भारतीय स्वरूप संवाददाता कानपुर क्राइस्ट चर्च कॉलेज, कानपुर के आंतरिक गुणवत्ता आश्वासन सेल (IQAC) द्वारा ‘अखिल भारतीय महिला सम्मेलन’ (AIWC), कानपुर शाखा के सहयोग से आज 30 मार्च 2026 को सुबह 11:00 बजे कॉलेज के डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन सभागार में ‘वित्तीय साक्षरता पर एक जागरूकता कार्यक्रम’ का सफल आयोज किया गया।
कार्यक्रम का औपचारिक शुभारंभ IQAC की समन्वयक प्रो. सुजाता चतुर्वेदी के स्वागत भाषण से हुआ। उन्होंने अत्यंत गरिमामय ढंग से अतिथियों का स्वागत किया और युवाओं के बीच वित्तीय साक्षरता को बढ़ावा देने में शैक्षणिक संस्थानों की महत्वपूर्ण भूमिका पर विस्तार से प्रकाश डाला। इसके पश्चात, कॉलेज के प्राचार्य प्रो. विनय जॉन सेबस्टियन ने अपने प्रेरणादायक संबोधन में आज के गतिशील आर्थिक परिवेश में वित्तीय जागरूकता की बढ़ती आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि व्यक्तिगत वित्तीय स्थिरता सुनिश्चित करने और छात्रों को सूचित आर्थिक निर्णय लेने के लिए वित्तीय साक्षरता अनिवार्य है।
कॉलेज की उप-प्राचार्या प्रो. श्वेता चंद ने भी छात्र जीवन से लेकर सेवानिवृत्ति योजनाओं तक वित्तीय निवेश और बचत पर अपने विचार साझा किए। उन्होंने जोर देकर कहा कि निवेश की योजना कम उम्र से ही शुरू कर देनी चाहिए। कार्यक्रम को आगे बढ़ाते हुए AIWC, कानपुर शाखा की सचिव रमिंदर कौर अरोरा ने वित्तीय समावेशन और महिला सशक्तिकरण की दिशा में संस्था द्वारा की जा रही पहलों के बारे में जानकारी दी। डॉ. पवनेश मिश्रा ने मुख्य वक्ता अरविंद कुमार गुप्त (सेवानिवृत्त एजीएम, भारतीय स्टेट बैंक) का संक्षिप्त परिचय प्रस्तुत किया। अपने सत्र में, अरविंद कुमार गुप्त ने वित्तीय साक्षरता के विभिन्न पहलुओं जैसे—बचत, निवेश के विकल्प, डिजिटल बैंकिंग, वित्तीय सुरक्षा और वित्तीय धोखाधड़ी से बचाव पर एक ज्ञानवर्धक व्याख्यान दिया। कार्यक्रम का समापन डॉ. रुक्मणी देवी द्वारा दिए गए धन्यवाद प्रस्ताव के साथ हुआ।
इस अवसर पर AIWC की अध्यक्षा अनीता गर्ग, नैक (NAAC) समन्वयक प्रो. सत्य प्रकाश सिंह, प्रो. शालिनी कपूर, प्रो. अनिंदिता भट्टाचार्य, प्रो. ज्योत्सना लाल, डॉ. शुभी तिवारी, डॉ. अंकिता जैस्मिन लाल सहित अन्य शिक्षकगण, गैर-शिक्षण कर्मचारी और बड़ी संख्या में छात्र उपस्थित रहे। छात्रों की सक्रिय भागीदारी ने इस कार्यक्रम को भव्य रूप से सफल बनाया।
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कानपुर नगर। चंद्रशेखर आजाद कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय (सीएसए), कानपुर में गोल्डन जुबली वर्ष के उपलक्ष्य में कृषि विश्वविद्यालय एवं एमएसएमई विभाग के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित तीन दिवसीय लघु, सूक्ष्म एवं मध्यम उद्यम (एमएसएमई) कॉनक्लेव एवं क्षेत्रीय ट्रेड शो में भारत के पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद पहुंचे।
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इस कार्यशाला का उद्देश्य समाज शास्त्र एवं वाणिज्य विभाग के स्नातक एवं स्नातकोत्तर विद्यार्थियों में शोध कौशल को विकसित करना था।
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भारत में बाल विवाह एक ऐसी सामाजिक और भौगोलिक चुनौती है, जो आधुनिक विकास और शिक्षा विस्तार के बावजूद आज भी अनेक समुदायों में गहराई तक जड़ें जमाए हुए है। यह प्रथा विशेष रूप से लड़कियों के जीवन को प्रभावित करती है—उनकी शिक्षा, स्वास्थ्य, सुरक्षा, अवसर, क्षमता और आत्मनिर्भर भविष्य, सभी पर इसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-5 (2019–21) के अनुसार 20–24 वर्ष आयु-वर्ग की 23.3% महिलाओं का विवाह 18 वर्ष से पहले ही हो चुका था। यह तथ्य इस बात का संकेत है कि कानूनी निषेध और नीति-हस्तक्षेपों के बावजूद सामाजिक-जड़ता, परंपरा और असमान विकास के कारण बाल विवाह अब भी पूरी तरह समाप्त नहीं हो पाया है। इसके स्थानिक पैटर्न भी विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं—पूर्वी और मध्य भारत के कई राज्य, जैसे बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल, असम और छत्तीसगढ़, अभी भी बाल विवाह की उच्चतम दर वाले क्षेत्रों में आते हैं। इन राज्यों में शिक्षा और स्वास्थ्य अवसंरचना का कमजोर होना, ग्रामीण निर्धनता का व्यापक होना, सामाजिक-पितृसत्तात्मक मान्यताओं का प्रबल होना और महिलाओं की निम्न साक्षरता दर जैसे कारक इस कुप्रथा को बनाए रखते हैं। कम आयु में विवाह लड़कियों को शारीरिक और मानसिक दोनों स्तरों पर अनेक जोखिमों के सामने ला देता है—कम उम्र में गर्भधारण से मातृ एवं नवजात मृत्यु दर बढ़ती है, कुपोषण और एनीमिया की समस्याएँ गंभीर रूप ले लेती हैं और प्रजनन स्वास्थ्य पर दीर्घकालिक असर पड़ता है। शिक्षा रुक जाने से लड़कियों के कौशल-विकास, रोजगार और आजीविका के अवसर भी सीमित हो जाते हैं, जिससे उनकी सामाजिक-आर्थिक प्रगति बाधित होती है। भारतीय न्याय संहिता (2023) ने 18 वर्ष से कम आयु की पत्नी के साथ यौन संबंध को बलात्कार की श्रेणी में रखा है, जबकि सर्वोच्च न्यायालय ने भी विभिन्न याचिकाओं में राज्यों को बाल विवाह पर कड़ा नियंत्रण लागू करने के निर्देश दिए हैं। भारत सरकार द्वारा 2025 तक बाल विवाह की दर को 23.3% से घटाकर 10% तक लाने और 2030 तक देश को बाल विवाह-मुक्त बनाने का लक्ष्य भी इसी दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए विवाह पंजीकरण को अनिवार्य रूप से बढ़ावा देना, समुदायों और धार्मिक संस्थानों को जागरूकता अभियानों में शामिल करना, महिलाओं को नेतृत्वकारी भूमिकाओं में सक्षम बनाना, तथा बाल संरक्षण एजेंसियों की क्षमता को मजबूत करना जैसे बहुआयामी उपाय लागू किए जा रहे हैं। समग्रतः, बाल विवाह केवल एक कानूनी उल्लंघन नहीं, बल्कि शिक्षा, स्वास्थ्य, लैंगिक समानता और क्षेत्रीय विकास से जुड़ी एक गहरी सामाजिक-संरचनात्मक समस्या है, जिसका समाधान तभी संभव है जब सरकार, समाज और परिवार—तीनों स्तरों पर सतत और सामूहिक प्रयास किए जाएँ।~डॉ रश्मि गोयल
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