दैनिक भारतीय स्वरूप कानपुर (जिला सूचना कार्यालय) नगर, दिनांक 02 अगस्त, 2026* पीएम श्री स्कूल जवाहर नवोदय विद्यालय, सरसौल, कानपुर नगर के प्रभारी प्राचार्य आर. के. सिंह ने बताया कि जवाहर नवोदय विद्यालय चयन परीक्षा-2027 के अंतर्गत कक्षा-6 में प्रवेश हेतु ऑनलाइन पंजीकरण की अंतिम तिथि बढ़ाकर 07 अगस्त, 2026 कर दी गई है। ऐसे अभ्यर्थी, जिन्होंने अभी तक आवेदन नहीं किया है, वे निर्धारित तिथि तक अपना ऑनलाइन आवेदन पूर्ण कर सकते हैं।
उन्होंने बताया कि ऑनलाइन आवेदन प्रक्रिया दो चरणों में संपन्न की जाएगी। प्रथम चरण में अभ्यर्थी को राज्य, जनपद, विकास खंड, विद्यालय का नाम, वास्तविक पता, अभ्यर्थी का नाम, अभिभावक का मोबाइल नंबर तथा जन्मतिथि सहित आवश्यक विवरण दर्ज करना होगा। इसके पश्चात पंजीकृत मोबाइल नंबर पर प्राप्त यूजर आईडी एवं पासवर्ड के माध्यम से द्वितीय चरण की प्रक्रिया पूर्ण करनी होगी।
द्वितीय चरण में अभ्यर्थी का नवीनतम पासपोर्ट आकार का फोटो, हस्ताक्षर, माता-पिता के हस्ताक्षर तथा कक्षा-5 में अध्ययनरत होने का विद्यालय के प्रधानाध्यापक द्वारा निर्गत प्रमाण-पत्र वेबसाइट पर अपलोड करना अनिवार्य होगा। सभी विवरण एवं आवश्यक अभिलेख सफलतापूर्वक अपलोड होने के बाद आवेदन पत्र का प्रिंट सुरक्षित रख लेना चाहिए।
उन्होंने बताया कि प्रवेश हेतु अभ्यर्थी की जन्मतिथि 01 मई, 2015 से 31 जुलाई, 2017 (दोनों तिथियां सम्मिलित) के मध्य होनी चाहिए। अभ्यर्थी www.navodaya.gov.in तथा https://cbseitms.rcil.gov.in/nvs/ पर जाकर ऑनलाइन आवेदन कर सकते हैं।
प्रभारी प्राचार्य ने बताया कि जवाहर नवोदय विद्यालय चयन परीक्षा शनिवार, 28 नवम्बर, 2026 को आयोजित की जाएगी। उन्होंने अभिभावकों से अपील की कि अंतिम तिथि की प्रतीक्षा किए बिना समय रहते आवेदन प्रक्रिया पूर्ण कर लें, जिससे किसी भी प्रकार की तकनीकी असुविधा से बचा जा सके। अधिक जानकारी के लिए अभ्यर्थी एवं अभिभावक उपरोक्त वेबसाइटों का अवलोकन कर सकते हैं।
डी जी कॉलेज में नशा मुक्त युवा फॉर विकसित भारत संकल्प अभियान आयोजित
भारतीय स्वरूप संवाददाता कानपुर दयानन्द गर्ल्स पी.जी. कॉलेज, कानपुर में “नशा मुक्त युवा फॉर विकसित भारत : संकल्प अभियान” का आयोजन को सफलतापूर्वक किया गया। कार्यक्रम का उद्देश्य युवाओं को नशे के दुष्प्रभावों के प्रति जागरूक करना तथा नशामुक्त समाज के निर्माण हेतु प्रेरित करना था। इस अवसर पर “नशा मुक्त युवा फॉर विकसित भारत” विषय पर व्याख्यान आयोजित किया गया, जिसमें प्रो रुचिमिता पांडे ने युवाओं को नशे से दूर रहने तथा स्वस्थ एवं सकारात्मक जीवनशैली अपनाने का संदेश दिया।
अभियान के अंतर्गत विभिन्न गतिविधियों जैसे मेडिटेशन सत्र, जागरूकता कार्यक्रम, कला प्रतियोगिता , मेडिटेशन, खेलकूद एवं नुक्कड़ नाटक का आयोजन किया गया। माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी द्वारा इस अभियान के शुभारंभ का सजीव प्रसारण छात्राओं ने उत्साहपूर्वक देखा तथा नशामुक्त भारत के निर्माण का संकल्प लिया।
कार्यक्रम के दौरान छात्राओं एवं उपस्थित जनसमूह को यह शपथ दिलाई गई कि वे स्वयं किसी भी प्रकार के नशे का सेवन नहीं करेंगी तथा अपने परिवार एवं समाज को भी नशे के दुष्प्रभावों के प्रति जागरूक करेंगी। इस अवसर पर “Say No to Drugs, Say Yes to Life” तथा “युवा शक्तिशाली बनेगी, विकसित भारत गढ़ेगी” जैसे प्रेरणादायक संदेशों का प्रसार किया गया।
कार्यक्रम का सफल संचालन एवं संयोजन डॉ. संगीता सिरोही (कार्यक्रम अधिकारी, एन.एस.एस.) के निर्देशन में संपन्न हुआ। कार्यक्रम में महाविद्यालय की प्राचार्या प्रो. वंदना निगम तथा निदेशक (स्ववित्तपोषित पाठ्यक्रम) प्रो. अर्चना वर्मा तथा कार्यालय अधीक्षक कृष्णेन्द्र श्रीवास्तव का विशेष मार्गदर्शन प्राप्त हुआ।
कार्यक्रम को सफलतापूर्वक सम्पन्न करने में राष्ट्रीय सेवा योजना इकाई, माय भारत वॉलंटियर्स, एन.सी.सी. इंचार्ज प्रो. शुभ्रा राजपूत, प्रेंजर प्रभारी प्रो. स्वाति सक्सेना, डॉ ज्योत्सना पांडे, डॉ पूजा श्रीवास्तव, डॉ कुमुद लता, डॉ उमा अवस्थी, डॉ अंजना श्रीवास्तव, डॉ साधना सिंह, डॉ सुषमा शर्मा, डॉ वंदना द्विवेदी, डॉ पिंकी द्विवेदी, डॉ दीपाली सक्सेना, समस्त एनएसएस समिति एवं सांस्कृतिक समिति का विशेष योगदान सराहनीय रहा।
Read More »दूरसंचार विभाग और मध्य प्रदेश सरकार ग्वालियर में भारत का पहला दूरसंचार विनिर्माण क्षेत्र (टीएमजेड) स्थापित करने के लिए समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर करेंगे
समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर समारोह में केंद्रीय संचार एवं उत्तर पूर्वी क्षेत्र विकास मंत्री श्री ज्योतिरादित्य एम. सिंधिया, मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव और संचार एवं ग्रामीण विकास राज्य मंत्री डॉ. चंद्रशेखर पेम्मासानी सहित अन्य विशिष्ट गणमान्य व्यक्ति उपस्थित रहेंगे।
ग्वालियर में भारत के पहले दूरसंचार विनिर्माण क्षेत्र की स्थापना देश के घरेलू दूरसंचार विनिर्माण पारिस्थितिकी तंत्र को मजबूत करने और प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के आत्मनिर्भर भारत के दृष्टिकोण को आगे बढ़ाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है। इस पहल का उद्देश्य निवेश आकर्षित करके, नवाचार को बढ़ावा देकर, स्वदेशी डिजाइन और विनिर्माण को प्रोत्साहित करके और अगली पीढ़ी के दूरसंचार उत्पादों और समाधानों के विकास में तेजी लाकर दूरसंचार उपकरणों और संबद्ध प्रौद्योगिकियों के लिए विश्व स्तरीय विनिर्माण पारिस्थितिकी तंत्र का निर्माण करना है।
दूरसंचार विनिर्माण क्षेत्र से दूरसंचार उपकरण निर्माताओं, प्रौद्योगिकी कंपनियों, एमएसएमई, स्टार्टअप्स और दूरसंचार मूल्य श्रृंखला से जुड़े अन्य हितधारकों के विकास को बढ़ावा मिलने की उम्मीद है। इससे रोजगार के पर्याप्त अवसर भी उत्पन्न होंगे, क्षेत्रीय औद्योगिक विकास को बढ़ावा मिलेगा, आपूर्ति श्रृंखला की मजबूती बढ़ेगी और भारत दूरसंचार विनिर्माण और नवाचार के वैश्विक केंद्र के रूप में स्थापित होगा।
दूरसंचार विभाग और मध्य प्रदेश सरकार के बीच समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर से ग्वालियर में टीएमजेड चरण-1 की स्थापना की दिशा में सहयोग के ढांचे को औपचारिक रूप दिया जाएगा, जिससे भारत की दूरसंचार विनिर्माण और प्रौद्योगिकी महत्वाकांक्षाओं को आगे बढ़ाने में केंद्र-राज्य साझेदारी को और मजबूती मिलेगी।
इस कार्यक्रम में भारत सरकार, मध्य प्रदेश सरकार और दूरसंचार क्षेत्र के वरिष्ठ अधिकारी और हितधारक एक साथ आएंगे।
| अधिक जानकारी के लिए डीओटी हैंडल्स को फ़ॉलो करें: –
इंस्टाग्राम– https://www.instagram.com/department_of_telecom?igsh=MXUxbHFjd3llZTU0YQ फेसबुक – https://www.facebook.com/DoTIndia यूट्यूब: https://youtube.com/@departmentoftelecom?si=DALnhYkt89U5jAaa |
क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों (आरआरबी) ने वित्त वर्ष 2025-26 में अब तक का सबसे अधिक 10,177 करोड़ रुपये का शुद्ध लाभ कमाया, साथ ही अन्य प्रमुख वित्तीय मानकों में लगातार सुधार किया है
भारत सरकार नियमित रूप से राष्ट्रीय और क्षेत्रीय स्तरों पर क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों (आरआरबी) के प्रदर्शन और वित्तीय स्थिति की समीक्षा करती है।
पिछले चार वित्तीय वर्षों में वित्त मंत्री की अध्यक्षता में आरआरबी की निम्नलिखित समीक्षाएं की गई हैं:
| क्रम संख्या | राष्ट्रीय/क्षेत्रीय स्तर | तारीख और स्थान |
| 1. | राष्ट्रीय स्तर | 07.07.2022 नई दिल्ली में |
| 2. | उत्तर-पूर्वी आरआरबी | 21.07.2023 अगरतला में |
| 3. | दक्षिणी आरआरबी | 04.08.2023 चेन्नई में |
| 4. | उत्तरी आरआरबी | 30.08.2023 नई दिल्ली में |
| 5. | राष्ट्रीय स्तर | 19.08.2024 नई दिल्ली में |
| 6. | पश्चिमी-मध्य आरआरबी | 22.08.2024 उदयपुर में |
| 7. | उत्तर-पूर्वी आरआरबी | 30.09.2024 ईटानगर में |
| 8. | दक्षिणी आरआरबी | 09.11.2024 बेंगलुरु में |
| 9. | पूर्वी आरआरबी | 29.11.2024 पटना में |
| 10. | कर्नाटक ग्रामीण बैंक | 16.10.2025 बेल्लारी में |
क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों (आरआरबी) ने वित्त वर्ष 2025-26 में अब तक का सबसे अधिक 10,177 करोड़ रुपये का शुद्ध लाभ कमाया, साथ ही अन्य प्रमुख वित्तीय मानकों में लगातार सुधार किया है
इसके अलावा अनुवर्ती ( फ़ॉलो-अप ) कार्रवाई के रूप में वित्तीय सेवा विभाग (डीएफएस) विभिन्न स्तरों पर आरआरबी और प्रायोजक बैंकों के साथ समय-समय पर और नियमित बैठकें करता है।
समीक्षा बैठकों के एजेंडा आइटम में अन्य बातों के साथ-साथ, ये शामिल हैं:
- वित्तीय मापदंडों पर आरआरबी के प्रदर्शन की समीक्षा।
- प्रौद्योगिकी उन्नयन पर ज़ोर।
- सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम (एमएसएमई) पोर्टफोलियो पर ध्यान।
- कृषि-संबद्ध, एमएसएमई और खुदरा क्षेत्रों के लिए ऋण विविधीकरण का महत्व।
- ग्रामीण और सुदूर क्षेत्रों में वित्तीय समावेश का विस्तार।
हाल के वर्षों में आरआरबी की वित्तीय स्थिति में सुधार हुआ है। वित्त वर्ष 2025-26 के दौरान आरआरबी ने 10,177 करोड़ रुपये का अब तक का सबसे अधिक कुल शुद्ध लाभ दर्ज किया। आरआरबी ने पूंजी से जोखिम भारित संपत्तियां अनुपात (सीआरएआर) जमा, अग्रिम, गैर-निष्पादित परिसंपत्ति (एनपीए) क्रेडिट-डिपॉजिट अनुपात (सीडी अनुपात) आदि जैसे प्रमुख वित्तीय मानकों में भी लगातार सुधार दिखाया है। पिछले तीन वर्षों में प्रमुख वित्तीय पैमानों पर आरआरबी का प्रदर्शन इस प्रकार है:
| क्रम संख्या | मुख्य वित्तीय पैरामीटर | वित्त वर्ष 2023-24 | वित्त वर्ष 2024-25 | वित्त वर्ष |
| 1. | कुल जमा राशि (करोड़ रुपये में) |
6,59,815 | 7,13,800 | 7,68,621 |
| 2. | बकाया लोन
(करोड़ रुपये में) |
4,71,384 | 5,24,163 | 5,78,349 |
| 3. | क्रेडिट-डिपॉज़िट अनुपात
(सीडी अनुपात) (%) |
71.4 | 73.4 | 75.2 |
| 4. | सकल गैर-निष्पादित परिसंपत्ति
(जीएनपीए) (%) |
6.1 | 5.4 | 5.3 |
| 5. | शुद्ध गैर-निष्पादित परिसंपत्ति
(एनएनपीए) (%) |
2.4 | 2.0 | 2.1 |
| 6. | शुद्ध लाभ
(करोड़ रुपये में) |
7,571 | 6,820 | 10,177 |
| 7. | शुद्ध मूल्य (करोड़ रुपये में) |
56,780 | 63,927 | 74,086 |
| 8. | जोखिम भारित परिसंपत्तियों के लिए पूंजी अनुपात (सीआरएआर) (%) | 14.2 | 14.4 | 15.0 |
स्रोत: नाबार्ड
सरकार ग्रामीण और दूर-दराज के इलाकों में वित्तीय समावेश को बढ़ाने की दिशा में आरआरबी की प्रगति की नियमित रूप से समीक्षा करती है। प्रधानमंत्री जन-धन योजना (पीएमजेडीवाई), प्रधानमंत्री मुद्रा योजना (पीएमएमवाई), प्रधानमंत्री सुरक्षा बीमा योजना (पीएमएसबीवाई), प्रधानमंत्री जीवन ज्योति बीमा योजना (पीएमजेजेबीवाई), अटल पेंशन योजना (एपीवाई) जैसी विभिन्न वित्तीय समावेश योजनाओं के लक्ष्य डीएफएस द्वारा निर्धारित किए जाते हैं और समय-समय पर निगरानी की जाती है।
वित्त राज्य मंत्री श्री पंकज चौधरी ने आज राज्यसभा में यह जानकारी दी।
गगनयान मिशन के लिए विकास संबंधी गतिविधियां संचालित की गई
- मानव-रेटेड प्रक्षेपण यान (एचएलवीएम3): सभी प्रणोदन चरणों और संरचनाओं का विकास तथा उनके जमीनी परीक्षण सफलतापूर्वक पूर्ण कर लिए गए हैं।
- ऑर्बिटल मॉड्यूल: क्रू मॉड्यूल और सर्विस मॉड्यूल के लिए प्रणोदन प्रणालियों का विकास, परीक्षण और प्रमाणीकरण पूरा कर लिया गया है। पर्यावरण नियंत्रण एवं जीवन रक्षक प्रणाली (ईसीएलएसएस) का इंजीनियरिंग मॉडल विकसित कर लिया गया है। इसके अतिरिक्त, डेसीलरेशन प्रणाली, क्रू मॉड्यूल अप-राइटिंग प्रणाली, थर्मल प्रोटेक्शन सिस्टम तथा एंड-टू-एंड एवियोनिक्स का विकास एवं सफल परीक्षण भी पूरा कर लिया गया है।
- क्रू एस्केप सिस्टम (सीईएस): पांच प्रकार की मोटरों का विकास कर उनका स्थिर परीक्षण सफलतापूर्वक पूरा किया गया है। क्रू एस्केप सिस्टम की सभी संरचनाओं का निर्माण और प्रमाणीकरण भी पूरा कर लिया गया है।
- बुनियादी ढांचे की स्थापना: ऑर्बिटल मॉड्यूल तैयारी सुविधा, गगनयान नियंत्रण केन्द्र, गगनयान नियंत्रण सुविधा, क्रू प्रशिक्षण सुविधा तथा दूसरे प्रक्षेपण परिसर में आवश्यक संशोधनों का कार्य पूरा कर लिया गया है।
- परीक्षण मिशन: क्रू एस्केप सिस्टम (सीईएस) के उड़ान के दौरान प्रमाणीकरण के लिए पहला टेस्ट व्हीकल मिशन (टीवी-डी1) सफलतापूर्वक पूरा किया गया है। इसके अतिरिक्त, डेसीलरेशन प्रणाली के प्रमाणीकरण के लिए सिम्युलेटेड क्रू मॉड्यूल के साथ इंटीग्रेटेड एयर ड्रॉप टेस्ट-01 (आईएडीटी-01) और इंटीग्रेटेड एयर ड्रॉप टेस्ट-02 (आईएडीटी-02) भी सफलतापूर्वक संपन्न किए गए हैं। टीवी-डी2 मिशन को पूरा करने की तैयारियां आखिरी चरण में हैं।
- उड़ान संचालन एवं संचार नेटवर्क : ग्राउंड नेटवर्क का विन्यास अंतिम रूप से तैयार कर लिया गया है। आईडीआरएसएस-1 के फीडर स्टेशन और स्थलीय संचार लिंक स्थापित किए जा चुके हैं। पारस्परिक सहयोग के लिए अन्य अंतरिक्ष एजेंसियों के साथ समझौता ज्ञापनों पर हस्ताक्षर किए गए हैं।
- क्रू रिकवरी संचालन: रिकवरी के लिए आवश्यक संसाधनों को अंतिम रूप दे दिया गया है तथा क्रू रिकवरी की विस्तृत कार्ययोजना तैयार कर ली गई है।
इसके समानांतर, गगनयान मिशन के लिए विकसित नई प्रणालियों के प्रदर्शन और प्रमाणीकरण हेतु विभिन्न ग्राउंड क्वालिफिकेशन परीक्षण किए जा रहे हैं।
गगनयात्रियों ने रूस के ग्लावकोसमोस में सामान्य प्रशिक्षण सफलतापूर्वक पूरा कर लिया है। वर्तमान में बेंगलुरु स्थित अंतरिक्ष यात्री प्रशिक्षण सुविधा में गगनयान मिशन-विशिष्ट प्रशिक्षण जारी है।
पहले मानव रहित मिशन जी-1 को पूरा करने की दिशा में विभिन्न गतिविधियां प्रगति पर हैं। एचएलवीएम3 के सभी चरण—एचएस200, एल110 और सी32—तथा क्रू एस्केप सिस्टम की मोटरें उड़ान के लिए तैयार हैं। क्रू मॉड्यूल और सर्विस मॉड्यूल की सभी प्रणालियां विकसित की जा चुकी हैं। इन दोनों मॉड्यूलों का संयोजन, एकीकरण और परीक्षण अंतिम चरण में है तथा समेकित सिमुलेशन भी किए जा रहे हैं।
गगनयान मिशनों का प्रक्षेपण सतीश धवन अंतरिक्ष केन्द्र एसएचएआर के द्वितीय प्रक्षेपण परिसर से किया जाएगा। इसके लिए एकीकरण, परीक्षण और प्रक्षेपण संबंधी आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए विभिन्न अवयवों, सुविधाओं और प्रणालियों की योजना बनाकर उनका विकास एवं स्थापना की गई है। ऑर्बिटल मॉड्यूल तैयारी सुविधा (ओएमपीएफ) का निर्माण किया गया है, जहां क्रू मॉड्यूल (सीएम), सर्विस मॉड्यूल (एसएम) तथा क्रू एस्केप सिस्टम (सीईएस), जिसमें सीईएस के ठोस मोटर भी शामिल हैं, की तैयारी की जाएगी। एकीकरण, पहुंच तथा परीक्षण संबंधी आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए द्वितीय वाहन संयोजन भवन (एसवीएबी) में आवश्यक संशोधन किए गए हैं। एसवीएबी टर्मिनल कक्ष (एसवीटीआर) तथा लॉन्च पैड टर्मिनल कक्ष–गगनयान (एलटीआर-जी) में परीक्षण सुविधाओं और इंटरफेस को उन्नत बनाया गया है। इसके अतिरिक्त, उप-संयोजन एवं चरण तैयारी सुविधाओं (एचएस200, एल110-जी, सी25-जी और ईबी) के लिए परीक्षण प्रणालियों का भी विस्तार किया गया है। मानवयुक्त मिशनों की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए द्वितीय प्रक्षेपण परिसर के अम्बिलिकल टॉवर पर क्रू एक्सेस आर्म, बबल लिफ्ट तथा जिप लाइन प्रणाली भी स्थापित की गई हैं।
पर्यावरण नियंत्रण एवं जीवन समर्थन प्रणाली (ईसीएलएसएस) अनेक परस्पर जुड़ी प्रणालियों का एक समेकित तंत्र है और मानव अंतरिक्ष उड़ान के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण प्रौद्योगिकी है। इसका उपयोग पूरे मिशन के दौरान क्रू मॉड्यूल के भीतर तापमान, आर्द्रता, वायुदाब तथा कार्बन डाइऑक्साइड के स्तर को नियंत्रित रखते हुए रहने योग्य वातावरण बनाए रखने के लिए किया जाता है। इस प्रणाली का विकास इसरो द्वारा स्वदेशी रूप से किया जा रहा है। वर्तमान में यह प्रणाली विकासात्मक परीक्षणों के चरण में है। इसके सीमित संस्करण का उड़ान प्रदर्शन मानव रहित गगनयान मिशनों में किए जाने की योजना है।
यह जानकारी प्रधानमंत्री कार्यालय, कार्मिक, लोक शिकायत एवं पेंशन, परमाणु ऊर्जा तथा अंतरिक्ष राज्य मंत्री डॉ. जितेन्द्र सिंह ने आज लोकसभा में एक लिखित उत्तर में दी।
अंतरिक्ष क्षेत्र में निजी क्षेत्र की भागीदारी
वर्ष 2026 में कुल 187 मिलियन अमेरिकी डॉलर निवेश की जानकारी मिली है। अब तक इन-स्पेस द्वारा गैर-सरकारी संस्थाओं (एनजीई) को विभिन्न अंतरिक्ष कार्यों के लिए कुल 108 आधिकारिक अनुमतियां प्रदान की जा चुकी हैं। इनमें उपग्रह/पेलोड की स्थापना एवं संचालन, अंतरिक्ष परिवहन प्रणालियों का प्रक्षेपण आदि शामिल हैं।
इन-स्पेस द्वारा जारी “अंतरिक्ष गतिविधियों की मंजूरी (एनजीपी) के संबंध में भारतीय अंतरिक्ष नीति-2023 के कार्यान्वयन के लिए मानदंड, दिशानिर्देश एवं प्रक्रियाओं” के अंतर्गत अनुमति के लिए प्राप्त आवेदनों का मूल्यांकन इस दृष्टि से किया जाता है कि निजी संस्थाओं को अंतरिक्ष गतिविधियों की अनुमति देते समय रणनीतिक, सुरक्षा तथा राष्ट्रीय हितों सहित अन्य महत्वपूर्ण पहलुओं की रक्षा सुनिश्चित की जा सके। इसके अतिरिक्त, इन-स्पेस हितधारकों के परामर्श से “भारतीय संस्थाओं द्वारा भारत में संचालित अंतरिक्ष गतिविधियों के लिए सुरक्षा एवं संरक्षा दिशानिर्देश” तैयार करने पर भी कार्य कर रहा है।
सरकार ने अंतरिक्ष क्षेत्र के स्टार्टअप्स को सहयोग देने के लिए विभिन्न पहल और योजनाएं शुरू की हैं। निजी क्षेत्र को प्रोत्साहित करने के लिए निम्नलिखित पहल और नीतियां लागू की गई हैं:
- भारतीय अंतरिक्ष नीति-2023 लागू की गई है, जिसमें सभी हितधारकों की भूमिकाएं और जिम्मेदारियां स्पष्ट रूप से निर्धारित की गई हैं।
- प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) नीति उदार बनाई गई है।
- इन-स्पेस से अनुमति प्राप्त करने के लिए मानदंड, दिशानिर्देश एवं प्रक्रियाएं लागू की गई हैं।
- इसरो की सुविधाएं उपलब्ध कराने के लिए एनजीई के लिए रियायती मूल्य नीति लागू की गई है।
- 1,000 करोड़ रुपये के वेंचर कैपिटल फंड की स्थापना की गई है।
- अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी के विकास और उसके व्यावसायीकरण के लिए 500 करोड़ रुपये के प्रौद्योगिकी अपनाओ कोष की स्थापना की गई है।
- विचारों को उत्पाद में विकसित करने के लिए इन-स्पेस सीड फंड योजना शुरू की गई है।
- निजी क्षेत्र को इसरो की सुविधाओं तक पहुंच तथा मार्गदर्शन (मेंटरशिप) उपलब्ध कराया जा रहा है।
- कौशल संबंधी आवश्यकताओं की कमी को दूर करने के लिए स्किल पहल शुरू की गई है।
- अंतरिक्ष प्रणालियों के परीक्षण और सिमुलेशन की सुविधाएं किफायती लागत पर उपलब्ध कराने के लिए एक तकनीकी केन्द्र की स्थापना की गई है।
- इसरो से प्रौद्योगिकी हस्तांतरण को सक्षम बनाया गया है।
- पीओईएम प्लेटफॉर्म के माध्यम से अंतरिक्ष उपयोगिता का परीक्षण करने का अवसर प्रदान किया जा रहा है।
- स्पेस एडॉप्शन अवेयरनेस वर्कशॉप (एसएएडब्ल्यू), इंडस्ट्री मीट्स तथा अन्य प्रचारात्मक आयोजनों के माध्यम से व्यावसायिक अवसर उपलब्ध कराए जा रहे हैं।
इसके अलावा, 17 स्टार्ट-अप्स को अंतरिक्ष से जुड़ी अलग-अलग गतिविधियां करने की मंज़ूरी दी गई है।
स्पेस टेक्नोलॉजी के कमर्शियल इस्तेमाल को बढ़ावा देने के लिए, भारत सरकार ने ये योजनाएं/पहल शुरू करने की घोषणा की है:
- अंतरिक्ष क्षेत्र के लिए उदारीकृत प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) नीति लागू की गई है।
- गैर-सरकारी संस्थाओं (एनजीई) को इसरो की सुविधाओं तक पहुंच प्रदान करने के लिए रियायती मूल्य निर्धारण नीति लागू की गई है।
- अंतरिक्ष क्षेत्र के स्टार्टअप्स को सहयोग देने के लिए 1,000 करोड़ रुपये के वेंचर कैपिटल फंड की स्थापना की गई है।
- स्वदेशी अंतरिक्ष प्रौद्योगिकियों के विकास, प्रदर्शन और व्यावसायीकरण में तेजी लाने के लिए 500 करोड़ रुपये के प्रौद्योगिकी अपनाओ कोष (टीएएफ) की शुरुआत की गई है।
- निजी क्षेत्र के विकास को समर्थन देने के लिए इसरो के अवसंरचना, तकनीकी विशेषज्ञता और मार्गदर्शन तक पहुंच उपलब्ध कराई जा रही है।
- अंतरिक्ष क्षेत्र की बदलती कार्यबल आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए कौशल विकास संबंधी पहलें शुरू की गई हैं।
- अंतरिक्ष प्रणालियों के किफायती परीक्षण, सत्यापन और सिमुलेशन सुविधाएं उपलब्ध कराने के लिए एक तकनीकी केन्द्र की स्थापना की गई है।
- ii. व्यावसायीकरण को बढ़ावा देने के लिए इसरो द्वारा विकसित प्रौद्योगिकियों के उद्योगों को हस्तांतरण की व्यवस्था की गई है।
- पीएसएलवी ऑर्बिटल एक्सपेरिमेंटल मॉड्यूल (पीओईएम) प्लेटफॉर्म के माध्यम से अंतरिक्ष प्रौद्योगिकियों के सत्यापन के अवसर उपलब्ध कराए जा रहे हैं।
- स्वदेशी उपग्रह प्लेटफॉर्म क्षमताओं के विकास तथा उपग्रह निर्माण में तेजी लाने के लिए “सैटेलाइट बस ऐज़ अ सर्विस (एसबीएएएस) “ पहल शुरू की गई है।
- घरेलू आपूर्ति श्रृंखला को सुदृढ़ बनाने, निवेश आकर्षित करने तथा एकीकृत अंतरिक्ष औद्योगिक इकोसिस्टम के विकास के लिए राज्य सरकारों को समर्पित अंतरिक्ष विनिर्माण क्लस्टरों की स्थापना के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है।
सरकार ने अंतरिक्ष क्षेत्र के उदारीकरण के माध्यम से कई सक्रिय कदम उठाए हैं, जो वैश्विक अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था में भारत की हिस्सेदारी बढ़ाने में योगदान दे रहे हैं। इस दिशा में उठाए गए विभिन्न कदम निम्नलिखित हैं:
नीतिगत एवं नियामक सुधार:
- भारतीय अंतरिक्ष नीति-2023 का कार्यान्वयन.
- उदारीकृत एफडीआई नीति और अनुकूल नियामकों, दिशानिर्देशों का विकास।
बुनियादी ढांचा विकास:
- गैर-सरकारी संस्थाओं (एनजीई) को पहुंच प्रदान करते हुए इसरो की सुविधाओं का विस्तार।
- साझा अवसंरचना सहायता के साथ इन-स्पेस तकनीकी केन्द्र तथा अंतरिक्ष विनिर्माण क्लस्टरों की स्थापना।
कौशल विकास:
- उद्योगोन्मुख अंतरिक्ष पाठ्यक्रम, विद्यार्थियों के लिए इमर्शन कार्यक्रम तथा क्षमता निर्माण संबंधी पहलें।
- अंतरिक्ष क्षेत्र के प्रत्येक प्रमुख पहलू को शामिल करते हुए 14 अल्पकालिक कौशल विकास पाठ्यक्रमों का डिजाइन और विकास।
पूंजी तक पहुंच:
- 1,000 करोड़ रुपये का वेंचर कैपिटल फंड।
- प्रौद्योगिकी के व्यावसायीकरण के लिए 500 करोड़ रुपये का प्रौद्योगिकी अपनाओ कोष।
- स्टार्टअप्स के लिए वित्तपोषण तथा अनुसंधान एवं विकास सहायता को प्रोत्साहन।
प्रौद्योगिकी एवं क्षमता विकास:
- एसएसएलवी सहित इसरो की प्रौद्योगिकियों के हस्तांतरण को बढ़ावा।
- स्वदेशी अनुसंधान एवं विकास तथा नवाचार को प्रोत्साहन।
मांग सृजन :
- पृथ्वी अवलोकन के लिए सार्वजनिक-निजी भागीदारी तथा प्रूफ-ऑफ-कॉन्सेप्ट कार्यक्रम।
- विभिन्न सरकारी क्षेत्रों में अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी को अपनाने को बढ़ावा देना।
अंतरराष्ट्रीय सहयोग एवं वैश्विक बाजार तक पहुंच:
- द्विपक्षीय एवं बहुपक्षीय सहयोग के माध्यम से अग्रणी अंतरिक्ष देशों के साथ अंतरराष्ट्रीय साझेदारियों को सुदृढ़ बनाना।
- अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष आयोजनों, व्यावसायिक मंचों तथा बिजनेस-टू-बिजनेस सहभागिताओं में भागीदारी को समर्थन देकर वैश्विक बाजार तक पहुंच को सुगम बनाना।
- निर्यात, प्रौद्योगिकी साझेदारी तथा वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में एकीकरण को बढ़ावा देने के लिए उभरते हुए अंतरिक्ष बाजारों के साथ सहयोग का विस्तार करना।
यह जानकारी प्रधानमंत्री कार्यालय, कार्मिक, लोक शिकायत एवं पेंशन, परमाणु ऊर्जा तथा अंतरिक्ष राज्य मंत्री डॉ. जितेन्द्र सिंह ने आज लोकसभा में एक लिखित उत्तर में दी।
अनुलग्नक – I
परिणाम
परिपक्व होती निजी अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था
जून 2020 में किए गए सुधारों के तहत अंतरिक्ष क्षेत्र को निजी भागीदारी के लिए खोलने के छह वर्ष बाद इसके परिणाम स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहे हैं। सक्रिय अंतरिक्ष स्टार्टअप्स की संख्या वर्ष 2014 में केवल 1 से बढ़कर आज 400 से अधिक हो गई है। निजी निवेश 600 मिलियन अमेरिकी डॉलर से अधिक हो चुका है और भारत के निजी अंतरिक्ष क्षेत्र ने प्रक्षेपण तथा कक्षा (ऑर्बिटल) संचालन क्षमता का सफल प्रदर्शन किया है। दो कंपनियों ने उप-कक्षीय (सब-ऑर्बिटल) प्रक्षेपण यान का सफल प्रक्षेपण किया है (नवम्बर 2022 और मई 2024 में)। एनजीई ने 30 से अधिक उपग्रहों को कक्षा में स्थापित किया है तथा पीएसएलवी ऑर्बिटल एक्सपेरिमेंटल मॉड्यूल (पीओईएम) जैसे प्लेटफॉर्मों के माध्यम से लगभग 45 पेलोड अंतरिक्ष में संचालित किए जा रहे हैं।
अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था: निवेश में वृद्धि, निवेशकों का व्यापक आधार और प्रत्यक्ष विदेशी निवेश
निजी पूंजी में न केवल उल्लेखनीय वृद्धि हुई है, बल्कि निवेशकों का आधार भी व्यापक हुआ है। संचयी वित्तपोषण वर्ष 2021-22 में 100.5 मिलियन अमेरिकी डॉलर को पार कर गया, वर्ष 2023-24 में बढ़कर 348.5 मिलियन अमेरिकी डॉलर तक पहुंच गया और 31 मार्च 2026 तक यह 618.5 मिलियन अमेरिकी डॉलर हो गया। साथ ही, निवेश का स्वरूप शुरुआती चरण के सीड निवेश से आगे बढ़कर विकास चरण की ओर स्थानांतरित हुआ है।
भारत के अंतरिक्ष इकोसिस्टम को गति देने वाले निवेशकों का आधार अब सम्पन्न निवेशकों तक सीमित नहीं रहा है। अब संप्रभु संपदा कोष, वैश्विक परिसंपत्ति प्रबंधक और रणनीतिक कॉर्पोरेट निवेशक भी निवेशकों की सूची में प्रमुख रूप से शामिल हैं। इस परिपक्व होते निवेश परिदृश्य के परिणामस्वरूप स्काईरूट एयरोस्पेस, जीआईसी और ब्लैकरॉक के निवेश सहयोग के साथ अंतरिक्ष क्षेत्र की पहली यूनिकॉर्न कंपनी बनी। वहीं, दिगंतारा ने जापान की एसबीआई इन्वेस्टमेंट की भागीदारी के साथ 50 मिलियन अमेरिकी डॉलर का निवेश हासिल किया, जबकि पिक्सेल को वैश्विक प्रौद्योगिकी कंपनी अल्फाबेट का समर्थन प्राप्त हुआ।
यह गति वर्ष 2026 में और तेज हुई। अग्निकुल कॉसमॉस ने इक्विटी निवेश के रूप में 2.7 मिलियन अमेरिकी डॉलर जुटाने के साथ-साथ तमिलनाडु सरकार से ऐतिहासिक 25 करोड़ रुपये का निवेश प्राप्त किया। गैलेक्सआई ने वर्ष की शुरुआत में कई निवेश चरणों के माध्यम से 11 मिलियन अमेरिकी डॉलर से अधिक की राशि जुटाई, जबकि ध्रुव स्पेस ने मई में 105 करोड़ रुपये (12.5 मिलियन अमेरिकी डॉलर) का निवेश प्राप्त कर अपनी उपग्रह समूह क्षमताओं के तीव्र विस्तार की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाया। हालांकि, ये चर्चित सफलता की कहानियां अंतरिक्ष क्षेत्र में बढ़ती व्यावसायिक संभावनाओं को दर्शाती हैं, लेकिन वे देश के कहीं अधिक व्यापक, जीवंत और तेजी से विकसित हो रहे अंतरिक्ष इकोसिस्टम की केवल एक छोटी-सी झलक भर हैं।
निजी अंतरिक्ष मिशनों का एक वर्ष: देश और विदेश में सहयोग तथा बढ़ता विश्वास
पिछले एक वर्ष के दौरान भारतीय कंपनियों ने अपनी तकनीकी विशेषज्ञता का प्रभावी प्रदर्शन किया है और अनेक अवसरों पर अंतरराष्ट्रीय भागीदारों के साथ मिलकर सफल मिशन संचालित किए हैं। जनवरी 2025 में पिक्सेल, दिगांतारा और एक्सडीलिंक्स स्पेसलैब्स ने एक साथ सफलतापूर्वक कक्षा में प्रवेश किया। इसके बाद अगस्त 2025 में पिक्सेल ने फाल्कन-9 के माध्यम से तीन और उपग्रह प्रक्षेपित कर अपने छह-उपग्रहों वाले फायरफ्लाई उपग्रह समूह के प्रथम चरण को पूरा किया, जो वर्तमान में सेवा में उपलब्ध सर्वाधिक उच्च-रिज़ॉल्यूशन वाला वाणिज्यिक हाइपरस्पेक्ट्रल प्रणाली है। ध्रुव स्पेस ने अपने थायबोल्ट-3 और लीप-1 मिशनों का सफल संचालन किया तथा एमओआई-1 और लाचित जैसे सहयोगात्मक मिशनों में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया। इसके अतिरिक्त बेलाट्रिक्स, गैलेक्सआई, ग्रहा स्पेस, हेक्स-20, टेकमी2स्पेस, ऑर्बिटएड सहित अनेक अन्य कंपनियों ने भी निजी क्षेत्र की ऑर्बिटल क्षमताओं का सफल प्रदर्शन किया। प्रक्षेपण यान और प्रणोदन प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में अग्निकुल कॉसमॉस ने अपने 3डी-प्रिंटेड सेमी-क्रायोजेनिक इंजन का सफल परीक्षण किया, जबकि स्काईरूट एयरोस्पेस ने इसरो की एक सुविधा में अपने विक्रम रॉकेट के लिए ठोस ईंधन मोटर का सफल परीक्षण किया।
पीएसएलवी ऑर्बिटल एक्सपेरिमेंटल मॉड्यूल अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी के प्रमाणीकरण की प्रक्रिया में क्रांतिकारी बदलाव लाया है। इसने स्टार्टअप्स और शैक्षणिक संस्थानों को अंतरिक्ष में अपने पेलोड और प्रौद्योगिकियों के सत्यापन के लिए एक अत्यधिक सुलभ और कम लागत वाला मंच उपलब्ध कराया है। पीओईएम-4 मॉड्यूल में इसरो तथा शैक्षणिक संस्थानों के प्रयोगों के साथ-साथ गैलेक्सआई, बेलाट्रिक्स, टेकमी2स्पेस, पियरसाइट स्पेस, मनस्तु स्पेस और एनस्पेस टेक के पेलोड भी शामिल थे।
भारतीय अंतरिक्ष उद्योग की व्यावसायिक पहुंच भी लगातार बढ़ रही है। दिगंतारा अमेरिका और यूरोप में अपने कार्यालय स्थापित कर रही है तथा सिंगापुर और यूनाइटेड किंगडम की अंतरिक्ष एजेंसियों के साथ कार्य कर रही है। वहीं पिक्सेल विभिन्न महाद्वीपों के ग्राहकों को हाइपरस्पेक्ट्रल डेटा उपलब्ध करा रही है। इन-स्पेस ने 45 से अधिक देशों के साथ कार्य संबंध स्थापित किए हैं और विदेशी अंतरिक्ष एजेंसियों के साथ तीन सहयोग समझौतों पर हस्ताक्षर किए हैं। देश में, इन-स्पेस की अर्थ ऑब्जर्वेशन–पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप (ईओ-पीपीपी) पहल के तहत पिक्सेल, ध्रुव स्पेस, सैटश्योर और पियरसाइट स्पेस ने एलाइड ऑर्बिट्स के रूप में साझेदारी की है। इस साझेदारी के तहत लगभग 1,200 करोड़ रुपये के निजी निवेश से पांच वर्षों में 12 बहु-मोडल उपग्रहों वाला भारत का पहला निजी स्वामित्व वाला पृथ्वी अवलोकन उपग्रह समूह विकसित किया जाएगा, जो देश को उच्च-रिज़ॉल्यूशन वाला कानून के अधीन डेटा उपलब्ध कराएगा।
पराग कणों से पता चला हड़प्पा सभ्यता क्यों सिकुड़ गई
भारत के गढ़वाल हिमालय में वनस्पति की गतिशीलता और उससे संबंधित जल-जलवायु परिवर्तनशीलता को समझना, उत्तर होलोसीन (मेघालय युग; 4.2 हजार वर्ष पूर्व से वर्तमान तक) के दौरान मानसूनी परिवर्तनशीलता को समझने में महत्वपूर्ण हो सकता है। हिमालय से प्राप्त होलोसीन झील अभिलेख (नाचिकेता ताल, छराका ताल, देवर ताल, देवरिया ताल) सीमित हैं क्योंकि इनमें रेडियोकार्बन कालक्रम ठीक से निर्धारित नहीं हैं, जिनमें जलाशय प्रभाव, आयु संबंधी बड़ी त्रुटियां और मोटे तौर पर नमूने लेने की प्रक्रिया शामिल है।
इसलिए, इस शोध की कमी को दूर करने के लिए विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग (डीएसटी) के स्वायत्त संस्थान बीरबल साहनी इंस्टीट्यूट ऑफ पैलियोसाइंसेज (बीएसआईपी) ने गढ़वाल हिमालय के देवरिया ताल (झील) से प्राप्त एक अच्छी तरह से दिनांकित (10 एएमएस 14 सी तिथियां) तलछट कोर पर जांच की, ताकि मध्य होलोसीन से लेकर वर्तमान तक फैले वनस्पति गतिशीलता, जल-जलवायु परिवर्तन और आईएसएम परिवर्तनशीलता का उच्च रिज़ॉल्यूशन (शताब्दी से सहस्राब्दी पैमाने तक) पराग-आधारित रिकॉर्ड प्रदान किया जा सके।
पराग और बीजाणुओं का उपयोग अतीत की वनस्पति गतिशीलता और समकालीन जलवायु परिवर्तन के पुनर्निर्माण के लिए स्थापित उपकरणों के रूप में किया जाता रहा है।
त्रापा बीज के खोलों पर प्राप्त दस एएमएस रेडियोकार्बन ( 14सी ) तिथियों ने देवरिया ताल से प्राप्त तलछट कोर के कालक्रम को विकसित करने में सहायता की। रेडियोकार्बन डेटिंग का कार्य अमेरिका में जॉर्जिया विश्वविद्यालय के सेंटर फॉर एप्लाइड आइसोटोप स्टडीज (सीएआईएस) में किया गया और तिथियों को ऑक्सकैल 4.355 का उपयोग करके कैलेंडर वर्षों में परिवर्तित किया गया।
डॉ. मोहम्मद फ़िरोज़ क़मर के नेतृत्व में शोधकर्ताओं ने लगभग 4250 कैलेंडर वर्ष बीपी के आसपास ओक/पाइन अनुपात में अचानक वृद्धि पाई, जो 4200 कैलेंडर वर्ष बीपी पर अचानक, अल्पकालिक शुष्क जलवायु स्थिति के स्थल से पहले से प्रलेखित मौलिक और तलछटी साक्ष्य के अनुरूप है, जिसे विश्व स्तर पर “4.2 हजार घटना” (का = हजार) के रूप में जाना जाता है।
वैज्ञानिकों का मानना है कि इससे सिंधु घाटी सभ्यता (आईवीसी) या हड़प्पा सभ्यता के सिंधु नदी और घग्गर-हाकरा नदी के किनारे बसे लोगों का पलायन हुआ। वे घरेलू और कृषि कार्यों के लिए पूर्वी गांगेय मैदानी इलाकों के नए क्षेत्रों में चले गए, क्योंकि थार रेगिस्तान के किनारे नदी प्रणाली में आने वाली नियमित मौसमी बाढ़ समाप्त हो गई थी। इस प्रकार, शोधकर्ताओं ने हड़प्पा सभ्यता के संकुचन का कारण भारत के गढ़वाल हिमालय में 4.2 हजार वर्ष पूर्व होलोसीन काल में हुए अचानक जलवायु परिवर्तन (एसीसी) को बताया।
वैज्ञानिकों ने ठंडी-शुष्क जलवायु और कमजोर समुद्री सूक्ष्म भूभाग (आईएसएम) का कारण अंतर उष्णकटिबंधीय अभिसरण क्षेत्र (आईटीसीजेड) के दक्षिण की ओर खिसकने को बताया, जो उत्तरी गोलार्ध में गर्मियों में सौर विकिरण में कमी के परिणामस्वरूप होता है। 4.2 हजार वर्ष पहले आईएसएम के अचानक कमजोर होने का संबंध अल-नीनो के मजबूत चरण और हिंद महासागर द्विध्रुव (आईओडी) के प्रबल ऋणात्मक अवस्था में परिवर्तन से जोड़ा गया है।
सबसे स्पष्ट होलोसीन शीतलन घटनाओं में से एक के रूप में, 4.2 हजार वर्ष पुरानी घटना निम्न अक्षांश क्षेत्र में आईएसएम के साथ-साथ अल नीनो, अंतर उष्णकटिबंधीय अभिसरण क्षेत्र (आईटीसीजेड), हिंद महासागर द्विध्रुव (आईओडी), और ग्रीष्मकालीन सौर विकिरण (एसआई) जैसे विभिन्न प्रेरक कारकों के बीच दूरसंचार की जांच करने के लिए एक प्राकृतिक प्रयोग प्रदान करती है।

चित्र 1. अध्ययन क्षेत्र का मानचित्र जिसमें अध्ययन स्थल देवरिया ताल को प्रमुखता से दर्शाया गया है। ऊपरी पैनल में राष्ट्रीय संदर्भ दिया गया है, जिसमें नई दिल्ली, चंडीगढ़ और श्रीनगर की स्थिति शामिल है। निचले पैनल में अध्ययन स्थल के आसपास की स्थानीय स्थलाकृति को दर्शाया गया है
डॉ. डेविड एफ. पोरिंचू (जॉर्जिया विश्वविद्यालय, अमेरिका), डॉ. अनूप कुमार सिंह (लखनऊ विश्वविद्यालय; लखनऊ, अब बाबू, लखनऊ में) और डॉ. बहादुर सिंह कोटलिया (कुमाऊं विश्वविद्यालय, नैनीताल; अब दिवंगत) के सहयोग से किए गए अध्ययन में विभिन्न अवधियों के दौरान अन्य वैश्विक जलवायु घटनाओं के संकेतों पर जोर दिया गया है।
शोधकर्ताओं ने यह भी कहा कि रोमन वार्म पीरियड (आरडब्ल्यूपी: 2500-1450 कैलेंडर वर्ष बीपी) के दौरान, जब उत्तरी अटलांटिक क्षेत्र गर्म था (सौर परिवर्तनशीलता या आंतरिक उत्तरी अटलांटिक परिवर्तनशीलता के कारण), आईएसएम मजबूत था (जिसके परिणामस्वरूप उच्च कृषि उत्पादकता हुई और “भारत के स्वर्ण युग” का उदय हुआ)। इसकी वजह संभवतः बढ़े हुए सौर विकिरण और आईटीसीजेड के संबंधित उत्तर की ओर खिसकना रहा होगा।
मध्यकालीन जलवायु विसंगति (एमसीए: 1050–650 कैलेंडर वर्ष बीपी ) के दौरान, आईटीसीजेड के उत्तर की ओर खिसकने से तीव्र आईएसएम (सूक्ष्म भूगर्भीय भूगर्भीय तरंगदैर्ध्य) उत्पन्न हुई। अन्य पहचाने गए कारकों में अल नीनो-दक्षिणी दोलन ( ईएनएसओ) द्वारा नियंत्रित सौर विकिरण में उतार-चढ़ाव, सकारात्मक तापमान विसंगतियां, सूर्य धब्बों की बढ़ी हुई गतिविधि, उच्च सौर विकिरण और उत्तरी अटलांटिक में ऊष्माभंगुर परिसंचरण की शक्ति में परिवर्तन शामिल थे। इसके अतिरिक्त, अरब सागर में हवा की बढ़ी हुई शक्ति और भारत में अधिक नमी की स्थिति भी इसी अवधि के दौरान देखी गई।

चित्र 2. अ) समय के सापेक्ष क्वेरकस और पाइनस की सापेक्ष बहुलता का आरेख। ब) आर्टेमिसिया और कैनाबिस सैटिवा, अमरेंथेसी, ब्रैसिकेसी, अल्टरनैंथेरा, कैरियोफिलेसी और कॉन्वोलवुलेसी से युक्त सिनैंथ्रोपिक परागकणों की सापेक्ष बहुलता और सेरेलिया की सापेक्ष बहुलता। ग) ओक/पाइन परागकण अनुपात और पोएसी की सापेक्ष बहुलता। घ) ओक/पाइन परागकण अनुपात और एक्सआरएफ-व्युत्पन्न मौलिक डेटा के पीसीए अक्ष 1 स्कोर (नीडरमैन एट अल., 2021)
छवि कॉपीराइट @ पैलियोजियोग्राफी, पैलियोक्लाइमेटोलॉजी, पैलियोइकोलॉजी (एल्सवियर), 2026
लघु हिमयुग (एलआईए: 650–100 कैलेंडर वर्ष पूर्व; 1350-1850 ईस्वी ) के दौरान आईएसएम कमजोर था, जिसका संबंध उत्तरी अटलांटिक दोलन (एनएओ) के सकारात्मक चरण के दौरान मध्य पूर्व में एशियाई पछुआ जेट स्ट्रीम और पछुआ हवाओं के तीव्र होने और ईएनएसओ के गर्म चरण के दौरान एशियाई जेट स्ट्रीम के निचले अक्षांशों की ओर पलायन से हो सकता है। एलआईए के दौरान आईएसएम के सबसे कमजोर चरण का संबंध ठंडे उत्तरी गोलार्ध के दौरान भूमध्य रेखा के पार उत्तर की ओर ऊर्जा प्रवाह में वृद्धि के कारण आईटीसीजेड के दक्षिण की ओर खिसकने से है। ईएनएसओ आईटीसीजेड की उत्तर की ओर गति को सीमित करता है, जिससे ग्रीष्म मानसून की शुरुआत में देरी होती है और वर्षा में कमी आती है।
पैलियोजियोग्राफी पैलियोक्लाइमेटोलॉजी पैलियोइकोलॉजी में प्रकाशित यह शोध, वर्तमान आईएसएम-प्रभावित जलवायु परिस्थितियों के साथ-साथ भविष्य के संभावित जलवायु रुझानों और अनुमानों के बारे में हमारी समझ को बेहतर बनाता है और नीति निर्माताओं को सामाजिक आवश्यकताओं को प्रभावी ढंग से पूरा करने वाली वैज्ञानिक रूप से सूचित रणनीतियों को विकसित करने के लिए अंतर्दृष्टि प्रदान करता है।
विकसित भारत के लिए नशा मुक्त युवा संकल्प अभियान का शुभारम्भ 2 अगस्त 2026 को होगा

प्रधानमंत्री के आह्वान पर ‘एमवाई भारत’ के नेतृत्व में एक राष्ट्रव्यापी जन आंदोलन के रूप में यह अभियान शुरू किया जाएगा। इसमें देश भर के युवाओं की सक्रिय भागीदारी होगी। इस पहल का उद्देश्य जागरूकता, सामुदायिक सहभागिता और निरंतर जन भागीदारी को बढ़ावा देकर नशामुक्त भारत के निर्माण के लिए युवा नागरिकों को एक सामूहिक राष्ट्रीय मिशन में एकजुट करना है।
प्रधानमंत्री के संबोधन से प्रेरित होकर, देश भर में लगभग 10,000 स्थानों पर एक साथ शपथ ग्रहण समारोह आयोजित किए जाएंगे, जिसमें एक करोड़ से अधिक युवा नशा मुक्ति की शपथ लेंगे, नशा मुक्त समाज के प्रति अपनी प्रतिबद्धता की पुष्टि करेंगे और नशा मुक्त युवा स्वयंसेवकों के रूप में राष्ट्र निर्माण के लिए खुद को समर्पित करेंगे।
इस अभियान में माय भारत स्वयंसेवकों, भारत राष्ट्रीय सेवा योजना (एनएसएस) स्वयंसेवकों, युवा क्लबों, स्कूलों, कॉलेजों, विश्वविद्यालयों, गैर-सरकारी संगठनों, औद्योगिक संघों और 125 से अधिक आध्यात्मिक संगठनों की अभूतपूर्व भागीदारी देखने को मिलेगी, जिससे यह देश में मादक द्रव्यों के दुरुपयोग के खिलाफ युवाओं के नेतृत्व वाले सबसे बड़े जन आंदोलनों में से एक बन जाएगा।
पारंपरिक जागरूकता कार्यक्रमों के विपरीत, विकसित भारत के लिए नशा मुक्त युवा संकल्प अभियान को 100 सप्ताह के सतत जन भागीदारी आंदोलन के रूप में परिकल्पित किया गया है। अगले 100 सप्ताहों तक प्रत्येक रविवार को स्वस्थ जीवन शैली को प्रोत्साहित करने, सामुदायिक भागीदारी को मजबूत करने और युवाओं की ऊर्जा को रचनात्मक राष्ट्र निर्माण की दिशा में निर्देशित करने के लिए देश भर में युवाओं के नेतृत्व में गतिविधियां आयोजित की जाएंगी।
साप्ताहिक गतिविधियों में खेल प्रतियोगिताएं, पैदल मार्च, ध्यान सत्र, सांस्कृतिक कार्यक्रम, कला और रचनात्मक प्रतियोगिताएं, नुक्कड़ नाटक (स्ट्रीट प्ले), जागरूकता अभियान और अन्य सामुदायिक सहभागिता पहल शामिल होंगी। इनका उद्देश्य सकारात्मक सामाजिक मूल्यों को बढ़ावा देते हुए समाज को मादक द्रव्यों के सेवन के हानिकारक प्रभावों को लेकर संवेदनशील बनाना है।
निरंतर भागीदारी को प्रोत्साहित करने और अनुकरणीय प्रयासों को मान्यता देने के लिए, अभियान में उत्कृष्ट योगदान देने वाले स्वयंसेवकों और संगठनों को 50वें, 75वें और 100वें सप्ताह के पड़ावों पर सम्मानित किया जाएगा, जिससे सार्वजनिक सेवा और सामूहिक जिम्मेदारी की भावना को बल मिलेगा।
केंद्रीय युवा कार्यक्रम एवं खेल मंत्री श्री मनसुख मांडविया ने देश भर के युवाओं और सामाजिक संगठनों से राष्ट्रीय हित में प्रधानमंत्री की अपील का समर्थन करने और इस ऐतिहासिक आंदोलन में सक्रिय भागीदार बनने का आह्वान किया है। लाखों युवाओं, संस्थानों और सामुदायिक संगठनों के सामूहिक प्रयासों से, इस अभियान का उद्देश्य एक राष्ट्रव्यापी सामाजिक आंदोलन का निर्माण करना है जो लोगों को नशे के सेवन को त्यागने और एक स्वस्थ, मजबूत तथा अधिक विकसित भारत के निर्माण में योगदान देने के लिए प्रेरित करे।
विकसित भारत के लिए नशा मुक्त युवा संकल्प अभियान प्रधानमंत्री के उस दृष्टिकोण को दर्शाता है जिसमें मादक पदार्थों के विरुद्ध लड़ाई को नागरिकों की सक्रिय भागीदारी से संचालित जन आंदोलन में परिवर्तित करने की बात कही गई है। “विकसित भारत की सबसे बड़ी शक्ति नशा मुक्त युवा हैं” के संदेश से प्रेरित यह अभियान इस राष्ट्रीय संकल्प को हर गांव, कस्बे और शहर तक पहुंचाने का प्रयास है ताकि विकसित भारत 2047 की ओर देश की यात्रा को और मजबूती मिल सके।
निपुण भारत मिशन और मूलभूत साक्षरता एवं संख्यात्मकता
यह मिशन, जो राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के अनुरूप है, समग्र शिक्षा की केंद्र प्रायोजित योजना — स्कूली शिक्षा के लिए एक समेकित योजना — के तत्वावधान में लॉन्च किया गया है। सभी राज्य/केंद्रशासित प्रदेश निपुण भारत मिशन का कार्यान्वयन कर रहे हैं। यह पहली बार है कि 3-6 वर्ष के आयु वर्ग को 5+3+3+4 संरचना के प्रारंभिक चरण में, जिसमें 3 वर्ष की बालवाटिका तथा कक्षा 1 एवं 2 शामिल हैं, विद्यालयी व्यवस्था का हिस्सा बनाया गया है। सरकारी तथा सरकारी सहायता प्राप्त विद्यालयों में प्रारंभिक चरण के लिए राज्य-वार नामांकन का विवरण अनुबंध-I में दिया गया है।
समग्र शिक्षा के अंतर्गत निपुण भारत मिशन सहित, विभिन्न हस्तक्षेपों के कार्यान्वयन के लिए राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को उनकी आवश्यकताओं और प्राथमिकताओं के आधार पर राज्यों एवं केंद्रशासित प्रदेशों द्वारा तैयार की गई समग्र शिक्षा की वार्षिक कार्ययोजना एवं बजट (एडब्ल्यूपी एंड बी) के अनुसार वित्तीय सहायता प्रदान की जाती है। इन योजनाओं का मूल्यांकन तथा अनुमोदन/आकलन योजना के कार्यक्रमगत एवं वित्तीय मानकों के अनुसार राज्यों एवं केंद्रशासित प्रदेशों के साथ परामर्श करके परियोजना अनुमोदन बोर्ड (पीएबी) द्वारा किया जाता है।
समग्र शिक्षा के लिए निधि एक समग्र रूप में जारी की जाती है। इन्हें कुछ शर्तों की पूर्ति के आधार पर जारी किया जाता है, जैसे व्यय की प्रगति, राज्यांश की अनुरूप प्राप्ति, लेखापरीक्षित लेखे, संचयी राज्यांश का विवरण, लंबित अग्रिमों का विवरण, अद्यतित व्यय विवरण तथा लेखापरीक्षित उपयोगिता प्रमाण-पत्र। निपुण भारत मिशन के अंतर्गत (समग्र शिक्षा के भाग के रूप में) पिछले तीन वर्षों तथा चालू वर्ष के दौरान आवंटित निधियों का राज्य-वार विवरण अनुबंध-II में दिया गया है।
सार्वभौमिक मूलभूत साक्षरता एवं संख्यात्मकता (एफएलएन) प्राप्त करने तथा अधिगम (लर्निंग) परिणामों में सुधार के लिए निपुण भारत मिशन के अंतर्गत निम्नलिखित विभिन्न पहलें की गई हैं:-
- कक्षा 1 के लिए खेल-आधारित तीन माह का ‘स्कूली तैयारी मॉड्यूल एवं दिशानिर्देश’, जिसका नाम ‘विद्या प्रवेश’ है, 29 जुलाई, 2021 को प्रारंभ किया गया। विद्या प्रवेश कार्यक्रम का उद्देश्य विविध पृष्ठभूमियों (बालवाटिका, आंगनवाड़ी केंद्र (एडब्ल्यूसी), घर, निजी प्ले स्कूल आदि) से कक्षा 1 में आने वाले सभी बच्चों में स्कूली तैयारी को बढ़ावा देना है, जिससे उनका कक्षा 1 में सहज अंतरण सुनिश्चित हो सके। यह आनंददायक एवं प्रेरक वातावरण में खेल-आधारित, आयु तथा विकास के अनुरूप अधिगम अनुभव प्रदान करता है, जिससे बच्चे की पूर्व-साक्षरता, पूर्व-संख्यात्मकता, संज्ञानात्मक तथा सामाजिक कौशलों के साथ-साथ समग्र विकास को सुदृढ़ किया जा सके। यह कार्यक्रम पूरे देश में लागू किया जा रहा है। वर्ष 2022-23 से अब तक 8.8 लाख विद्यालयों के 5 करोड़ से अधिक विद्यार्थी इससे लाभान्वित हो चुके हैं।
- 3 से 6 वर्ष के आयु वर्ग के बच्चों के लिए शिक्षण-अधिगम सामग्री (एलटीएम) के संग्रह ‘जादुई पिटारा’ (जेपी) का शुभारंभ 20 फरवरी, 2023 को किया गया। यह एक बॉक्स है, जिसमें प्रारंभिक चरण के लिए 53 शिक्षण-अधिगम सामग्री शामिल हैं, जैसे खिलौने, खेल, पहेलियां, कठपुतलियां, पोस्टर, फ्लैशकार्ड, कहानी कार्ड, विद्यार्थियों के लिए प्ले बुक सेट तथा शिक्षकों के लिए पुस्तिकाएं। जादुई पिटारा की उपयोगकर्ता पुस्तिका तथा सभी गतिविधि कार्ड, चित्र पठन पोस्टर, कहानी कार्ड और निर्देशों का 22 भाषाओं में अनुवाद किया गया है। इसमें प्रशिक्षकों के लिए ‘उन्मुख’ नामक एक प्रशिक्षक पुस्तिका भी शामिल है, जो प्रशिक्षकों के लिए एक व्यापक मार्गदर्शिका है और जिसमें 3-6 वर्ष के आयु वर्ग के बच्चों के लिए गतिविधियों का संकलन उपलब्ध है।
- जादुई पिटारा (जेपी) पर आधारित ई-जादुई पिटारा (ई-जेपी) का शुभारंभ 10 फरवरी, 2024 को किया गया। ई-जेपी एक मोबाइल-आधारित एप्लिकेशन और वेबसाइट है, जो खेल-आधारित शिक्षण पद्धति पर आधारित है तथा 3 से 8 वर्ष के आयु वर्ग के बच्चों के लिए खेल-आधारित शिक्षण-अधिगम सामग्री (एलटीएम) के संग्रह ‘जादुई पिटारा’ के अधिगम को व्यापक रूप से प्रसारित करने का माध्यम है। इसे https://ejaaduipitara.ncert.gov.in/ पर देखा जा सकता है।
- कक्षा 1 और 2 के लिए खेल एवं गतिविधि-आधारित पाठ्य-पुस्तकें भी तैयार की गई हैं और उन्हें राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों के साथ साझा किया गया है (हिंदी– “सारंगी”, अंग्रेज़ी– “मृदंग”, गणित– “जॉयफुल मैथमेटिक्स” एवं “आनंदमय गणित”, तथा उर्दू– “शहनाई”), जो राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 तथा प्रारंभिक चरण के लिए राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा (एनसीएफ-एफएस) की अनुशंसाओं के अनुरूप हैं।
- मातृभाषा में बुनियादी साक्षरता एवं संख्यात्मकता (एफएलएन) के अधिगम के लिए 121 स्थानीय भाषाओं में प्रारंभिक पठन-पुस्तिकाएं (प्राइमर्स) विकसित की गई हैं। ये वे भाषाएं हैं, जिन्हें कम-से-कम 10,000 लोग बोलते हैं।
- राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय अनुसंधान के आधार पर अधिगम परिणामों के अनुरूप बालवाटिका से लेकर कक्षा 2 तक के लिए बुनियादी साक्षरता एवं संख्यात्मकता (एफएलएन) के लक्ष्य विकसित किए गए हैं।
- शिक्षकों के सतत् व्यावसायिक विकास को सुनिश्चित करने के लिए सरकार ने अक्टूबर, 2020 में दीक्षा (ज्ञान साझाकरण हेतु डिजिटल अवसंरचना) मंच पर ऑनलाइन निष्ठा कार्यक्रम का शुभारंभ किया। यह कार्यक्रम बुनियादी साक्षरता एवं संख्यात्मकता (एफएलएन) के विकासात्मक लक्ष्यों और अधिगम परिणामों के अनुरूप पाठ्य तथा वीडियो सामग्री सहित बहुभाषी प्रशिक्षण मॉड्यूल उपलब्ध कराता है। दीक्षा पर एफएलएन के लिए एक समर्पित अनुभाग भी उपलब्ध है, जिसमें उच्च गुणवत्ता वाले अधिगम संसाधन देशभर में, सामाजिक एवं आर्थिक रूप से वंचित जिलों सहित, उपलब्ध हैं। वर्तमान में दीक्षा पर 133 भाषाओं (126 भारतीय भाषाएं और 7 विदेशी भाषाएं) में सामग्री उपलब्ध है, तथा निष्ठा एफएलएन एवं ईसीसीई के अंतर्गत 15.57 लाख से अधिक उपयोगकर्ता ऑनलाइन प्रशिक्षण कार्यक्रम सफलतापूर्वक पूरा कर चुके हैं।
यह जानकारी शिक्षा राज्य मंत्री श्री जयंत चौधरी ने आज राज्यसभा में एक लिखित उत्तर में दी।
अनुबंध-I
राज्यसभा अतारांकित प्रश्न संख्या 1142, जिसका उत्तर 29.07.2026 को दिया गया, के भाग (क) एवं (ख) के उत्तर में उल्लिखित अनुबंध-I; माननीय सांसद श्रीमती सीमा द्विवेदी, श्री बृज लाल, डॉ. संदीप कुमार पाठक तथा श्री केसरिदेवसिंह झाला द्वारा पूछे गए “निपुण भारत मिशन और बुनियादी साक्षरता एवं संख्यात्मकता” संबंधी प्रश्न के संदर्भ में
| सरकारी एवं सरकारी सहायता प्राप्त विद्यालयों में प्रारंभिक चरण के लिए राज्य-वार नामांकन | ||||
| राज्य/केंद्र शासित प्रदेश | 2022-23 | 2023-24 | 2024-25 | 2025-26 |
| अंडमान और निकोबार द्वीप समूह | 11,291 | 11,042 | 10,913 | 11,474 |
| आंध्र प्रदेश | 6,40,500 | 6,64,776 | 5,82,824 | 5,44,883 |
| अरुणाचल प्रदेश | 48,179 | 46,616 | 40,359 | 37,964 |
| असम | 13,14,702 | 12,22,654 | 11,15,213 | 10,35,658 |
| बिहार | 36,35,668 | 25,90,376 | 25,11,248 | 24,28,158 |
| चंडीगढ़ | 30,164 | 29,309 | 26,925 | 30,343 |
| छत्तीसगढ़ | 7,21,279 | 7,23,579 | 6,76,804 | 6,24,948 |
| दादरा और नगर हवेली तथा दमन और दीव | 20,347 | 22,362 | 22,464 | 24,704 |
| दिल्ली | 4,50,703 | 4,16,484 | 3,85,120 | 3,54,797 |
| गोवा | 58,296 | 57,245 | 55,037 | 52,387 |
| गुजरात | 13,89,600 | 13,35,387 | 12,69,636 | 17,25,726 |
| हरियाणा | 3,90,089 | 3,04,590 | 3,15,643 | 3,24,882 |
| हिमाचल प्रदेश | 1,57,190 | 1,56,867 | 1,45,519 | 1,43,975 |
| जम्मू और कश्मीर | 4,02,784 | 4,18,042 | 3,90,012 | 3,60,676 |
| झारखंड | 11,24,858 | 10,56,983 | 9,11,220 | 8,54,140 |
| कर्नाटक | 12,31,328 | 9,96,359 | 9,14,375 | 8,91,573 |
| केरल | 9,08,195 | 8,79,307 | 8,14,291 | 7,49,451 |
| लद्दाख | 8,934 | 8,357 | 8,314 | 8,166 |
| लक्षद्वीप | 3,322 | 3,403 | 3,409 | 3,423 |
| मध्य प्रदेश | 17,37,576 | 15,28,342 | 12,45,396 | 11,82,094 |
| महाराष्ट्र | 25,85,858 | 24,19,182 | 22,26,691 | 22,06,774 |
| मणिपुर | 81,599 | 77,863 | 75,344 | 66,876 |
| मेघालय | 2,96,253 | 2,88,573 | 2,77,943 | 3,00,931 |
| मिजोरम | 45,663 | 43,612 | 39,308 | 38,971 |
| नागालैंड | 61,265 | 53,689 | 51,483 | 47,521 |
| ओडिशा | 10,64,315 | 10,08,836 | 9,17,659 | 10,51,011 |
| पुदुचेरी | 24,007 | 21,877 | 20,329 | 20,109 |
| पंजाब | 7,99,946 | 7,97,689 | 7,24,138 | 6,96,921 |
| राजस्थान | 16,49,319 | 13,24,618 | 10,54,543 | 10,53,570 |
| सिक्किम | 14,292 | 12,731 | 12,556 | 12,526 |
| तमिलनाडु | 9,78,945 | 8,81,865 | 7,93,853 | 7,65,646 |
| तेलंगाना | 5,07,830 | 4,08,333 | 3,69,732 | 3,86,831 |
| त्रिपुरा | 94,516 | 90,103 | 85,881 | 84,963 |
| उत्तराखंड | 48,81,250 | 37,37,647 | 28,95,290 | 30,32,603 |
| उत्तर प्रदेश | 1,64,080 | 1,40,936 | 1,06,552 | 77,636 |
| पश्चिम बंगाल | 34,85,224 | 35,19,543 | 32,71,717 | 31,33,498 |
| अखिल भारतीय | 3,10,19,367 | 2,72,99,177 | 2,43,67,741 | 2,43,65,809 |
स्रोत: यूडीआईएसई+
अनुबंध-II
राज्यसभा अतारांकित प्रश्न संख्या 1142, जिसका उत्तर 29.07.2026 को दिया गया, के भाग (ग) के उत्तर में उल्लिखित अनुबंध-II; माननीय सांसद श्रीमती सीमा द्विवेदी, श्री बृज लाल, डॉ. संदीप कुमार पाठक तथा श्री केसरिदेवसिंह झाला द्वारा पूछे गए “निपुण भारत मिशन और बुनियादी साक्षरता एवं संख्यात्मकता” संबंधी प्रश्न के संदर्भ में
निपुण भारत मिशन के अंतर्गत राज्य-वार आवंटित निधि
(लाख रुपये में)
| क्रम संख्या | राज्य/केंद्र शासित प्रदेश | 2023-24 | 2024-25 | 2025-26 | 2026-27 |
| कुल योग | 3,83,290.85 | 4,60,780.93 | 2,81,690.24 | 4,19,572.53 | |
| 1 | अंडमान और निकोबार द्वीप समूह | 866.74 | 764.23 | 836.32 | 837.88 |
| 2 | आंध्र प्रदेश | 6,184.48 | 7,842.35 | 3,732.30 | 7,455.05 |
| 3 | अरुणाचल प्रदेश | 3,596.81 | 3,704.90 | 3,514.69 | 839.3 |
| 4 | असम | 13,800.57 | 34,663.28 | 7,068.95 | 16,510.92 |
| 5 | बिहार | 48,337.02 | 65,361.86 | 25,385.06 | 60,614.96 |
| 6 | चंडीगढ़ | 483.79 | 406.52 | 372.62 | 450.92 |
| 7 | छत्तीसगढ़ | 15,886.90 | 17,678.32 | 7,506.32 | 11,841.47 |
| 9 | दादरा और नगर हवेली तथा दमन और दीव | 1,046.74 | 1,018.90 | 1,003.29 | 928.55 |
| 8 | दिल्ली | 6,428.72 | 8,553.69 | 5,577.95 | 7,072.44 |
| 10 | गोवा | 296.94 | 293.58 | 49.49 | 43.99 |
| 11 | गुजरात | 11,135.59 | 13,461.54 | 13,120.29 | 13,438.93 |
| 12 | हरियाणा | 11,755.65 | 9,737.24 | 2,301.23 | 5,302.37 |
| 13 | हिमाचल प्रदेश | 11,526.46 | 15,288.30 | 14,986.39 | 14,158.11 |
| 14 | जम्मू और कश्मीर | 19,390.83 | 18,399.82 | 15,955.20 | 11,974.55 |
| 15 | झारखंड | 11,939.48 | 15,334.93 | 6,119.98 | 20,321.90 |
| 16 | कर्नाटक | 10,044.22 | 9,463.97 | 9,397.99 | 21,140.29 |
| 17 | केरल | 5,250.79 | 5,631.18 | 3,666.76 | 3,610.35 |
| 18 | लद्दाख | 2,131.85 | 752.75 | 758.37 | 681.35 |
| 19 | लक्षद्वीप | 30.7 | 44.21 | 46.36 | 36.66 |
| 20 | मध्य प्रदेश | 32,797.48 | 43,175.68 | 15,572.15 | 26,147.31 |
| 21 | महाराष्ट्र | 21,853.42 | 18,918.77 | 7,905.88 | 20,714.46 |
| 22 | मणिपुर | 4,121.95 | 4,589.13 | 1,895.21 | 2,105.18 |
| 23 | मेघालय | 4,884.50 | 1,082.32 | 1,203.50 | 143.6 |
| 24 | मिजोरम | 1,655.45 | 1,370.69 | 1,315.08 | 1,214.12 |
| 25 | नागालैंड | 4,591.07 | 982.64 | 389.16 | 665.65 |
| 26 | ओडिशा | 15,000.99 | 15,060.12 | 29,408.09 | 27,811.61 |
| 27 | पुदुचेरी | 775.64 | 174.87 | 113.65 | 307.72 |
| 28 | पंजाब | 10,162.88 | 14,894.76 | 12,281.56 | 11,970.94 |
| 29 | राजस्थान | 15,156.90 | 15,379.14 | 5,682.64 | 15,437.26 |
| 30 | सिक्किम | 1,835.15 | 1,157.59 | 753.7 | 883 |
| 31 | तमिलनाडु | 13,086.10 | 16,917.51 | 5,462.43 | 12,279.21 |
| 32 | तेलंगाना | 2,753.43 | 4,421.39 | 8,148.11 | 4,990.27 |
| 33 | त्रिपुरा | 1,939.47 | 2,166.86 | 1,241.07 | 1,762.33 |
| 34 | उत्तराखंड | 4,571.27 | 5,085.57 | 2,285.12 | 4,043.02 |
| 35 | उत्तर प्रदेश | 53,987.75 | 66,364.13 | 55,996.36 | 85,487.14 |
| 36 | पश्चिम बंगाल | 13,983.12 | 20,638.20 | 10,637.00 | 6,349.71 |
शिक्षा को रोजगार अवसरों के साथ जोड़ना
राष्ट्रीय क्रेडिट फ्रेमवर्क (एनसीआरएफ), राष्ट्रीय उच्च शिक्षा योग्यता फ्रेमवर्क (एनएचईक्यूएफ), अकादमिक बैंक ऑफ क्रेडिट्स (एबीसी) और मल्टीपल एंट्री एवं मल्टीपल एग्जिट प्रावधान अकादमिक, व्यावसायिक और अनुभवात्मक शिक्षा के एकीकरण, संचय और हस्तांतरण के लिए एक ढांचा प्रदान करते हैं।
अकादमिक शिक्षा और रोजगार की आवश्यकताओं के बीच संबंध को मजबूत करने के लिए उच्च शिक्षा पाठ्यक्रमों में परिणाम आधारित शिक्षा, कौशल आधारित मॉड्यूल, परियोजना आधारित शिक्षण, इंटर्नशिप और उद्योग सहभागिता का प्रावधान किया गया है। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) और अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद (एआईसीटीई) ने उच्च शिक्षण संस्थानों और तकनीकी संस्थानों द्वारा संचालित किए जाने वाले अप्रेंटिसशिप एम्बेडेड डिग्री प्रोग्राम (एईडीपी) के लिए दिशानिर्देश जारी किए हैं।
इसका उद्देश्य अध्ययन के दौरान विद्यार्थियों को व्यावहारिक अनुभव प्रदान करना, स्नातकों की दक्षताओं को बढ़ाना और उनकी रोजगार क्षमता में सुधार करना है। यूजीसी और एआईसीटीई अप्रेंटिसशिप घटक के मूल्यांकन के लिए उद्योग/प्रतिष्ठान, शिक्षा जगत और उच्च शिक्षण संस्थानों (एचईआई) को शामिल करते हुए मूल्यांकन प्रक्रिया अपनाते हैं।
राष्ट्रीय अप्रेंटिसशिप प्रशिक्षण योजना (एनएटीएस) का उद्देश्य भारतीय युवाओं को कार्यस्थल आधारित प्रशिक्षण और कौशल प्रदान करना है। इसे शिक्षा मंत्रालय के उच्च शिक्षा विभाग द्वारा मुंबई, कानपुर, चेन्नई और कोलकाता स्थित चार क्षेत्रीय अप्रेंटिसशिप प्रशिक्षण बोर्डों/व्यावहारिक प्रशिक्षण बोर्डों (बीओएटी/बीओपीटी) के माध्यम से लागू किया जाता है।
पिछले पांच वर्षों (2021-2022 से 2025-2026) के दौरान एनएटीएस के अंतर्गत लगभग 17.22 लाख अप्रेंटिस शामिल किए गए हैं। इस अवधि के दौरान शिक्षा मंत्रालय ने अप्रेंटिस के लिए स्टाइपेंड सहायता के रूप में 2892.75 करोड़ रुपये जारी किए हैं।
एनएटीएस 2.0 पोर्टल को अप्रेंटिसशिप प्रशिक्षण के पंजीकरण और प्रबंधन के लिए एक तकनीक आधारित मंच के रूप में शुरू किया गया है। इसमें अप्रेंटिसशिप अनुबंधों की डिजिटल प्रक्रिया, प्रशिक्षण और स्टाइपेंड संबंधी प्रक्रियाओं की निगरानी तथा अप्रेंटिस और प्रतिष्ठानों की बेहतर ट्रैकिंग की सुविधा उपलब्ध है।
एनएटीएस के अंतर्गत अब तक एईडीपी के कार्यान्वयन के लिए उच्च शिक्षण संस्थानों (एचईआई) के साथ लगभग 457 समझौता ज्ञापनों (एमओयू) पर हस्ताक्षर किए गए हैं। इसके अतिरिक्त, 75,000 से अधिक अप्रेंटिस एआई अप्रेंटिसशिप कार्यक्रम से लाभान्वित हुए हैं।
एआईसीटीई ने उभरते क्षेत्रों और प्रमुख इंजीनियरिंग पाठ्यक्रमों में तकनीकी शिक्षा के पाठ्यक्रमों तथा शिक्षण पद्धतियों का व्यापक मूल्यांकन किया है, ताकि उन्हें बदलती उद्योग आवश्यकताओं के अनुरूप बनाया जा सके।
इस मूल्यांकन में डिग्री-केंद्रित शिक्षा से हटकर कौशल, अनुकूलन क्षमता, व्यावहारिक अनुभव और उद्योग प्रासंगिकता पर अधिक जोर दिया गया है। मॉडल पाठ्यक्रमों को राष्ट्रीय महत्व के संस्थानों के प्रमुख शिक्षाविदों, उद्योग विशेषज्ञों, सार्वजनिक संगठनों और अनुसंधान संस्थानों के परामर्श से विकसित किया गया है।
इन पाठ्यक्रमों में अनुभवात्मक शिक्षण, इंटर्नशिप, बहुविषयक अनुभव और उभरती प्रौद्योगिकियों से संबंधित दक्षताओं को शामिल किया गया है, ताकि वर्तमान और भविष्य की कार्यबल आवश्यकताओं को पूरा किया जा सके।
मॉडल पाठ्यक्रम में अधिक लचीलापन प्रदान करने के लिए क्रेडिट आवश्यकताओं को कम किया गया है और रोजगार क्षमता पर केंद्रित “मूल्यवर्धित” पाठ्यक्रमों को शामिल किया गया है।
एआईसीटीई ने सितंबर 2025 में प्रोजेक्ट प्रैक्टिस शुरू किया है, जिसका उद्देश्य टियर-2 और टियर-3 शहरों के एआईसीटीई अनुमोदित संस्थानों में सैद्धांतिक रटने वाली शिक्षा से हटकर व्यावहारिक परियोजना आधारित शिक्षण और उद्योग से जुड़े कौशल प्रशिक्षण को बढ़ावा देना है।
इसके अतिरिक्त, एआईसीटीई ने कैंपस कार्यक्रमों में कार्य आधारित शिक्षण, परियोजना पोर्टफोलियो और एआई से संबंधित दक्षताओं को शामिल करने के लिए कई प्रमुख सुधार शुरू किए हैं। इन सुधारों में पाठ्यक्रमों में उभरती और एआई आधारित प्रौद्योगिकियों का समावेश, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (कृत्रिम बुद्धिमत्ता), मशीन लर्निंग (मशीन अधिगम), रोबोटिक्स और साइबर-फिजिकल सिस्टम (साइबर-भौतिक प्रणाली) से संबंधित पाठ्यक्रमों एवं वैकल्पिक विषयों को शामिल करना शामिल है।
विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) ने सामुदायिक महाविद्यालयों, बी.वोक. डिग्री कार्यक्रमों और दीन दयाल उपाध्याय ज्ञान अर्जन एवं कौशल मानव क्षमताओं और आजीविका उन्नयन केंद्रों के माध्यम से कौशल आधारित शिक्षा को समर्थन दिया है।
रोजगारपरक कौशल मॉड्यूल को पाठ्यक्रम में जॉब रोल्स/स्वयम् (एसडब्ल्यूएवाईएएम) के एक भाग के रूप में शामिल किया गया है, जिनमें संचार कौशल, स्व-प्रबंधन कौशल, सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी (आईसीटी) कौशल, उद्यमिता कौशल और हरित कौशल शामिल हैं।
कौशल विकास को समर्थन देने के लिए स्वयम् प्लस (एसडब्ल्यूएवाईएएम प्लस) पोर्टल भी शुरू किया गया है, जो कार्यबल के अपस्किलिंग (कौशल उन्नयन) और रीस्किलिंग (पुनः कौशल विकास) पर केंद्रित है। 17 क्षेत्रों में 89 उद्योग भागीदारों से तैयार किए गए 500 से अधिक पाठ्यक्रम विकसित किए गए हैं और इन्हें एआई, डेटा एनालिस्ट (डेटा विश्लेषक) जैसे उभरते क्षेत्रों में उपलब्ध कराया गया है।
यह जानकारी शिक्षा राज्य मंत्री डॉ. सुकांत मजूमदार ने आज राज्यसभा में एक लिखित उत्तर में दी।
भारतीय स्वरुप दैनिक ई-पेपर