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केन्द्रीय मंत्रिमंडल ने वित्त वर्ष 2030-31 तक आत्मनिर्भरता हासिल करने के लिए ₹11,440 करोड़ के परिव्यय के साथ ‘दलहन में आत्मनिर्भरता हेतु मिशन’ को मंजूरी दी

केन्द्रीय मंत्रिमंडल ने 1 अक्टूबर 2025 को ‘दलहन में आत्मनिर्भरता हेतु मिशन’ नामक एक केंद्रीय प्रायोजित योजना को मंजूरी दी है। इसका योजना का उद्देश्य घरेलू उत्पादन को बढ़ावा देना और छह वर्षों की अवधि (2025-26 से 2030-31) के दौरान दलहन में आत्मनिर्भरता हासिल करना है। इस योजना के लिए ₹11,440 करोड़ का वित्तीय प्रावधान किया गया है।

मिशन के फसल कटाई के बाद के अवसंरचना वाले घटक के अंतर्गत, मिशन अवधि के लिए कुल 1000 प्रसंस्करण इकाइयों को स्वीकृति प्रदान की गई है। इन 1000-प्रसंस्करण इकाइयों में से प्रथम चरण में 528-प्रसंस्करण इकाइयों का लक्ष्य राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को आवंटित किया गया है। राज्यवार प्रारंभिक लक्ष्य का विवरण परिशिष्ट-1 में दिया गया है।

धान की खेती के बाद खाली रहने वाले इलाकों और अन्य ऐसे क्षेत्रों में, जहां दूसरी फसलें भी उगाई जा सकती हैं, दलहन का रकबा और उत्पादन बढ़ाने के लिए, मुफ्त बीज किट बांटकर सहायता प्रदान की जा रही है। इस मिशन के अंतर्गत, राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों द्वारा प्रस्तुत वार्षिक कार्य योजना(AAP) के अनुसार 6 वर्षों में 87.5 लाख बीज किट वितरित करने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। रबी 2025-26 के दौरान राज्यों को कुल 10.36 लाख बीज किट आवंटित किए गए हैं। राज्यवार आवंटन का विवरण परिशिष्ट-II में दिया गया है। वर्ष 2026-27, 2027-28, 2028-29, 2029-30 और 2030-31 के लिए बीज किट के संभावित लक्ष्य क्रमशः 15.00 लाख, 16.25 लाख, 17.50 लाख, 13.75 लाख और 12.5 लाख निर्धारित किए गए हैं।

दलहन मिशन के अंतर्गत क्लस्टर हेतु कुल 489 जिलों को केंद्रित जिलों के रूप में चिन्हित किया गया है। स्थानीय आवश्यकताओं और बदलती परिस्थितियों के आधार पर इन चिन्हित जिलों में भविष्य में संशोधन किया जा सकता है। देश में केंद्रित जिलों की सूची परिशिष्ट-III में दी गई है।

दलहन की खेती के अंतर्गत कुल क्षेत्रफल में 35 लाख हेक्टेयर की वृद्धि का अनुमान है, जिसमें 24.5 लाख हेक्टेयर पारंपरिक क्षेत्रों में और 10.5 लाख हेक्टेयर गैर-पारंपरिक क्षेत्रों में होगा, जो वर्ष 2030–31 तक पूरा हो जाएगा। इस मिशन के तहत क्षेत्र विस्तार का अनुमान परिशिष्ट-IV में दिया गया है।

परिशिष्ट–I

‘दलहन में आत्मनिर्भरता हेतु मिशन’ के अंतर्गत फसल कटाई के बाद के अवसंरचना वाले घटक के तहत प्रथम चरण में प्रसंस्करण इकाइयों के राज्यवार लक्ष्य इस प्रकार हैं:

 (संख्या में)

क्रम संख्या राज्य प्रसंस्करण इकाइयाँ (दाल मिलें)
1 आंध्र प्रदेश 22
2 अरूणाचल प्रदेश 10
3 असम 25
4 बिहार 37
5 छत्तीसगढ़ 22
6 गोवा 5
7 गुजरात 28
8 हरियाणा 5
9 हिमाचल प्रदेश 5
10 जम्मू-कश्मीर 5
11 झारखंड 22
12 लद्दाख 5
13 कर्नाटक 30
14 केरल 5
15 मध्य प्रदेश 55
16 महाराष्ट्र 34
17 मणिपुर 5
18 मेघालय 5
19 मिजोरम 5
20 नागालैंड 11
21 ओडिशा 16
22 पंजाब 5
23 पुद्दुचेरी 5
24 राजस्थान 30
25 सिक्किम 5
26 तमिलनाडु 21
27 तेलंगाना 16
28 त्रिपुरा 8
29 उत्तर प्रदेश 56
30 उत्तराखंड 9
31 पश्चिम बंगाल 16
कुल 528

 

परिशिष्ट–II

रबी 2025-26 के दौरान बीज किटों का राज्य-वार आवंटन

 

राज्य बीज किटों की संख्या
आंध्र प्रदेश 96,200
असम 25,000
बिहार 20,000
छत्तीसगढ़ 68,100
गुजरात 4,500
हरियाणा 17,580
झारखंड 12,000
कर्नाटक 8,000
मध्य प्रदेश 2,22,700
महाराष्ट्र 95,000
ओडिशा 18,500
पंजाब 5,000
राजस्थान 1,28,700
तमिलनाडु 82,500
तेलंगाना 5,000
त्रिपुरा 2,000
उत्तर प्रदेश 2,11,000
पश्चिम बंगाल 15,000
Total 10,36,780

 

परिशिष्ट–III

दलहन मिशन के अंतर्गत केन्द्रित जिलों की सूची

राज्य केन्द्रित जिले (संख्या)
आंध्र प्रदेश 22
अरूणाचल प्रदेश 10
असम 25
बिहार 37
छत्तीसगढ़ 22
गुजरात 28
हरियाणा 3
हिमाचल प्रदेश 2
जम्मू-कश्मीर 2
झारखंड 22
लद्दाख 1
कर्नाटक 30
मध्य प्रदेश 55
महाराष्ट्र 34
मेघालय 3
नागालैंड 11
ओडिशा 16
पुद्दुचेरी 3
पंजाब 7
राजस्थान 30
तमिलनाडु 21
तेलंगाना 16
त्रिपुरा 8
उत्तर प्रदेश 56
उत्तराखंड 9
पश्चिम बंगाल 16
कुल 489

 

परिशिष्ट–IV

दलहनों के क्षेत्रफल विस्तार का अनुमान

(लाख हेक्टेयर में)

 

क्रम संख्या राज्य 2024-25 2025-26 2026-27 2027-28 2028-29 2029-30 2030-31
1 आंध्र प्रदेश 11.39 11.67 11.8 12 12.29 12.58 12.79
2 अरूणाचल प्रदेश 0.14 0.14 0.15 0.15 0.15 0.15 0.16
3 असम 1.66 1.7 1.72 1.75 1.79 1.83 1.86
4 बिहार 4.48 4.59 4.64 4.72 4.84 4.95 5.03
5 छत्तीसगढ़ 6.87 7.04 7.12 7.24 7.42 7.59 7.71
6 गोवा 0.04 0.04 0.04 0.04 0.04 0.04 0.04
7 गुजरात 13.16 13.49 13.63 13.87 14.2 14.54 14.78
8 हरियाणा 0.75 0.77 0.78 0.79 0.81 0.83 0.84
9 हिमाचल प्रदेश 0.29 0.3 0.3 0.31 0.31 0.32 0.33
10 जम्मू-कश्मीर 0.32 0.33 0.33 0.34 0.35 0.35 0.36
11 झारखंड 8.96 9.18 9.28 9.44 9.67 9.9 10.06
12 कर्नाटक 34.07 34.92 35.29 35.91 36.77 37.64 38.26
13 केरल 0.01 0.01 0.01 0.01 0.01 0.01 0.01
14 लद्दाख 0.01 0.01 0.01 0.01 0.01 0.01 0.01
15 मध्य प्रदेश 45.55 46.69 47.18 48.01 49.17 50.32 51.15
16 महाराष्ट्र 49.79 51.03 51.58 52.48 53.74 55.01 55.91
17 मणिपुर 0.31 0.32 0.32 0.33 0.33 0.34 0.35
18 मेघालय 0.09 0.09 0.09 0.09 0.1 0.1 0.1
19 मिजोरम 0.03 0.03 0.03 0.03 0.03 0.03 0.03
20 नागालैंड 0.32 0.33 0.33 0.34 0.35 0.35 0.36
21 ओडिशा 5.41 5.55 5.6 5.7 5.84 5.98 6.07
22 पुद्दुचेरी 0.01 0.01 0.01 0.01 0.01 0.01 0.01
23 पंजाब 0.6 0.62 0.62 0.63 0.65 0.66 0.67
24 राजस्थान 54.02 55.37 55.96 56.94 58.31 59.68 60.66
25 सिक्किम 0.05 0.05 0.05 0.05 0.05 0.06 0.06
26 तमिलनाडु 7.5 7.69 7.77 7.9 8.1 8.29 8.42
27 तेलंगाना 3.54 3.63 3.67 3.73 3.82 3.91 3.97
28 त्रिपुरा 0.21 0.22 0.22 0.22 0.23 0.23 0.24
29 उत्तर प्रदेश 21.77 22.31 22.55 22.95 23.5 24.05 24.45
30 उत्तराखंड 0.49 0.5 0.51 0.52 0.53 0.54 0.55
31 पश्चिम बंगाल 4.39 4.5 4.55 4.63 4.74 4.85 4.93
पूरा भारत 276 283 286 291 298 305 310

यह जानकारी कृषि एवं किसान कल्याण राज्य मंत्री भागीरथ चौधरी ने आज लोकसभा में एक लिखित उत्तर में दी।

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केंद्रीय मंत्रिमंडल ने उत्तर प्रदेश में 6969.04 करोड़ रुपये के परिव्यय से बाराबंकी से बहराइच तक 101.515 किलोमीटर की 4-लेन एक्सेस-कंट्रोल्ड राष्ट्रीय राजमार्ग-927 निर्माण की सरकारी निजी भागीदारी वार्षिकी मोड परियोजना को मंजूरी दी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में केंद्रीय मंत्रिमंडल की आर्थिक मामलों की समिति ने 6969.04 करोड़ रुपये की लागत से उत्तर प्रदेश में बाराबंकी से बहराइच (101.515 किलोमीटर) तक 4-लेन के प्रवेश और निकास नियंत्रित राष्ट्रीय राजमार्ग-927 के सरकारी निजी भागीदारी वार्षिकी मोड में निर्माण को स्वीकृति दे दी है।

उत्तर प्रदेश में राष्ट्रीय राजमार्ग-927 के बाराबंकी-बहराइच खंड के प्रस्तावित उन्नयन से बाराबंकी और बहराइच जिलों के शहरी क्षेत्रों में सड़क निर्माण की बड़ी ज्यामितीय खामियों, तीखे मोड़ों और भीड़भाड़ की समस्या का समाधान होगा। सेवा सड़कों के साथ नियंत्रित पहुंच वाले 4-लेन राजमार्ग के रूप में तैयार यह परियोजना प्रमुख रिहायशी क्षेत्रों को बाह्यमार्ग प्रदान करेगी, औसत यात्रा गति बढ़ाएगी, यात्रा समय में लगभग एक घंटे की कमी लाएगी और समग्र सड़क सुरक्षा, ईंधन दक्षता और वाहन परिचालन लागत में सुधार करेगी। इससे क्षेत्रीय गतिशीलता और सामाजिक-आर्थिक विकास को बढ़ावा मिलेगा।

यह परियोजना उत्तर प्रदेश के प्रमुख आर्थिक, सामाजिक और प्रचालन केंद्रों को निर्बाध रूप से जोड़ेगी है। इसके अतिरिक्त, उन्नत कॉरिडोर 3 आर्थिक केंद्रों, 2 सामाजिक केंद्रों और 12 प्रचालन केंद्रों से जुड़कर विभिन्न परिवहन साधनों के निर्बाध समन्वय और एकीकरण को बढ़ावा देगी, जिससे रूपईडीहा लैंड पोर्ट और हवाई अड्डों के साथ बेहतर बहु परिवहन सुविधा मिलेगी और समूचे क्षेत्र में माल और यात्री आवाजाही तेज होगी। परियोजना पूर्ण होने पर, यह नेपालगंज सीमा द्वारा भारत और नेपाल के बीच महत्वपूर्ण सीमा पार व्यापार और पारगमन कॉरिडोर स्थापित करेगी, जिससे रूपईडीहा लैंड पोर्ट तक पहुंच में उल्लेखनीय सुधार होगा। यह सड़क बहराइच और श्रावस्ती जैसे दूरस्थ जिलों को भी जोड़ेगी, प्रधानमंत्री गतिशक्ति आर्थिक और लॉजिस्टिक्स केंद्रों के साथ संपर्क प्रदान करेगी और कृषि व्यापार, पर्यटन, सीमा पार वाणिज्य और क्षेत्रीय निवेश को प्रोत्साहित करेगी।

गलियारे का नक्शा

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परियोजना विवरण:

विशेषता विवरण
परियोजना का नाम बाराबंकी से बहराइच तक चार लेन वाला एक्सेस-नियंत्रित राष्ट्रीय राजमार्ग-927
गलियारे लखनऊ – रूपईडीहा
लंबाई (किलोमीटर) 101.515
कुल सिविल लागत (करोड़ रुपये में) 3485.49
भूमि अधिग्रहण लागत (करोड़ रुपये में) 1574.85
कुल पूंजीगत लागत (करोड़ रुपये में) 6969.04
मोड हाइब्रिड वार्षिकी मोड
बाईपास 48.28 किलोमीटर
प्रमुख सड़कों का जुड़ाव राष्ट्रीय राजमार्ग 27, 330बी और 730

राज्य राजमार्ग 13 और 30बी

आर्थिक / सामाजिक / परिवहन केंद्र जुड़ाव हवाई अड्डे: लखनऊ और श्रावस्ती

रेलवे स्टेशन: बाराबंकी, रसौली, जंगीराबाद, रफीनगर, बिंदौरा, बुढ़वल, चौकाघाट, घाघराघाट, जरवल और बहराईच

लैंड पोर्ट: रूपईडीहा

आर्थिक केंद्र: 01 विशेष आर्थिक क्षेत्र और 02 मेगा फूड पार्क

सामाजिक केंद्र: 02 आकांक्षी जिले।

प्रमुख शहर/कस्बों का जुड़ाव बाराबंकी, रामनगर, जरवल, कैसरगंज, कुंडासर, फखरपुर और बहराईच
रोजगार सृजन क्षमता 36.54 लाख व्यक्ति-दिवस (प्रत्यक्ष) और 43.04 लाख व्यक्ति-दिवस (अप्रत्यक्ष)
वित्त वर्ष 28 में वार्षिक औसत दैनिक यातायात अनुमानित यात्री कार यूनिट 28,557 (पैकेज-1) और 21,270 (पैकेज-2) हैं।

 

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राष्ट्रीय कृषि बाजार (ई-एनएएम) ने 1,656 मंडियों को एकीकृत किया और अपनी स्थापना के बाद से अब तक 4.82 लाख करोड़ रुपये के व्यापार के साथ 1.80 करोड़ से अधिक किसानों को लाभान्वित किया है

सरकार ने 2016 से राष्ट्रीय कृषि बाजार (ई-एनएएम) की शुरुआत की है। यह एक ऑनलाइन ट्रेडिंग प्लैटफॉर्म है जो कृषि उत्पादों के पारदर्शी और प्रतिस्पर्धी ऑनलाइन व्यापार को सुविधाजनक बनाने के लिए विभिन्न राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों (यूटी) में स्थित वास्तविक थोक मंडियों को एकीकृत करता है। अपनी स्थापना के बाद से अब तक 23 राज्यों और 4 केंद्र शासित प्रदेशों की 1,656 मंडियों को ई-एनएएम पोर्टल पर शामिल किया गया है। ई-एनएएम प्लैटफॉर्म से एकीकृत मंडियों की राज्य/केंद्र शासित प्रदेशवार संख्या अनुलग्नक-I में दी गई है।

28 फरवरी, 2026 तक ई-एनएएम प्लैटफॉर्म पर 1.80 करोड़ किसान और 2.72 लाख व्यापारी पंजीकृत हो चुके हैं। ई-एनएएम पर 4,724 किसान उत्पादक संगठनों (एफपीओ) को भी शामिल किया गया है। ई-एनएएम पर शुरुआत से लेकर फरवरी 2026 तक व्यापार किए गए कृषि उत्पादों की कुल मात्रा 13.22 करोड़ मीट्रिक टन है और मूल्य 4,82,350 करोड़ रुपये है।

ई-एनएएम प्लैटफॉर्म किसानों को पारदर्शी ऑनलाइन बोली के माध्यम से खरीदारों के एक बड़े समूह को अपनी उपज बेचने में सक्षम बनाता है, जिससे उचित मूल्य निर्धारण और बेहतर मूल्य प्राप्ति में सुविधा होती है। यह मंच किसानों को राज्य और देश भर के खरीदारों तक पहुंच प्रदान करता है, जिससे प्रतिस्पर्धी कीमतों का पता लगाना और बिक्री से प्राप्त राशि को सीधे किसानों के बैंक खातों में स्थानांतरित करना संभव हो पाता है।

वर्तमान में राजस्थान में 134 ई-एनएएम मंडियां कृषि उत्पादों की गुणवत्ता जांच के लिए एआई-आधारित और एमएल-आधारित मशीनों का उपयोग कर रही हैं। इससे परीक्षण का समय काफी कम हो गया है, जिसके लिए भारत सरकार की ओर से ई-एनएएम योजना के तहत सहायता प्रदान की गई है।

ई-एनएएम योजना के तहत सरकार ई-एनएएम पोर्टल के साथ एकीकरण के लिए आवश्यक विपणन और संबद्ध बुनियादी ढांचे को मजबूत करने के लिए राज्यों को प्रति मंडी 75.00 लाख रुपये तक की अनुदान सहायता प्रदान करती है। इसमें गुणवत्ता जांच प्रयोगशालाएं, इलेक्ट्रॉनिक वजन सुविधाएं, कंप्यूटर, प्रिंटर, सफाई, ग्रेडिंग, पैकेजिंग सुविधाएं, सॉफ्टवेयर अवसंरचना और खाद इकाइयां आदि जैसी सुविधाएं शामिल हैं।

राजस्थान राज्य सहित राज्य/केंद्र शासित प्रदेशों के िहसाब से योजना के तहत किए गए व्यय और प्रगति की स्थिति का विवरण अनुलग्नक-II में दिया गया है।

अनुलग्नक-I

राज्य/केंद्र शासित प्रदेश के अनुसार ई-एनएएम प्लैटफॉर्म से एकीकृत मंडियों की संख्या

 

क्रम संख्या राज्य/संघ शासित प्रदेश ई-एनएएम प्लैटफॉर्म में एकीकृत मंडियों की संख्या
1 अंडमान व नोकोबार द्वीप समूह 1
2 आंध्र प्रदेश 33
3 असम 3
4 बिहार 20
5 चंडीगढ़ 1
6 छत्तीसगढ़ 21
7 गोवा 7
8 गुजरात 144
9 हरियाणा 114
10 हिमाचल प्रदेश 38
11 जम्मू और कश्मीर 17
12 झारखंड 19
13 कर्नाटक 5
14 केरल 6
15 मध्य प्रदेश 139
16 महाराष्ट्र 181
17 नगालैंड 19
18 ओडिशा 66
19 पुदुचेरी 4
20 पंजाब 156
21 राजस्थान 173
22 तमिलनाडु 213
23 तेलंगाना 57
24 त्रिपुरा 19
25 उत्तर प्रदेश 162
26 उत्तराखंड 20
27 पश्चिम बंगाल 18
  कुल 1,656

अनुलग्नक-II

राजस्थान राज्य सहित राष्ट्रीय कृषि बाजार (ई-नाम) योजना के तहत किए गए व्यय और प्रगति का राज्य/केंद्र शासित प्रदेश वार विवरण

अनुलग्नक-II

राजस्थान राज्य सहित राष्ट्रीय कृषि बाजार (ई-नाम) योजना के तहत किए गए व्यय और प्रगति का राज्य/केंद्र शासित प्रदेश वार विवरण

क्रम संख्या. राज्य/संघ शासित प्रदेश बाजारों की संख्या पंजीकृत किसान

(प्रारंभ से)

व्यापार की गई वस्तुओं की कुल मात्रा (मीट्रिक टन) बेची गई वस्तुओं का कुल मूल्य

(करोड़ रुपये में)

धनराशि जारी

(लाख रुपये में)

1 अंडमान व नोकोबार द्वीप समूह 1 4 0.01 0.00003 30
2 आंध्र प्रदेश 33 1454269 9709095.144 63416.08464 1970
3 असम 3 120 16.901 0.034606 90
4 बिहार 20 5273 3706.0974 15.42531 600
5 चंडीगढ़ 1 7109 830625.0134 1671.178963 30
6 छत्तीसगढ़ 21 136310 1586160.822 3372.542845 1050
7 गोवा 7 30 326.27495 2.144641 210
8 गुजरात 144 869922 3200730.849 12740.82758 4455
9 हरियाणा 114 2727271 38063266.94 123474.0866 4980
10 हिमाचल प्रदेश 38 125681 485667.2241 1871.202815 1455
11 जम्मू और कश्मीर 17 52189 290358.2339 1736.25543 699.34
12 झारखंड 19 268737 36206.77301 73.149486 1330
13 कर्नाटक 5 1577 280236.5281 2020.27787 150
14 केरल 6 3244 819.29753 2.684441 180
15 मध्य प्रदेश 139 3025294 11207445.93 37160.21086 6722
16 महाराष्ट्र 181 1247627 6207325.069 23067.3705 5048.2
17 नगालैंड 19 185 1272.29 5.616512 1425
18 ओडिशा 66 485056 2786326.257 7174.535604 3804.1
19 पुदुचेरी 4 13630 54942.55486 206.275105 60
20 पंजाब 156 217938 4650166.345 15042.69163 1815
21 राजस्थान 173 1554645 31638799.41 130772.6947 9882.77
22 तमिलनाडु 213 475472 3612035.769 9837.033745 9165.19
23 तेलंगाना 57 1823968 7965061.914 30164.30568 3751.5
24 त्रिपुरा 19 84 86.483 0.8202895 210
25 उत्तर प्रदेश 162 3305648 8376687.871 16558.70725 7520
26 उत्तराखंड 20 92407 1076653.294 1722.573073 1170
27 पश्चिम बंगाल 18 108186 119911.4636 242.077615 1167.38
  कुल 1656 18001876 132183930.8 482350.8077 68970.48

कृषि एवं किसान कल्याण राज्य मंत्री श्री भागीरथ चौधरी ने आज लोकसभा में लिखित जवाब में यह जानकारी दी।

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भारतीय रेलवे ने अतिक्रमण रोकने और सुरक्षित ट्रेन परिचालन सुनिश्चित करने के लिए सभी जोन में 16,398 किमी रेल पटरियों के किनारे सुरक्षा घेराबंदी (फेंसिंग) की

भारतीय रेलवे (आईआर) में ट्रेन संचालन की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाती है। एक महत्वपूर्ण सुरक्षा उपाय के रूप में, उन मार्गों पर जहाँ ट्रेनों की तय गति 110 किमी प्रति घंटे से अधिक है, साथ ही अन्य संवेदनशील स्थानों पर अतिक्रमण को रोकने और सुरक्षित ट्रेन संचालन सुनिश्चित करने के लिए सुरक्षा घेराबंदी (फेंसिंग) का प्रावधान किया गया है। इसके अलावा, मवेशियों, पैदल यात्रियों और छोटे वाहनों को रेलवे लाइन पार करने में सुविधा देने के लिए सुरक्षा फेंसिंग के साथ पैदल यात्री सबवे भी बनाए जा रहे हैं।

पूरे लोनावला-पुणे-दौंड मार्ग पर सुरक्षा घेराबंदी प्रदान करने के लिए ₹209.38 करोड़ की लागत का कार्य स्वीकृत किया गया है। इस कार्य में पैदल यात्री सबवे के साथ लगभग 290 किमी फेंसिंग का निर्माण शामिल है। खंड की पूरी लंबाई के लिए निविदा आवंटित कर दी गई है और अभी तक लगभग 150 किमी फेंसिंग का कार्य पूरा हो चुका है।

अब तक विभिन्न रेलवे जोनों में की गई सुरक्षा फेंसिंग का विवरण इस प्रकार है (किमी में):

क्षेत्रीय रेलवे लगाई गई बाड़ की लंबाई (किलोमीटर में)
केंद्रीय 966
पूर्वी 754
पूर्वी मध्य 730
पूर्वी तट 533
उत्तरी 736
उत्तर मध्य 2721
उत्तर पूर्वी 613
पूर्वोत्तर सीमा 153
उत्तर पश्चिमी 1539
दक्षिण 827
दक्षिण मध्य 2326
दक्षिण पूर्वी 209
दक्षिण पूर्व मध्य 365
दक्षिण पश्चिमी 255
वेस्टर्न 2257
पश्चिम मध्य 1415
कुल 16398

यह जानकारी केंद्रीय रेल मंत्री, सूचना एवं प्रसारण मंत्री और इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री अश्विनी वैष्णव ने आज लोकसभा में प्रश्नों का उत्तर देते हुए दी।

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राष्ट्रपति 19 से 21 मार्च तक उत्तर प्रदेश के दौरे पर रहेंगी

राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मु 19 से 21 मार्च, 2026 तक उत्तर प्रदेश के दौरे पर रहेंगी।

19 मार्च को राष्ट्रपति अयोध्या स्थित श्री राम जन्मभूमि मंदिर जाएंगी। वे राम जन्मभूमि मंदिर के विभिन्न स्थानों पर दर्शन और आरती करेंगी तथा श्री राम यंत्र स्थापना कार्यक्रम में उपस्थित रहेंगी।

20 मार्च को राष्ट्रपति वृंदावन में रामकृष्ण मिशन सेवाश्रम के नंद किशोर सोमानी ऑन्कोलॉजी ब्लॉक का उद्घाटन करेंगी।

21 मार्च को, दिल्ली लौटने से पहले राष्ट्रपति का गोवर्धन परिक्रमा का भी कार्यक्रम हैं।

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सीमावर्ती क्षेत्रों के गाँवों में दूरसंचार का विस्तार नए विकास प्रतिमान दर्शाता है: लोकसभा में केन्द्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य एम. सिंधिया

केन्‍द्रीय संचार तथा पूर्वोत्तर क्षेत्र विकास मंत्री, श्री ज्योतिरादित्य एम. सिंधिया ने आज लोकसभा को भारत के सीमावर्ती क्षेत्रों के गाँवों में मोबाइल कनेक्टिविटी के विस्तार में हुई महत्वपूर्ण प्रगति की जानकारी दी, और समावेशी डिजिटल अवसंरचना की दिशा में सरकार के निरंतर प्रयासों पर बल दिया।

सीमावर्ती क्षेत्रों के गाँवों में मोबाइल टावर कनेक्टिविटी से संबंधित एक प्रश्न के उत्तर में केन्‍द्रीय मंत्री ने बताया कि अंतरराष्ट्रीय सीमा की पहली बस्ती से 0 से 50 किलोमीटर के भीतर स्थित गाँवों को सीमावर्ती गाँव के रूप में वर्गीकृत किया जाता है। उन्होंने उल्लेख किया कि वाइब्रेंट विलेजेज प्रोग्राम के तहत इन बस्तियों को अब देश के “अंतिम गाँव” नहीं, बल्कि “प्रथम गाँव” माना जाता है, जो विकास प्राथमिकताओं में बदलाव को दर्शाता है।

केन्‍द्रीय मंत्री ने जोर देकर कहा कि प्रधानमंत्री नरेन्‍द्र मोदी के दूरदर्शी नेतृत्व में भारत ने दूरसंचार क्षेत्र में तकनीकी आत्मनिर्भरता का मार्ग अपनाया है। उन्होंने बताया कि बीएसएनएल के लिए स्वदेशी 4जी टेलीकॉम स्टैक का विकास महत्वपूर्ण दूरसंचार उपकरणों के घरेलू निर्माण की दिशा में एक रणनीतिक कदम है, जिससे भारत उन चुनिंदा देशों की श्रेणी में शामिल हो गया है जिनके पास ऐसी क्षमताएँ हैं।

बीएसएनएल के पुनरुद्धार का उल्लेख करते हुए केन्‍द्रीय मंत्री ने कहा कि इस सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम ने वित्त वर्ष 2024–25 के दौरान लगभग 18 वर्षों में तिमाही में पहली बार शुद्ध लाभ दर्ज किया है। इसके ग्राहक आधार में 8.55 करोड़ से बढ़कर 9.27 करोड़ तक वृद्धि हुई है, जो उपभोक्ताओं के नए विश्वास को दर्शाती है। उन्होंने आगे बताया कि 1,00,000 4जी टावर स्थापित किए जा चुके हैं और आगे विस्तार की योजना है, तथा 4जी नेटवर्क के स्थिर होने के बाद 5जी सेवाएँ शुरू की जाएंगी।

केन्‍द्रीय मंत्री ने यह भी जानकारी दी कि जिन आबाद गाँवों में अब तक मोबाइल कवरेज नहीं है, वहाँ दूरसंचार सेवा प्रदाताओं द्वारा उनकी तकनीकी और वाणिज्यिक व्यवहार्यता के आधार पर सेवा प्रदान की जा रही है। सरकार ने डिजिटल भारत निधि के माध्यम से वित्तीय सहायता प्रदान करते हुए ग्रामीण, दूरस्थ और सीमावर्ती क्षेत्रों, जिसमें राजस्थान भी शामिल है, में दूरसंचार कनेक्टिविटी के विस्तार के लिए अनेक योजनाओं को मंजूरी दी है।

उन्होंने बताया कि राजस्थान के सीमावर्ती क्षेत्रों में 97.28 प्रतिशत गाँवों और स्थानों पर पहले से ही मोबाइल कवरेज उपलब्ध है। इसके अलावा, सरकार ने देशभर में, विशेषकर सीमावर्ती क्षेत्रों में, मोबाइल कनेक्टिविटी को और मजबूत करने के लिए अनेक महत्वपूर्ण पहल शुरू की हैं।

इनमें दूरसंचार सेवा प्रदाताओं के लिए लाइसेंसिंग शर्तों में संशोधन शामिल है, ताकि अंतरराष्ट्रीय सीमाओं के पास मोबाइल टावर स्थापित करने पर लगी पाबंदियों को हटाया जा सके। इसके साथ ही, दूरसंचार कानून, 2023 के तहत अधिसूचित दूरसंचार (राइट ऑफ वे) नियम, 2024 को लागू किया गया है, जिससे दूरसंचार अवसंरचना के तेजी से और आसानी से विस्तार को संभव बनाया जा सके। गति शक्ति संचार पोर्टल भी शुरू किया गया है, ताकि किसी अन्‍य व्‍यक्ति की जमीन का उपयोग करने के कानूनी अधिकार की स्वीकृति प्रक्रिया को तेज किया जा सके।

उत्तराखंड में प्रगति को उजागर करते हुए श्री सिंधिया ने बताया कि पहचाने गए 705 सीमावर्ती गाँवों में से 684 को पहले ही दूरसंचार कनेक्टिविटी प्रदान की जा चुकी है। शेष गाँवों में भी कवरेज सुनिश्चित करने के लिए प्रयास जारी हैं, जिनमें डिजिटल भारत निधि योजना के तहत लक्षित हस्तक्षेप शामिल हैं।

श्री सिंधिया ने जोर देकर कहा कि आज भारत के पास विश्व के सबसे व्यापक दूरसंचार नेटवर्कों में से एक नेटवर्क है, जो यूपीआई और डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर जैसी बड़े पैमाने की डिजिटल सेवाओं को सक्षम बना रहा है। उन्होंने कहा कि किफायती, व्यापक और तेज़ तकनीकी अपनाने की वजह से भारत डिजिटल संचार के क्षेत्र में वैश्विक अग्रणी के रूप में उभरा है।

ग्रामीण ब्रॉडबैंड कनेक्टिविटी पर उन्होंने भारतनेट कार्यक्रम के तहत हुई प्रगति का उल्लेख करते हुए बताया कि 2,15,000 से अधिक ग्राम पंचायतों को पहले ही जोड़ा जा चुका है। लगभग 1.39 लाख करोड़ रुपये के परिव्यय के साथ विस्तारित भारतनेट पहल विश्व के सबसे बड़े कार्यक्रमों में से एक है। नेटवर्क को रिंग टोपोलॉजी में उन्नत किया जा रहा है, ताकि अधिकता और विश्वसनीयता सुनिश्चित की जा सके, साथ ही मांग-आधारित तरीके से अतिरिक्त गाँवों को भी जोड़ा जा रहा है। केन्‍द्रीय मंत्री ने जोर देकर यह भी कहा कि पिछले एक दशक में भारत की दूरसंचार क्रांति ने डेटा की लागत को लगभग 97 प्रतिशत तक कम कर दिया है, साथ ही मोबाइल अवसंरचना का व्यापक विस्तार किया है और देशभर में 5जी सेवाओं के तेज़ी से विस्तार को संभव बनाया है।

उन्होंने अंत में प्रधानमंत्री नरेन्‍द्र मोदी के नेतृत्व में सरकार की इस प्रतिबद्धता को दोहराया कि देश के सभी क्षेत्रों, विशेषकर सीमा और दूरस्थ इलाकों में अंतिम छोर तक कनेक्टिविटी सुनिश्चित की जाएगी, जिससे विकास और राष्ट्रीय सुरक्षा दोनों उद्देश्यों को आगे बढ़ाया जा सके।

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परमाणु ईंधन चक्र में स्वदेशी क्षमता में वृद्धि

भारत में यूरेनियम अयस्क के खनन और प्रसंस्करण के लिए अधिकृत परमाणु ऊर्जा विभाग (डीएई) के अधीन एक सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम (पीएसयू) यूरेनियम कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड (यूसीआईएल) ने यूरेनियम खनन की स्वदेशी क्षमता को बढ़ाने के लिए पहल की है। यूरेनियम कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड ने विकसित भारत-2047 के विजन के अनुरूप नई यूरेनियम खनन परियोजनाओं को शुरू करने की योजना बनाई है। राजस्थान के सीकर जिले के रोहिल में 2,500 टन प्रति दिन की क्षमता वाली खदान और मिल स्थापित करने तथा छत्तीसगढ़ के जाजवाल यूरेनियम परियोजना में एक और खदान और मिल स्थापित करने की पहल की है, जो वैधानिक मंजूरी प्राप्त करने के विभिन्न चरणों में हैं।

परमाणु ऊर्जा विभाग के अंतर्गत आने वाली परमाणु ईंधन परिसर (एनएफसी) परमाणु न्यूक्लियर पॉवर कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड (एनपीसीआईएल) के लिए स्वदेशी रूप से ईंधन असेंबली का निर्माण करती है। न्यूक्लियर पॉवर कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड यूरेनियम को कच्चे माल के रूप में उपयोग करके प्रेशराइज्ड हेवी वाटर रिएक्टर (पीएचडब्ल्यूआर) और बॉइलिंग वाटर रिएक्टर (बीडब्ल्यूआर) संचालित करता है, जिसकी आपूर्ति यूसीआईएल से की जाती है और आयात भी किया जाता है। एनएफसी ने एनपीसीआईएल के रिएक्टर तैनाती कार्यक्रम और यूसीआईएल से प्राप्त आपूर्ति के अनुसार समय-समय पर अपनी ईंधन उत्पादन क्षमता को बढ़ाने के लिए पहल की है।

भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र (बीएआरसी), परमाणु ऊर्जा विभाग के अनुसंधान एवं विकास इकाई और परमाणु पुनर्चक्रण बोर्ड (एनआरबी) तारापुर स्थित एकीकृत परमाणु पुनर्चक्रण संयंत्र (आईएनआरपी) तथा कल्पक्कम स्थित तीव्र रिएक्टर ईंधन चक्र सुविधा (एफआरएफसीएफ) में घरेलू स्रोतों से प्राप्त प्रयुक्त ईंधन के पुनर्चक्रण और अपशिष्ट प्रबंधन तथा तीव्र रिएक्टरों के लिए ईंधन निर्माण हेतु उच्च क्षमता वाली एकीकृत परमाणु पुनर्चक्रण सुविधाओं का निर्माण कर रहे हैं। इन सुविधाओं से देश में ईंधन निर्माण और अपशिष्ट प्रबंधन की स्वदेशी क्षमता में वृद्धि होने की उम्मीद है।

खनन और ईंधन निर्माण क्षेत्रों में की गई पहलों और एकीकृत परमाणु सुविधाओं के चालू होने से प्रेशराइज्ड हेवी वाटर रिएक्टर के लिए ईंधन का उत्पादन बढ़ेगा और फास्ट ब्रीडर रिएक्टरों के लिए मिश्रित ऑक्साइड (एमओएक्स) ईंधन की निरंतर उपलब्धता सुनिश्चित होगी। तारापुर और कलपक्कम में स्थित परमाणु पुनर्चक्रण सुविधाओं के अंतर्गत नए ईंधन निर्माण संयंत्र फास्ट रिएक्टरों के लिए ईंधन की उपलब्धता सुनिश्चित करेंगे।

केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी (स्वतंत्र प्रभार) एवं पृथ्वी विज्ञान राज्य मंत्री प्रधानमंत्री कार्यालय, कार्मिक, लोक शिकायत एवं पेंशन, परमाणु ऊर्जा एवं अंतरिक्ष राज्य मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने बुधवार को लोकसभा में लिखित उत्तर में यह जानकारी दी।

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केन्द्रीय मंत्रिमंडल ने कपास किसानों को प्रत्यक्ष सहायता प्रदान करने के लिए 2023-24 के कपास सीजन के लिए सीसीआई को 1,718.56 करोड़ रुपये के एमएसपी वित्त पोषण को मंजूरी दी

किसान कल्याण को सुदृढ़ करने और आत्मनिर्भर भारत के विजन को आगे बढ़ाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए, प्रधानमंत्री नरेन्‍द्र मोदी की अध्यक्षता वाली आर्थिक मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति ने कपास के 2023-24 सीजन के लिए भारतीय कपास निगम (सीसीआई) को न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) के रूप में 1,718.56 करोड़ रुपये की धनराशि स्वीकृत की है। इस धनराशि का उद्देश्य देश भर के कपास किसानों को प्रत्यक्ष मूल्य सहायता प्रदान करना है।

कपास किसानों के हितों, विशेष रूप से उन अवधियों में जब बाजार मूल्य एमएसपी से नीचे आ जाते हैं, की रक्षा के लिए एमएसपी (न्यूनतम समर्थन मूल्य) अभियान चलाए जाते हैं। ये उपाय कपास की कीमतों को स्थिर करने, विवशतापूर्ण बिक्री रोकने और किसानों को लाभकारी रिटर्न सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। कृषि बाजारों में समावेशिता बढ़ाकर, एमएसपी प्रचालन कपास उत्पादक समुदायों की आर्थिक सुरक्षा में महत्वपूर्ण योगदान देते हैं।

कपास भारत की सबसे महत्वपूर्ण नकदी फसलों में से एक है, जो लगभग 60 लाख किसानों की आजीविका को बनाए रखती है और प्रसंस्करण, व्यापार और वस्त्र उद्योग सहित संबद्ध कार्यकलापों में लगे 400-500 लाख लोगों की सहायता करती है।

2023-24 के कपास सीजन के दौरान, अनुमानित कपास की खेती का क्षेत्रफल 114.47 लाख हेक्टेयर था, जिसमें 325.22 लाख गांठ का उत्पादन होने का अनुमान था, जो वैश्विक कपास उत्पादन का लगभग 25 प्रतिशत था। भारत सरकार कृषि लागत और मूल्य आयोग (सीएसीपी) की अनुशंसाओं के आधार पर सीड कॉटन (कपास) के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) निर्धारित करती है।

सरकार ने कपास में न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) प्रचालन के लिए भारतीय कपास निगम (सीसीआई) को केंद्रीय नोडल एजेंसी के रूप में नामित किया है। सीसीआई बाजार मूल्य एमएसपी स्तर से नीचे आने पर किसानों से उचित औसत गुणवत्ता (एफएक्यू) वाली सभी कपास की खरीद बिना किसी मात्रा सीमा के करती है, जिससे किसानों को एक सुनिश्चित सुरक्षा कवच मिलता है।

अपनी तैयारियों के तहत, सीसीआई ने कपास उत्पादक सभी 11 प्रमुख राज्यों में एक मजबूत खरीद नेटवर्क स्थापित किया है, जिसमें 152 जिलों में 508 से अधिक खरीद केंद्र कार्यरत हैं। ये  किसानों के लिए निर्बाध और सुलभ खरीद सुनिश्चित करते हैं।

इसके अतिरिक्‍त, सीसीआई ने एमएसपी प्रचालनों की दक्षता और पारदर्शिता बढ़ाने के लिए कई प्रौद्योगिकी-आधारित और किसान-केंद्रित पहल की हैं। इनमें एमएसपी से संबंधित जानकारी का प्रसार, गांठ पहचान और पता लगाने की प्रणाली (बीआईटीएस) का कार्यान्वयन और “कॉट-एली” मोबाइल ऐप का लॉन्‍च शामिल है, जो किसानों तक बेहतर पहुंच और सेवा वितरण में सक्षम बनाता है।

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दयानंद गर्ल्स पी जी कॉलेज द्वारा नशा मुक्ति जागरूकता कार्यक्रम आयोजित

भारतीय स्वरूप संवाददाता कानपुर 19 मार्च दयानंद गर्ल्स पी.जी. कॉलेज, कानपुर में राष्ट्रीय सेवा योजना (NSS) तथा नशा मुक्ति समिति के संयुक्त तत्वावधान में नशा मुक्ति जागरूकता हेतु एक सेमिनार एवं रैली का सफल आयोजन किया गया। कार्यक्रम का उद्देश्य छात्राओं को नशे के दुष्परिणामों के प्रति जागरूक करना तथा उन्हें स्वस्थ एवं सकारात्मक जीवन शैली के लिए प्रेरित करना था।
*सेमिनार / कार्यशाला* के अंतर्गत छात्राओं को नशा मुक्ति के प्रति सचेत रहने हेतु व्याख्यान एवं काउंसलिंग प्रदान की गई। कार्यक्रम में मुख्य वक्ता डॉ. शिप्रा श्रीवास्तव एवं अपूर्वा बाजपेई ने नशे से होने वाले शारीरिक, मानसिक एवं सामाजिक दुष्परिणामों पर विस्तारपूर्वक प्रकाश डाला। इसी क्रम में विमला देवी तथा श्वेता गोंड ने छात्राओं को नशे की लत से दूर रहने के लिए प्रेरित करते हुए महत्वपूर्ण विचार प्रस्तुत किए।
कार्यक्रम के अंतर्गत छात्राओं द्वारा एक *‘Say no to Drugs’ जागरूकता रैली* भी निकाली गई, जिसे प्राचार्या द्वारा हरी झंडी दिखाकर रवाना किया गया। रैली के माध्यम से समाज को यह संदेश दिया गया कि नशा व्यक्ति, समाज एवं राष्ट्र—तीनों के लिए अत्यंत हानिकारक है। छात्राओं ने “Say No to Drugs”, “तंबाकू को ना कहें”, “सिगरेट को ना कहें”, “पान मसाले को ना कहें” जैसे प्रभावी नारों के माध्यम से जन-जागरूकता का प्रयास किया।
इसके अतिरिक्त छात्राओं ने *रंगोली एवं पोस्टर* के माध्यम से नशे के दुष्परिणामों को सृजनात्मक रूप में प्रस्तुत किया, जिसका निर्देशन पूजा श्रीवास्तव द्वारा किया गया।
इस कार्यक्रम के सफल आयोजन में महाविद्यालय की प्राचार्या प्रो. वंदना निगम एवं सेल्फ फाइनेंस की निदेशक प्रो. अर्चना वर्मा का पूर्ण सहयोग एवं मार्गदर्शन प्राप्त हुआ। कार्यक्रम को सफल बनाने में डॉ. अंजना श्रीवास्तव, डॉ. सुषमा शर्मा, डॉ. साधना सिंह, पूजा श्रीवास्तव, डॉ. ज्योत्सना पांडे, डॉ. पारुल त्रिवेदी तथा कार्यालय अधीक्षक कृष्णेंद्र श्रीवास्तव तथा समस्त छात्राओं का सराहनीय योगदान रहा।

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क्राइस्ट चर्च कॉलेज में ‘रिसर्च प्रोजेक्ट एवं मेथडोलॉजी’ पर दो दिवसीय कार्यशाला आयोजित

भारतीय स्वरूप संवाददाता कानपुर क्राइस्ट चर्च कॉलेज, कानपुर के राजनीति विज्ञान एवं समाजशास्त्र विभाग द्वारा “रिसर्च प्रोजेक्ट एवं मेथडोलॉजी” विषय पर 11–12 मार्च 2026 को सरवेपल्ली राधाकृष्णन कॉलेज ऑडिटोरियम में दो दिवसीय कार्यशाला का आयोजन किया जा रहा है। इस कार्यशाला का उद्देश्य समाज शास्त्र एवं वाणिज्य विभाग के स्नातक एवं स्नातकोत्तर विद्यार्थियों में शोध कौशल को विकसित करना था।कार्यक्रम का शुभारंभ अतिथियों एवं प्रतिभागियों के स्वागत के साथ हुआ। कार्यक्रम की अध्यक्षता कॉलेज के प्राचार्य एवं संरक्षक प्रो. विनय जे. सेबेस्टियन ने की। अपने अध्यक्षीय संबोधन में उन्होंने उच्च शिक्षा में शोध के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि विद्यार्थियों को शोध परियोजना तैयार करते समय वैज्ञानिक एवं विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण अपनाना चाहिए। उन्होंने विद्यार्थियों को ऐसे अकादमिक आयोजनों से अधिकतम लाभ उठाने के लिए प्रेरित किया।कार्यक्रम के प्रथम दिन के पहले शैक्षणिक सत्र में मुख्य अतिथि प्रो. ए. के. शर्मा (पूर्व विभागाध्यक्ष, एचएसएस विभाग, आईआईटी कानपुर) ने “सामाजिक विज्ञान में शोध कैसे करें” विषय पर व्याख्यान दिया। अपने वक्तव्य में उन्होंने शोध समस्या की पहचान, शोध प्रश्नों का निर्माण, परिकल्पना निर्माण तथा उपयुक्त शोध पद्धति के चयन जैसे महत्वपूर्ण पहलुओं पर विस्तार से चर्चा की। उन्होंने शोध कार्य में नैतिकता और शैक्षणिक ईमानदारी के महत्व को भी रेखांकित किया।

इसके बाद विशिष्ट अतिथि प्रो. अशुतोष सक्सेना (पूर्व विभागाध्यक्ष, राजनीति विज्ञान विभाग, क्राइस्ट चर्च कॉलेज) ने “रिसर्च प्रोजेक्ट निर्माण की कला और विज्ञान: सामाजिक विज्ञान के यूजी एवं पीजी विद्यार्थियों के लिए चरणबद्ध मार्गदर्शिका” विषय पर व्याख्यान दिया। उन्होंने विद्यार्थियों को शोध विषय चयन, डेटा संग्रहण, अध्यायों की संरचना तथा शोध निष्कर्षों की प्रस्तुति के बारे में व्यावहारिक मार्गदर्शन प्रदान किया। साथ ही उन्होंने शोध कार्य की गुणवत्ता को बेहतर बनाने के लिए योजनाबद्ध अध्ययन और आलोचनात्मक विश्लेषण की आवश्यकता पर बल दिया।

दोनों सत्र अत्यंत संवादात्मक और ज्ञानवर्धक रहे। विद्यार्थियों ने शोध पद्धति, विषय चयन, डेटा संग्रहण तथा परियोजना लेखन से संबंधित अनेक प्रश्न पूछे, जिनका विशेषज्ञों ने विस्तार से उत्तर दिया।

कार्यक्रम के प्रो. विभा दीक्षित ने कार्यक्रम का सफल संचालन किया और संयोजक डॉ. संजय शुक्ला धन्यवाद् ज्ञापन प्रस्तुत किया । कार्यक्रम के सहसंयोजक डॉ. प्रवीण के. सिंह, डॉ. मनीषी त्रिवेदी, डॉ. अर्चना वर्मा एवं डॉ. अर्चना पाण्डेय ने कार्यक्रम के सफल आयोजन में अपना योगदान दिया.

कार्यशाला में बड़ी संख्या में विद्यार्थियों और शिक्षकों ने भाग लिया तथा इसे विद्यार्थियों के लिए शोध की दिशा में एक महत्वपूर्ण और उपयोगी पहल बताया गया। कार्यशाला का दूसरा दिन 12 मार्च को शोध सिनॉप्सिस तथा प्रभावी शोध परियोजना लेखन पर केंद्रित सत्रों के साथ आयोजित किया जाएगा।

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