Breaking News

लेख/विचार

टॉक्सिक रिलेशनशिप 

कहते हैं जब कोई इंसान प्रेम में होता है या कोमल भावनाओं के साथ किसी रिश्ते में जुड़ जाता है तो कुछ भी करने को, सहने को तैयार हो जाता है। 

जब दो विपरीत प्रवृति के लोग किसी रिश्ते में जुड़ जाते तो सबसे भयावह स्थिति उत्पन्न होती है। दिल और दिमाग का तालमेल संभव नहीं हो पाता। भावुक इंसान चूंकि भावनाओं से जुड़ता है इस लिए रिश्ते में तमाम समस्याएं उत्पन्न होने लगती हैं। दिमाग वाला बिना नफा नुकसान देखे कोई काम नहीं करता। नतीजा भावुक इंसान पीड़ा ,अवसाद में घिरने लगता है। लेकिन तमाम दुख ,दर्द ,अवहेलना , अपमान सहने के बाद भी उस रिश्ते को बचाने में लगा रहता है और दूसरे इंसान को कोई फ़र्क नहीं पड़ता।

टॉक्सिक रिलेशनशिप आखिर क्या है इसे कैसे पहचाना जाए? अगर किसी रिश्ते में आपको लगातार पीड़ा ,तिरस्कार , अवहेलना मिल रही हो बेवजह प्रताड़ना ,गलत साबित किया जा रहा हो ,रिश्ते में खुशी से ज्यादा दुख ने पाँव पसार लिए हों तो निःसंदेह आप गलत रिश्ते में जुड़े हैं। ऐसे रिश्ते में दूसरा व्यक्ति नकारात्मक रूप से आपको प्रभावित करके नियंत्रित करने की कोशिश करता है। इसके लिए अनैतिक बर्ताव, कटु बाणी ,आरोप प्रत्यारोप आम बातें हो जाती हैं। जबकि दूसरा इंसान कुछ बीते अच्छे दिनों की यादें समेटे बदलाव की उम्मीद में सब सहता रहता है। नतीजतन दोनों ही इस चीज़ के अभ्यस्त हो जाते हैं।

अगर हम कहें कि टॉक्सिक रिलेशन जुए के खेल जैसा होता है, तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। जैसे जुए में दस बार हारने के बाद भी जीतने की उम्मीद बनी रहती है। वैसे ही भावनाओं से जुड़ा इंसान बदलाव की उम्मीद में सब सहता रहता है और एक समय ऐसा आ जाता है कि ये उसकी आदत बन जाती है और मर मर कर जीना उसकी नियति ।

   जीवन हमें एक बार ही मिलता है।कोशिश करें इसे हम उन लोगों के साथ गुजारें जिन्हें हमारी परवाह है। जिनको हमारे सुख दुख से फ़र्क पड़ता हो। महज भावुकता में बह कर ऐसे किसी रिश्ते को ना ढोयें जो आपको कष्ट देना ही जानता हो । 

टूटने ,बिखरने का भय त्याग कर अपने स्वभाव अनुसार रिश्तों में जुड़िए फिर देखिए जीवन कितना खूबसूरत है। बस इस बदलाव के लिए अपने अंदर दृढ़ इच्छा शक्ति पैदा करनी होगी।

  • निवेदिता शुक्ला
  • इटावा , उत्तर प्रदेश

Read More »

युवा नवसंकल्प

उठो, जागो युवाओं लेना है तुम्हें आज …एक संकल्प।

वो धरती जिसने बरसों सहा है गुलामी को,

अपने रक्त से रचे हैं जिसने तमाम स्वतंत्रता चिह्न,

अब देना है तुम्हें नव रूप, फिर से उसी धरा को।

पालन करना है तुम्हें अपने कर्तव्यों का ।

जागो युवाओं! व्रत लो, रचोगे नया इतिहास तुम।

तुम्हें चलना है उन राहों पर जिन्हें दिखाया था स्वामी विवेकानंद और गांधी ने,

एक नई ज्योति जगाई थी उन्होंने आजादी की ,

और बंधाया अटूट विश्वास दिल में,

लेकिन युवाओं अब नई चुनौती है इस नए युग में

विकास,शिक्षा और नवोद्योग की।

तुम्हारे हौसलों के पंख ले जाएंगे देश को ऊँचाइयों तक,

गाँव-गाँव और शहर-शहर जगमगाओगे तुम एक सबेरा शिक्षा का।

धरती की छाती पर लहराओगे फूल उत्सवों के, किसान बन कर।

थमने मत दे तू चल उठ आगे बढ़।

थाम ले मशाल अपने हाथों में,

तब चमकेगा तेरा नाम तकनीक, कला और विज्ञान के क्षेत्र में

उठो युवाओं लेना है एक और संकल्प तुम्हें

तुम बनोगे पहिए विकास की गाड़ी के,

तोड़ दोगे तुम भ्रष्टाचार की दीवार को,

बोओगे नए बीज नवाचार के,

और लहराओगे तुम एकता के ध्वज को विविधता के बीच।

युवाओं, तुम ही तो हो केंद्र बिन्दु राष्ट्र की उन्नति का,

ऐसा बिन्दु जिसके आसपास कोई बाधा न हो

न जाति,न धर्म और न ही भाषा ।

उठो युवाओं तुम्हें संभालना है अपने पर्यावरण को,

अपनी स्वच्छ हवाएँ,जल और हरियाली को।

तुम्हीं बनाओगे उन्नति का एक उजला सा वन।

युवाओं मुझे पता है हिलोरें लेती हैं सैनिकों की शौर्य गाथा, तुम्हारे लहू में,

लेकिन नहीं भूलोगे तुम शांति, समृद्धि और अपना उद्देश्य।

युवाओं तुम्हे बनाना है महाशक्ति इस धरा को,

तुम्हीं दे पाओगे सब को न्याय, समृद्धि, साझा तरक्की में सबका हिस्सा।

उठो युवाओं तुम्हारी राह देखता है ये देश,

प्रतिस्पर्धा के युग में तुम जलाओ एक मशाल नव युग की।

नव संकल्प लो युवाओं,राष्ट्र की उन्नति में कर दो न्योछावर अपना सर्वस्व,

क्योकि देश भक्ति ना रहे मोहताज किसी भाषा की, किसी जाति की और न ही धर्म की।

युवाओं तुम्हारा जोश लहराएगा तिरंगा बन कर अनंत अकाश में, हमेशा हमेशा।

~ प्रो. प्रभात द्विवेदी राजकीय महाविद्यालय

चिन्यालीसौंड, उत्तरकाशी उत्तराखण्ड

Read More »

तर्कशीलता का मतलब नास्तिक होना नहीं है

किसी भी बात को तर्क के जरिए स्थापित किया जा सकता है और तर्कों द्वारा ही खंडित भी किया जा सकता है। हमारे देश में से बहुत से ऐसे मुद्दे रहे हैं जिन को तर्कों द्वारा स्थापित करने में बहुत मशक्कत करनी पड़ी है और लोगों द्वारा बहिष्कार भी सहन करना पड़ा है। धर्म के उन्मादी लोगों को समझा पाना बहुत कठिन होता है क्योंकि समाज में फैली कुरीतियों में या तो उनके स्वार्थ सिद्ध होते हैं या फिर एक भेड़ चाल जो सदियों से चली आ रही है  जिसकी वजह से वो उस लीक से हटना पसंद नहीं करते हैं।
हमारे यहाँ सती प्रथा जो 500 ईसा पूर्व शुरू हुई और 1829 में इसे लॉर्ड विलियम बैंटिक ने इसे गैर कानूनी घोषित कर दिया था। इस प्रथा को खत्म करने में राजा राममोहन राय का महत्वपूर्ण योगदान रहा था। इसी तरह बाल विवाह का इतिहास भी बहुत पुराना है लेकिन समय के साथ इसके नियम बदलते रहे और इस प्रथा का विरोध भी राजाराम मोहन राय ने प्रमुखता से किया।1929 में बाल विवाह विरोध कानून लागू हुआ। इसी तरह विधवा विवाह शुरू करने में ईश्वर चंद्र विद्यासागर का योगदान रहा। ईश्वर चंद्र विद्यासागर  ने विधवा विवाह अधिनियम के लिए आवाज उठाई। पर्दा प्रथा के लिए भी कई समाज सुधारकों ने आवाज उठाई। स्त्री शिक्षा के क्षेत्र में भी सावित्रीबाई फुले, भीमराव अंबेडकर ने महिलाओं को शिक्षा का अधिकार दिलवाया। सावित्री बाई फुले को भी सामाजिक उपेक्षा का सामना करना पड़ा लेकिन उन्होंने तर्क के साथ समाज में अपनी बात रखने के साथ-साथ उसे लोगों के जेहन में स्थापित भी किया।
अब कुछ मसले और है जो विवाद के तौर पर उभरने लगे हैं। सती प्रथा, पर्दा प्रथा, बाल विवाह, स्त्री शिक्षा ऐसे कई मसले रहे हैं जिन्हें सबसे पहले तर्कों द्वारा ही खत्म किया गया है। सबसे बड़ी बात यह है कि इन कुरीतियों को धार्मिक मान्यता प्राप्त थी। अब धीरे-धीरे लड़कियों में होने वाले मासिक चक्र को लेकर उनके विचारों में परिवर्तन लक्षित हो रहा है। उनका मानना है कि यह एक प्राकृतिक प्रक्रिया है। इसका धर्म से कोई लेना देना नहीं है। एक क्रिया जो हर महीने होती है इसके लिए उन्हें अपवित्र मानना या मंदिर में प्रवेश ना करने देना, पूजा पाठ से वंचित रखना उन्हें सही नहीं लगता। यदि स्वास्थ्य की नजर से देखा जाए तो यह दिन आराम करने के लिए होते हैं क्योंकि इन दिनों लड़कियों+महिलाओं को कई शारीरिक और मानसिक परेशानियों का सामना करना पड़ता है। हालांकि बदलते वक्त के साथ बहुत बदलाव आया है लेकिन सबकी अपनी सुविधानुसार बदलाव आया है और इन आराम के दिनों का महत्व भी खत्म हो गया है। स्कूल, कॉलेज, ऑफिस सभी जगह महिलाएं अपनी ड्यूटी मुस्तैदी से करती है और अब आराम जैसा कुछ भी नहीं रह गया है। घर में महिलाएं सभी काम बहुत नॉर्मल तरीके से करती है सिर्फ पूजा पाठ नहीं करती। तो फिर पूजा पाठ में अड़चन क्यों? मंदिर में प्रवेश वर्जित क्यों? क्यों अभी भी कुछ जगहों पर इन दिनों में घर के कामों से भी वंचित रखा जाता है?
अभी भी धार्मिक कर्मकांडों का भय बहुत ज्यादा है और हाल के समय में तो कुछ ज्यादा ही है। यदि बाहरी देशों में देखें तो इस मसले को ज्यादा तूल नहीं दिया जाता है, एक स्वाभाविक शारीरिक क्रिया के तौर पर ही देखा जाता है। सभी देशों में इस मसले पर अपने कुछ रिवाज हैं लेकिन बहुत से देश इन कुरीतियों से बाहर निकल चुके हैं। मासिक धर्म को लेकर वहाँ इतनी संकीर्णता नहीं है।
सवाल हमारे यहाँ गहरी पैठ चुकी इस कुरीति पर है? क्या हम भविष्य में इन कुरीतियों से आगे बढ़ पाएंगे? यह सवाल अब लड़कियों के मन में पनपने लगा है। ~प्रियंका वर्मा महेश्वरी 

~

Read More »

सीजफायर पे इतनी किच किच क्यों

दैनिक भारतीय स्वरूप पाकिस्तान स्थित आतंकी अड्डो को निशाना बनाते हुए भारत द्वारा की गयी सैन्य कार्रवाई बन्द हो जाने के बाद पूरे देश में बहस छिड़ी हुई है| विपक्षी दल जहाँ सरकार पर हमलावर हैं वहीँ सत्ता पक्ष के नेता ऑपरेशन सिन्दूर को सफल तथा सीजफायर को अस्थाई बता रहे हैं| प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी ने देश के नाम अपने सम्बोधन में बताया कि भारत ने पहले तीन दिनों में ही पाकिस्तान को इतना तबाह कर दिया जिसका उसे अन्दाजा भी नहीं था| भारत की आक्रामक कार्रवाई के बाद पाकिस्तान बचने के रास्ते खोजने लगा था| प्रधानमन्त्री ने यह भी बताया कि पाकिस्तान दुनियां भर में तनाव कम करने के लिए गुहार लगा रहा था और बुरी तरह पिटने के बाद पाकिस्तानी सेना ने 10 मई की दोपहर हमारे डीजीएमओ को सम्पर्क किया| तब तक हम आतंकवाद के इन्फ्रास्ट्रक्चर को बड़े पैमाने पर तबाह कर चुके थे| पाकिस्तान की तरफ से जब यह कहा गया कि उसकी ओर से आगे कोई आतंकी गतिविधी और सैन्य दुस्साहस नहीं दिखाया जायेगा तो भारत ने भी उस पर विचार किया| प्रधानमन्त्री ने अपने वक्तव्य में स्पष्ट कहा कि हमने पाकिस्तान के आतंकी और सैन्य ठिकानों पर अपनी जवाबी कार्रवाई को सिर्फ स्थगित किया है| सर्जिकल स्ट्राइक और एयर स्ट्राइक के बाद ऑपरेशन सिन्दूर अब भारत की नीति बन चुकी है| पाकिस्तान को चेतवानी देते हुए उन्होंने कहा है कि हम आतंक की सरपरस्त सरकार और आतंक के आकाओं को अलग-अलग नहीं देखेंगे| रक्षामन्त्री राजनाथ सिंह ने भी प्रधानमन्त्री की बात दोहराते हुए पाकिस्तान को आगाह किया कि हिन्दुस्तान की धरती पर किया गया कोई भी आतंकी हमला एक्ट ऑफ़ वार माना जायेगा|

पहलगाम आतंकी हमले के बाद ‘ऑपरेशन सिन्दूर’ के तहत भारतीय वायु सेना ने 6-7 मई की रात पाकिस्तान तथा पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में कुल 9 आतंकी ठिकानों पर एयर स्ट्राइक की थी| जिसका उद्देश्य आतंकियों के लांचपैड तथा हथियारों के भण्डार को नेस्तानाबूद करना था| जो पूरी तरह सफल रहा| विभिन्न स्रोतों से प्राप्त जानकारी के अनुसार इस कार्रवाई में जैश-ए-मुहम्मद का सरगना अब्दुल रऊफ अजहर सहित 100 से अधिक आतंकी मारे गये| अब्दुल रऊफ दिसम्बर 1999 में इंडियन एयरलाइंस की फ्लाइट – 814 के अपहरण तथा अमेरिकी पत्रकार डेनियल पर्ल की हत्या में शामिल बताया जाता था| आतंकी अड्डों पर अचानक हुई इस बड़ी कार्रवाई से बौखलाए पाकिस्तान ने भारत के कई सैन्य ठिकानों तथा रिहायशी इलाकों को निशाना बनाने की कोशिश की| परन्तु भारत के एयर डिफेंस सिस्टम ने माकूल जवाब देते हुए सभी हमलों को चुटकियों में विफल कर दिया| पाकिस्तान द्वारा छोड़े गये सभी ड्रोन जहाँ हवा में ही नष्ट कर दिये गये वहीं उसका एयर बेस सिस्टम भी ध्वस्त कर दिया गया| इस ऑपरेशन में जिन नौ आतंकी ठिकानों को निशाना बनाया गया, उनमें चार पाकिस्तान में तथा पांच पाक अधिकृत कश्मीर में स्थित थे| इन्हें लश्कर, जैश-ए-मुहम्मद तथा हिजबुल मुजाहिदीन जैसे भारत विरोधी आतंकी संगठनों के ठिकानों के रूप में चिन्हित किया गया था| अन्तर्राष्ट्रीय सीमा से लगभग 25 किलोमीटर दूर मुरीदके में स्थित लश्कर मुख्यालय का नाम ‘मरकज तैयबा’ था| 26/11 के आतंकी अजमल कसाब तथा डेविड हेडली आदि ने यहीं प्रशिक्षण लिया था| अन्तर्राष्ट्रीय सीमा से लगभग 100 किमी दूर बहावलपुर में स्थित जैश-ए-मुहम्मद के मुख्यालय का नाम ‘मस्जिद/मरकज सुभान अल्लाह’ था| यह आतंकियों की भर्ती, प्रशिक्षण तथा उन्हें कट्टर बनाने का केन्द्र था| अन्तर्राष्ट्रीय सीमा से लगभग 12 किमी दूर सियालकोट में स्थित ‘मेहमूना जोया’ नाम का आतंकी अड्डा हिजबुल मुजाहिदीन का बड़ा शिविर तथा कठुआ जम्मू क्षेत्र का नियंत्रण केन्द्र बताया गया| जनवरी 2016 में पठानकोट एयरबेस पर हमले की योजना बनाने तथा उस पर निगरानी रखने का काम यहीं से हुआ था| सियालकोट में ही अन्तर्राष्ट्रीय सीमा से लगभग 6 किमी दूर जैश-ए-मुहम्मद का सरजाल नामक केन्द्र था| मार्च 2025 में जम्मू कश्मीर के चार पुलिस कर्मियों की हत्या करने वाले आतंकवादियों ने यहीं प्रशिक्षण लिया था| पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर के पांच आतंकी अड्डों में ‘सवाई/शवाई नाला’ नामक लश्कर का प्रशिक्षण केन्द्र नियंत्रण रेखा से लगभग 30 किमी दूर मुजफ्फराबाद में स्थित था| मुजफ्फराबाद में ही ‘सैयदना बिलाल’ नाम से जैश-ए-मुहम्मद का प्रशिक्षण केन्द्र संचालित था| जहाँ हथियार, विस्फोटक तथा जंगल में जीवित रहने का प्रशिक्षण दिया जाता था| वहीँ नियंत्रण रेखा से लगभग 30 किमी दूर कोटली में राजौरी-पूंछ क्षेत्र में सक्रिय लश्कर आतंकियों का प्रशिक्षण केन्द्र था| जिसका नाम गुलपुर था| अप्रैल 2023 में पूंछ में तथा जून 2024 में हिन्दू तीर्थयात्रियों की बस पर हमला करने वाले आतंकियों ने यहीं प्रशिक्षण लिया था| कोटली में ही नियंत्रण रेखा से लगभग 13 किमी दूर लश्कर के अब्बास नामक अड्डे में फिदायीन अर्थात आत्मघाती हमले का प्रशिक्षण दिया जाता था| नियंत्रण रेखा से लगभग 9 किमी दूर भीम्बेर में बरनाला नाम से लश्कर का आतंकी अड्डा था| जिसमें हथियार, आईईडी (इम्प्रोवाइज्ड एक्सप्लोसिव डिवाइस) तथा जंगल में जीवित रहने की ट्रेनिग दी जाती थी| इन सभी आतंकी अड्डों की तबाही ने निश्चित ही भारत विरोधी आतंकियों की कमर तोड़ने का काम किया है| इसे आतंक के खिलाफ भारत की लड़ाई को बहुत बड़ी सफलता के रूप में देखा जाना चाहिए| लेकिन भारत की एक बड़ी आबादी ऑपरेशन सिन्दूर के तहत पाकिस्तान के टुकड़े होते हुए देखना चाहती थी| लोगों का यह विचार था कि अब यह कार्रवाई पाक अधिकृत कश्मीर की भारत में वापसी तथा बलूचिस्तान की आजादी के बाद ही रुकनी चाहिए| परन्तु अचानक घोषित हुए सीजफायर ने सबकी आशाओं पर पानी फेर दिया| उसमें भी सीजफायर का ऐलान भारत और पाकिस्तान से पहले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा किये जाने से आम जन का आश्चर्यचकित होना स्वाभाविक है|  

अब प्रश्न यह उठता है कि आतंकी अड्डों पर कार्रवाई शुरू करते ही जब भारत सरकार ने बड़ी प्रतिबद्धता पूर्वक स्पष्ट कर दिया था कि हम सिर्फ और सिर्फ आंतकवादियों के खिलाफ सैन्य कार्रवाई कर रहे हैं| इसमें न तो पाकिस्तान के सैन्य ठिकानों पर हमला किया जायेगा और न ही वहां के रिहायशी इलाकों को निशाना बनाया जायेगा| तब फिर भारत की एक बड़ी आबादी के मन में बलूचिस्तान की आजादी तथा पाक अधिकृत कश्मीर पर कब्जे की भ्रान्ति ने कैसे और क्यों जन्म लिया? इसके राजनीतिक निहितार्थ भले ही तलाशे जा रहे हों| परन्तु कारण यह हो सकता है कि 22 अप्रैल को पहलगाम में हुए आतंकी हमले के बाद आलोचना झेल रही सरकार ने 6 मई तक सेना को पर्याप्त होमवर्क करने के बाद सैन्य कार्रवाई की इजाजत दी थी| जिसका परिणाम पूरी तरह सकारात्मक रहा और पाकिस्तान तथा पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में स्थित आतंकी अड्डों को पूरी तरह ध्वस्त किया जा सका| तदोपरान्त पाकिस्तान की ओर से की गयी जवाबी कार्यवाही को भी भारतीय जवानो ने विफल कर दिया| ऐसे में भारत की एक बड़ी आबादी को यह आभास होना स्वाभाविक था कि हम पाकिस्तान पर भारी हैं| अतः लगे हाँथ पाक अधिकृत कश्मीर को मुक्त तथा बलूचिस्तान को आजाद करवाकार समस्या को हमेशा-हमेशा के लिए समाप्त कर देना चाहिए| जबकि सरकार तथा सेना का उद्देश्य 7 मई को ही पूरा हो गया था| अतः कार्रवाई को रोकना मुनासिब लगा और हुआ भी यही| ऐसे में आम जन में असन्तोष फ़ैल गया| बड़े पैमाने पर लोगों की प्रतिक्रियाएं आयीं और अभी तक आ रही हैं| इसी अवसर का लाभ उठाते हुए विपक्षी दल भी हमलावर हो रहे हैं| कोई इन्दिरा गाँधी को याद कर रहा है तो कोई अटल विहारी वाजपेई की दुहाई दे रहा है| प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी को अन्ततोगत्वा कहना ही पड़ा कि हमने पाकिस्तान के आतंकी और सैन्य ठिकानों पर अपनी जवाबी कार्रवाई को सिर्फ स्थगित किया है|

निश्चित ही भारत सैन्य स्तर पर पाकिस्तान से कई गुना अधिक शक्तिशाली है| परन्तु उत्साह के अतिरेक में सीजफायर के विरोध में प्रतिक्रिया देने से पूर्व हमें इस बात पर भी विचार करना चाहिए कि आज की परिस्थितियां 1971 से कहीं अधिक भिन्न हैं| बलूचिस्तान की आजादी और पाक अधिकृत कश्मीर की मुक्ति के लिए सैन्य कार्रवाई की बजाय कूटनीतिक तरीका अधिक उपयुक्त है| इस हेतु प्रयास भी जारी है| इसके अलावा पाक अधिकृत कश्मीर की मुक्ति से कहीं अधिक आवश्यक जम्मू कश्मीर को आतंकवाद से मुक्त करवाना है| साढ़े तीन दशक से अपने ही देश में निर्वासित जीवन जी रहे कश्मीर के मूल निवासियों की घर वापसी भारत सरकार के लिए सबसे बड़ी चुनौती है| ऑपरेशन सिन्दूर को इस चुनौती से निपटने की दिशा में एक बड़े एवं प्रभावशाली प्रयास के रूप में देखा जाना चाहिए

डॉ.दीपकुमार शुक्ल (स्वतन्त्र टिप्पणीकार)

Read More »

शिक्षा का स्रोत अब शुद्ध नहीं रहा

‘शिक्षा’ पाना हो गया दूभर,
जब से यह व्यापार बनी।
ज्ञान की गंगा सूख रही है,
शातिरों की दुकान चली।।”

👉शिक्षा के व्यावसायीकरण और उससे उपजी समस्याओं पर गहरा कटाक्ष करती मेरी शायरी न केवल एक भावनात्मक अभिव्यक्ति है, बल्कि समाज में शिक्षा के क्षेत्र में हो रहे पतन को भी उजागर करती है।
👉 एक कड़वी हकीकत यह है कि
शिक्षा, जो कभी ज्ञान, नैतिकता और जीवन मूल्यों की आधारशिला मानी जाती थी, आज एक विशाल व्यवसाय बन चुकी है। प्राचीन भारत में गुरुकुलों की परंपरा थी, जहां गुरु अपने शिष्यों को बिना किसी भेदभाव के ज्ञान प्रदान करते थे। लेकिन आज के दौर में शिक्षा एक ऐसा बाजार बन गया है, जहां डिग्रियां, सर्टिफिकेट और रैंकिंग्स की कीमत तय होती है, न कि ज्ञान की।
👉 अच्छी शिक्षा अब गरीब और मध्यम वर्ग के लिए एक बोझ बन गई है। महंगी फीस, कोचिंग संस्थानों की लूट, और निजी स्कूलों-कॉलेजों की मनमानी ने इसे एक ऐसा सपना बना दिया है, जो हर किसी की पहुंच से बाहर होता जा रहा है।
👉 शिक्षा का असली मकसद है व्यक्ति का सर्वांगीण विकास: बौद्धिक, नैतिक और सामाजिक। लेकिन आज शिक्षा केवल नौकरी पाने का जरिया बनकर रह गई है। स्कूलों और कॉलेजों में रट्टा मारने की संस्कृति, परीक्षा में नंबर लाने की होड़, और प्रतिस्पर्धा ने ज्ञान के प्रति जिज्ञासा को खत्म कर दिया है। बच्चे किताबों को बोझ की तरह ढोते हैं, लेकिन उनमें जीवन के लिए जरूरी समझ और संवेदनशीलता का विकास नहीं हो पाता।
इसके अलावा, शिक्षा का स्तर भी असमान है। सरकारी स्कूलों में संसाधनों की कमी और शिक्षकों की उदासीनता है, तो निजी संस्थानों में मुनाफे की भूख। दोनों ही स्थितियों में असली हानि विद्यार्थियों की होती है। यह कटु सत्य है कि, “शिक्षा का स्रोत अब शुद्ध नहीं रहा, बल्कि प्रदूषित होकर केवल दिखावे का रह गया है।”
👉शिक्षा क्षेत्र में माफिया तंत्र की मौजूदगी को उजागर करता है। कोचिंग संस्थान, निजी विश्वविद्यालय, और डिग्री बेचने वाली दुकानें इस माफिया तंत्र का हिस्सा हैं। ये संस्थान मोटी फीस वसूलते हैं, लेकिन बदले में न गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देते हैं और न ही नैतिकता का पाठ पढ़ाते हैं। कई बार तो फर्जी डिग्रियां और पेपर लीक जैसे घोटाले भी सामने आते हैं, जो इस तंत्र की गहरी जड़ों को दिखाते हैं।
उदाहरण के लिए, भारत में इंजीनियरिंग, मेडिकल और प्रबंधन जैसे क्षेत्रों में प्रवेश परीक्षाओं के लिए कोचिंग संस्थानों का बोलबाला है। ये संस्थान लाखों रुपये की फीस लेते हैं, लेकिन हर छात्र को सफलता की गारंटी नहीं दे सकते। फिर भी, माता-पिता और छात्र सामाजिक दबाव और भविष्य की चिंता में शातिरों के चक्कर में पड़ जाते हैं। यह शातिरों की ऐसी दुकान है, जो सपनों को बेचती है, लेकिन हकीकत में केवल मुनाफा कमाती है।
👉शिक्षा के इस व्यावसायीकरण का समाज पर गहरा प्रभाव पड़ रहा है। सबसे बड़ा प्रभाव है। अमीर लोग अपने बच्चों को महंगे स्कूलों और विदेशी विश्वविद्यालयों में पढ़ा सकते हैं, लेकिन गरीब और मध्यम वर्ग के लिए यह संभव नहीं। नतीजा यह है कि सामाजिक गतिशीलता रुक रही है, और गरीब हमेशा गरीब बना रहता है।
इसके अलावा, शिक्षा का यह रूप युवाओं में तनाव और मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं को भी बढ़ा रहा है। आत्मविश्वास की जगह असुरक्षा, और जिज्ञासा की जगह रटने की आदत ने नई पीढ़ी को खोखला कर दिया है।
👉 मेरी निजी राय है कि, “निजी संस्थानों पर सरकारी नियंत्रण की जरूरत है ! फीस व शिक्षा की गुणवत्ता को लेकर सख्त नियम बनाए जाएं, ताकि शिक्षा माफिया की मनमानी पर लगाम लगे।”
👉 शिक्षा की वर्तमान स्थिति पर अनेक सवाल उठाती है और हमें सोचने पर मजबूर करती है कि हम अपनी भावी पीढ़ियों को क्या दे रहे हैं ?

✒️श्याम सिंह पंवार कानपुर।

Read More »

स्वस्थ समाज के लिए मानसिक विकारों से छुटकारा जरूरी : डॉ अमरीन

भारतीय स्वरूप संवाददाता कानपुर। विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस के अवसर पर कानपुर प्रेस क्लब में एसोसिएशन ऑफ यूनिवर्सल रिलीफ ऐड (AURA) ट्रस्ट की संस्थापक डॉ अमरीन फातिमा ने प्रेसवार्ता करते हुए बताया, ” AURA ट्रस्ट के बैनर तले ट्रस्ट के सदस्यों के सहयोग से जमीनी स्तर पर कार्य किया जा रहा है। अनेक बच्चों को नशे की लत से छुटकारा दिलाया गया है और निरन्तर छुटकारा दिलाया जा रहा है। इसके साथ ही कई लोगों को मानसिक विकारों से उबारने का काम किया है। “

डॉ फातिमा ने यह भी बताया कि संस्था का उद्देश्य है कि लोगों के बेहतर जीवन के लिए कार्य करना है।
उन्होंने अपील की कि अगर किसी को मानसिक स्वास्थ्य की समस्या है तो वह कभी भी मुझसे या ट्रस्ट के सदस्यों से सम्पर्क कर सकता है।
उन्होंने यह भी कहा कि लोगो को अपने मानसिक स्वास्थ्य के प्रति सचेत रहना चाहिए। भावनात्मक, सामाजिक और मनोवैज्ञानिक संतुलन बनाये रखना चाहिए। क्योंकि आत्महत्या का एक कारण यह भी है।
यह भी कहा कि मानसिक स्वास्थ्य की परिभाषा के मुताबिक, लोगों को मानसिक विकारों से ही मुक्ति नहीं बल्कि भावनात्मक रूप से स्वस्थ रहना, सामाजिक जिम्मेदारियों को निभाना और मनोवैज्ञानिक रूप से मजबूत रहना भी मानसिक स्वास्थ्य का अभिन्न हिस्सा है।
प्रेस वार्ता में मौजूद फिजियोथेरेपिस्ट सौम्या बाजपेयी ने मानसिक स्वास्थ्य के प्रति जागरूक रहें और स्वस्थ समाज के निर्माण में अहम योगदान करें। उन्होंने लोगों से अपील की कि संस्था से जुड़ें और समाजहित में सहयोग करें।
प्रेस वार्ता में संस्था की संस्थापक डॉ अमरीन फातिमा, फिजियोथेरेपिस्ट सौम्या बाजपेयी, पत्रकार श्याम सिंह पंवार मौजूद रहे।

Read More »

जानिए क्या है कानपुर में सड़क के जर्जर होने कि असल वजह..क्या हो सकता है समाधान?

क्षेत्र कानपुर की सड़कों पर निकलते ही यह आभास हो जाता है कि सड़क पर गड्ढों का मौत रूपी मायाजाल फैला है …कानपुर में कई जगहों पर बनी सड़के कुछ ही समय बाद टूटकर चकनाचूर होने लगती हैं …और बनने के चंद समय बाद सीधी सपाट सड़के बड़े-बड़े गड्ढे में तब्दील हो जाती हैं …और इन्हीं कानपुर में सड़कों पर बने गड्ढे से होकर कई लोगों की मौत की खबर निकालती हैं …अब यह बात आम हो गई है कि कानपुर में सड़कों पर अचानक गाड़ी गड्ढे में गई और फिर बड़ी दुर्घटना हो गई ..कानपुर में यह हाल किसी गली कूचों का नहीं बल्कि बड़ी-बड़ी में सड़कों का भी है समस्या यह नहीं है कि यहां पर सड़कों का निर्माण नहीं होता है समस्या यह है कि यहां पर सड़के बनने के चंद समय बाद चकनाचूर होनी शुरू हो जाती हैं ..सरकार करोड़ों रुपए खर्च करके सड़कों का निर्माण करवाती है और फिर चंद समय बाद यही सड़के बड़े-बड़े गड्ढे में तब्दील होकर बदहाली का रोना रोने लगते हैं है यानी सरकार का किया गया खर्च चंद ही समय बाद पानी में डूब जाता है .. यहां पर असल समस्या यह बिल्कुल नहीं की सड़कों का निर्माण नहीं हो रहा है ?बल्कि यहां असल समस्या यह है सड़के बनने के बाद चंद समय में ही चकनाचूर हो जाती हैं …इसके पीछे एक नहीं कई कारण रहते हैं ..सबसे पहला कारण सड़के बनने के कुछ समय बाद सड़कों पर किसी नई पाइपलाइन को डालने के लिए सड़कों को खोदा जाता है ..

और फिर बिना किसी मानकता के इन गड्ढों को भर दिया जाता है …जिसके परिणाम स्वरूप चंद ही समय बाद यह गड्ढे बड़े-बड़े मौत रूपी तालाबों में तब्दील हो जाते है … अगर इन गड्ढों के कारण किसी कि मौत होती है तो यह मात्र दुर्घटना नहीं बल्कि मौत की साजिश है !और इस साजिश में गुनहगार एक नहीं बल्कि कई लोग हैं जैसे सबसे पहले गुनहगार वह है जिसने सड़क निर्माण में धांधली करी ,और दूसरा गुनहगार वह है जिसने सड़क खुदाई के दौरान किए गए गड्ढे से मिट्टी को चोरी कर मौत का तालाब बनाने में सहायता करी ..और अगले गुनहगार वह लोग हैं जो लोग कम भार वाली सड़कों पर अधिक भार वाली गाड़ी लेकर फर्राटा भरते हैं … जिस कारण भी सड़के जल्द से जल्द चकनाचूर होने लगती हैं ! फिलहाल यूपी कि तमाम सड़कों को सही करवाने के लिए मुख्यमंत्री योगी ने अभी अभी हाल ही में कहा है …”की सड़क निर्माण के लिए बजट कि कोई कमी नहीं है …सड़कों का निर्माण करवाया जाए व जर्जर सड़कों को ठीक करवाया जाए “लेकिन संभवत योगी का यह फरमान काम नहीं आएगा …ऐसा इसलिए क्योंकि इससे पहले भी कई बार सड़क निर्माण के लिए सरकार अच्छा खासा रुपए खर्च कर चुकी है …लेकिन फिर भी आज सड़के जर्जर पड़ी हैं ..ऐसे में आप सोच रहे होंगे कि आखिरकार इन सड़कों की हालत को सही करने का सही तरीका क्या है ?इस बात को अगर हम कम शब्दों में समझें तो इसका केवल एक उपचार है जिन लोगों ने सड़कों के निर्माण में धांधली करी है या जिन लोगों ने मिट्टी चोरी कर सड़कों को तालाब तब्दील कराया है उन लोगों के खिलाफ योजनाबद्ध तरीके से हत्या करने वाला मुकदमा दर्ज होना चाहिए !~विश्लेषण:विकास बाजपेई

Read More »

नई पेंशन योजना कितनी कारगर?

केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव ने यूनिफाइड पेंशन योजना लागू की जिसके तहत इस योजना का लाभ सरकारी कर्मचारियों को दिया जाएगा साथ ही यह भी कहा गया कि 2004 के बाद रिटायर्ड   सरकारी कर्मचारियों को भी इसका लाभ मिलेगा। यह योजना एनडीए गवर्नमेंट की नई योजना है जिसे नेशनल पेंशन स्कीम एनपीएस के समांतर जारी किया गया है और यह योजना 1अप्रैल 2025 से लागू होगी। गौरतलब है कि सरकारी कर्मचारियों के लिए एनपीएस और यूपीएस में से एक को चुनने का विकल्प रखा गया है। वहीं देश के कई राज्यों में पुरानी पेंशन योजना ओपीएस अभी भी लागू है। अब ऐसे में लोगों को ओपीएस, एनपीएस और यूपीएस में अंतर करना मुश्किल हो रहा है, लोगों को यह समझ नहीं आ रहा कि कौन सी योजना उनके लिए लाभदायक है और उनके लिये अनुकूल होगी।

यूपीएस पेंशन योजना के तहत केंद्रीय कर्मचारियों को एक निश्चित पेंशन दिया जाएगा जो आखरी 12 महीने की औसत मूल वेतन का 50% होगा। कर्मचारियों को यह पेंशन पाने के लिए कम से कम 25 साल तक नौकरी करनी होगी। वहीं अगर किसी कर्मचारी की सेवा में रहते हुए मृत्यु होने की स्थिति में परिवार (पत्नी) को 60 प्रतिशत पेंशन के रूप में मिलेगा। इसके अलावा 10 साल तक की न्यूनतम सेवा की स्थिति में कर्मचारी को कम से कम 10 हज़ार रुपये प्रति माह पेंशन के रूप में दिए जाएंगे। इसके अलावा कर्मचारी और फ़ैमिली पेंशन को महंगाई के साथ जोड़ा जाएगा। इसका लाभ सभी तरह की पेंशन में मिलेगा। वहीं ग्रैच्युटी के अलावा नौकरी छोड़ने पर एकमुश्त रकम दी जाएगी। इसकी गणना कर्मचारियों के हर छह महीने की सेवा पर मूल वेतन और महंगाई भत्ते के दसवें हिस्से के रूप में होगी।
सरकार का दावा है कि इससे 23 लाख केंद्रीय कर्मचारियों को फायदा होगा। पहले कर्मचारी पेंशन के लिए 10 प्रतिशत का अंशदान करते थे और केंद्र सरकार भी इतना ही अंशदान करती थी, लेकिन 2019 में सरकार ने सरकारी योगदान को 14 प्रतिशत कर दिया था, जिसे बढ़ाकर अब 18.5 प्रतिशत कर दिया जाएगा। नयी एकीकृत पेंशन योजना 1अप्रैल 2025 से लागू होगी, तब तक इसके लिए संबंधित नियमों को बनाने के काम किया जाएगा और कर्मचारियों के पास एनपीएस यानी नेशनल पेंशन स्कीम या यूपीएस में रहने का विकल्प होगा।
एनपीएस के तहत दो अकाउंट होते हैं टायर 1 टायर 2 जिसे कोई भी खोल सकता है और निवेश कर सकता है। यूपीएस एक निश्चित पेंशन स्कीम है साथ ही फैमिली पेंशन भी मिलेगा। मिनिमम निश्चित पेंशन का भी प्रावधान है जबकि एनपीएस में ऐसा नहीं है। यूपीएस सुरक्षित पेंशन योजना है जबकि एनपीएस एक मार्केट लिंक योजना है लेकिन देश में सरकारी कर्मचारी काफी समय से पुरानी पेंशन योजना लागू करने की मांग कर रहे हैं। पिछले 10 सालों से यह मसला उलझा हुआ है और कोई निर्णय नहीं लिया जा सका है। इस योजना के लागू होने के साथ ही यह सवाल भी आने लगे हैं कि जब एनपीएस और यूपीएस का विकल्प है तो ओपीएस का विकल्प क्यों नहीं रखा गया? यदि यूपीएस में 50% देने की बात रखी गई है तो ओपीएस में भी तो यही 50% देने की बात कही गई है। फिर सरकार पुरानी पेंशन योजना लागू क्यों नहीं कर रही है?
दरअसल ओपीएस एक परिभाषित लाभ योजना है जो वेतन आयोग की सिफारिशों के आधार पर समायोजन के साथ जीवन भर पेंशन के रूप में प्राप्त अंतिम वेतन के आधे हिस्से की गारंटी देती है। वहीं, एनपीएस एक परिभाषित योगदान योजना है जहां सरकारी कर्मचारी अपने मूल वेतन का 10 प्रतिशत योगदान करते हैं। इसके अलावा निजी क्षेत्र में कार्य कर रहे कर्मचारियों के विषय में कुछ नहीं कहा गया है। यह कर्मचारी भी देश के विकास में टैक्स के रूप में रकम चुकाते हैं।
कई विधानसभा चुनाव में ओपीएस की मांग भाजपा पर भारी पड़ी है और वहां कांग्रेस को फायदा पहुंचा है। अब फिर से विधानसभा चुनाव का सिलसिला शुरू हो गया है ऐसे में भाजपा 370 जैसे कार्ड के अलावा नई पेंशन योजना द्वारा सरकारी कर्मचारियों को लुभा रही है। 23 लाख सरकारी कर्मचारियों को लाभान्वित होने की बात कही गई है और इन्हीं कर्मचारियों में से अधिकतर ने पुरानी पेंशन योजना की मांग रखी है। दूसरी ओर एक सवाल यह भी खड़ा होता है कि क्या यह चुनावी वादों से घिरे प्रधानमंत्री की छवि को सुधारने का प्रयास है?

~प्रियंका वर्मा माहेश्वरी

Read More »

चाटुकारिता करने वाला व्यक्ति ‘पत्रकार’ नहीं होता ~श्याम सिंह पंवार

किसी मीडिया संस्थान से मात्र ‘आईडेंडिटी कार्ड’ बनवा लेने से, हाँथ में माइक ले लेने से और वाहन पर ‘प्रेस’ का स्टीकर चिपका लेने से कोई ‘पत्रकार’ नहीं बन जाता है। ‘पत्रकार’ वह व्यक्ति नहीं होता है जो अपने मुहल्ले के लोगों के बीच धौंस जमाने के लिये रसूखदारों (कथित जनप्रतिनिधि, गैरजिम्मेदार अधिकारी आदि) के साथ बैठकर गप्पें बघारता है, उनके मनमुताबिक पेश किये गये खुलासों व विचारों को जनता के बीच परोसने के साथ-साथ उसके मनमस्तिष्क पर जबरिया थोपने में जुटा रहता है। ऐसा करने से ‘वह’ रसूखदारों के लिये तो चहेता बन जाता है जिनकी चाटुकारिता में वह लीन रहता है। वह व्यक्ति ‘पत्रकार’ नहीं होता है बल्कि एक चाटुकार ही होता है, लोग भले ही उसे पत्रकार कहते हैं और उसके बारे में उसके सामने खुलकर बोलने से कतराते रहते हैं, लेकिन देर-सबेर, उनकी सच्चाई सामने आ ही जाती है।
पत्रकारों से जुड़े ऐसे अनेक मामले प्रकाश में आ चुके हैं जिनसे सवाल पनपता है कि ‘पत्रकार’ ऐसे भी होते हैं क्या? तो मेरे नजरिये से जवाब यह है कि पत्रकार ऐसे नहीं होते हैं बल्कि पत्रकार का चोला ओढ़ कर पत्रकारिता के पेशे को कलंकित करने वाले वो शातिर लोग होते हैं जो निज स्वार्थ सिद्धि के लिये किसी भी सीमा तक गिर सकते हैं, उन्हें पत्रकारिता से कोई लेना-देना नहीं होता है।
मेरे नजरिये से ‘पत्रकार’ देश का वह व्यक्ति है जो किसी रसूखदार की चाटुकारिता ना कर किसी भी मामले की सच्चाई की तह तक जाने में जुटा रहता है। जनता की समस्याओं को सरकारों तक पहुचाने व सरकारों की मंशा को जनता तक पहुंचाने का सशक्त माध्यम बनता है। निष्पक्षता के साथ अपनी कलम चलाना अपना दायित्व समझता है।
लोकतांत्रिक देशों में विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के बाद ‘पत्रकारिता’ को लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ कहा गया है। ऐसे में देश की जनता की पत्रकारों से शुरू से ही यह अपेक्षा रहती है कि वे आमजन के साथ खड़े हों और जनता से जुड़े मसलों पर सरकारों से सवाल करें। हालांकि ऐसा करने से उनके सामने अनेक कठिनाइयाँ सामने आ सकती हैं और इसे नकारा भी नहीं जा सकता है।
विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका, जब अपने पथ से विचलित होता दिखता है, तब पत्रकार ही निष्पक्ष पत्रकारिता के माध्यम से तीनों को उनके ‘दायित्व का बोध’ कराने की जिम्मेदारी निभाता है। अतीत में जाकर इसके अनेक उदाहरण देखे जा सकते है और वर्तमान में भी शायद इसकी (निष्पक्ष पत्रकारिता) जरूरत है, लेकिन मौजूदा दौर में स्थिति बहुत बदल सी गई है और पत्रकारों की भूमिका अब सवालों के घेरे में आ गई है। जिनका उद्देश्य था, विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका से सवाल करना आज वह खुद सवालों के घेरे में है। जिसका मुख्य उद्देश्य सच्चाई की तलाश करना, जनहित के मुद्दों पर सरकारों से सवाल करना था और आमजन के साथ खड़े रहना होता था, आज वह (पत्रकार) किसी भी सीमा तक गिर रहा है! पथप्रदर्शक की भूमिका निभाने वाला (पत्रकार) ही पथभ्रष्टक की भूमिका में पाया जा रहा है!
आखिरकार, यह स्थिति क्यों और कैसे बन रही है, इस ओर गंभीरता से विचार करना शायद समय की दरकार है जिससे कि पत्रकारिता की छवि धूमिल ना हो सके और पत्रकार को उसकी वास्तविक पहचान व सम्मान मिल सके।।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं भारतीय प्रेस परिषद के सदस्य हैं)

Read More »

दयानंद गर्ल्स पीजी कॉलेज में एक पेड़ मां के नाम तथा पेड़ लगाओ पेड़ बचाओ अभियान के अंतर्गत किया गया पौधारोपण

दयानंद गर्ल्स पीजी कॉलेज कानपुर में राष्ट्रीय सेवा योजना इकाई के स्वयंसेवकों द्वारा एक पेड़ मां के नाम अभियान के अंतर्गत वृहद पौधारोपण किया गया । इस वर्ष की थीम “पेड़ लगाओ पेड़ बचाओ” के आधार पर समस्त वॉलिंटियर्स एवं प्राध्यापिकाओं ने पौधारोपण करते हुए निरंतर प्रयास से पेड़ो को बचाए रखने हेतु संकल्प लिया । इस अवसर पर उच्च शिक्षा निदेशालय, उत्तर प्रदेश शासन के निर्देशानुसार मातृ वाटिका का निर्माण भी किया गया। लगाए गए पौधों में मुख्यतः सागौन , आम , जामुन इमली, नीम , पीपल , पाखड़ , नींबू इत्यादि रहे। इस अवसर पर कुछ पौधे मातृ वाटिका में लगाए गए तथा कुछ पौधे छात्राओं को वितरित किए गए ताकि वह अपने घर, आंगन या प्रांगण में वह पौधा लगाकर उसकी रक्षा करें तथा उसे पाल पोसकर बड़ा करें।
इस अभियान के अंतर्गत आज यह दूसरा चरण था जिसमें कुल 50 पौधे लगाए गए प्रथम चरण में भी 50 पौधे स्वयं सेविकाओं को लगाने हेतु वितरित किए गए थे। महाविद्यालय प्राचार्य प्रो वंदना निगम में छात्राओं को वृक्ष लगाने तथा उनकी सुरक्षा करने के महत्व के बारे में विस्तार पूर्वक बताया। इस अवसर पर महाविद्यालय के वनस्पति विज्ञान विभाग, रसायन शास्त्र विभाग, भूगोल विभाग की समस्त प्राध्यापिकाओं समेत आइक्यूएसी इंचार्ज प्रो सुगंधा तिवारी एवं अलका श्रीवास्तव उपस्थिति रही। राष्ट्रीय सेवा योजना की 56 छात्राओं के द्वारा मातृ वाटिका के निर्माण में सक्रिय योगदान किया गया।

Read More »