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सिनेमाटोग्राफ (संशोधन) अधिनियम और आईटी ढांचा पायरेसी विरोधी प्रवर्तन को मजबूत करते हैं। 4,996 टेलीग्राम चैनलों और 1,263 वेबसाइटों सहित 7,393 यूआरएल निष्क्रिय किए गए।

सरकार ने सिनेमाई फिल्मों की ऑनलाइन पायरेसी से निपटने के लिए कानूनी और संस्थागत ढांचे को मजबूत किया है। जिसमें टेलीग्राम के माध्यम से फिल्मों का अनधिकृत प्रसार भी शामिल है। सिनेमाई अधिनियम, 1952 को सिनेमाई (संशोधन) अधिनियम, 2023 के माध्यम से संशोधित किया गया ताकि फिल्मों की अनधिकृत रिकॉर्डिंग और प्रदर्शन पर अंकुश लगाने के लिए विशिष्ट प्रावधान शामिल किए जा सकें। नवगठित धारा 7(1ख)(ii) सरकार को सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 की धारा 79(3) के अंतर्गत पायरेटेड सामग्री होस्ट करने वाले मध्यस्थों के खिलाफ कार्रवाई करने का अधिकार देती है।

सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 की धारा 79(3)(ख) के अंतर्गत उपयुक्त सरकारों द्वारा मध्यस्थों को अवैध सामग्री को हटाने/उस तक पहुंच को अक्षम करने के लिए अधिसूचना जारी करने का प्रावधान है। सूचना प्रौद्योगिकी नियम, 2021 के अंतर्गत, मध्यस्थों को किसी भी ऐसी सामग्री को हटाना अनिवार्य है जो उस समय लागू किसी भी कानून का उल्लंघन करती हो, जैसे ही उन्हें न्यायालय के आदेश या उपयुक्त सरकार या उसकी अधिकृत एजेंसी द्वारा जारी नोटिस के माध्यम से इसकी जानकारी प्राप्त होती है।

फिल्मों की पायरेसी से संबंधित शिकायतें प्राप्त होने पर, मंत्रालय मध्यस्थों को अधिसूचना जारी कर उन्हें उल्लंघनकारी सामग्री को तुरंत हटाने या उस तक पहुंच को अक्षम करने का निर्देश देता है। सरकार ने सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के संयुक्त सचिव (फिल्म) को सूचना प्रौद्योगिकी नियम, 2021 और सिनेमैटोग्राफ अधिनियम, 1952 के अंतर्गत मध्यस्थों को सामग्री हटाने के नोटिस जारी करने के लिए अधिकृत किया है। सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय में एक संस्थागत तंत्र भी स्थापित किया गया है, जिसके तहत इंटरनेट पर उपलब्ध फिल्मों की पायरेटेड प्रतियों के संबंध में कॉपीराइट धारकों से शिकायतें प्राप्त की जाती हैं और मध्यस्थों को ऐसी सामग्री तक पहुंच को अक्षम करने के लिए अधिसूचना जारी की जाती है।

पायरेसी विरोधी कार्रवाई

कानून के उपर्युक्त प्रावधानों के अनुसार, मध्यस्थों को फिल्म पायरेसी के लिए 1,263 वेबसाइटों और 4,996 टेलीग्राम चैनलों सहित 7,393 यूआरएल को निष्क्रिय करने का निर्देश दिया गया है।

यह जानकारी सूचना एवं प्रसारण एवं संसदीय कार्य राज्य मंत्री डॉ. एल. मुरुगन ने आज लोकसभा में श्री बालाशौरी वल्लभनेनी द्वारा पूछे गए एक प्रश्न के लिखित उत्तर में प्रदान की।

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देश में संचालित फर्जी विश्वविद्यालय

शिक्षा समवर्ती सूची में है, और भारत में शिक्षा के विकास के लिए केंद्र सरकार तथा राज्य सरकारें दोनों मिलकर काम करती हैं। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग(यूजीसी) समय-समय पर भारत में फर्जी विश्वविद्यालयों की सूची प्रकाशित करता है। फरवरी 2026 में प्रकाशित नवीनतम सूची के अनुसार, 32 संस्थानों की पहचान फर्जी विश्वविद्यालयों के रूप में की गई है।

इन फर्जी विश्वविद्यालयों की सूची विश्वविद्यालय अनुदान आयोग(यूजीसी) की वेबसाइट पर उपलब्ध है:

https://www.ugc.gov.in/universitydetails/Fakeuniversity.

इन स्वयं को विश्वविद्यालय घोषित करने वाले अथवा फर्जी विश्वविद्यालयों के संबंध में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग(यूजीसी) द्वारा निम्नलिखित कार्रवाई की गई है:

  1. फर्जी संस्थानों को स्पष्टीकरण/अनुपालन पत्र/कारण बताओ/चेतावनी नोटिस जारी किया गया।
  2. ऐसे स्वघोषित(फर्जी) संस्थानों के प्रति छात्रों और आम जनता को आगाह करने के लिए यूजीसी की वेबसाइट पर सार्वजनिक सूचनाएं जारी की गई।
  3. संबंधित राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों के मुख्य सचिवों, शिक्षा सचिवों तथा प्रधान सचिवों को पत्र भेजकर ऐसे स्वघोषित फर्जी विश्वविद्यालयों/संस्थानों के विरुद्ध उचित कार्रवाई करने तथा विश्वविद्यालय अनुदान आयोग अधिनियम, 1956 का उल्लंघन कर संचालित हो रहे इन संस्थानों के विरुद्ध प्रथम सूचना रिपोर्ट(एफआईआर) दर्ज कराने का अनुरोध किया गया है।

इसके अलावा, केंद्र सरकार ने सभी राज्य सरकारों और केंद्र शासित प्रदेश(यूटी) प्रशासनों के मुख्य सचिवों से अनुरोध किया है कि वे इन संस्थानों को बंद करने के लिए कानूनी कार्रवाई करें, और खुद को “विश्वविद्यालय” के रूप में गलत तरीके से पेश करके, डिग्रियां बांटकर और अपने नाम के साथ “विश्वविद्यालय” शब्द का उपयोग करके छात्रों को ठगने और धोखा देने में शामिल लोगों के खिलाफ उचित कार्रवाई करें। उनसे यह भी अनुरोध किया गया कि वे अपने राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों में चल रहे किसी भी अन्य फर्जी विश्वविद्यालय के बारे में केंद्र सरकार/यूजीसी को सूचित करें जो यूजीसी की फर्जी विश्वविद्यालयों की सूची में शामिल नहीं भी हैं।  यह जानकारी शिक्षा राज्य मंत्री डॉ. सुकांता मजूमदार ने आज राज्यसभा में एक लिखित उत्तर में दी।

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रेप्को बैंक ने आज नई दिल्ली में केन्द्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह को 22.90 करोड रुपये का लाभांश चेक भेंट किया

रेप्को बैंक ने आज नई दिल्ली में केन्द्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री  अमित शाह को वित्तीय वर्ष 2025-26 के लिए भारत सरकार द्वारा धारित ₹76.32 करोड़ की शेयर पूंजी पर 30% की दर से लाभांश के रूप में ₹22.90 करोड़ का लाभांश चेक भेंट किया। श्री अमित शाह ने रेप्को बैंक के चेयरमैन श्री ई. संथानम, बैंक के डायरेक्टर और रेपको होम फाइनेंस लिमिटेड के चेयरमैन श्री सी. थंगाराजू और मैनेजिंग डायरेक्टर श्री ओ.एम. गोकुल से चेक प्राप्त किया।

X प्लेटफॉर्म पर एक पोस्ट में श्री अमित शाह ने कहा कि वित्तीय वर्ष 2025-26 में ₹169 करोड़ का शुद्ध लाभ अर्जित कर सहकारी बैंकिंग में मिसाल कायम करने के लिए रेप्को बैंक प्रबंधन को बधाई। उन्होंने कहा कि यह बैंक के इतिहास में अब तक का सबसे ज़्यादा लाभ है। गृह मंत्रालय के अधिकार क्षेत्र में आने वाले इस बैंक की सफलता इसके पेशेवर और बेहतरीन कामकाज का सबूत है। रेप्को बैंक के मैनेजमेंट और स्टाफ़ को शुभकामनाएँ।

इस अवसर पर केन्द्रीय गृह सचिव श्री गोविंद मोहन, सचिव (सीमा प्रबंधन और एफ.एफ.आर) डॉ. राजेंद्र कुमार, संयुक्त सचिव (एफ.एफ.आर. डिवीजन) श्री गया प्रसाद और संयुक्त सचिव (आर.एच.एस) श्री मक्खन लाल मीणा उपस्थित थे।

बैंक ने वित्त वर्ष 2025-26 के दौरान ₹169 करोड़ का शुद्ध लाभ अर्जित किया है जो बैंक के इतिहास में अब तक का सबसे अधिक है। बैंक पिछले तीन दशकों से लगातार लाभ अर्जित कर शेयरधारकों को लाभांश दे रहा है। 30.06.2026 की स्थिति के अनुसार बैंक का बिजनेस मिक्स 26,000 करोड़ रुपये से अधिक हो गया है।

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सुरक्षा संबंधी बुनियादी ढांचा और वामपंथी उग्रवाद से प्रभावित क्षेत्रों में विकास

भारत के संविधान की सातवीं अनुसूची के अनुसार, पुलिस और लोक व्यवस्था के विषय राज्य सरकारों के अधिकार क्षेत्र में आते हैं। हालाकि, भारत सरकार वामपंथी उग्रवाद (एलडब्ल्यूई) से प्रभावित रहे राज्यों के प्रयासों में सहायता करती रही है। एलडब्ल्यूई के खतरे से समग्र रूप से निपटने हेतु, 2015 में “एलडब्ल्यूई से निपटने हेतु राष्ट्रीय नीति एवं कार्य योजना” को मंज़ूरी दी गई थी और इसमें ‘संपूर्ण सरकार’ वाले दृष्टिकोण पर जोर दिया गया था। इसमें सुरक्षा संबंधी उपाय, विकास के कदम और स्थानीय समुदायों के अधिकारों व सुविधाओं को सुनिश्चित करने जैसी विविध प्रकार की रणनीतियां शामिल हैं। इस नीति के दृढ़ कार्यान्वयन के परिणामस्वरूप देश से वामपंथी उग्रवाद का उन्मूलन हुआ है।

लगभग छह दशकों की हिंसा के बाद, देश वामपंथी उग्रवाद से मुक्त हो गया है। वामपंथी उग्रवाद को कभी देश की आंतरिक सुरक्षा के सबसे बड़े खतरों में से एक माना जाता था। यह सफलता “वामपंथी उग्रवाद से निपटने हेतु राष्ट्रीय नीति एवं कार्य योजना” 2015 को दृढ़ता  से कार्यान्वित करने और केन्द्र व राज्य सरकारों के समन्वित प्रयासों से हासिल हुई है। वर्तमान में, छत्तीसगढ़ या किसी अन्य राज्य का कोई भी जिला वामपंथी उग्रवाद से प्रभावित नहीं है। अभी देश के 38 जिलों (जिनमें छत्तीसगढ़ के 13 जिले शामिल हैं) को ‘विरासत एवं जोर (लिगेसी एंड थ्रस्ट)’ वाले जिलों की श्रेणी में रखा गया है। ये जिले अब वामपंथी उग्रवाद से प्रभावित नहीं हैं, लेकिन स्थिति को सुदृढ़ बनाए रखने तथा इनके दोबारा उग्रवाद की चपेट में आने की किसी भी संभावना को रोकने हेतु सुरक्षा एवं विकास के उपायों के तहत कुछ और समय तक निरंतर सहयोग जारी रखने की आवश्यकता है।

सरकार ने जनजातीय और दूर-दराज के इलाकों में विकास पर ध्यान देकर नक्सलवाद की जड़ पर प्रहार किया है। बेहतर कानून एवं व्यवस्था और बुनियादी ढांचे में निवेश ने आर्थिक विकास को बढ़ावा देने वाला माहौल बनाया है, जिससे सरकारी और निजी निवेश में भी बढ़ोतरी हुई है।

विकास के मोर्चे पर, भारत सरकार की प्रमुख योजनाओं के अलावा, पूर्व में वामपंथी उग्रवाद (एलडब्ल्यूई) से प्रभावित रहे छत्तीसगढ़ के विभिन्न इलाकों में कई खास पहल की गई हैं। इन पहलों में सड़कों के नेटवर्क के विस्तार, दूरसंचार कनेक्टिविटी को बेहतर बनाने, शिक्षा, कौशल विकास और वित्तीय समावेशन पर विशेष जोर दिया गया है। छत्तीसगढ़ में विकास के मोर्चे पर की गई कुछ पहलों का विवरण इस प्रकार है:

  • सड़कों के नेटवर्क के विस्तार हेतु, वामपंथी उग्रवाद से प्रभावित क्षेत्रों के लिए दो खास योजनाओं – सड़क आवश्यकता योजना (आरआरपी) और वामपंथी उग्रवाद से प्रभावित क्षेत्रों के लिए सड़क कनेक्टिविटी परियोजना (आरसीपीएलडब्ल्यूईए) – के तहत 4,314 किलोमीटर लंबी सड़कें बनाई गई हैं। इसके अलावा, भारत सरकार ने पूर्व में वामपंथी उग्रवाद से प्रभावित रहे छत्तीसगढ़ राज्य के विभिन्न इलाकों में सीमा सड़क संगठन (बीआरओ) द्वारा 127.08 किलोमीटर महत्वपूर्ण सड़कों और 06 महत्वपूर्ण पुलों के निर्माण को भी मंजूरी दी है।
  •  दूरसंचार कनेक्टिविटी को बेहतर बनाने हेतु, कुल 1511 टावर लगाए गए हैं।
  • कौशल विकास हेतु, कुल 09 औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थान (आईटीआई) और 14 कौशल विकास केन्द्र (एसडीसी) खोले गए हैं।
  • जनजातीय इलाकों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के लिए 45 एकलव्य मॉडल आवासीय स्कूल (ईएमआरएस) शुरू किए गए हैं।
  • वित्तीय समावेशन हेतु, डाक विभाग ने बैंकिंग सेवाओं से लैस 1,508 डाकघर खोले हैं। साथ ही, 413 बैंक शाखाएं और 269 एटीएम भी खोले गए हैं।
  • छत्तीसगढ़ के बस्तर इलाके में स्वास्थ्य सेवा से जुड़ी सुविधाओं तक पहुंच बेहतर बनाने हेतु, प्रधानमंत्री स्वास्थ्य सुरक्षा योजना (पीएमएसएसवाई) के तहत जगदलपुर के सरकारी मेडिकल कॉलेज में 240 बिस्तरों वाला सुपर स्पेशलिटी अस्पताल शुरू किया गया है। इस सुविधा से बस्तर के लोगों के लिए स्वास्थ्य संबंधी सेवाएं अब और अधिक सुलभ हो गई हैं, जिससे मरीजो को इलाज के लिए दूर के शहरों में जाने की जरूरत कम हो गई है।
  • स्थानीय समुदायों के अधिकारों और हक को सुनिश्चित करने हेतु, लाभार्थियों को 5,34,068 मालिकाना हक के दस्तावेज (टाइटल डीड) वितरित किए गए हैं। इनमें 4,81,432 व्यक्तिगत और 52,636 सामुदायिक मालिकाना हक के दस्तावेज शामिल हैं। छत्तीसगढ़ समेत पूर्व में वामपंथी उग्रवाद से प्रभावित इलाकों में स्थानीय स्व-शासन को और सुदृढ़ करने हेतु, गृह मंत्रालय पंचायती राज मंत्रालय के साथ मिलकर एक संयुक्त योजना बना रहा है। ये कदम वामपंथी उग्रवाद से मुक्त हुए इलाकों में सामुदायिक अधिकारों को मजबूत करने और भागीदारी वाली शासन व्यवस्था को बेहतर बनाने के प्रति सरकार की प्रतिबद्धता को दर्शाते हैं।

गृह मंत्रालय ने छत्तीसगढ़ के पूर्व में वामपंथी उग्रवाद से प्रभावित रहे सात जिलों में एक स्वतंत्र एजेंसी के जरिए एक सर्वेक्षण कराया है। इस सर्वेक्षण का उद्देश्य विभिन्न सरकारी कल्याणकारी योजनाओं एवं विकासात्मक पहलों के कवरेज के स्तर और आजीविका के सृजन की संभावनाओं का आकलन करना था। इस सर्वेक्षण में शिक्षा के स्तर, स्वास्थ्य संबंधी संकेतकों और प्राथमिक विद्यालयों, आंगनवाड़ी केन्द्रों एवं द्वितीयक स्वास्थ्य सुविधाओं जैसी बुनियादी सेवाओं की उपलब्धता की जानकारी एकत्रित की गई है। इस सर्वेक्षण से प्राप्त जानकारी केन्द्रीय गृह मंत्रालय और राज्य सरकार को विकास संबंधी अंतर को कम करने तथा आजीविका सुनिश्चित करने के लक्ष्य को पूरा करने में मदद कर रही है।

युवाओं और स्थानीय समुदायों को रचनात्मक तरीके से जोड़ने हेतु, भारत सरकार ‘ट्राइबल यूथ एक्सचेंज प्रोग्राम (टीवाईईपी)’ चलाती है। इस कार्यक्रम के तहत, छत्तीसगढ़ समेत पूर्व में वामपंथी उग्रवाद से प्रभावित रहे इलाकों के जनजातीय समुदाय के युवाओं को देश के विभिन्न  हिस्सों में एक सप्ताह के जानकारी बढ़ाने वाले दौरे (एक्सपोजर विजिट) पर ले जाया जाता है। यह कार्यक्रम उन्हें अलग-अलग इलाकों एवं पृष्ठभूमि के लोगों से मिलने-जुलने का मौका देता है। इससे राष्ट्रीय एकता को बढ़ावा मिलता है, भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विविधता के बारे में जागरूकता बढ़ती है और देश की औद्योगिक व विकासात्मक प्रगति की जानकारी मिलती है। वर्ष 2014 से अब तक छत्तीसगढ़ समेत पूर्व में वामपंथी उग्रवाद से प्रभावित रहे राज्यों के कुल 37,655 जनजातीय युवाओं ने टीवाईईपी में हिस्सा लिया है।

इसके अलावा, ‘सिविक एक्शन प्रोग्राम’ के तहत, भारत सरकार छत्तीसगढ़ समेत पूर्व में वामपंथी उग्रवाद से प्रभावित रहे इलाकों में तैनात केन्द्रीय सशस्त्र पुलिस बलों (सीएपीएफ) को फंड देती है। इस फंड का सदुपयोग वे अपने अभियान वाले इलाकों में स्वास्थ्य शिविर लगाने, खेल प्रतियोगिताएं आयोजित करने और स्थानीय समुदायों के बीच आवश्यक सामग्रियां वितरित करने जैसी विभिन्न कल्याणकारी गतिविधियों में करते हैं। इससे सुरक्षा बलों और स्थानीय लोगों के बीच की दूरी कम करने में बहुत मदद मिली है। वर्ष 2014 से अब तक, इस योजना  के तहत छत्तीसगढ़ समेत पूर्व में वामपंथी उग्रवाद से प्रभावित रहे इलाकों में तैनात सीएपीएफ को कुल 221.88 करोड़ रुपये का फंड जारी किया गया है।

सुरक्षा के मोर्चे पर, भारत सरकार पूर्व में वामपंथी उग्रवाद से प्रभावित रहे राज्यों की सरकारों की सहायता करती है। इसके लिए वह केन्द्रीय सशस्त्र पुलिस बल और इंडिया रिजर्व बटालियन उपलब्ध कराती है, हेलीकॉप्टर की सहायता देती है, सुरक्षा शिविरों के बुनियादी ढांचे को सुदृढ़ करती है, प्रशिक्षण देती है, राज्य पुलिस बलों के आधुनिकीकरण के लिए फंड एवं हथियार व उपकरण देती है, खुफिया जानकारी साझा करती है और सुरक्षित पुलिस थाने निर्मित करवाती  है।  

  • वर्ष 2014-15 से राज्यों की क्षमता बढ़ाने हेतु, ‘सुरक्षा संबंधी व्यय (एसआरई)’ योजना के तहत पूर्व में वामपंथी उग्रवाद से प्रभावित रहे राज्यों को कुल 3805.04 करोड़ रुपये जारी किए गए हैं। यह राशि सुरक्षा बलों के संचालन संबंधी खर्च एवं प्रशिक्षण संबंधी जरूरतों, आत्मसमर्पण करने वाले वामपंथी उग्रवाद के कैडरों के पुनर्वास, और वामपंथी उग्रवाद द्वारा की गई हिंसा में मारे गए सुरक्षा बल के जवानों/नागरिकों के परिवारों को अनुग्रह राशि देने जैसे कामों के लिए दी गई है। एसआरई योजना के तहत छत्तीसगढ़ राज्य को कुल 1453.95 करोड़ रुपये जारी किए गए हैं।
  •  “पुलिस बलों के आधुनिकीकरण” की योजना के तहत अपने पुलिस बलों को आधुनिक बनाने तथा जरूरी संसाधनों से लैस करने के राज्यों के प्रयासों को और ठोस किया गया है। इस योजना के तहत, राज्य सरकारों को हथियार, सूचना प्रौद्योगिकी (आईटी) के उपकरण, दूरसंचार व्यवस्था, प्रशिक्षण, पुलिस थानों के निर्माण, आवाजाही की सुविधा, पुलिस कर्मियों के लिए आवास और अन्य पुलिस अवसंरचना आदि के लिए केन्द्र सरकार की और से सहायता प्रदान की जाती है। इसकी एक उप-योजना यानी ‘विशेष बुनियादी ढांचा योजना (एसआईएस) के तहत, वामपंथी उग्रवाद से प्रभावित राज्यों में संबंधित राज्य के विशेष बलों, विशेष खुफिया शाखाओं (एसआईबी), जिला पुलिस को मजबूत करने और सुरक्षित पुलिस थानों (एफपीएस) के निर्माण हेतु 1,761 करोड़ रुपये के कार्यों को मंजूरी दी गई है। इसमें से छत्तीसगढ़ को 451.2 करोड़ रुपये मंजूर किए गए हैं। सुरक्षा संबंध बुनियादी ढांचे पर भारत सरकार का ध्यान बहुत अहम रहा है। अब तक 663 सुरक्षित पुलिस थानों का निर्माण किया जा चुका है, जिनमें से 135 छत्तीसगढ़ में निर्मित किए गए हैं। एसआईएस-2017-21 और एसआईएस-2022-26 के तहत छत्तीसगढ़ राज्य को 110.34 करोड़ रुपये (केन्द्रीय हिस्से का 60 प्रतिशत) जारी किए गए हैं।
  • ‘वामपंथी उग्रवाद के प्रबंधन हेतु केन्द्रीय एजेंसियों को सहायता (एसीएएलडब्ल्यूईएमएस)’ योजना के तहत, शिविरों के बुनियादी ढांचे और वामपंथी उग्रवाद-विरोधी अभियानों के लिए हेलीकॉप्टर उपलब्ध कराने के लिए सहायता प्रदान की जाती है। इस योजना के जरिए 2014-15 से केन्द्रीय एजेंसियों को कुल 1303.68 करोड़ रुपये दिए गए हैं।
  • पूर्व में वामपंथी उग्रवाद से सबसे अधिक प्रभावित रहे जिलों के विकास को गति देने हेतु, ‘विशेष केन्द्रीय सहायता (एससी) योजना’ के तहत सार्वजनिक बुनियादी ढांचे में अहम कमियों को पूरा करने के लिए फंड दिया जाता है। वित्तीय वर्ष 2017-18 से अब तक, छत्तीसगढ़ राज्य को लगभग 1715.83 करोड़ रुपये जारी किए गए हैं।
  • वामपंथी उग्रवादियों की आर्थिक आपूर्ति को रोकने और सीपीआई (माओवादी) तथा उनके आर्थिक समर्थकों के बीच के गठजोड़ का पर्दाफाश करने पर विशेष ध्यान दिया गया है। केन्द्रीय एजेंसियों के सहयोग से राज्य पुलिस द्वारा विभिन्न तरीकों से की गई समन्वित कार्रवाई से अतीत में वामपंथी उग्रवादियों को मिलने वाले फंड और संसाधनों को रोकने में काफी सफलता मिली है।

वामपंथी उग्रवादियों को मुख्यधारा में शामिल होने के लिए प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से, भारत सरकार और राज्य सरकारों ने व्यापक ‘आत्मसमर्पण-सह-पुनर्वास’ नीतियां तैयार की हैं। भारत सरकार, ‘सुरक्षा संबंधी व्यय (एसआरई)’ योजना के तहत ‘आत्मसमर्पण-सह-पुनर्वास’ नीति के माध्यम से इस प्रयास में भी राज्यों की सहायता करती है।

भारत सरकार, एसआरई योजना के तहत आत्मसमर्पण करने वालों के पुनर्वास पर वामपंथी उग्रवाद से प्रभावित राज्यों द्वारा किए गए खर्च की भरपाई करती है। पुनर्वास पैकेज में, अन्य चीजों के अलावा, वामपंथी उग्रवाद के ऊंचे पद वाले कैडरों के लिए 5 लाख रुपये और वामपंथी उग्रवाद के अन्य कैडरों के लिए 2.5 लाख रुपये की तत्काल सहायता राशि शामिल है। इसके अलावा, इस योजना के तहत हथियार/गोला-बारूद समर्पित करने पर प्रोत्साहन भी दिया जाता है। इसमें उनकी पसंद के क्षेत्र/व्यवसाय में प्रशिक्षण देने और तीन वर्षों तक हर महीने 10,000 रुपये का स्टाइपेंड देने का भी प्रावधान है। राज्यों को आकर्षक ‘आत्मसमर्पण-सह-पुनर्वास’ नीतियां अपनाने के लिए भी प्रोत्साहित किया गया है।

वामपंथी उग्रवाद के उन्मूलन के बाद की स्थिति में, भारत सरकार का ध्यान आत्मसमर्पण करने वाले कैडरों के पुनर्वास में मदद करने, सरकारी कल्याणकारी योजनाओं को पूर्ण रूप से कार्यान्वित करने, स्थानीय स्व-शासन को मजबूत करने, जनजातीय पहचान एवं संस्कृति को संरक्षित करने और दूर-दराज के इलाकों में शासन व सार्वजनिक सेवाओं की पहुंच बढ़ाने पर है।

इसके अलावा, वामपंथी उग्रवाद के समाप्त होने के बाद, वामपंथी उग्रवाद से मुक्त इलाकों में मौजूद एक-तिहाई सुरक्षा शिविरों को ‘जन सुविधा केन्द्रों’ में बदला जा रहा है। ये केन्द्र स्थानीय समुदायों को आजीविका को प्रोत्साहित करने, कौशल विकास, सरकारी योजनाओं का लाभ प्रदान करने, डिजिटल सेवाएं उपलब्ध कराने, स्वास्थ्य सेवाएं और सांस्कृतिक व खेल-कूद की सुविधाएं  सुलभ कराने जैसी विभिन्न प्रकार की सेवाएं देंगे। पहला ‘जन सुविधा केंद्र’ छत्तीसगढ़ के बस्तर जिले के जगदलपुर में नेतानार में ‘शहीद वीर गुंडाधुर सेवा डेरा केन्द्र’ के रूप में शुरू किया गया है।

कुल मिलाकर, भारत सरकार पूर्व में वामपंथी उग्रवाद से प्रभावित रहे देश के विभिन्न जिलों में सुरक्षा और तेजी से विकास सुनिश्चित करने हेतु प्रतिबद्ध है।

यह जानकारी गृह राज्यमंत्री श्री नित्यानंद राय ने राज्यसभा में पूछे गए एक प्रश्न के लिखित उत्तर में दी।

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प्रधानमंत्री ने अनुच्छेद 370 और 35(ए) के निरसन के सात वर्ष पूरे होने पर उसके महत्व के बारे में बताया

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने आज अनुच्छेद 370 और 35(ए) के ऐतिहासिक निरसन के सात साल पूरे होने पर 5 अगस्त, 2019 को भारत के समावेशी विकास की यात्रा में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर बताया।

श्री मोदी ने कहा कि पिछले सात वर्षों में जम्मू-कश्मीर और लद्दाख के लोगों ने विभिन्न क्षेत्रों में व्यापक बदलाव देखा है। इंफ्रास्ट्रक्चर का उल्लेखनीय विस्तार हुआ है, वहीं शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा, उद्यमिता और खेल के क्षेत्र में नए अवसर उत्पन्न हुए हैं। श्री मोदी ने यह भी कहा, “महिलाएं और हाशिए वाले समुदायों के सदस्य, अब भारत के संविधान के भरपूर कार्यान्वयन के माध्यम से सशक्त हुए हैं, जो दशकों से अनेक संवैधानिक अधिकारों से वंचित थे।”

प्रधानमंत्री ने कहा कि इस वर्ष की जयंती का विशेष महत्व है क्योंकि देश डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की 125वीं जयंती मना रहा है। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय एकता के प्रति डॉ. मुखर्जी की आजीवन प्रतिबद्धता पीढ़ियों को प्रेरित करती रहेगी और उनके द्वारा प्रतिपादित दृष्टिकोण को 5 अगस्त, 2019 को ऐतिहासिक रूप से साकार होते देखा गया।

जम्मू-कश्मीर और लद्दाख के विकास के प्रति सरकार की अटूट प्रतिबद्धता की पुष्टि करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि प्रत्येक नागरिक को बड़े सपने देखने, अपनी आकांक्षाओं को साकार करने और एक विकसित भारत की परिकल्पना में योगदान देने का अवसर मिलना चाहिए।

प्रधानमंत्री ने एक्स पर पोस्ट किया:

सात साल पहले, इसी दिन, अनुच्छेद 370 और 35(ए) इतिहास बन गए, जिसने जम्मू-कश्मीर के साथ-साथ लद्दाख की यात्रा में एक निर्णायक नए अध्याय की शुरुआत की।

तब से जम्मू-कश्मीर और लद्दाख के लोगों के जीवन में व्यापक बदलाव आया है। इंफ्रास्ट्रक्चर का विस्तार हुआ है, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा, उद्यमिता और खेल जैसे क्षेत्रों में अवसर बढ़े हैं। चाहे महिलाएं हों या हाशिए वाले समुदाय के लोगों को भारत के संविधान के भरपूर कार्यान्वयन के कारण सशक्त बनाया गया है, जिन्हें दशकों तक बुनियादी संवैधानिक अधिकारों से वंचित रखा गया था।

इस वर्ष 5 अगस्त का दिन विशेष महत्व रखता है क्योंकि इसी दिन हमारा देश डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की 125वीं जयंती मना रहा है। राष्ट्रीय एकता के प्रति उनका आजीवन समर्पण पीढ़ियों को प्रेरित करता रहता है। दशकों पहले उन्होंने जो कल्पना की थी, वह 5 अगस्त, 2019 को ऐतिहासिक रूप से साकार हुई।

हम जम्मू-कश्मीर के साथ-साथ लद्दाख की प्रगति के प्रति अपनी प्रतिबद्धता की पुष्टि करते हुए यह सुनिश्चित करने के लिए प्रतिबद्ध हैं कि प्रत्येक नागरिक को बड़े सपने देखने, उन्हें हासिल करने और एक विकसित भारत के निर्माण में योगदान देने का अवसर मिले।

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क्राइस्ट चर्च कॉलेज ने राष्ट्रीय रसायन विज्ञान दिवस मनाया

भारतीय स्वरूप संवाददाता कानपुर, 3 अगस्त : क्राइस्ट चर्च कॉलेज, कानपुर के रसायन विज्ञान विभाग द्वारा राष्ट्रीय रसायन विज्ञान दिवस का आयोजन भारत के महान वैज्ञानिक एवं आधुनिक रसायन विज्ञान के अग्रदूत आचार्य प्रफुल्ल चन्द्र राय की 165वीं जयंती के उपलक्ष्य में किया गया। यह कार्यक्रम केमिकल सोसायटी 2026–27 के तत्वावधान में विभागीय सेमिनार कक्ष में प्रातः 11:00 बजे से 12:00 बजे तक आयोजित हुआ।

कार्यक्रम का शुभारम्भ प्रो. मीत कमल के स्वागत उद्बोधन से हुआ, जिसमें उन्होंने मुख्य अतिथि, प्राचार्य, शिक्षकों एवं विद्यार्थियों का हार्दिक स्वागत किया। इसके पश्चात मोहम्मद मुनीर द्वारा मुख्य अतिथि को स्मृति-चिह्न भेंट कर सम्मानित किया गया।

रसायन विज्ञान विभाग की प्रभारी प्रो. अनिंदिता भट्टाचार्य ने शैक्षणिक सत्र 2026–27 के लिए केमिकल सोसायटी के नव-निर्वाचित पदाधिकारियों की घोषणा की तथा उन्हें वैज्ञानिक सोच और शैक्षणिक उत्कृष्टता को बढ़ावा देने के लिए प्रेरित किया।

इसके उपरांत प्रो.ज्योत्सना लाल ने राष्ट्रीय रसायन विज्ञान दिवस के महत्व एवं केमिकल सोसायटी की गतिविधियों पर प्रकाश डाला। साथ ही, आचार्य प्रफुल्ल चन्द्र राय के जीवन, उनके वैज्ञानिक योगदान तथा भारतीय रसायन विज्ञान के विकास में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका पर आधारित एक लघु वीडियो भी प्रस्तुत किया गया।

कॉलेज के प्राचार्य प्रो. विनय जॉन सेबेस्टियन ने अपने संबोधन में वैज्ञानिक अनुसंधान, नवाचार और नैतिक मूल्यों के महत्व पर बल देते हुए विद्यार्थियों को विज्ञान के क्षेत्र में समर्पण एवं जिज्ञासा के साथ आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया।

मुख्य अतिथि प्रो. अमर श्रीवास्तव, प्राचार्य, हर सहाय कॉलेज, कानपुर का परिचय डॉ. धनंजय डे ने कराया। अपने प्रेरणादायक व्याख्यान में प्रो. श्रीवास्तव ने आचार्य प्रफुल्ल चन्द्र राय के अमूल्य योगदान, समकालीन वैश्विक चुनौतियों के समाधान में रसायन विज्ञान की भूमिका तथा युवाओं में वैज्ञानिक दृष्टिकोण विकसित करने की आवश्यकता पर विस्तार से विचार व्यक्त किए। उनका व्याख्यान विद्यार्थियों एवं शिक्षकों द्वारा अत्यंत सराहा गया।

व्याख्यान के पश्चात प्रश्नोत्तर सत्र आयोजित किया गया, जिसमें विद्यार्थियों ने उत्साहपूर्वक रसायन विज्ञान एवं अनुसंधान से जुड़े विभिन्न विषयों पर अपने प्रश्न रखे।

कार्यक्रम का समापन प्रो. श्वेता चन्द द्वारा प्रस्तुत धन्यवाद ज्ञापन के साथ हुआ। उन्होंने मुख्य अतिथि, प्राचार्य, शिक्षकों, आयोजन समिति एवं सभी प्रतिभागियों के प्रति आभार व्यक्त किया।

यह आयोजन रसायन विज्ञान विभाग की वैज्ञानिक जागरूकता को बढ़ावा देने तथा आचार्य प्रफुल्ल चन्द्र राय के प्रेरणादायी योगदान को स्मरण करने की प्रतिबद्धता का उत्कृष्ट उदाहरण रहा।

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एक देश, अनेक शिक्षा प्रणालियाँ !

क्या समान अवसर केवल संविधान की किताबों तक सीमित है?
यदि भारत एक है, तो क्या उसके बच्चों की शिक्षा भी कम-से-कम एक जैसी नहीं होनी चाहिए?विशेष संपादकीय | खोजी विश्लेषण

भारत को अक्सर “विविधताओं का देश” कहा जाता है। भाषाएँ अलग हैं, पहनावे अलग हैं, संस्कृतियाँ अलग हैं और जीवन-शैली भी अलग-अलग है। यही विविधता भारत की सबसे बड़ी शक्ति मानी जाती है। लेकिन एक प्रश्न ऐसा है, जिसे हमने शायद कभी गंभीरता से पूछने की कोशिश ही नहीं की—क्या शिक्षा भी विविधता का विषय होनी चाहिए, या समान अवसर का?

आज भारत का हर बच्चा चाहे राजस्थान में जन्मा हो, बिहार में, गुजरात में, तमिलनाडु में या असम में—वह अंततः उसी भारत का नागरिक है। आगे चलकर वही बच्चा UPSC देगा, वही JEE और NEET देगा, वही सेना में भर्ती होगा, वही न्यायपालिका, प्रशासन, विज्ञान, उद्योग और राजनीति में अपनी जगह बनाएगा। राष्ट्रीय प्रतियोगिताएँ सबके लिए समान हैं, लेकिन उन प्रतियोगिताओं तक पहुँचने का रास्ता सबके लिए समान नहीं है। यही भारतीय शिक्षा व्यवस्था का सबसे बड़ा विरोधाभास है।

संविधान का अनुच्छेद 14 सभी नागरिकों को कानून के समक्ष समानता का अधिकार देता है। अनुच्छेद 21A प्रत्येक बच्चे को शिक्षा का अधिकार देता है। नीति-निर्देशक तत्व राज्य से अपेक्षा करते हैं कि वह समान अवसर उपलब्ध कराए। लेकिन व्यवहार में भारत की शिक्षा व्यवस्था अनेक परतों में बँटी हुई दिखाई देती है। कहीं राज्य बोर्ड, कहीं CBSE, कहीं ICSE, कहीं अलग-अलग क्षेत्रीय पाठ्यक्रम। परिणाम यह है कि एक ही कक्षा में पढ़ने वाले दो बच्चों का शैक्षणिक आधार केवल इसलिए अलग हो सकता है क्योंकि उनका जन्म अलग-अलग राज्यों में हुआ।

यहाँ प्रश्न यह नहीं है कि राज्यों को अपनी भाषा, संस्कृति या इतिहास पढ़ाने का अधिकार होना चाहिए या नहीं। होना चाहिए, और अवश्य होना चाहिए। भारत की विविधता का सम्मान लोकतंत्र की मूल भावना है। प्रश्न यह है कि क्या गणित, विज्ञान, संविधान, नागरिक शास्त्र, अर्थव्यवस्था, डिजिटल साक्षरता और बुनियादी जीवन-कौशल जैसे विषयों का न्यूनतम स्तर भी राज्य-राज्य में अलग होना चाहिए?

जब राष्ट्रीय प्रतियोगी परीक्षा में प्रश्नपत्र समान होता है, तब तैयारी की बुनियाद अलग क्यों है? यदि अंतिम दौड़ एक ही ट्रैक पर होनी है, तो शुरुआती रेखा अलग-अलग क्यों खींची गई है?

शिक्षा विशेषज्ञ वर्षों से इस ओर ध्यान दिलाते रहे हैं कि भारत में केवल पाठ्यक्रम ही नहीं, बल्कि शिक्षा की गुणवत्ता भी अत्यंत असमान है। कहीं प्रयोगशालाएँ हैं, कहीं केवल नाम मात्र की। कहीं प्रशिक्षित शिक्षक हैं, कहीं वर्षों से रिक्त पद। कहीं डिजिटल बोर्ड और कृत्रिम बुद्धिमत्ता की प्रयोगशालाएँ हैं, तो कहीं बच्चों के पास बैठने के लिए पर्याप्त बेंच तक नहीं। ऐसे में केवल “समान परीक्षा” की बात करना, समान अवसर की गारंटी नहीं बन जाता।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 ने शिक्षा सुधार की दिशा में कई महत्वपूर्ण प्रस्ताव रखे। बुनियादी साक्षरता, कौशल विकास, बहुभाषिकता और लचीले पाठ्यक्रम जैसे विचार स्वागतयोग्य हैं। लेकिन आज भी भारत में ऐसा कोई राष्ट्रीय न्यूनतम शैक्षणिक मानक नहीं है, जो यह सुनिश्चित करे कि देश के हर बच्चे ने कम-से-कम समान बुनियादी ज्ञान प्राप्त किया है। यही वह खाली स्थान है, जिस पर गंभीर चर्चा की आवश्यकता है।

समस्या केवल पाठ्यक्रम की नहीं है। किताबें अलग, उनकी कीमतें अलग, निजी विद्यालयों की फीस अलग, यूनिफॉर्म की व्यवस्था अलग, डिजिटल संसाधनों की उपलब्धता अलग। कई स्थानों पर अभिभावकों को विद्यालय द्वारा निर्धारित विशेष दुकानों से ही किताबें और यूनिफॉर्म खरीदनी पड़ती हैं। शिक्षा धीरे-धीरे अधिकार से अधिक बाज़ार का विषय बनती दिखाई देती है। यदि दो समान आय वाले परिवार अलग-अलग राज्यों में रहते हैं, तो संभव है कि उनके बच्चों की शिक्षा पर होने वाला खर्च और मिलने वाली गुणवत्ता दोनों अलग हों।

यहाँ एक महत्वपूर्ण आपत्ति भी सामने आती है। कई लोग कहते हैं कि भारत जैसा विविध देश एक समान शिक्षा व्यवस्था को स्वीकार नहीं कर सकता। राज्यों की अपनी ऐतिहासिक, भाषाई और सांस्कृतिक आवश्यकताएँ हैं। यह तर्क महत्वपूर्ण है और इसे नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। वास्तव में किसी भी सुधार का उद्देश्य राज्यों की पहचान समाप्त करना नहीं होना चाहिए।

इसीलिए समाधान “One Nation, One Syllabus” नहीं, बल्कि One Nation, One Minimum Education Standard” हो सकता है।

इसका अर्थ यह नहीं कि तमिलनाडु राजस्थान का इतिहास पढ़ाए या राजस्थान के विद्यालय मलयालम पढ़ाएँ। इसका अर्थ यह है कि देश का प्रत्येक बच्चा, चाहे वह किसी भी बोर्ड में पढ़ता हो, कम-से-कम गणित, विज्ञान, संविधान, नागरिक शास्त्र, भारतीय इतिहास की मूल रूपरेखा, अर्थव्यवस्था, डिजिटल साक्षरता, पर्यावरण और जीवन-कौशल का एक समान राष्ट्रीय स्तर प्राप्त करे। इसके ऊपर राज्य अपनी भाषा, साहित्य, संस्कृति, भूगोल और स्थानीय इतिहास पढ़ाएँ। विविधता भी बचे और समान अवसर भी।

ऐसी व्यवस्था केवल छात्रों के लिए नहीं, बल्कि पूरे राष्ट्र के लिए लाभकारी होगी। इससे राष्ट्रीय प्रतियोगी परीक्षाओं में आधारभूत असमानता कम होगी। राज्यों के बीच शैक्षणिक तुलना सरल होगी। शिक्षा की गुणवत्ता का मूल्यांकन अधिक वस्तुनिष्ठ हो सकेगा। और सबसे महत्वपूर्ण—किसी बच्चे का भविष्य उसके जन्मस्थान से कम और उसकी प्रतिभा व मेहनत से अधिक निर्धारित होगा।

इस चर्चा में फीस का प्रश्न भी उतना ही महत्वपूर्ण है। शिक्षा यदि अधिकार है, तो उसकी पहुँच भी समान होनी चाहिए। यह व्यावहारिक रूप से संभव नहीं कि देश के हर निजी विद्यालय की फीस एक जैसी हो, क्योंकि भूमि, वेतन और संचालन लागत अलग-अलग हैं। लेकिन यह अवश्य संभव है कि फीस निर्धारण के लिए पारदर्शी राष्ट्रीय मानक हों, मनमानी वृद्धि पर नियंत्रण हो और आर्थिक रूप से कमजोर छात्रों के लिए सहायता की प्रभावी व्यवस्था हो। शिक्षा का उद्देश्य लाभ कमाना नहीं, नागरिक बनाना होना चाहिए।

यूनिफॉर्म के प्रश्न पर भी बहस आवश्यक है। पूरे देश में एक जैसी पोशाक व्यावहारिक न हो, लेकिन कम-से-कम ऐसा ड्रेस कोड विकसित किया जा सकता है जो अनावश्यक आर्थिक बोझ कम करे। यूनिफॉर्म किसी एक विक्रेता से खरीदने की बाध्यता समाप्त हो और अभिभावकों को खुले बाज़ार से निर्धारित मानक के अनुसार वस्त्र खरीदने की स्वतंत्रता मिले। इससे शिक्षा से जुड़े अनेक छोटे-छोटे आर्थिक शोषण स्वतः समाप्त हो सकते हैं।

आज भारत “विश्वगुरु” बनने की आकांक्षा रखता है। लेकिन कोई भी राष्ट्र अपनी शिक्षा व्यवस्था से ऊपर नहीं उठ सकता। विश्व की अग्रणी अर्थव्यवस्थाओं ने पहले अपनी शिक्षा व्यवस्था को मजबूत किया, उसके बाद विज्ञान, उद्योग और नवाचार में नेतृत्व प्राप्त किया। यदि भारत को वास्तव में ज्ञान-आधारित अर्थव्यवस्था बनना है, तो सबसे पहले उसे अपने बच्चों के लिए समान प्रारंभिक अवसर सुनिश्चित करने होंगे।

यह लेख किसी राज्य के विरुद्ध नहीं है, किसी बोर्ड के विरुद्ध नहीं है और न ही किसी सरकार के विरुद्ध। यह केवल एक प्रश्न उठाता है—क्या भारत के बच्चों को कम-से-कम समान बुनियादी शिक्षा का अधिकार मिलना चाहिए?

यदि उत्तर “हाँ” है, तो अब बहस केवल शिक्षा नीति पर नहीं, बल्कि शिक्षा समानता पर होनी चाहिए। शायद समय आ गया है कि देश National Minimum Education Standard” पर गंभीर राष्ट्रीय विमर्श शुरू करे—ऐसा मानक जो राज्यों की विविधता का सम्मान करे, लेकिन बच्चों के भविष्य में असमानता न पैदा करे।

क्योंकि अंततः प्रश्न केवल शिक्षा का नहीं है। प्रश्न उस भारत का है, जहाँ एक बच्चे की सफलता उसकी प्रतिभा और परिश्रम से तय हो—न कि उसके पिन कोड, बोर्ड या राज्य से। और शायद लोकतंत्र में इससे बड़ा प्रश्न कोई नहीं हो सकता।

लेखक :  सी एम जैन
संपर्क : +91 9408887777
 

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पीएम-अजय आदर्श ग्राम कंपोनेंट के तहत देश भर में 47,328 गांवों का चयन, तेलंगाना में 435 गांव

भारत सरकार अनुसूचित जाति समुदायों के सामाजिक-आर्थिक विकास को बढ़ावा देने के लिए अपने आदर्श ग्राम कंपोनेंट के तहत गांवों के एकीकृत विकास के माध्यम से प्रधानमंत्री अनुसूचित जाति अभ्युदय योजना (पीएम-अजय) लागू कर रही है। इस योजना का उद्देश्य केंद्र और राज्य सरकार की योजनाओं के कनवर्जेंस और प्रमुख विकास कमियों को दूर करके प्रमुख सामाजिक-आर्थिक संकेतकों का सैचुरेशन सुनिश्चित करना है।

सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता राज्य मंत्री श्री रामदास अठावले ने राज्यसभा में श्री अनिल कुमार यादव मंडाडी को दिए एक लिखित जवाब में यह जानकारी साझा की। सदन को बताया गया कि पीएम-अजय के आदर्श ग्राम घटक के तहत देशभर में 47,328 गांवों का चयन किया गया है, जिनमें तेलंगाना के 435 गांव शामिल हैं। चयनित गांवों का राज्यवार विवरण सदन के पटल पर रख दिया गया है।

लिखित उत्तर में आगे कहा गया कि आदर्श ग्राम कंपोनेंट शिक्षा सहित 10 क्षेत्रों में 50 निगरानी योग्य सामाजिक-आर्थिक संकेतकों की पूर्णता के माध्यम से चयनित गांवों के एकीकृत विकास पर केंद्रित है। इन संकेतकों की बेसलाइन स्टेटस स्थापित करने के लिए एक नीड असेसमेंट सर्वे आयोजित किया जाता है। पहचानी गई कमियों को केंद्र व राज्य सरकार की योजनाओं के समन्वय से या पीएम-अजय के तहत सहायता प्राप्त हस्तक्षेपों द्वारा दूर किया जाता है। राज्यों द्वारा की गई प्रगति को पीएमएजीवाई पोर्टल पर नियमित रूप से अपडेट किया जाता है।

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सदन को यह भी सूचित किया गया कि इस योजना के अंतर्गत देशभर में 3,28,131 विकास कार्यों और 1,10,51,213 लाभार्थियों की पहचान की गई है। इनमें से अब तक 46,642 विकास कार्य पूरे हो चुके हैं, जिससे 47,59,399 लाभार्थी लाभान्वित हुए हैं।

तेलंगाना के संबंध में, लिखित उत्तर में कहा गया कि शिक्षा क्षेत्र के तहत 3,529 लाभार्थियों की पहचान की गई है, जिनमें से 472 लाभार्थियों को योजना के तहत लाभ प्राप्त हो चुका है।

थर्ड-पार्टी ऑडिट के संबंध में पूछे गए प्रश्न का उत्तर देते हुए सदन को बताया गया कि राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को पीएम-

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आईआईटी दिल्ली में आयोजित हैंडलूम हैकाथॉन 2.0 का सफल समापन हुआ, जिसमें भारत के हथकरघा क्षेत्र के लिए प्रौद्योगिकी आधारित नवाचारों का प्रदर्शन किया गया

हैंडलूम हैकाथॉन 2.0 – ‘‘बुनाई में नवाचार’’ का दूसरा संस्करण आईआईटी दिल्ली के फाउंडेशन फॉर इनोवेशन एंड टेक्नोलॉजी ट्रांसफर (एफआईटीटी) में सफलतापूर्वक संपन्न हुआ। वस्त्र मंत्रालय के सहयोग से आयोजित इस हैकाथॉन में 2,500 से अधिक प्रतिभागियों ने हिस्‍सा लिया, जिनमें से 280 प्रतिभागी देश भर से चयनित शीर्ष 100 टीमों का प्रतिनिधित्व कर रहे थे। इनका उद्देश्य भारत के हथकरघा क्षेत्र के लिए प्रौद्योगिकी आधारित समाधान विकसित करना था।

इस हैकाथॉन ने नवप्रवर्तकों, शोधकर्ताओं, संकाय सदस्यों और हथकरघा विशेषज्ञों को करघे के आधुनिकीकरण, डिजाइन नवाचार, स्थिरता, बाजार पहुंच और बुनकरों की आजीविका से संबंधित चुनौतियों का समाधान करने के लिए एक राष्ट्रीय मंच प्रदान किया। चयनित टीमों ने उत्पादकता में सुधार, पारंपरिक शिल्प कौशल के संरक्षण और हथकरघा क्षेत्र की प्रतिस्पर्धात्मकता को बढ़ाने के उद्देश्य से विभिन्न विषयों पर अभिनव समाधान प्रस्तुत किए।

इस कार्यक्रम में वस्त्र मंत्रालय की विकास आयुक्त (हथकरघा) डॉ. एम. बीनाआईएएस, आईआईटी दिल्ली के वस्त्र और फाइबर इंजीनियरिंग विभाग की प्रमुख डॉ. दीप्ति गुप्ता, आईआईटी दिल्ली पूर्व छात्र संघ के सचिव श्री पंकज कपाडिया और थिंकस्टार्टअप के सह-संस्थापक श्री संजीव शिवेश ने भाग लिया, जो हथकरघा क्षेत्र में नवाचार को बढ़ावा देने के लिए सरकार, शिक्षा जगत और उद्योग के सहयोगात्मक प्रयासों को प्रदर्शित करता है।

डॉ. एम. बीना ने उपस्थित लोगों को संबोधित करते हुए भारत की समृद्ध हथकरघा विरासत और आधुनिक प्रौद्योगिकी के बीच पूरक संबंध पर प्रकाश डाला।

‘‘हथकरघा हमारी समृद्ध विरासत का प्रतीक है, जबकि प्रौद्योगिकी भविष्य का प्रतिनिधित्व करती है। हथकरघा हैकाथॉन के माध्यम से, हम अपने बुनकर समुदाय को सशक्त बनाने के लिए इन दोनों क्षेत्रों को एक साथ ला रहे हैं।’’

उन्होंने कहा कि हथकरघा बुनाई में स्थिरता और चक्रीयता अंतर्निहित होती है और उन्होंने बुनाई प्रक्रियाओं, डिजाइन विकास और आधुनिक विपणन में नवाचार की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने विकास आयुक्त (हथकरघा) कार्यालय की प्रमुख पहलों पर प्रकाश डाला, जिनमें इंडियन हैंडमेड पोर्टल भी शामिल है, जो एक ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म है और बुनकरों को बिना किसी मध्यस्थ के अपने उत्पादों को विश्व स्तर पर प्रदर्शित करने और बेचने में सक्षम बनाता है।

डॉ. एम. बीना ने मैनुअल श्रम को कम करने, पारंपरिक बुनाई प्रक्रियाओं में वैज्ञानिक सटीकता को एकीकृत करने और बुनकरों की आजीविका को बढ़ाने वाले तकनीकी समाधान विकसित करने के लिए आईआईटी और एनआईएफटी जैसे प्रमुख संस्थानों के साथ संस्थागत साझेदारी के महत्व पर जोर दिया।

श्री पंकज कपाडिया ने इस अवसर पर कहा कि हथकरघा क्षेत्र को पुनर्जीवित करने में प्रौद्योगिकी की भूमिका पर प्रकाश डाला और पारंपरिक शिल्प कौशल और नवाचार के बीच सहयोग का स्वागत किया।

डॉ. दीप्ति गुप्ता ने कहा कि आईआईटी दिल्ली में स्थापित होने वाला आगामी हथकरघा प्रौद्योगिकी उत्कृष्टता केंद्र हथकरघा के साथ प्रौद्योगिकी के एकीकरण को मजबूत करेगा, जिससे हस्तनिर्मित वस्त्रों की विशिष्टता को संरक्षित करते हुए मानकीकरण और उत्पादकता को बढ़ावा मिलेगा। वस्त्र मंत्रालय के सहयोग से अगले सप्ताह इस केंद्र का उद्घाटन प्रस्तावित है।

श्री संजीव शिवेश ने फाइनलिस्ट टीमों को बधाई दी और उन्हें हथकरघा क्षेत्र के लिए नवोन्मेषी समाधान विकसित करना जारी रखने के लिए प्रोत्साहित किया, साथ ही फाइनलिस्टों में उनके चयन को उचित सामाजिक और आर्थिक प्रभाव पैदा करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि बताया।

इस हैकाथॉन ने भारत के हथकरघा उद्योग को सुदृढ़ करने के लिए नवाचार, सहयोगात्मक अनुसंधान और प्रौद्योगिकी आधारित पहलों को बढ़ावा देने के प्रति वस्त्र मंत्रालय की प्रतिबद्धता की पुष्टि की। युवा नवप्रवर्तकों को इस क्षेत्र के लिए व्यावहारिक समाधान विकसित करने के लिए प्रोत्साहित करके, इस पहल का उद्देश्य उत्पादकता, स्थिरता और बाजार प्रतिस्पर्धात्मकता में सुधार करने के साथ-साथ देश की समृद्ध हथकरघा विरासत को संरक्षित करना भी है।

हैंडलूम हैकाथॉन 2.0 के विजेताओं को चार विषयगत श्रेणियों में सम्मानित किया गया – बुनकरों की आजीविका और वित्तीय समावेशन, बाजार पहुंच और डिजिटल एकीकरण, स्थिरता और पर्यावरणीय प्रभाव, और डिजाइन और संचालन में नवाचार। विजेता समाधानों में बुनकरों की आजीविका के लिए एआई-सक्षम प्लेटफॉर्म, डिजिटल बाजार पहुंच उपकरण, पर्यावरण के अनुकूल रंगाई और निगरानी प्रणाली, और करघे के आधुनिकीकरण और डिजाइन के लिए प्रौद्योगिकी-आधारित नवाचार शामिल थे।

विजेता टीमों ने केसीजी कॉलेज ऑफ टेक्नोलॉजी, आईआईएचटी सलेम, आईआईटी मद्रास, बनारस हिंदू विश्वविद्यालय, श्री ईश्वर कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग, कुमारगुरु कॉलेज ऑफ टेक्नोलॉजी, केएलबी आईआईएचटी हैदराबाद और स्टार्टअप सविन्या स्टूडियो जैसे विभिन्न कॉलेजों का प्रतिनिधित्व किया।

हैंडलूम हैकाथॉन 2.0 का सफल समापन वस्त्र मंत्रालय के नवाचार को बढ़ावा देने, अकादमिक-उद्योग सहयोग को मजबूत करने और प्रौद्योगिकी-सक्षम और विश्व स्तर पर प्रतिस्पर्धी हथकरघा इकोसिस्‍टम के निर्माण के प्रयासों में एक और महत्वपूर्ण कदम है, जो भारत के बुनकरों के दीर्घकालिक विकास और समृद्धि का समर्थन करता है।

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सीबीए ने ‘ऑपरेशन वज्र’ के तहत बिहार में नकली दवाओं के अंतर-राज्यीय नेटवर्क का भंडाफोड़ किया; मास्टरमाइंड गिरफ्तार

‘ऑपरेशन वज्र’ के तहत, केंद्रीय नारकोटिक्स ब्यूरो (सीबीएन) की मध्य प्रदेश यूनिट ने बिहार के गया और मसौढ़ी (पटना) में नकली दवाओं/ अवैध दवाओं के 8 गोदामों और एक अवैध विनिर्माण इकाई को जब्त किया है। इन जगहों का इस्तेमाल नशीले पदार्थों और अन्य दवाओं को अवैध रूप से बनाने और भंडारण करने के लिए किया जा रहा था।

यह 2025 में दर्ज अपराध की जांच में एक और बड़ी कामयाबी है। एक बड़े अनुवर्ती (फॉलो-अप) अभियान के दौरान बिहार के गया में चार अवैध गोदामों का भंडाफोड़ किया गया, जिसमें 68,200 ट्रामाडोल टैबलेट, 59,000 अन्य टैबलेट और कोडीन सिरप की 52,542 बोतलें जब्त की गईं।

लगातार जांच और तकनीकी व मानवीय खुफिया जानकारी जुटाने के आधार पर, सीबीएन ने 22 जुलाई 2026 को मुख्य आरोपी को सफलतापूर्वक गिरफ्तार किया। इस गिरफ्तारी से महत्वपूर्ण सुराग मिले, जिससे आगे बड़े पैमाने पर कार्रवाई का रास्ता साफ हुआ।

16 से 27 जुलाई 2026 के बीच, सीबीएन की एमपी इकाई (नीमच) के निवारक अनुभाग (प्रिवेंटिव सेक्शन) ने पूरे बिहार में कड़ी निगरानी और क्षेत्रीय अभियान चलाए। जांच के दौरान पता चला कि फरार आरोपी ने गया के खानजहांपुर इलाके में गैर-कानूनी तरीके से बनाए गए नशीले पदार्थों और नकली दवाओं को जमा करने के लिए फिर से अवैध गोदाम चलाना शुरू कर दिया था। कई दिनों तक उसकी गतिविधियों पर गुप्त रूप से नजर रखने के बाद, सीबीएन की टीम ने उसे सफलतापूर्वक पकड़ लिया।

आरोपी द्वारा दी गई जानकारी के आधार पर, सीबीएऩ की टीम ने दो अपंजीकृत और बिना मंजूरी वाले गोदामों की तलाशी ली और गैर-कानूनी तरीके से बनाए गए 21,373 ब्यूप्रेनोर्फिन इंजेक्शन एम्प्यूल बरामद किए। तलाशी के दौरान भारी मात्रा में नकली और मिलावटी गैर-एनडीपीएस दवाएं भी ज़ब्त की गईं, जिनमें क्लैवम-625, पैन-40, बेटाडीन ऑइंटमेंट, एजिथ्रल और कई अन्य दवाएं शामिल थीं।

स्थानीय पुलिस की सहायता से किए गए बाद के अनुवर्ती अभियानों से शहर के विभिन्न हिस्सों में स्थित छह और अपंजीकृत और अनधिकृत गोदामों की पहचान की गई। इन परिसरों से पर्याप्त मात्रा में नकली और अनाधिकृत रूप से भंडार की गई गैर-एनडीपीएस दवाएं मिलीं। जब्त किए गए भंडार और सील किए गए गोदामों को आगे की कानूनी कार्रवाई के लिए बिहार राज्य औषधि प्रशासन को सौंप दिया गया।

सीबीएन द्वारा उपलब्ध कराई गई जानकारी के आधार पर, राज्य औषधि विभाग ने अवैध गोदामों से निम्नलिखित मात्रा में गैर-एनडीपीएस नकली दवाएं जब्त कीं:

  • टैबलेट/कैप्सूल – 439,774
  • इंजेक्शन/वायल/एम्प्यूल – 1,895
  • सिरप/बोतलें – 3,811
  • अन्य दवा उत्पाद (लोशन/ट्यूब/ड्रॉप्स, आदि) – 3,490

लगातार पूछताछ के दौरान, संदिग्धों ने आगे बताया कि उनके पहले गिरफ्तार किए गए एक साथी ने पटना के मसौढ़ी के पास एक फार्महाउस में गैर-कानूनी विनिर्माण इकाई बनाई थी, जहां बुप्रेनोरफिन और अन्य नशीले पदार्थों को गैर-कानूनी तरीके से बनाने के लिए मशीनरी और उपकरणों का इस्तेमाल किया जा रहा था। इस जानकारी पर तुरंत कार्रवाई करते हुए, सीबीए की टीम ने स्थानीय पुलिस, राज्य औषधि विभाग और खाद्य विभाग के अधिकारियों की मदद से उस जगह पर संयुक्त तलाशी अभियान चलाया। तलाशी के दौरान विनिर्माण से जुड़ी कई मशीनें, उपकरण, रसायन और आर्टिफिशियल फ्लेवरिंग एजेंट बरामद किए गए। पूरी गैर-कानूनी विनिर्माण इकाई को बंद कर दिया गया और एनडीपीएस अधिनिय, 1985 के प्रावधानों के तहत सभी मशीनरी, उपकरणों और संबंधित सामान को ज़ब्त कर लिया गया।

जांच से इस सिंडिकेट के काम करने के तरीके का भी पता चला है। आरोपियों ने कम आय वाले इलाकों में बिना किसी किराए के समझौते (टेनेंसी एग्रीमेंट) के जगह किराए पर ली, किसी भी तरह का डिजिटल रिकॉर्ड न बने, इसलिए किराए का भुगतान नकद में किया, और कानून लागू करने वाली एजेंसियों से बचने के लिए नकली पहचान दस्तावेजों के जरिए लिए गए मोबाइल कनेक्शन का इस्तेमाल किया।

इस कैलेंडर वर्ष में, सीबीएन एमपी इकाई ने अब तक 90 मामले दर्ज किए हैं, जिनमें 3 अवैध लैब का भंडाफोड़ शामिल है और 121 संदिग्धों को गिरफ्तार किया है। केंद्रीय नारकोटिक्स ब्यूरो (सीबीएन) संगठित ड्रग तस्करी सिंडिकेट को खत्म करने और नशीले पदार्थों व साइकोट्रोपिक पदार्थों के अवैध विनिर्माण, भंडारण और तस्करी में शामिल लोगों के खिलाफ कानून को सख्ती से लागू करने तथा भारत में दवाओं के सुरक्षित उपयोग को सुनिश्चित करने के अपने पक्के संकल्प को दोहराता है।

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