्रस्टेड ग्लोबल पार्टनर,” “वृद्धि का मंत्र – ग्रोथ का यंत्र,” तथा “स्केल अप मंत्र फॉर इमर्जिंग कंपनीज़” जैसे सत्रों में औषधि निर्यात के अगले दशक की रणनीतियों पर विचार-विमर्श किया गया। प्रतिभागियों ने गुणवत्ता प्रणालियों को सुदृढ़ करने, अनुपालन तत्परता सुनिश्चित करने तथा मूल्य श्रृंखला में उन्नयन के संबंध में अपने व्यावहारिक अनुभव साझा किए, साथ ही लागत और आपूर्ति में विश्वसनीयता बनाए रखने पर भी बल दिया।
निर्यातकों को प्रमुख साझेदारों, जिनमें यूरोपीय संघ और संयुक्त राज्य अमेरिका शामिल हैं, के साथ हालिया व्यापारिक सहभागिताओं से उत्पन्न अवसरों के बारे में भी अवगत कराया गया। यह उल्लेख किया गया कि अधिक निकट आर्थिक व्यवस्थाएँ बाज़ार पहुँच तथा स्थिर मांग के लिए स्पष्ट मार्ग सुनिश्चित करने में, विशेषकर बड़े, विनियमित बाज़ारों में, सहायक हो सकती हैं। 572.3 अरब अमेरिकी डॉलर के औषधि और चिकित्सा उपकरण बाज़ार के संदर्भ में यूरोपीय संघ के साथ सहभागिता पर चर्चा की गई, जबकि संयुक्त राज्य अमेरिका के साथ द्विपक्षीय व्यापार व्यवस्था भारतीय औषधि कंपनियों के लिए बाज़ार पहुँच और मूल्य प्रतिस्पर्धात्मकता को और सुदृढ़ कर सकती है।
भारत की औषधि निर्यात संवर्धन परिषद (फार्मेक्सिल) की गतिविधियों तथा 12वीं अंतरराष्ट्रीय औषधि एवं स्वास्थ्य सेवा उद्योग प्रदर्शनी (आईफेक्स) पर एक प्रस्तुति दी गई, जिसके पश्चात निर्यातकों और हितधारकों के साथ एक खुला संवाद आयोजित किया गया। कार्यक्रम में लगभग 200 निर्यातकों ने भाग लिया, जिनमें अधिकांश भारत के पश्चिमी क्षेत्र से थे।
अहमदाबाद में हुई चर्चाओं में निर्यातकों और व्यापक जनहित से संबंधित प्रमुख प्राथमिकताओं पर ध्यान केंद्रित रखा गया, जिनमें त्वरित और अधिक सुनिश्चित अनुमोदन, सुदृढ़ नियामकीय सहयोग और मात्रा-आधारित निर्यात से जैविक औषधियों, बायोसिमिलर्स और नवाचार-प्रेरित उत्पादों जैसे उच्च-मूल्य खंडों की ओर क्रमिक बदलाव शामिल हैं। वाणिज्य विभाग निर्यातकों, नियामक निकायों और विदेशों में भारतीय मिशनों के साथ सतत् संवाद जारी रखेगा, जिससे समस्याओं की समय पर पहचान और समाधान सुनिश्चित किया जा सके तथा वैश्विक बाज़ारों में भारत के औषधि निर्यात की निरंतर वृद्धि को समर्थन मिले।
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भारत सरकार में कौशल विकास और उद्यमिता राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) एवं शिक्षा राज्य मंत्री जयंत चौधरी ने आज अमरोहा कौशल महोत्सव में चयनित उम्मीदवारों को नियुक्ति पत्र सौंपे। यह जमीनी स्तर पर कौशल विकास को रोजगार से जोड़ने पर सरकार के निरंतर ध्यान को दर्शाता है।
इस अवसर पर अपने संबोधन में जयंत चौधरी ने कहा, “चौधरी अजीत सिंह जी की जयंती पर, हम ग्रामीण भारत और उसके युवाओं की शक्ति में उनके अटूट विश्वास को श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं। अमरोहा में उद्यमशीलता की भावना से लेकर मेहनती युवा आबादी तक अपार संभावनाएं हैं। आज 4,000 से अधिक युवाओं द्वारा दिखाया गया उत्साह उनकी आकांक्षा और तत्परता दोनों को दर्शाता है। कौशल महोत्सव जैसे मंच प्रतिभा और अवसर के बीच की खाई को पाटने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ये हमारे युवाओं के दरवाजे तक उद्योग को लाते हैं जिससे उन्हें काम की तलाश में पलायन किए बिना रोजगार, प्रशिक्षण और करियर मार्गदर्शन प्राप्त करने में मदद मिलती है।”
भारत में बाल विवाह एक ऐसी सामाजिक और भौगोलिक चुनौती है, जो आधुनिक विकास और शिक्षा विस्तार के बावजूद आज भी अनेक समुदायों में गहराई तक जड़ें जमाए हुए है। यह प्रथा विशेष रूप से लड़कियों के जीवन को प्रभावित करती है—उनकी शिक्षा, स्वास्थ्य, सुरक्षा, अवसर, क्षमता और आत्मनिर्भर भविष्य, सभी पर इसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-5 (2019–21) के अनुसार 20–24 वर्ष आयु-वर्ग की 23.3% महिलाओं का विवाह 18 वर्ष से पहले ही हो चुका था। यह तथ्य इस बात का संकेत है कि कानूनी निषेध और नीति-हस्तक्षेपों के बावजूद सामाजिक-जड़ता, परंपरा और असमान विकास के कारण बाल विवाह अब भी पूरी तरह समाप्त नहीं हो पाया है। इसके स्थानिक पैटर्न भी विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं—पूर्वी और मध्य भारत के कई राज्य, जैसे बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल, असम और छत्तीसगढ़, अभी भी बाल विवाह की उच्चतम दर वाले क्षेत्रों में आते हैं। इन राज्यों में शिक्षा और स्वास्थ्य अवसंरचना का कमजोर होना, ग्रामीण निर्धनता का व्यापक होना, सामाजिक-पितृसत्तात्मक मान्यताओं का प्रबल होना और महिलाओं की निम्न साक्षरता दर जैसे कारक इस कुप्रथा को बनाए रखते हैं। कम आयु में विवाह लड़कियों को शारीरिक और मानसिक दोनों स्तरों पर अनेक जोखिमों के सामने ला देता है—कम उम्र में गर्भधारण से मातृ एवं नवजात मृत्यु दर बढ़ती है, कुपोषण और एनीमिया की समस्याएँ गंभीर रूप ले लेती हैं और प्रजनन स्वास्थ्य पर दीर्घकालिक असर पड़ता है। शिक्षा रुक जाने से लड़कियों के कौशल-विकास, रोजगार और आजीविका के अवसर भी सीमित हो जाते हैं, जिससे उनकी सामाजिक-आर्थिक प्रगति बाधित होती है। भारतीय न्याय संहिता (2023) ने 18 वर्ष से कम आयु की पत्नी के साथ यौन संबंध को बलात्कार की श्रेणी में रखा है, जबकि सर्वोच्च न्यायालय ने भी विभिन्न याचिकाओं में राज्यों को बाल विवाह पर कड़ा नियंत्रण लागू करने के निर्देश दिए हैं। भारत सरकार द्वारा 2025 तक बाल विवाह की दर को 23.3% से घटाकर 10% तक लाने और 2030 तक देश को बाल विवाह-मुक्त बनाने का लक्ष्य भी इसी दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए विवाह पंजीकरण को अनिवार्य रूप से बढ़ावा देना, समुदायों और धार्मिक संस्थानों को जागरूकता अभियानों में शामिल करना, महिलाओं को नेतृत्वकारी भूमिकाओं में सक्षम बनाना, तथा बाल संरक्षण एजेंसियों की क्षमता को मजबूत करना जैसे बहुआयामी उपाय लागू किए जा रहे हैं। समग्रतः, बाल विवाह केवल एक कानूनी उल्लंघन नहीं, बल्कि शिक्षा, स्वास्थ्य, लैंगिक समानता और क्षेत्रीय विकास से जुड़ी एक गहरी सामाजिक-संरचनात्मक समस्या है, जिसका समाधान तभी संभव है जब सरकार, समाज और परिवार—तीनों स्तरों पर सतत और सामूहिक प्रयास किए जाएँ।~डॉ रश्मि गोयल
भारतीय स्वरूप संवाददाता
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