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लेख/विचार

योग गठिया के रोगियों को राहत पहुंचा सकता है

अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स), नई दिल्ली के एक नए अध्ययन से पता चलता है कि योगाभ्यास से गठिया (रूमेटाइड अर्थराइटिस-आरए) के रोगियों के स्वास्थ्य में काफी सुधार आ सकता है।

आरए एक पुरानी ऑटोइम्यून बीमारी है जो जोड़ों में सूजन का कारण बनती है। यह जोड़ों को नुकसान पहुंचाती है और इस रोग में दर्द होता है। इसके कारण फेफड़े, हृदय और मस्तिष्क जैसे अन्य अंग प्रणालियां भी प्रभावित हो सकती हैं। परंपरागत रूप से, योग शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य लाभों के लिए जाना जाता है।

डीएसटी द्वारा समर्थित, मोलेक्यूलर री-प्रोडक्शन एंड जेनेटिक्स प्रयोगशाला, एनाटॉमी विभाग और रुमेटोलॉजी विभाग एम्स, नई दिल्ली द्वारा एक सहयोगी अध्ययन ने गठिया के रोगियों में सेलुलर और मोलेक्यूलर स्तर पर योग के प्रभावों की खोज की है। इससे पता चला है कि कैसे योग पीड़ा से राहत देकर गठिया के मरीजों को लाभ पहुंचा सकता है।

पता चला है कि योग सेलुलर क्षति और ऑक्सीडेटिव तनाव (ओएस) को नियंत्रित करके सूजन को कम करता है। यह प्रो- और एंटी-इंफ्लेमेटरी साइटोकिन्स को संतुलित करता है, एंडोर्फिन के स्तर को बढ़ाता है, कोर्टिसोल और सीआरपी के स्तर को कम करता है तथा मेलाटोनिन के स्तर को बनाए रखता है। इसके जरिये सूजन और अतिसक्रिय प्रतिरक्षा प्रणाली चक्र का विघटन रुक जाता है।

मोलेक्यूलर स्तर पर, टेलोमेरेज़ एंजाइम और डीएनए में सुधार तथा कोशिका चक्र विनियमन में शामिल जीन की गतिविधि को बढ़ाकर, यह कोशिकाओं की उम्र बढ़ने की प्रक्रिया को धीमा कर देता है। इसके अतिरिक्त, योग माइटोकॉन्ड्रियल फ़ंक्शन को बेहतर बनाता है, जो ऊर्जा चयापचय को बढ़ाकर और ऑक्सीडेटिव तनाव को कम करके टेलोमेर एट्रिशन व डीएनए क्षति से बचाता है।

डीएसटी द्वारा समर्थित, एम्स के एनाटॉमी विभाग के मोलेक्यूलर री-प्रोडक्शन एंड जेनेटिक्स प्रयोगशाला में डॉ. रीमा दादा और उनकी टीम द्वारा किए गए एक अध्ययन में दर्द में कमी, जोड़ों की गतिशीलता में सुधार, चलने-फिरने की कठिनाई में कमी और योग करने वाले रोगियों के लिए जीवन की समग्र गुणवत्ता में वृद्धि दर्ज की गई। ये समस्त लाभ योग की प्रतिरक्षात्मक सहनशीलता और मोलेक्यूलर रेमिशन स्थापित करने की क्षमता में निहित हैं।

साइंटिफिक रिपोर्ट्स, 2023 में प्रकाशित अध्ययन https://www.nature.com/articles/s41598-023-42231-w से पता चलता है कि योग तनाव को कम करने में मदद कर सकता है, जो गठिया  के लक्षणों के लिए एक ज्ञात कारण है। कोर्टिसोल जैसे तनाव हार्मोन को कम करके, योग अप्रत्यक्ष रूप से सूजन को कम कर सकता है, माइटोकॉन्ड्रियल फ़ंक्शन में सुधार कर सकता है, जो ऊर्जा उत्पादन और सेलुलर स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकता है और -एंडोर्फिन, मस्तिष्क-व्युत्पन्न न्यूरोट्रॉफ़िक कारक (बीडीएनएफ), डीहाइड्रोएपियनड्रोस्टेरोन (डीएचईए), मेलाटोनिन और सिरटुइन-1 (एसआईआरटी-1) के बढ़े हुए स्तरों से को-मॉर्बिड डिप्रेशन की गंभीरता को कम कर सकता है। योग न्यूरोप्लास्टिसिटी को बढ़ावा देता है और इस प्रकार रोग निवारण रणनीतियों में सहायता करता है तथा को-मॉर्बिड डिप्रेशन की गंभीरता को कम करता है।

इस शोध से गठिया रोगियों के लिए पूरक चिकित्सा के रूप में योग की क्षमता का प्रमाण मिलता है। योग न केवल दर्द और जकड़न जैसे लक्षणों को कम कर सकता है, बल्कि रोग नियंत्रण और जीवन की बेहतर गुणवत्ता में भी योगदान दे सकता है। दवाओं के विपरीत, योग के कोई दुष्प्रभाव नहीं हैं और यह गंभीर ऑटोइम्यून स्थितियों के प्रबंधन के लिए एक सस्ता व प्रभावी तथा स्वाभाविक विकल्प प्रदान करता है।

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हैरान हूँ मैं कभी इस बात पर कभी उस बात पर

आज कल यू ट्यूब पर लगातार तरहां तरहा के उपाय बताये जा रहे है।लोगों को कन्फ़्यूशज किया जा रहा है,अलग अलग बातें समझा कर।बेचारे लोग अपनी समस्याओं से परेशान हो कर पंडित ज्योतिषी से पूछते जा रहे हैं !!कि बताये हमारे कौन सा ग्रह अच्छा है कौन सा बुरा .. पंडित जी कोई ऐसा उपाय बता दीजिए ,बस पैसा सब तरफ़ से बरसना शुरू हो जाये।
मैं कहती हूँ अगर क़िस्मत मे पैसा होगा, तो आ ही जायेगा.. अगर पैसा क़िस्मत मे नही है तो जो हम पंडितों से पूछ पूछ कर, कभी ये उपाय तो कभी वो उपाय कर रहे होते है ,उससे मुझे नहीं लगता कि पैसा आ जायेगा .. चलो मान भी लें कि उपाय करने से कहीं से पैसा आ भी गया या किसी जप ,तप ,साम ,दाम ,दंड ,भेद से कहीं पैसा इकट्ठा हो भी गया तो दोस्तों ..
वो धन कुछ समय तो सुख दे सकता है हमेशा नही।कभी-कभी ऐसा धन दुख ही दे कर जाता है।
हैल्थ प्रोब्लम, बच्चों का बिगड़ना , क्लेश या कोई और समस्या ले कर आता क्योंकि इसे हमने अपनी ज़िद्द से अर्जित किया।
पैसा लम्बे समय तक वही फलता फूलता है जो नेक कमाई ,साफ़ मन से अर्जित किया हो। हम लोग व्रत भी करते है तो भी शर्तों पर।भगवान के सामने पहले बात रखी जाती है कि हे भगवान आप मेरा ये काम करें तो मैं आप का व्रत करूँगा।
ये तो ऐसी बात है कि हमारा बच्चा ज़िद्द करे, मां बाप से कि आप को मेरी बात माननी होगी …
नहीं तो मैं अन्न नहीं ग्रहण करूँगा।
जबकि बच्चे को तो पता भी नहीं कि वो उसकी वो माँग सही है भी या नही।
दूसरी बात ,जब हमारा बच्चा इस तरह की ज़िद्द ले कर बैठ जाता है तो हमें क़तई अच्छा नहीं लगता..कंयूकि माँ बाप को पता होता है क्या देना ज़रूरी है बच्चे के लिए ,वो तो वक़्त आने पर दे ही
देंगे ।अब किसी छोटे बच्चे को उसकी ज़िद्द पर कार तो नहीं दी सकती। वो तो जब वो उसके काबिल होगा तो उसका पिता उसे वक़्त आने पर ले भी देगा।
इक होड़ सी ..
इक भागदौड़ सी लगी हुई है हर कहीं।सब कुछ पाने की चाह रखे हुए है लोग।तुम उससे आगे और मैं तुम्हारे आगे।
ये कैसा जीवन है ?जिसमें शान्ति नही,सन्तोष नही ,इक दूसरे के सिर पर पैर रख कर आगे बढ़ने की चाहत हमें कहीं नहीं ले जा सकती।
अगर ग्रहों की बात करें तो हमें किसी से पूछने की ज़रूरत है तो ही नहीं।दोस्तों ।
सब उपाय हमारे ही आसपास है ।
हमारे अंदर ही है।
सिर्फ़ उन्हें साफ़ साफ़ देखने, समझने और व्यवहारिक जीवन में लाने की ही ज़रूरत है।
🌹
पिता ..” सूर्य ग्रह “का प्रतीक है।
जो व्यक्ति पिता की इज़्ज़त करता है,उनकी सेवा करता है उनपर किसी प्रकार का खर्च , उनके इलाज पर खर्च करता है
उनके पास वक़्त निकाल कर बैठता है ,पैरो को दबाता है …
अवश्य ही उसका सूर्य बलवान होता है। उसे सूर्य ग्रह को उंचा करने के लिए कोई उपाय की ज़रूरत है ही नही।अगर बाप क तकलीफ़ दोगे या उससे किसी तरह का छल करोगे ,तो कितना भी आप सूर्य को जल चढ़ा लें..
सूर्य नीच का ही रहेगा।
पिता को हर सुख, हर सुविधा दे कर ही हम अपना सूर्य बलवान कर सकते है।
🌹ऐसे ही चन्द्र ग्रह
इस ग्रह के नीच होने पर मन की कमजोरी ,बीमारी और उदासी घेरे रहती है “माता का रूप है “उसको शान्त करने के लिए माता की सेवा ,उसका सम्मान ,माता को सुन्दर कपड़ा ,उनको सुगन्धित फूल देना ।उसकी हर इच्छा को पूरा करना ही “चन्द्र को उंचा “करने के उपाय है 
🌹भाई ,दोस्त ,यार ये सब ही मंगल ग्रह के ही रूप है
इन सब से किया गया छल कपट ,निरादर ,हमारे मंगल ग्रह के दूषित कर देता है।पंडित कह देते है पीली या लाल दालों को पानी में डालो ..या किसी आनाथ आश्रम में पीली चीजो का दान कर दो ..
मैं तो बस यही कह रही हूँ अपने किसी आसपास नज़र घुमा कर देखिए ,
अपने किसी दोस्त को या अपने छोटे या बड़े भाई को ,..कहीं उसे तो हमारी सहायता की आवश्यकता नहीं।
उनको सहारा दो।कभी ऐसा भी होता है आप के घर राजाओं जैसा भोजन खाया जा रहा होता है और आप का भाई या कोई दोस्त या कोई आप का जानने वाले के यहाँ दाल खाना भी नसीब नहीं होता।
सो किसी ऐसे की मदद ही आप का मंगल को उंचा कर देगी।भगवान ने हमारे लिए सारे उपाय बहुत सरल और हमारे आसपास ही रखे हुए है।
मंगल को उंचा करने का यही सीधा सा तरीक़ा है अपने भाई ,यार ,दोस्तों से बना कर रखे बिना की छल कपट के। फिर देखिए मंगल आप का उंचा ही होगा।
🌹“बुध का रूप “बहन या बेटी ही है
अपनी बहन या किसी की बहन , अपनी बेटी या किसी की बेटी की इज़्ज़त करने से। उसके दुख सुख में खड़े होने से हमारा बुध ग्रह को ताकतवर बन जाता है पंडित भी हरी चीजों का दान बता देते है मगर कोशिश करें ,दान सब से पहले अपने आसपास के परिवारों से ही शुरू करे।
🌹“बृहस्पति ग्रह “
गुरू का रूप ही है
गुरू को सम्मान देना उसकी आज्ञा को मानना, उसकी सेवा मे लगना। बृहस्पति ग्रह को ख़ुश करने में सक्षम है
और हमारा उच्च का गुरू हो जायेगा 
🌹“शुक्र ग्रह का रूप “
पति या पत्नी ही है जिनके साथ हमारा सम्बंध जुड़ता है।
पति को ख़ुश रखना ,
उसका सम्मान करना ,
उसको अपने हाथों से भोजन बना कर खिलाना,उसके हर काम को ह्रदय से करना..,
उसके दुख सुख में साथ निभाना शुक्र ग्रह को उच्च कर देता है।
ऐसे ही पत्नियों को हर तरह का सुख देना पुरुषों का शुक्र ग्रह उच्च का कर देता है।
🌹“शनि ग्रह का रूप “
हमारे साथ जुड़े हुए पिता के रिश्तेदार जैसे
चाचा ,ताया ,बुआ
माँ से जुड़े रिश्तेदारों का सम्मान…बुजुर्गों का सम्मान ,उनकी सेवा से शनि उच्च के होते हैं ।
पक्षियों और जानवरों पर दया भाव रखना उनको पानी या खाने को कुछ देने से भी शनि उच्च के होते है नौकरों को नौकर न समझ कर उन्हें भी इज़्ज़त देना शनि ग्रह उच्च का कर देता है शनि आप के व्यवहार को देखता है कि आप किस के साथ क्या व्यवहार करते है सो अपनी सोच को साफ़ और सुव्यवस्थित रखने पर शनि की किरपा मिलती रहती है ।
🌹“राहू ग्रह “
ससुराल के रूप में होता है ।
उनसे बना कर रखिए।जो वो दे दे प्रसाद समझ कर ग्रहण कर लिया जाये ,
उनसे कभी माँगा नहीं जाना चाहिए बल्कि उनको देने की इच्छा ही राहू को उच्च का कर देती है।अपने शरीर की सफ़ाई ,अपने घर की सफ़ाई ,अपनी रसोई और अपने घर के शौचालय को साफ़ रखने से राहू उच्च का हो जाता है अपने घर में चीजों को सही तरीक़े सलीक़े से रखने से राहू उच्च का होता है।
🌹“केतु ग्रह..”
पंडित, महात्मा ,साधु या गुरू रूप है
उनकी सेवा करना ..
केतु को मोक्ष का कारक ग्रह भी माना जाता है इसीलिए इस मे सब से अच्छा बर्ताव .. साफ़ मन .. दया भाव .. छल कपट से दूर रहने पर ही केतु उच्च के होते है।
ग्रह कोई भी हो ,
अगर आप अच्छे हैं।
अच्छे विचार रखते है
सब की मदद कर रहे है।
यथा योग्य दान भी कर रहे है।
बुरे ग्रह का प्रभाव चाहे व्यक्ति पर पड़ तो सकता है मगर वो आप को नुक़सान नहीं पहुँचा पायेगा।
सब का भला करना
और सब के लिए मंगल की कामना करने वाले का कोई भी ग्रह कभी नुक़सान नहीं करता।
सब विकारों से दूर होने पर ही केतु हमें मोक्ष की ओर ले कर जायेगा
दोस्तों !!
बात बहुत सीधी और सरल है। अब सोचने की बात है ये सब उपाय इक सुलझा हुआ व्यक्ति बहुत आसानी से कर सकता है बस अपनी अन्तरात्मा को जगाने की ही ज़रूरत है।ये सब बातें तो हमारी रोज़मर्रा की ज़िंदगी में बातें शामिल होनी ही चाहिए ।इसमें केवल अच्छा स्वभाव ही रखने की आवश्यकता है
इसमें न कोई पैसा ख़र्च करने की ज़रूरत है ,न किसी पंडितों को पैसा देने की । न ही किसी के पास जाने की ज़रूरत है यहाँ तो अपने आप को और अपनी द्वारा की गई हर गतिविधियों पर नज़र रखने की ज़रूरत है 
✍️ लेखिका स्मिता

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मज़े की लाइफ

दैनिक भारतीय स्वरूप, कुछ ख्याल अक्सर अचानक आते हैं यूंकि बेमतलब से लगते हैं लेकिन सोचने पर मजबूर करते हैं कि हम जिंदगी को किस नजर से देखते हैं और शायद हमारा नजरिया हमारी जिंदगी के रास्ते भी तय करता है। कितने ही दुख सुख आते जाते हैं, कितने ही लोग मिलते बिछड़ते हैं जिंदगी में, पता नहीं कब कौन दोस्त बन जाता है और कब किसका साथ छूट जाता है। ये वक्त, ये पल ऐसे होते हैं जिनमें डूबकर हम बह जाते हैं या फिर मौन साधकर तटस्थ हो जाते हैं। कुछ ऐसे अपनों से भी वास्ता रहता है जो जिंदगी में नमक और शक्कर की तरह घुले से रहते हैं लेकिन फिर भी जिंदगी नींबू निचोड़ कर शरबत बना ही देती है क्योंकि हमेशा मुस्कुराते हुए हमें संबंधों को स्वीकारना होता है। कभी-कभी लगता है कि यह सब प्रपंच छोड़कर “मजे की लाइफ” का आनंद लेना चाहिए कोई कुछ बोल रहा हो तो बोलने दो उसे हम अपने ही गीत में मगन रहें, कोई पैर खींचना चाहे तो उसके साथ बैठकर बतिया ही लिया जाए। यह रफ्तार भरी जिंदगी कब थम जाती है यह भी हमें देर से मालूम पड़ता है। लब्बोलुआब कुछ यूं है कि पंचायती स्वभाव वाले प्राणी हमेशा खुश रहते हैं। तांक – झांक, लगाई – बुझाई शगल रहता है उनका और कुछ नहीं तो मनोरंजन ही हो जाता है। मोहल्ले में सबसे ज्ञानी भी वही रहते हैं।

“मोहल्ले में सबसे ज्ञानी हम ही हैं ऐसा हम मानते हैं अब क्या करें सबको मालूम हो या ना हो हमारा काम है ज्ञान बांटना और कुछ इधर-उधर करना। अब घर में बहुरिया है तो घर की चिंता से हम मुक्त है सारा जीवन खट लिया तो अब हम मजे से अपनी लाइफ जिएंगे।”
“पता नहीं लड़कियाँ एक ही शहर में शादी करके मायके में काहे पड़ी रहती है, समझ में नहीं आया आज तक। अब हम पूछे तो बुरे बन जाए फिर भी मन की कुलबुलाहट पर काबू कैसे पाएं तो पूछ ही लेते हैं कि का हो लल्लन की दुल्हिन बिटिया घर में है? सब कुसल मंगल तो है ना ?”
सवाल हम पूछा तो जवाब मा सवाल हम ही से पूछ लिया गया।
“अरे चाची! तुमका काहे चिंता हो रही है?”
चाची:- “अरे कुछू नाहीं! मुन्नी को देखा तो पूछ लिया। कौउनो बात नहीं सुखी रहो। रामदुलारी हमका मिलीं रहीं तो उनहीं बताइन कि मुन्नी आई है तो हाल-चाल लेक खातिर आए गयन और तुमरी सहेली बबीता के घर से झगड़े की आवाज आवत रही। लागत भय कि बहुरिया सास का खूब खरीखोटी बोलत रही। रोना धोना मचा रहै खूब, आवाज आवत रही।”
“अरे चाची! सब घर में कुछ ना कुछ होत है तुम काहे परेसान होती हो? घर मा बैइठ के भजन किया करो।”
चाची:- “हां बिटिया! अब यही करना ही है मगर आंख कान नाक बंद थोड़ी कर लेंगे।”
“चाची तुम तुमरी कहो कल तुम्हार बिटेवा तुमका का बोलत रहै ? काहे डांटत रहै?”
अरे कुछ नहीं! चलो हम जा रहे हैं, देर हो रही है। बिटिया लोगन का बहुत दिन मायका मा नाही रहेक चाही। ससुराल मा ही नीक लगतीं हैं और सुनो लल्लन की दुल्हिन हम अपना समझ कै बोलत हन नहीं तो हमका का पड़ी है। राधे-राधे..”
गली के नुक्कड़ पर सहेली नंदा मिल गई दोनों बतियाने लगी। कहां से आ रही हो जी?
“अरे लल्लन के घर पर रुक गये रहन पता है पंदर दिन से घर पर है मुन्नी, हमका तो दाल में कुछ काला नजर आ रहा है?”
“अरे कुछ नहीं! सब कामचोरी है ससुराल में काम करना पड़ता है तो भाग कर मायके आ जाती हैं।”
“हम्म यही बात होई! अच्छा सुनो तुम मंदिर गई रहौ का? बहुत चोट्टा पंडित है सब डकार लेत है फिर भी पेट नहीं भरत है उका ऊपर से ही – ही करत रहत है बस।”
“ऐजी तुम फालतू ना बोला करो उ अपना काम करत हय बेचारा, जो बुलावत है तय कर लेत है उतना मा ही सब होई जात है।”
“का हमका कुत्ता काटा है जो हम ई मेर बोलब? हंय?. हम देखा है कल रजनी कहत रही।”
“अच्छा छोड़ो तुम जाय के खुदही तय कर लो हम का देर हो रही है राधे-राधे।”
चाची:- “ठीक है! राधे-राधे। आजकल कौउनो से कुछू कहे वाला नहीं उल्टे हमरे ऊपर बरस पड़त हैं।”
घर पहुंचते ही… अम्मा जी आ गई? चौधरी वाले काम हो गए हों आपके तो जरा सब्जी काट दो हमको!”
“हां! लाओ दे दो अब यही करेंगे!”
कहने का मतलब यही है कि आप अपनी जिंदगी को अपने मनमुताबिक जियें। जिंदगी में कुछ हासिल करें या ना करें मगर सुकून जरूर हासिल करें। लोगों से जुड़ाव लगाव और संबंध इस जीवन की कमाई है और इसे निभाना वास्तव में कसौटी है कसौटी पर खरा उतरना भी कसौटी ही है आसान नहीं होता मगर यही हमारी पूंजी भी है। अपनी इच्छाओं अपनी भावनाओं और खुद अपने आप को नकारात्मकता से दूर रख कर जीवन का आनंद लेना चाहिए।- – प्रियंका वर्मा माहेश्वरी 

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राजनीतिक महाभारत…. जीत किसकी?

देश में चल रहे 2024 लोकसभा चुनाव का सियासी घमासान खत्म हो गया है और अब सबकी नजरें प्रधानमंत्री के शपथ समारोह पर है। सियासी युद्ध के परिणाम लोगों की सोच से परे रहा हालांकि साम दाम दंड भेद वाली नीति भाजपा की हमेशा से रही है मगर इस बार भाजपा की पकड़ कमजोर साबित हुई। इस चुनाव के नतीजों ने जहां बीजेपी की हार ने लोगों को चौकाया वहीं कांग्रेस का मजबूती से खड़ा होना और सत्तारूढ़ दल को टक्कर देना लोगों को आश्चर्य में डाल गया।

ये दीगर बात है कि कांग्रेस बहुमत नहीं ला पाई लेकिन एक मजबूत विपक्ष के रूप में खड़ी हुई है हालांकि सत्ता तक पहुंच बनाने के लिए उसे अभी कड़ी मेहनत की जरूरत है।
उत्तर प्रदेश में भाजपा ने जिन प्रदेशों पर आंख मूंद कर भरोसा किया था इस बार वहीं से इन्हें मुंह की खानी पड़ी। अयोध्या जैसे शहर से हार जाना जरा अविश्वसनीय लगता है। जो शहर राम मंदिर के प्रचार और जय श्री राम के नारों से गूंजता था वहां भाजपा की हार अप्रत्याशित है हालांकि कई कारण बताए जा रहे हैं।
फैजाबाद लोकसभा सीट के नतीजे से हर कोई हैरान है जहां सरकार द्वारा राम मंदिर का निर्माण कराया गया था और मंदिर में मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा भी ऐसे समय  की गई जब इसी साल देश में लोकसभा चुनाव होने वाले थे। यह दीगर बात है कि यह कार्य भी चुनावी रणनीति के तहत ही किया गया था मगर इन सब के बावजूद भाजपा को करारी हार का सामना करना पड़ा। ध्यान दें कि यहां साल 2022 की विधानसभा चुनाव में भी भाजपा की जमीन दरक चुकी थी और 2024 के लोकसभा चुनाव आते-आते पूरी तरह खिसक गई। 2022 के चुनाव में भाजपा ने जिले में पांच विधानसभा सीटों में से 2 सीटें गंवा दी थी फिर भी भाजपा सजग नहीं हुई और 2024 के लोकसभा चुनाव के परिणाम सामने है।
हिंदुत्व के रथ पर सवार भाजपा ने स्थानीय मुद्दों और मसलों को दरकिनार किया। 2020 में जब विकास कार्य शुरू हुआ तो सड़कों के चौड़ीकरण के दौरान बड़ी संख्या में मकान और दुकान टूटे। बड़ी संख्या में लोगों के घर उजड़े लोगों के रोजगार छिनें। व्यापारी वर्ग का आरोप है कि उन्हें मकान और दुकानों के अधिग्रहण का उचित मुआवजा नहीं मिला। जो लोग अपनी जमीन से संबंधित कागज पेश नहीं कर सके बड़ी संख्या में ऐसे लोगों को मुआवजा नहीं मिला। अयोध्या के हाई प्रोफाइल बनने की वजह से यहां आम लोगों की सुनवाई ना तो भाजपा के नेताओं ने की और ना ही यहां के अधिकारियों ने की यही वजह है कि भाजपा से लोगों का मोह भंग होने लगा।
अयोध्या में करीब 84% हिंदू और 13% मुसलमान है। इसके बावजूद यहां पर भाजपा का हिंदुत्व का कार्ड फेल हो गया। स्थानीय हिंदू मुसलमानों ने खुलकर कहा कि बाबरी की घटना के बाद यहां पर लगातार भाईचारे को बिगड़ने का काम किया गया है एक समय था कि जब मुसलमानों के बनाये खड़ाऊं वहां के साधू संतों के पैर में सजते थे।
अयोध्या के आसपास के इलाकों में ज्यादातर किसान है और जो खेती किसानी से अपना जीवन यापन करते हैं। ऐसे में आवारा पशुओं की समस्या को भाजपा ने नजरअंदाज किया। खेतीबाड़ी से हुए नुकसान के चलते किसानों ने अपने खेत कई सालों तक खाली छोड़ रखे थे। किसानी से लागत नहीं निकलती थी और आवारा पशुओं द्वारा नुकसान अलग होता था। समाजवादी पार्टी ने इन मुद्दों पर  मोर्चा संभाला और जन समर्थन हासिल किया।
दूसरी बात महंगाई और बेरोजगारी से त्रस्त जनता ना तो कांग्रेस को वोट देना चाह रही थी और ना ही भाजपा को देना चाह रही थी ऐसे में लोगों ने नोटा को अपनाया और बड़ी संख्या में ऐसे लोग वोट देने नहीं गए। यह चुनाव इस बात का प्रमाण है कि धर्म से देश नहीं चलता बल्कि बुनियादी मुद्दे ज्यादा जरूरी होते है।

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साहित्यिक संस्था ‘श्यामार्चना फाउंडेशन’ का सातवां स्मृति सम्मान समारोह व काव्य संगमन संपन्न

कानपुर 1 जून भारतीय स्वरूप संवाददाता,bकानपुर शहर की प्रतिष्ठित साहित्यिक संस्था ‘श्यामार्चना फाउंडेशन’ का सातवां स्मृति सम्मान समारोह व काव्य संगमन आज दिनांक 1 जून 2024 को संस्था के प्रधान कार्यालय जवाहर नगर में संपन्न हुआ। कार्यक्रम में लखनऊ, कानपुर, उन्नाव आदि शहरों के साहित्यकार उपस्थित रहे। इस वर्ष का स्मृति सम्मान प्रख्यात साहित्यकार व अंतरराष्ट्रीय कवि डॉक्टर सुरेश अवस्थी जी(कानपुर) प्रसिद्ध कथा वाचक डॉक्टर संत शरण त्रिपाठी जी ( लखनऊ) ख्यातिप्राप्त कवयित्री डॉ कमल मुसद्दी जी( कानपुर) व इं श्रवण कुमार मिश्रा ( लखनऊ)जी को दिया गया ।यह कार्यक्रम दो सत्रों में हुआ । प्रथम सत्र में श्यामार्चना फाउंडेशन के संस्थापक डॉ प्रदीप अवस्थी, अध्यक्ष निरंजन अवस्थी व कोषाध्यक्ष रेखा अवस्थी जी ने सभी साहित्यकारों को अंग वस्त्र,स्मृति चिन्ह, मोती माल, व श्रीफल भेंट कर उनका सम्मान किया व सभी का काव्यपाठ हुआ।द्वितीय सत्र में सभी साहित्यकारों के भोजन उपरांत काव्य गोष्ठी का आयोजन हुआ। जिसमे श्री अजीत सिंह राठौर (लुल्ल कानपुरी), अंशुमन दीक्षित,  मनीष रंजन त्रिपाठी ,डॉ कमलेश शुक्ला जी,  दिलीप दुबे,  अमित ओमर,डॉ नारायणी शुक्ला ,डॉ प्रमिला पांडे, अमित पांडे, डॉ दीप्ति मिश्रा, पी के शर्मा आदि सभी ने बेहतरीन काव्य पाठ किया। कार्यक्रम में डॉ अजीत सिंह राठौर (लुल्ल कानपुरी) की 14 वीं बाल गीत पुस्तक ‘कंचे’ का लोकार्पण भी हुआ। कार्यक्रम का शानदार संचालन स्वैच्छिक दुनिया के संस्थापक व प्रतिष्ठित कवि डॉ राजीव मिश्रा जी ने किया।

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छोटे व मझोले वर्ग के अखबारों का गला कसने में कोई कोर कसर बाकी नहीं रख रही सरकार!

केंद्र सरकार के इशारे पर भारत के समाचार पत्रों के महापंजीयक द्वारा इस वर्ष से प्रकाशकों को विषम परिस्थितियों में डाल दिया गया है । यह कटु सत्य है कि प्रेस सेवा पोर्टल के माध्यम से प्रकाशकों को अपने-अपने समाचार पत्र व पत्रिकाओं को बंद करने का केंद्र की मोदी सरकार द्वारा कुचक्र रचा गया है। वर्षों से समाचार पत्रों व पत्रिकाओं के पंजीयन प्रमाण पत्र जारी नहीं किए गए है । अनेकों मामले शीर्षक संबंधी मामले लम्बित है । पंजीयन प्रमाण पत्र में संशोधन के मामले लम्बित है । इन सब प्रकरणों को निस्तारित किए बिना प्रेस सेवा पोर्टल को लागू किया जाना न्याय संगत नहीं है । ज्ञातव्य हो कि प्रेस सेवा पोर्टल में अनेकों ऐसे प्राविधान रखे गए हैं जिन्हें छोटे व मझौले समाचार पत्रों व पत्रिकाओं के प्रकाशकों के द्वारा पूरा किया जाना असंभव है । इससे साफ जाहिर हो रहा है कि केंद्र सरकार ने सिर्फ बड़े अखबारों के लिए यह कार्य योजना बनाई है।
प्रेस सेवा पोर्टल शुरू किए जाने से पूर्व सभी समाचार पत्रों के संगठनों से विचार विमर्श किया जाना चाहिए था । इस वर्ष वार्षिक विवरणी ऑनलाइन दाखिल करने के लिए पहले पंजीकरण करना होगा । फिर मालिक, प्रकाशक, मुद्रक, प्रिंटिंग प्रेस, चार्टर्ड एकाउंटेंट की प्रोफाइल बनाकर अपलोड करनी पड़ेगी । प्रोफाइल के बिना वार्षिक विवरण को दाखिल नहीं कर पाएंगे। साथ ही प्रिंटिंग प्रेस को जीएसटी में पंजीकृत होना चाहिए अन्यथा प्रकाशक वार्षिक विवरण प्रस्तुत नहीं कर पाएंगे । ऐसा लगता है कि केंद्र सरकार ने छोटी व मझोले वर्ग की प्रिंट मीडिया को समाप्त करने की योजना को मूर्त रूप देने के लिए प्रेस सेवा पोर्टल की योजना को लागू किया है ।
हम आव्हान करते कि इस प्रेस सेवा पोर्टल का सभी प्रकाशकों को बहिष्कार करना चाहिए । जब तक प्रेस सेवा पोर्टल में वार्षिक विवरण को दाखिल करने में सरलीकरण न कर दिया जाए तब तक किसी हालत में वार्षिक विवरण प्रस्तुत नहीं किया जाएं । जो प्रपत्र आर एन आई के पास पहले से जमा हैं या आर एन आई द्वारा जारी किए गए हैं उन्हें स्वयं द्वारा सुरक्षित न रख कर फिर से मांग कर प्रकाशकों को परेशान किया जा रहा है। वर्तमान परिदृश्य में सभी प्रकाशकों को एकता के साथ इस सरकारी कुचक्र का कड़ा विरोध करने की जरूरत है अन्यथा छोटे व मझौले अखबारों को सरकार बंद करने की योजना में सफल हो जायेगी । यह प्रेस की आजादी पर अदृश्य हमला है।
इसमें कतई दो राय नहीं कि छोटे व मझोले वर्ग के अखबारों का गला कसने का काम बिगत 10 वर्षों से निरन्तर किया गया है और अभी भी जारी है।
-श्याम सिंह पंवार “सदस्य भारतीय प्रेस परिषद”

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मदर्स डे

“इसको कहा था कि ऑफिस से छुट्टी ले ले लेकिन मेरी सुनती कहां है?” रेवती गुस्से में बड़बड़ा रही थी। “छह बजे लड़के वाले आ जाएंगे इसे देखने और अभी तो इसका तैयार होना भी बाकी है और कम से कम एक नाश्ता तो अपने हाथ का बना कर रखें क्या सब बाजार का ही खिलाएंगे?” रेवती अपने पति शंकर की ओर देखते हुए बोली।

शंकर:- “कहा तो था मैंने कि जल्दी घर आ जाना, रुको! मैं फोन करता हूं उसे। आजकल ट्रैफिक भी बहुत ज्यादा रहता है कहीं फस गई होगी।”
शंकर:- “हेलो! बेटा कहां हो? घर आने में कितनी देर है? तुम्हें पता है सब फिर भी लेट कर रही हो? चलो जल्दी घर आ जाओ।”
मुस्कान:- “जी पापा! बस निकल ही रही थी, आज काम भी जरा ज्यादा था बस आधे घंटे में आ रही हूं।”
शंकर:- “हां! ठीक है ।”
(शंकर रेवती से):- “आ रही है आधे घंटे में”
रेवती:- “भगवान करे सब ठीक से निपट जाए। आज छुट्टी ले लेती तो अच्छा होता। खैर।”
करीब पौने घंटे में मुस्कान घर आई।
मुस्कान:- “सॉरी – सॉरी जरा लेट हो गई। बस! अभी दस मिनट में रेडी हो जाती हूं।” रेवती के चेहरे पर नाराजगी के भाव थे।
मुस्कान:- “मम्मी ढोकले का गोल रेडी है ना अभी बना देती हूं।”
मुस्कान:- “अरे मम्मी! क्यों गुस्सा कर रही हो सब कुछ समय पर हो जाएगा। उन्हें आने में अभी एक घंटा बाकी है तब तक सब हो जाएगा।” रेवती बिना कुछ बोले किचन में चली जाती है। करीब आधे घंटे बाद मुस्कान पटियाला सलवार कमीज पहन कर बाहर आती है। कानों में झुमके, आंखों में काजल, गले में पतली चेन, हाथों में कड़े डालकर बहुत प्यारी लग रही थी। वो सादगी में भी बहुत अच्छी दिख रही थी।
रेवती:- “अरे! लिपस्टिक क्यों नहीं लगाई और वह पेंडेंट सेट रखा था वो पहनना था बेटा! इतना सिंपल कोई तैयार होता है क्या?”
मुस्कान:- “अरे मम्मी! जैसी हूं वैसे ही रहने दो ना! बाद में कमियां निकलेंगे उससे तो अच्छा है कि मैं जैसी हूं वैसी ही देख ले मुझे।”
शंकर:- “ठीक ही तो कह रही है मुस्कान की मां और अच्छी तो लग रही है। छोड़ो यह सब, अब जाओ बेटा जल्दी से नाश्ता बना लो।”
मुस्कान:- “जी पापा!”
करीब साढ़े छह बजे लड़के वाले घर आए। आपस में एक दूसरे को अभिवादन करने के बाद बैठक में सब लोग बैठ कर औपचारिक बातचीत करने लगे। लड़की की मां:- “बहन जी बिटिया को तो बुलाईये।”
रेवती:- “जी बस! अभी आ रही है।”
रेवती अंदर जाती है और मुस्कान को साथ लेकर बाहर आती है। मुस्कान सबको नमस्ते करती है और अपने पिता के बगल में बैठ जाती है।
लड़के की मां:- “और बेटा काम कैसा चल रहा है? वैसे तो सब बायोडाटा में ही पढ़ लिया था। तुम्हारे शौक क्या-क्या है? घर के काम में दिलचस्पी रखती हो क्या? क्योंकि मेरा मानना है कि कितने ही कामकाजी और आधुनिक क्यों ना हो लेकिन घर के कामकाज आने चाहिए।”
मुस्कान:- “जी! थोड़ा बहुत तो सभी काम कर लेती हूं। खाना भी बना लेती हूं, बस सिलाई कढ़ाई वगैरह नहीं आती।
रेवती:- “पढ़ाई और फिर नौकरी में लग जाने के बाद, थोड़ा बहुत घर के काम सीखने के बाद इन सब कामों के लिए समय नहीं मिल पाता था इसे लेकिन घर के सभी काम जानती है।”
लड़के की मां:- “समझती हूं मैं! आजकल दोहरी जिम्मेदारी हो जाती है लड़कियों पर। अगर तुम लोगों को आपस में कुछ बात करनी हो तो कर सकते हो।”
मुस्कान:- “नहीं! बात करने जैसा क्या है? लेकिन मुझे अपनी एक बात आप दोनों से कहनी है।” सभी सवालिया नजरों से उसे देखने लगते हैं।
लड़के की मां:- “हां बेटा! जरूर कहो!”
मुस्कान:- “मेरे मम्मी पापा का मेरे अलावा और कोई नहीं है और मेरे जाने के बाद वो एकदम अकेले हो जाएंगे तो मैं चाहूंगी कि शादी के बाद भी मैं इनका ध्यान रखूं। उम्मीद है कि आपको आपत्ति नहीं होगी।”
लड़के की मां:- “मेरा भी एक ही बेटा है, इसके पापा की जाने के बाद हम दोनों ही एक दूसरे का सहारा है, अब तुम आ जाओगी तो मेरा एक हाथ और बढ़ जाएगा। उसी तरह मुकुल से शादी करने के बाद तुम्हारे मम्मी पापा को भी एक बेटा मिल जाएगा और तुम दोनों हम तीनों का ख्याल रखना। क्यों ठीक है ना मुकुल?”
मुकुल:- “जी मम्मी! आप बिल्कुल ठीक कह रही हैं।”
रेवती और शंकर जरा घबराये हुये थे कि कहीं रिश्ता टूट न जाए लेकिन उनका जवाब सुनकर उन्होंने चैन की सांस ली और मुस्कान की भी टेंशन खत्म हो गई थी। वह किचन में नाश्ता लाने चली गई। नाश्ते के साथ वो दो गुलाब के फूल भी साथ लाई। एक अपनी होने वाली सास को और एक अपनी मां को फूल देते हुए बोली “हैप्पी मदर्स डे” घर में खुशी का माहौल बन गया था। मुकुल भी सभी को नाश्ता परोसने में मुस्कान की मदद करने लगा। ~प्रियंकर वर्मा माहेश्वरी 

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सम्पादक मुद्रक प्रकाशक 

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ऐसी है माँ मेरी”

इंग्लैंड मे रहने की वजह से मुझे मौक़ा नहीं मिलता है कि मैं अपनी मां के साथ “मदर डे “भारत 🇮🇳 में मना नहीं पाऊँ,
वैसे तो उनके बारे में कुछ भी कहना नामुमकिन सा लगता है बस इक कोशिश ही है जो मैं कुछ अलफ़ाज़ लिख पाई हूँ..
सिर्फ़ मेरी ही माँ नही “बल्कि सभी माँओं को मेरे ये भाव समर्पित है”🙏🙏🙏
ऐसी है माँ मेरी कुछ भी साथ हो उसके …अच्छा या बुरा… तो रब की मर्ज़ी समझ कर ह्रदय से स्वीकारतीं है।
किसी बात पर दुखी न होना ..न कोई बात दिल से लगाती है …ऐसा ही होना था क़िस्मत मे ..बस यही बात समझाती है …
मेरी माँ को बहुत इँगलिश बोलनी तो आती नहीं ..मगर फिर भी सिर उठा कर मुझे जीना सिखाती है ..
“फोरगैट दा पास्ट ऐंड मूव ओन“ यही मंत्र वो मुझे सिखाती है पास्ट को गर न भूलोगे तो आगे कैसे बढ़ोगे तुम .. इक सैनिक की तरह तन कर मुझ को फिर बड़े प्यार से समझाती है कभी कभी हाथों को अपने आसमान की ओर फैलाती है फिर आँखे बंद करके यही बात दोहराती है “झोली भरी है मेरे मौला की ..
जब मर्ज़ी होगी तब वो देगा । संभाल न पायेगा तू जब बारिशे होंगी रहमत की .. अपने विश्वास से ही फिर वो .. ढाढ़स मुझे बँधाती है ..
🌹🌹🌹 ऐसी है माँ मेरी 🌹🌹🌹 कर्मकांड नहीं आता उसको .. बस … मीरा बन कर … अपने गिरधर को रिझाती है रब के हर रंग में ख़ुश रहती है वो .. “शुक्र शुक्र .., मेरे मौला का ..”🙏 दिन रात ये आलाप लगाती है .. “हाथ की तो कोई तेरे खींच भी लेगा .. तेरे माथे की छीन सके न कोई “ भोली सी सूरत ले फिर ये भी बात समझाती है .. करने दे तू … उसको अपना काम .. तू अपने काम पर ध्यान दे .. फिर देख.. तेरी मेहनत .. तेरी क़िस्मत कैसे रंग लाती है लाडो से भरी माँ मेरी हर पल मुझ से लाड लडाती है
लेखिका स्मिता ✍️

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किटी पार्टी

बालकनी में दाल सूखने के लिए रखी हुई थी। शाम होने को आई सोचा उठा लूं, बहू को आने में पता नहीं अभी और कितना वक्त लगेगा? छत पर पहुंची ही थी कि पड़ोसन सीमा ने आवाज दी, “अरे सविता भाभी आजकल दिखाई नहीं देती? तबीयत तो ठीक है ना?”

सविता:- “अब क्या बताऊं बहन बहू लाकर भी सुख नसीब में नहीं है।”
सीमा:- “क्यों क्या हो गया भाभी?”
सविता:- “उसे अपने सजने संवरने और घूमने – फिरने से ही फुर्सत नहीं मिलती। बेटे के सामने तो भली बनी रहती है और कामकाज का तो पूछो ही मत! मनमर्जी है बस।”
सीमा:- “आजकल ऐसा ही जमाना है भाभी। किसी को क्या कह सकते हैं। मुंह बंद रखने में ही भलाई है।”
सविता:-  “हां सो तो है। चलो जाती हूं अपनी चाय तो बना लूं मैं! दूसरों को भरोसे कब तक बैठी रहूंगी।”
सीमा:- “हां भाभी।”
शाम के 7:00 बज गए थे और लीना अभी तक नहीं आई थी। 7:20 को लीना ने घर में कदम रखा।
सविता:- “अरे लीना आज तो बहुत देर हो गई? कहां रह गई थी?”
लीना:- “अरे! मम्मी जी वो बस विम्मी के यहां से निकलने में जरा देर हो गई थी और आज ट्रैफिक भी बहुत था। मैं आपके लिए चाय बना देती हूं।”
सविता:- नहीं, रहने दो। मैंने पी ली है। तुम तो खाना खाकर आई होगी ना।”
लीना:- “जी मम्मी! आप सबके लिए आलू के पराठे और रायता बनाने वाली हूं।”
सविता:- “ठीक है एक घंटा तो लग ही जाएगा? कुछ काम हो तो बोल देना।”
लीना:- “जी।”
लीना जल्दी-जल्दी कपड़े चेंज करके किचन में आ गई । दोपहर में ही आलू उबालकर मसाला बनाकर रख दिया था और आटा गूंथकर फ्रिज में रख दिया था, रायता भी दोपहर को ही रेडी करके रख दिया था तो इस समय मुझे बड़ी शांति थी, एकदम से दौड़भाग नहीं करनी पड़ी।
लीना:- “मम्मी जी! खाना तैयार हो गया है पापा जी को भी बोल दीजिए। आप दोनों ही खाने के लिए बैठें।”
सविता:-  “इतनी जल्दी तैयार हो गया!”
लीना:-  “वो मैंने दोपहर को ही तैयारी कर ली थी इसलिए फटाफट रेडी हो गया।”
सविता:- “हमारे जमाने में यह किटी विटी नहीं होती थी। महीने में तीन चार बार तो बाहर ही खाती हो और यह क्या अलग-अलग से कपड़े पहनती रहती हो? ढंग के कपड़े पहना करो।”
(लीना हंसते हुए) “मम्मी किटी में थीम रखी जाती है तो उसी हिसाब से सबको वैसे ही कपड़े पहनने होते हैं।”
सविता:- “सब एक जैसे बंदर बन जाते हैं क्या? और वो हंसने लगती है।
लीना:- “बंदर तो नहीं लेकिन जंगल में मंगल मनाने का आनंद आता है” और बिना कुछ कहे किचन में चली जाती है।
लीना काम करते-करते मन ही मन कुढ़ते रहती है। इनको मेरा खुश रहना भी अच्छा नहीं लगता। दोस्तों के साथ कुछ समय गुजार लेती हूं तो कुछ समय घर और टेंशन दोनों से दूर हो जाती हूं लेकिन इन्हें नहीं सुहाता। बस घर में पड़े रहो काम करो और बातें सुनो इनकी। तभी डोरबेल बजती है और वो दरवाजा खोलती है तो सामने विकी खड़ा था। विकी के अंदर आते ही लीना दरवाजा बंद करके पूछती है कि, “आइसक्रीम लाने के लिए कहा था आप लेकर नहीं आए?”
विकी:- (कपड़े बदलते हुए) अभी खाना खाकर जब वॉक पर चलेंगे तो लेते आएंगे।”
लीना:- “ठीक है”।
विकी:- “कैसी रही तुम्हारी किटी?”
लीना:- “अच्छी रही! बहुत मजा आया, खाना भी अच्छा था। पता है मैं दो बार जीती में गेम में!”
विक्की मुस्कुरा देता है और कहता है, “अब तुम तो खाना खा चुकी हो, अब इस भूखे को भी जल्दी से खाना खिला दो।”
(लीना हंसते हुए) “हां भई हां ! चलो तैयार है खाना।”
खाना खाकर दोनों वाक पर चले जाते हैं।
सविता:- “लो! अब फिर से चली गई? यह नहीं कि मेरी दवाई और कमरे में पानी रख कर जाती?” सविता का पति:- अरे भाग्यवान! एक दिन कुछ काम तुम भी कर लिया करो क्यों उसके पीछे पड़ी रहती हो? रोज तो वही करती है।”
सविता:- “आप तो चुप ही रहो! जब देखो उसका पक्ष लेते रहते हैं। पतिदेव ने मोबाइल में सर झुका लिया।
वापस आते हुए विकी और लीना आइसक्रीम लेते हुए आए।
लीना:- “मम्मी जी! आइसक्रीम!”
सविता:- “फ्रिज में रख दो… अभी खाऊंगी तो रात में खांसी आएगी। कल दोपहर में खा लूंगी तेरे पापा को दे दो जाकर, मेरी दवाई और पानी कमरे में रखती जाओ।
लीना:- “जी!”
सुबह लीना घर के सभी काम जल्दी-जल्दी निपटाती जा रही थी। उसे मार्केट जाना था।
लीना:- “मम्मी जी! फ्रूट और टेलर के अलावा मीना आंटी के यहां से क्या लाना है आपके लिए और फ्रूट में क्या लेती आऊं?”
सविता:- “मीना मसाले देने वाली थी और कुछ मुखवास मंगवाई थी वो लेती आना और सुन टेलर को डांटना! बोलना कि आजकल सिलाई बराबर नहीं कर रहा और महंगा भी बहुत कर दिया है और फ्रूट कुछ भी ले आओ लेकिन तुम्हारे पापा जी के लिए सेब और केला जरूर लेती आना।”
लीना:- “जी।”
बाजार के काम निपटाते-निपटाते लीना को शाम के 5:00 बज गए।
सविता:- ” जाने कहां रह गई यह? बाहर जाती है तो पंख लग जाते हैं। जरा से काम के लिए पूरा दिन लगा दिया।” तभी लीना घर में आती है।
सविता:- “अरे ! बहुत देर लगा दी कहां रह गई थी?
लीना:- “कहीं नहीं, बस मीना आंटी और टेलर के पास ही देर हो गई। मेरा भी काम था बाजार में तो लेट हो गया।”
सविता:- “चाय बना दूं?”
लीना:- “ओह! नहीं मैं बनाती हूं सबके लिए।”
(लीना के ससुर):- “अरे सविता! तू ही चाय बना लेती। वह अभी तो आई है बाहर से थक कर।”
सविता:- “बोला तो था मैंने पर वह खुद बनाने चली गई।”
(लीना के ससुर):- “गलत बात है, लीना के आने के बाद से तुम बहुत आलसी हो गई हो।”
सविता:-  “हां सारी बुराई मुझमें में ही है।” ससुर उठ कर बाहर चले जाते हैं।
कुछ दिन बाद लीना का अपनी सहेलियों के साथ गेट टूगेदर का प्रोग्राम बनता है।
लीना:- “मम्मी जी! मैं अपनी सहेलियों के पास जा रही हूं। शाम के खाने की तैयारी कर दी है, आकर फुलके के उतार दूंगी।”
सविता:- “अरे कितनी किटी होती है तुम्हारी महीने में? अभी कुछ दिन पहले ही तो गई थी।”
लीना:- “जी! दो हैं। कभी-कभी दोनों की तारीख आसपास आ जाती है।” लीना कमरे में चली आती है। उसका मूड खराब हो गया था।
शाम को लीना ने हल्के नीले रंग की साड़ी पहनी और उससे मैचिंग ज्वैलरी पहन कर तैयार हो गई। बालों में जूड़ा बनाया और एक गुलाब का फूल लगाकर खुद को कांच में देखने लगी और मन ही मन खुद से कहने लगी, आज का बेस्ट ड्रेसिंग प्राइज मैं ही जीतूंगी। उसने घड़ी देखा और पर्स लेकर बाहर निकली।
लीना:- “मम्मी जी! मैं जा रही हूं 7:00 बजे तक आ जाऊंगी।”
सविता:- “अरे इतना तैयार होकर जाना पड़ता है क्या तुम्हारी किटी में?”
(लीना हंसते हुये) “मम्मी जी थीम के हिसाब से कपड़े पहने होते हैं। आज के नीले रंग की साड़ी पहननी है और जो सबसे अच्छा तैयार होगा उसे प्राइज मिलेगा।”
सविता:- “जाने क्या-क्या करते हो तुम लोग? हमारे जमाने में तो यह सब था नहीं तो हम क्या जाने? ठीक है जाओ।”
लीना सहेलियों के बीच पहुंचती है। सभी एक दूसरे से बहुत गर्मजोशी से मिलती है।
एक सहेली लीना से:- “क्यों लेट हो गया तुझे?”
लीना:- “घर है और घर पर सास है, मोगैंबो को खुश करके ही घर से निकल सकती हूं।” सब जोर से हंसने लगती है।
दूसरी सहेली:- “हां यार यह किटी ना हो तो लाइफ बोरिंग हो जाए यही कुछ समय होता है हमारे पास जब हम घर भूल जाते हैं और मजे करते हैं और फिर एक नई एनर्जी के साथ वापस घर जाते हैं।” सभी भावुक हो कर सहमति का भाव जताती हैं। अपनी बातचीत, गेम, फोटो शोटो लेने और खाने पीने में लीना को लेट होने लगा। लीना बोली, अरे! पार्टी जल्दी खत्म करो घर भी जाना है।” फिर कुछ देर में सभी एक दूसरे को बाय बाय करके अपने घर जाने लगीं।
लीना रास्ते में घर पहुंचने पर अपने काम का खाका का खींच रही थी कि पहले किचन का काम फिर बाद में दूसरे काम कि तभी उसकी गाड़ी बंद हो गई। एक तो लेट हो रहा था और दूसरे बीच रास्ते में गाड़ी बंद हो गई। वह परेशान हो गई उसने तुरंत घर पर फोन लगाया लेकिन सिग्नल नहीं होने के कारण फोन नहीं लग रहा था। उसने विकी को फोन करके सब बताया और कहा कि घर में मम्मी पापा को बता दो नहीं तो वो परेशान होंगे। वो गाड़ी खींचकर मैकेनिक के पास ले गई और ठीक करवा कर घर लौटी। घर पहुंच कर देखा कि उसकी सास नाराज होकर बैठी है।
सविता:- “समय देख रही हो क्या हो रहा है? 9:00 बज रहे हैं और तुम्हारा कोई ठिकाना नहीं?”
लीना:- “मैंने फोन लगाया था लेकिन आपका फोन नहीं लग रहा था तो मैंने विक्की को फोन करके कह दिया था कि वह आपको बता दे।”
सविता:- “हां! आया था फोन लेकिन कितनी देर हो गई? गाड़ी बनने छोड़कर ऑटो से ही आ जाती तुम लेकिन नहीं तुम्हारी मौजमजा ज्यादा जरूरी है। हम भले यहां भूखे मरते रहे। घर के सारे काम पड़े हैं और तुम घूमती रहो।”
लीना को रोना आ गया वह कमरे में आ गई और दरवाजा बंद कर लिया। कुछ देर में विकी भी आ गया। उसे घर का माहौल कुछ भारी लगा। उसने लीना को आवाज दी मगर वह नहीं आई तो वह अपने कमरे की ओर गया और दरवाजा खटखटाया। दरवाजा खोलते ही लीना विकी पर बरस पड़ी।
लीना:- “तुम बताओ! कि मैं घर पर कौन सा काम नहीं करती हूं? कौन सी जिम्मेदारी से पीछे हटती हूं या मेरी वजह से किसी को कोई तकलीफ पहुंचती है? जहां तक हो सकता है मैं सब मैनेज करती हूं, फिर भी कहीं ना कहीं कुछ ना कुछ कमियां गिना ही दी जाती है मुझे। मेरा घर से बाहर जाना किटी में मौजमजा करना मम्मी जी को अखरता है। जब देखो ताना मारते रहती हैं। अरे घर से कुछ देर के लिए सहेलियों के साथ मजे करने जाती हूं तो कौन सा गुनाह करती हूं। मैं तो नहीं करती दूसरी औरतों की तरह सोसाइटी में जाकर सास की बुराई। मैं भली मेरा घर भला। रास्ते में गाड़ी खराब हो गई तो इसमें मेरा क्या दोष? एकआध दिन निभा नहीं सकते क्या?”
विकी, सविता और लीना के ससुर सब चुपचाप सुन रहे थे। उस दिन सब बिना खाए अपने कमरे में चले गए।
(लीना के ससुर):- ” तुम भी न बिना वजह का हंगामा खड़ा कर देती हो, ना तुमको खाना बनाना और न ही दूसरे काम करने होते हैं। सब लीना ही करती है। फिर गाड़ी खराब हो गई तो उसने मैसेज भिजवा दिया था न कि लेट होगा फिर क्यों तमाशा किया? विकी का सोचो काम करके आया है थक गया होगा लेकिन भूखा सो गया और ऐसे में कल फिर से भूखा काम पर जाएगा घर का टेंशन लेकर? यह सही है क्या? क्या हो गया जो लीना महीने में दो बार अपनी सहेलियों के साथ समय बिताती है। यह तो अच्छा है कि फालतू औरतों की तरह तो उधर भटकती नहीं। इधर-उधर तुम्हारी बुराई नहीं करती है। कल को विकी को लेकर लीना अलग हो गई तो?” अब सविता जरा घबरा गई।
सुबह-सुबह सविता जल्दी उठ गई और किचन में गई तो देखा कि लीना चाय बनाने की तैयारी कर रही है।
सविता बालकनी में लगे तुलसी के पौधे से पत्तियां तोड़कर ले आई और धो कर लीना को देती हुई बोली, “चाय में डाल दो सबका सर दर्द सही हो जाएगा और कल के लिए सॉरी। ज्यादा लेट हो गया था तो परेशान हो गई थी।”
लीना हल्के से मुस्कुराई और सबके लिए चाय और बिस्किट लेकर बालकनी में आ गई। सबने चाय पी तो मन हल्का हो गया। लीना के ससुर मुस्कुराते हुए अखबार के पन्ने पलट रहे थे।

प्रियंका वर्मा माहेश्वरी 

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आप ही शक्ति स्वरूपा है जननी है स्वामिनी है

दिल से बधाई देना चाहूँगी अपनी सब देवी स्वरूप बहनों को ..जो आज अपने पैरों पर खड़ी है और सिर उठा कर चल रही है ।शक्ति बन कर अपना और अपने परिवार का पेट पाल रही है। मैं हमेशा यही कहती हूँ अपनी सभी बहनों से .. कि रानियों की तरह जीयें.. शासन करे समाज पर .. अपने आर परिवार पर .. सभी के दिलों पर शासन करने की अधिकारिणी हैं आप । आप को ज़रूरत नहीं कि आप सोसायटी के साथ साथ बदलती जाये.. किसी के बताने की ज़रूरत नहीं कि आप क्या करे या न करें  आप जैसी है वैसी ही रहें क्योंकि आप ही शक्ति स्वरूपा है जननी है स्वामिनी है आप ही तो है जो टूटे बटनो से लेकर ..टूटे हुए आत्मविश्वास को जोड़ने की क्षमता रखतीं हैं।
आप ही है ,जो सब के सकून का सबब ..और विनाश का कारण हो सकती है.. मगर अपने घर की और जिस देश मे आप का जनम हुआ है । वहाँ की ज़िम्मेवारी को उठाना हम सब का धर्म तो बनता ही है।
हर औरत पहले बेटी बन कर पिता के साथ दुख सुख में निभाती है तो कभी बहन बन कर भाई और पत्नी बन कर पति को मार्गदर्शन करवाती है और फिर माँ बन कर बच्चों में संस्कार डालने की ज़िम्मेदारी हम औरतों पर ही है। जो हम आज खुद को बहुत आत्मनिर्भर समझ रहे है और सोच लेते है कि हम ने ज़िन्दगी में जो भी हासिल किया है वो खुद किया है जबकि मैं समझती हूँ !!
हम जो भी बन पायें है ,उसमें कहीं न कहीं इक आदमी का भी हाथ होगा और होता भी है .. किसी के पापा ने ,पति ने ,भाई ने आगे बढ़ने की सीख दी होगी ,या फिर हो सकता है किसी दोस्त ने हमे आगे बढ़ने में हमारी मदद की होगी और इस बात को हम नज़रअंदाज़ नहीं कर सकते।सोसायटी में नाम कमाना अपने आप मे ही बहुत बडी उपलब्धि है ।ज़ुल्म के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाना गौरव और शक्ति का प्रतीक है। आज हमारे भीतर की आवाज़ ..जो बरसों से सोई हुई थी .. वो जाग चुकी है ।
हर पीढ़ी अपने से बडी पीढ़ी से ही सीखती है इसलिए एक बात जो बहुत ज़रूरी है,जो हमे अपनी नई पीढ़ी को विरासत मे देनी है .. और वो है …संस्कार,कोमलता , दया भाव,श्रद्धा ..गरिमा ..और मर्यादा … हम कह तो रहे है कि हमें स्ट्रोंग बनना चाहिए मगर परिणाम क्या हुआ ,हमारी कोमलता लुप्त हो गई कहीं । मैं ये नहीं कह रही कि हम आने वाली पीढ़ी को सिर पर पल्लू रखना सिखाये ,बस यही कह रही हूँ ,अपने संस्कारों को साथ ले कर चले।आँधी नग्नता … लोगों को लुभा तो सकती है मगर इज़्ज़त नहीं दे सकती।
बात बहुतो को बुरी लग सकती है मगर सच यही है कि आज माडर्न ज़माना कह कर …आज की औरत
वाइन ,शराब यहाँ तक की ड्रैगस ले रही है।ये हमारे देश की सभ्यता तो न थी कभी।हमारे समाज में यह ख़ास वजह है जो नस्ल दर नस्ल को ख़राब कर रही है, शायद अभी हम इस बात को गंभीरता से नहीं ले रहे .. मगर आने वाले समय में हम सब को इस बात का अफ़सोस ज़रूर रहेगा । जब हमारे बच्चों के घर टूटने लगेंगे और टूटने बिखरने की इक ख़ास वजह ,नशा करना ही होगी।! और आज तलाक होने की वजह संयम और सहनशीलता या मर्यादा में कमी ही है।
ये कैसी सोच हो गई है हमारी .. जहां हमारा घर टूटता है तो टूट जाये मगर हम मे से कोई भी..कुछ भी सहने को तैयार नही ।
.बचाईये !! अपने घरों को अपने बच्चों की ख़ातिर। हम सब मिल कर ही तो बदलाव ला सकते है।कोई हमें ख़ुशी बाहर से ला कर नहीं देगा।हमें खुद में से ही अर्जित करनी होगी। सब कुछ तेज़ी से बदल रहा है .. हमारा देश अपने संस्कारों के लिए ही सारे संसार में ख़ास जाना जाता था। यहाँ का लिबास विश्व भर में चर्चे का विषय हुआ करता था। धीरे धीरे हमारे देश में अपने देश की वेशभूषा की जगह विदेशी पहनावे ने ले ली है। दोस्तों! मेरे हिसाब से जिसे हम सैकसी लुक कहते है वो साड़ी में ज़्यादा दिखती है।
बस यही पैग़ाम है मेरा …स्वीकार कीजिए खुद को जैसे रब ने आप को बनाया है । आज के दौर में सब अच्छा दिखने में लाखों खर्च कर रहे है महँगे कपड़े पार्लर वग़ैरह …और ऊपर से कासमैटिक सर्जरी । फिर भी हम सकून में नही। ऐसा जीवन हमें किस ओर ले कर जा रहा है । हर कोई शान्ति को बाहर तालाश कर रहा है। अपने दुख की वजह दूसरे को बता रहा है …
भीड़ का हिस्सा बन कर हम सब ही तो भीड़ मे भागते जा रहे है । कभी एकान्त में बैठ कर सोचियेगा इस बारे में।
हम सभी को अपने संस्कारों पर से धूल हटाने की ज़रूरत है।तभी हमे शान्ति मिल सकती है … क्योंकि जो वक़्त चल रहा है ,
वहाँ लोग दिशा से भ्रमित हो रहे है। अकेले हो रहे है ,अगर कोई साथ है भी ..तो भरोसा नही है कि ये साथ कब तक चलेगा।
अपने को पहचानें। खुद को सक्षम बनाये ताकिआप की ख़ुशी दूसरों पर निर्भर न हो। किसी को जवाब देना बहुत आसान होता है ।कोई एक कहता है तो आज हम दस सुना सकते है ,मगर बात को सह लेना …. पोलाइट होना जरा मुश्किल है ।वही सीखने और सीखाने की ज़रूरत भी है । हम सब पर ही समाज की ज़िम्मेवारी है और हम ज़िम्मेदारियों को निभा कर भी ज़िन्दगी को इंजाय कर सकते है। इसमें कोई शक नही है। आज हम आसमान की बुलंदियों को तो छू रहे है मगर हम छोटी छोटी बातों को नज़रअंदाज़ भी कर रहे है। नई पीढ़ी के लिए अपना घर ,पैसा ,सोना ,चाँदी ,हीरे जवाहरात अपना बैंक बैलेंस ही न छोड़ कर जाये..अपितु … कुछ ऐसा छोड़ कर जायें ..जो आने वाली “ पीढ़ियों दर पीढ़ियों “के लिए सुख का कारण बने।

लेखिका स्मिता ✍️

✍️

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