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गडकरी ने आंध्र प्रदेश के विजयवाड़ा में 21,559 करोड़ रुपये के निवेश से 51 राष्ट्रीय राजमार्ग परियोजनाओं का उद्घाटन और शिलान्यास किया

केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री श्री नितिन गडकरी ने आंध्र प्रदेश के विजयवाड़ा में आज 21,559 करोड़ रुपए के निवेश से कुल 1380 किलोमीटर लंबी 51 राष्ट्रीय राजमार्ग परियोजनाओं का उद्घाटन और शिलान्यास किया।

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इस अवसर पर श्री गडकरी ने कहा कि प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में हम आंध्र प्रदेश में विश्व स्तरीय बुनियादी ढांचे के निर्माण के लिए प्रतिबद्ध हैं। उन्होंने कहा कि बेहतर सड़क संपर्क तटीय क्षेत्र में पर्यटन को बढ़ावा देगा, शहरी और ग्रामीण युवाओं के लिए रोजगार के अवसर पैदा करेगा और आंध्र प्रदेश के लोगों को समृद्ध बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।

 

श्री नितिन गडकरी ने कहा कि सेतु भारतम के तहत आरओबी के निर्माण से निर्बाध यातायात की सुविधा होगी, यात्रियों की सुरक्षा सुनिश्चित होगी, समय के साथ-साथ ईंधन की बचत होगी और प्रदूषण भी कम होगा। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय राजमार्ग राज्य के सामाजिक-आर्थिक विकास की धमनियां हैं।

 

श्री गडकरी ने कहा कि आंध्र प्रदेश के विशाखापत्तनम और काकीनाडा बंदरगाहों के बीच 4 लेन की सड़क आवाजाही की सुविधाओं में सुधार लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी। उन्होंने कहा कि बेंज सर्कल फ्लाईओवर के निर्माण से विजयवाड़ा शहर में भीड़भाड़ कम करने में मदद मिलेगी।

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विकसित देशों की गैर टिकाऊ जीवनशैली आज भी पूरी दुनिया को खतरे में डाल रही है: भूपेन्दर यादव

केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री  भूपेन्दर यादव ने 16 फरवरी 2022 को विश्व टिकाऊ विकास सम्मेलन 2022 के 21वें संस्करण के उद्घाटन सत्र में विशेष भाषण दिया। डब्ल्यूएसडीएस ऊर्जा एवं संसाधन संस्थान (टेरी) का वार्षिक प्रमुख कार्यक्रम है।

श्री यादव ने जोर देकर कहा कि जलवायु परिवर्तन सहित वैश्विक पर्यावरण चुनौतियों का समाधान करने के लिए, हमें अब अनिवार्य रूप से समानता तथा समान लेकिन विभिन्न जिम्मेदारियों और संबंधित क्षमताओं को ध्यान में रखते हुए सहमति प्राप्त वैश्विक नियमों पर कार्य करना चाहिए। पेरिस समझौता के लक्ष्यों को तब तक अर्जित नहीं किया जा सकता है जब तक कि सभी देशों द्वारा वैश्विक कार्बन बजट के उचित हिस्से के भीतर रहते हुए इक्विटी को कार्यान्वित न किया जाए। हमारा लक्ष्य न्यायसंगत सतत विकास तथा जलवायु कार्रवाईयों में निष्पक्षता होनी चाहिए। केवल तभी ‘‘जलवायु न्याय‘ प्राप्त किया जा सकता है।

उन्होंने यह भी कहा कि संसाधनों के उपयोग के प्रति दृष्टिकोण अनिवार्य रूप से ‘सचेत और सुविचारित उपयोग’  न कि ‘विचारहीन तथा विनाशकारी’ होना चाहिए।  एल. आई. एफ. आई. (लाइफस्टाइल फॉर द इनविरोनमेंट) जिसका भारत के प्रधानमंत्री ने ग्लासगो में सीओपी 26 में अनावरण किया था, के लक्ष्य को विश्व द्वारा अपनाया जाना चाहिए जिससे कि मानवता तथा ग्रह की रक्षा हो सके। श्री यादव ने कहा, ‘‘ जिन्होंने विश्व को गलत दिशा में ले जाने में सबसे अधिक योगदान दिया है, उन्हें ही अनिवार्य रूप से स्थिरता के मार्ग पर वापस लाने के लिए सर्वाधिक प्रयास करना चाहिए।”

पर्यावरण को बचाने की गहन आवश्यकता पर विचार करते हुए श्री यादव ने रेखांकित किया कि हालांकि औद्योगिक क्रांति से देशों में समृद्ध आई है, पर इसके कारण पर्यावरण को भारी नुकसान हुआ है। उन्होंने कहा ‘‘अर्थव्यवस्था पर महामारी के प्रतिकूल प्रभावों के बावजूद, भारत ने वास्तव में अपनी जलवायु महत्वाकांक्षा में वृद्धि की है। भारत विश्व में सबसे महत्वाकांक्षी स्वच्छ ऊर्जा परिवर्तनों की अगुवाई कर रहा है।”

श्री यादव ने यह भी कहा कि भारत के समावेशी तथा टिकाऊ वृहद-आर्थिक विकास के लिए आवश्यक है कि देश के अनुकूलन तथा शमन दोनों ही उद्देश्‍यों को, हमारे लोगों की आकांक्षाओं तथा आवश्यकताओं के बड़े लक्ष्य के भीतर समान तथा न्यायोचित तरीके से पूरा किया जाए। उन्होंने कहा कि हमारे नवीनतम आम बजट ने इस मार्ग का अनुसरण करने के हमारे दृढ़ संकल्प की पुष्टि की है।

अपने संबोधन का समापन समानता की आवश्यकता के साथ करते हुए, उन्होंने कहा कि ‘‘विकसित देशों को अनिवार्य रूप से अपनी ओर से समुचित महत्वाकांक्षा के साथ प्रत्युत्तर देना चाहिए तथा निश्चित रूप से अपने दोनों वादों- अपनी जीवनशैली में परिवर्तन लाने के जरिये उत्सर्जन में भारी कमी लाने तथा विकासशील देशों को अधिक वित्त तथा प्रौद्योगिकीय सहायता उपलब्ध कराने- को पूरा करना चाहिए।

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इश्क़ तो उसी का मुकम्मल हुआ जो रूह तक पहुँचा

🌹मेरी रूह को जो छू जाये ..वो ज़रिया महज़ गुलाब नहीं हो सकता। रूहानी इश्क़ की पाकीज़गी को गर क़ायल करना चाहो ,तो कुछ कतरा अशक बहाना होगा। ”बहुत इश्क़ इश्क़ तू करता है ,पता भी है ये इश्क़ होता क्या है ?जिस को ये इश्क़ लगा ,चाहे वो रब का हो या जग का फिर वो शख़्स खुद मे रहता ही कहाँ है फिर तो जैसे साहेब राज़ी वैसे वो राज़ी”। ये सच है ! इश्क़ की गलियों मे रंगरूप ,धनदौलत रुतबा कोई मायने नहीं रखता।सामने वाले की ख़ुशी किस बात में है,यही इक फ़िक्र रह जाती है। वहाँ त्याग स्वीकार और सिर्फ़ समर्पण ही होता है और बातें भी सिर्फ़ खामोशियाँ ही करती है बिना शर्तों के, बिना शिकायत के ,बिना अल्फ़ाज़ो के।जहां आँखों से बहा पानी आंसू न रह कर अमृत हो जाता है।

क्या ख़ूब कहा किसी फ़क़ीर ने कि इश्क़ तेरे विच ,मन मर्ज़िया न चलदियां .. जो यार कहे, ओही बिस्मिल्ला। इश्क़ की बेशुमार दौलत“दर्द”होता है जो सहना हर किसी के बस की बात है ही नही। इश्क़ “ठहराव “है उम्र भर का इन्तज़ार हैं।महज़ इक गुलाब🌹देना या लेना ही इश्क़ नहीं है ..ये तो सिर्फ़ इज़हारे इश्क़ है जनाब। गुलाब चाहे कितना भी खूबसूरत क्यों न हो ..वक़्त रहते मुरझायेंगा ही ..मगर इश्क़ तो वो शय है जो मरने के बाद भी इसकी महक क़ायम रहती है। दोस्तों! रब के या दुनिया के प्रेम में कोई ज़्यादा फ़र्क़ नही। दोनो ही सब्र माँगते है और सब्र हर किसी से होता नही, न ही ये कोई सौदा है जिसे ख़रीदा या बेचा जा सके। प्रेम तो इक रूहानी अहसास है जहां“मैं “खो”जाये..और बस “ तू ही तू“रह जाये।प्रेम मे दूरियाँ के कोई मायने नही।बावजूद दूरियों के भी अगर इश्क़ क़ायम रह जाता है ,तो वो इश्क़ ही कुछ और होता है।जब वाक़ई मे आप इश्क़ से रुबरू होते है तो न केवल गुलाब बल्कि आप खुद को ही समर्पित करने के लिए बाध्य हो जाते है। जब कोई बाहरी रंग रूप से आकर्षित होता है वो आकर्षण कभी ठहरता नहीं अगर दिल से प्रेम हो जाये तो आख़िरी साँस तक चलता है..और जब कही इश्क़ रूह से हो जाये ,तो वो अमरत्व को प्राप्त करता है। कोई विरला ही इसका अनुभव कर पाता है।इसे ही रूहानी इश्क़ भी कहा जाता है मगर अफ़सोस !

इन्सान दिल या जिस्म पर ही अटक गया, इश्क़ तो उसी का मुकम्मल हुआ जो रूह तक पहुँच गया। 🙏
इश्क़ तो जिस्मों से परे ,पाकीज़गी मे ही ये पनपता और महकता है।बिना छूऐ भी प्यार करना।जुदा हो कर भी उसी का ही ..हो कर रहना।अपनी खुदी को ही खो देना ..ये है मोहब्बत।प्रेम वही कर सकता है जो प्रेम के बदले कुछ न चाहे ..जो सिर्फ़ प्रेम देना जानता हो ..बदले मे मिले न मिले ,उसे ..उससे कोई सरोकार नही।
कृष्ण दीवानी मीरा साक्षात्कार प्रेम की ही मूर्ति थी।कृष्ण को उसने कभी देखा नही, छुआ नही। बस उसके अहसास से प्रेम किया और रंग गई उसी के रंग मे। वक़्त जितना भी माडर्न हो जाये दोस्तों सच्चे प्रेम की परिभाषा वही रहेगी। “स्त्री अगर बहुत सुन्दर है इसीलिए उससे प्रेम हो जाये, ये मात्र आकर्षण या वासना भी हो सकती हैं ।विपरीत इसके ..किसी स्त्री से प्रेम हो जाये फिर वो हर हाल मे सुन्दर लगे तो यक़ीनन प्रेम हुआ” सुन्दर चेहरा तो किसी को लुभा ही लेता है। खूबसूरत “दिल”पर कोई भी आशिक़ हो सकता है मगर मन की सादगी किसी की भी रूह को छू सकने की ताक़त रखता है, दोस्तों, बेशक प्यार का इज़हार गुलाब दे कर करे मगर कोशिश करे ,उन्हें गुलाब के साथ-साथ अपना पूर्ण समर्पण भी दे ,जो उनके जीवन को सदा के लिए महका दे।आप का प्यार इक बेशक़ीमती इत्र की तरहां हो जिसकी महक दूसरो को भी महसूस हो …आज हम अगर खुद मे झांके और देखे , क्या वाक़ई मे हम ऐसे इश्क़ से वाक़िफ़ है जो आख़िरी साँस तक चले।आज हालात कुछ और है जो किसी हद तक ठीक नही ।ये वैलेंटाइन बाहरी देशों की सभ्यता थी।हमारे देश मे इसका चलन कुछ ही सालों से हुआ है ।वैलेंटाइन को मनाईये ज़रूर ,मगर गुलाब सिर्फ़ उसे ही दे ..जिसके साथ आप सारी उम्र गुज़ारना चाहे हर किसी को दे कर खुद को छोटा न करे।

ये बात कुछ साल पहले लंदन की है इक लड़का बहुत प्यार करता था किसी लड़की से .. वैलेंटाइन के दिन उसने उसको एक हज़ार पौण्ड का बेशक़ीमती गुलाब का गुलदस्ता दिया और फिर लंदन के किसी बड़े होटल मे दोनो ने लंच किया।लड़के ने शाम को अपने दोस्तों के साथ पार्टी रख ली और पार्टी के दौरान लड़के ने लड़की को शादी के लिये प्रपोज़ भी कर दिया।यानी वैलेंटाइन को यादगार बनाने के लिये कोई कसर नही छोड़ी ।दोनों बहुत ख़ुश थे।साल के बाद शादी भी हो गई ।दो सालों में सारी दुनिया भी घूम डाली।मगर दो साल के बाद दोनों एक दूसरे से अलग हो गये .. उससे अगले साल वो लड़का किसी और को गुलाबों का गुलदस्ता भेज रहा था और लड़की किसी और के साथ वैलेंटाइन मना रही थी। मेरे हिसाब से न तो ये इश्क़ है न ही प्यार या मोहब्बत… हाँ आकर्षण ज़रूर कह सकती हूँ बहुत से लोग आकर्षण को ही इश्क़ समझ लेते हैं ।आप इसे क्या कहते है ये फ़ैसला मै आप पर ही छोड़ देती हूँ ।इश्क़ इतना सस्ता है ही नही ,जो गुलाब दे कर उसे ख़रीद लिया जाये या छोड़ दिया जाये..मगर ये आज विदेशों में ही नहीं बल्कि सब जगह ये चलन चल रहा है।

दोस्तों। माना ये इश्क़ को ज़ाहिर करने की पहली निशानी गुलाब हो सकती है,मगर गुलाब तो एक ही काफ़ी है और सिर्फ़ “अकेला गुलाब”प्यार की नींव तो नही हो सकता।गुलाब लेने वाले को भी ये समझना ज़रूरी है कि गुलाब के साथ काँटे भी होते हैं और उसे भी वैसे ही स्वीकार करें जैसे गुलाब 🌹को किया जाता है दुया करती हूँ ये प्रेम का उत्सव मनाने के लिये आप को वैलेंटाइन का इन्तज़ार न करना पड़े बल्कि हर दिन गुलाब जैसा ही खिला और महकता रहे 🙏गुलाब की पंखुड़ियों की लालिमा ..आपके चेहरे के नूर को ..चार चाँद लगा दे।
हैपी वैलेंटाइन….🙏 स्मिता

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क्राइस्ट चर्च कॉलेज कानपुर की एनएसएस यूनिट द्वारा हैल्थ कैंप आयोजित

क्राइस्ट चर्च कॉलेज कानपुर की एनएसएस यूनिट ने 09 फरवरी, 2022 को हैल्थ कैंप का आयोजन किया। इस कार्यक्रम का महत्वपूर्ण लक्ष्य सबको अपने स्वास्थ्य के प्रति जागरूक करना था। इस कार्यक्रम हेतु सेंट कैथरीन अस्पताल से आई डॉक्टरों की टीम जिसमें डॉक्टर समीर तथा डॉ मंजू मल्होत्रा और
पार्षद शिवम् दीक्षित जी मुख्य रूप से उपस्तिथ रहे ।

इस कार्यक्रम में स्थानीय लोगो ने अपनी भागीदारी देकर अपने स्वास्थ्य के प्रति अपनी जिम्मेदारी का परिचय दिया। इस कार्यक्रम में एनएसएस यूनिट ने बढ़-चढ़ कर भागीदारी निभाई। उन्होंने स्वयं कार्यक्रम के आदेशों का पालन किया तथा सभी को जागरूक करते हुए कार्यक्रम को सफल बनाया। तथा सब को अवगत कराया की स्वास्थ्य शिविर के दौरान कुछ बातों का ध्यान रखें जैसे उचित दूरी बनाए, मास्क पहने, और अपना सैनेटाइज़र साथ लेकर आये। इस शिविर में १०० से ज्यादा लोगो ने भाग लिया ।

इस कार्यक्रम में क्राइस्ट चर्च कॉलेज के प्रधानाचार्य डॉ जोसेफ डेनियल एवं उप प्रधानाचार्य डॉ सबीना बोदरा, डॉक्टर मृदुला सैमसंग तथा एनएसएस प्रोग्राम ऑफिसर डॉ सुनीता वर्मा एवं संध्या सिंह उपस्थित रही जिनके मार्गदर्शन में कार्यक्रम सफलतापूर्वक संपन्न हुआ।
कार्यक्रम में एनएसएस इकाई के छात्रों के प्रतिनिधि हर्षवर्धन दीक्षित ने अपने समन्वयकों आयुषी पाठक एवं आयुष कुमार संग एनएसएस की टीम जिनमें विशेष रुप से पवन श्रीवास्तवा , वर्षा आनंद, ग्रीषा माथुर, अनन्या राठौर, सुप्रिया दास, यशस्वी कश्यप, वेदिका सिंह, अरबाज खान, इरम वकील, देव सोनकर ने कार्यक्रम में अपना सहयोग दिया तथा कार्यक्रम को सफल बनाया।

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छत्रपति शाहू जी महाराज विश्वविद्यालय के ५७ स्थापना दिवस के अवसर पर एस ऍन सेन बालिका विद्यालय पोस्ट ग्रेजुएट महाविद्यालय की ऍन एस एस इकाई द्वारा गोद ली गयी मलिन बस्ती काकोरी में एक स्वाथ्य एवम पोषण शिविर का महिलाओं एवम बच्चों के लिए आयोजन

कानपुर 9 फरवरी, छत्रपति शाहू जी महाराज विश्वविद्यालय के ५७ स्थापना दिवस के अवसर पर एस ऍन सेन बालिका विद्यालय पोस्ट ग्रेजुएट महाविद्यालय की ऍन एस एस इकाई द्वारा गोद ली गयी मलिन बस्ती काकोरी में एक स्वाथ्य एवम पोषण शिविर का महिलाओं एवम बच्चों के लिए आयोजन किया गया। इस अवसर पर प्राचार्य डॉ निशा अग्रवाल ने शिविर का उद्गाटन किया साथ ही साथ शिविर की सफलता के लिए सभी ऍन एस एस वालंटियर्स और प्रोग्राम अधिकारी को शुभकामनाए दी। कार्यक्रम अधिकारी डॉ चित्रा सिंह तोमर ने महिलाओं व बच्चों को स्वस्थ्य के प्रति जागरूक रहने की आव्यशकता को बताया। डॉ प्रीति सिंह ने आयुर्वेद तथा जड़ीबूटियों और वनपस्तियों का, जोकि उस बस्ती में आसानी से उपलब्ध हैं, का प्रयोग कर स्वस्थ्य रहने के प्रति महिलाओं को जागरूक किया। डॉ मोनिका शुक्ला ने जरुरी पोषण के प्रति महिलाओं को जागरूक किया तथा बताया कि उपलब्ध अनाज, दालों और सब्जियों से किस प्रकार वे महिलाएं पोषण प्राप्त कर सकती हैं। शिविर का समापन ऍन एस एस यूनिट कि छात्राओं द्वारा बस्ती में पोषण और स्वस्थ्य से सम्बंधित पोस्टरों के साथ रैली निकल कर हुआ जिसमें सभी महिलाओं, बच्चों ने बढ़ चढ़ कर भाग लिया। शिविर का आयोजन बहुत ही सफल रहा।

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विधवा

आईने के सामने खड़ी थी मैं। क्रीम कलर की बॉर्डर वाली साड़ी मुझ पर बहुत फब रही थी लेकिन मैं आईने में दूसरे रंग की साड़ी में खड़ी नजर आ रही थी सुर्ख लाल रंग की साड़ी…. माथे पर बड़ी सी बिंदी, आंखों में काजल, होठों पर लिपस्टिक और मैं खुद पर ही इतरा रही थी। मैंने अपने प्रतिरूप को छूना चाहा मगर यह क्या अचानक मैं खो गई और जो सामने थी वह एक विधवा थी। कबीर के जाने के बाद मेरे जीवन से सभी रंग उड़ चुके थे। खुशियों ने मुस्कुराना बंद कर दिया था और जिम्मेदारियों का बोझ मुझे परिपक्व बना रहा था। धीरे धीरे मेरा जीवन सामान्य होने लगा था लेकिन शायद मैं अंदर ही अंदर कुछ टूट सी रही थी… कोई कुछ महसूस नहीं कर रहा था लेकिन अंदर से कुछ दरक रहा था मगर फिर भी मैं मुस्कुरा रही थी, जी रही थी। उदासी मुझ पर हावी ना होने पाए इसलिए मैंने खुद को काम में गुथा लिया था। मयंक की जिम्मेदारी थी और उसके लिए मुझे जीना था, हंसना था।

मैं:- “मयंक! मैं कॉलेज के लिए निकल रही हूं, तुम ट्यूशन से आते वक्त लॉन्ड्री से होते हुए आना कुछ कपड़े ड्राइक्लीन को दिए हुए हैं वह लेते आना।”
मयंक:- “ठीक है मां।”
विचारों में सृजनात्मकता और नवीनता मेरा स्वभाव स्वभाव है और मेरा यह स्वभाव जल्दी से किसी को रास नहीं आता। वैसे भी एक सामाजिक धारणा है कि एक विधवा स्त्री सपने कैसे देख सकती है? गाड़ी चलाते हुए यह विचार मेरे जेहन में घूम रहे थे। कॉलेज में फाइलों और क्लास में उलझे रहकर मैं यह सब भूल जाती और जब मन शांत होकर अकेला होता तब मुझे कबीर बहुत याद आते। कबीर तुम हमेशा कहते थे ना कि तुम्हारे ऊपर चटक रंग ज्यादा अच्छे लगते हैं मरून रंग तुम पर कुछ ज्यादा ही अच्छा लगता है। तुम हमेशा ऐसे ही चटक रंग पहनना, ज्यादा सुंदर लगती हो। कबीर के यह शब्द आज भी मेरे मन को छू जाते हैं। मुझे याद है एक बार मंदिर जाते समय मैंने हल्के जामुनी रंग की साड़ी पहनी थी। तब कबीर ने कहा, “अरे यह क्या पहन लिया? तुम्हारे ऊपर बिल्कुल अच्छा नहीं लग रहा। गहरे रंग का कुछ पहनना चाहिए” और उन्होंने गहरे हरे रंग की साड़ी निकाल कर दी मुझे। आश्चर्य होता था मुझे कि कोई व्यक्ति इतना ध्यान कैसे रख सकता है वो भी कपड़ों का, कपड़ों के रंगों का मगर कबीर ध्यान देते थे। कभी अच्छा भी लगता था तो कभी झल्लाहट भी होती थी मुझे लेकिन मैं आज इन सब चीजों की कमी महसूस करती हूं।
कॉलेज के लिए तैयार होते समय अचानक मेरा हाथ मरून रंग की साड़ी पर गया फिर पता नहीं क्यों मरुन साड़ी पहनकर ही ऑफिस चली गई। उस दिन मैं सबकी आंखों का केंद्र थी मगर मैंने किसी की आंख की परवाह नहीं की। मुझे जीना था,  खुश रहना था मयंक के लिए, कबीर के लिए और अपने लिए। मैंने धीरे-धीरे सफेद रंग को अलविदा कहा और सभी रंगों को आत्मसात कर लिया सिवाय एक रंग के सुर्ख लाल रंग।
अब मैं सजने संवरने लगी थी तो लोगों की आंखों में चुभने भी लगी थी। लोगों की प्रतिक्रियाएं भी आती, “देखो तो कैसी है! विधवा है लेकिन तैयार कैसे हो रही?” कुछ तो इतने रूढ़ होते कि चरित्र पर ही उंगली उठा देते थे। फिर भी मैं हारी नहीं। मेरा आत्मविश्वास मजबूत होता गया और धीरे-धीरे लोगों को मैं उत्तर भी देने लगी।
निम्मी मासी:- “अरे बेटा! अब शुभ कामों में बुलाया तो है मगर जरा दूर बैठा करो और इतनी चटक रंग की साड़ी क्यों पहनी? हल्के रंग की पहनी चाहिए। अब शोभा नहीं देता इस तरह से। समाज के सभी लोग देखते हैं।”
मैं:- “मासी! जमाना बदल गया है और लोगों की सोच भी बदल गई है। आजकल के बच्चे नहीं मानते हैं यह सब। अब देखो मिलोनी बुला रही है और बोल रही है कि “फेरों के वक्त पास में ही रहना बुआजी। भैया भाभी भी बुला रहे हैं, सम्मान दे रहे तो बिना वजह का बखेड़ा क्यों खड़ा करूं?” मासी बुरा सा मुंह बना कर रह गई। भाभी भी पास आकर बोली, “हां बुआ जी क्या पति के जाने से औरत सिंगार करना छोड़ दे, जीना छोड़ दे, सपने देखना छोड़ दे, अपनी इच्छाओं को मार दे, जिंदा लाश बन कर रहे और आगे का जीवन निराशा और अकेलेपन में गुजारे।”
बुआ:- “हमने भी तो ऐसे ही गुजारा है जीवन। पति के जाने के बाद कैसा उत्सव? विधवा होने के बाद स्त्री के लिए यह सब अशोभनीय है, पाप है।”
भाभी:- “कुछ नहीं होता बुआ जी! नंददोई जी को जीजी हमेशा तैयार और खुश ही अच्छी लगती थी और अब जब अकेली रह गई हैं तो उन्हें निराशा में धकेलना क्या ठीक है? उन्हें हमारे साथ, हम सब के बीच में रहकर खुशियां मनानी चाहिए”।
मुझे गहने, कपड़े, मेंहदी, काजल, लिपस्टिक, बिंदी लगाये देखकर लोगों में खुसफुस होते रहती लेकिन मैं परवाह नहीं करती क्योंकि मुझे पता है समय परिवर्तनशील है और कुछ समय बाद यह लोग चुप हो जाएंगे और समर्थन भी देंगे क्योंकि जब इन्हीं में से ही किसी की बेटी पर ऐसा दुख आएगा तब। पास ही के मंदिर में शाम की आरती की आवाज आनी शुरू हो गई थी और मेरा मन धीरे-धीरे शांत हो गया होता जा रहा था।

प्रियंका वर्मा महेश्वरी

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एंग्जायटी डिसॉर्डर के लक्षण

#एंग्जायटी #डिसऑर्डर ❤️❤️❤️

हमेशा अपने साथ कुछ गलत होने की आशंका, छोटी-छोटी बातों को लेकर बेवजह घबराहट और चिंता में घिरे रहना एंग्जायटी डिसॉर्डर का लक्षण हो सकता है।
जब ऐसी नकारात्मक भावनाओं पर व्यक्ति का कोई नियंत्रण न हो और तमाम कोशिशों के बावजूद छह महीने से ज्यादा लंबे समय तक इसके लक्षण दिखाई दें तो यह समस्या एंग्जायटी डिसॉर्डर का रूप धारण कर सकती है।

#क्या है #मर्ज

हमेशा चिंता, बेचैनी, वास्तविक या काल्पनिक घटनाओं पर आधारित भविष्य का डर शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर बुरा असर डालता है। हालांकि, हर व्यक्ति में इसके अलग-अलग लक्षण नजर आते हैं, लेकिन स्थायी डर और चिंता लगभग सभी में देखे जाते हैं। अगर ये लक्षण ज्यादा तीव्र न हों तो समय बीतने के साथ समाप्त हो जाते हैं, अन्यथा एंग्जाइटी डिसार्डर की समस्या हो सकती है। इससे व्यक्ति की रोजमर्रा की दिनचर्या प्रभावित होने लगती है।

#क्यों होती है #समस्या

आजकल युवा आबादी का एक बडा हिस्सा इस मनोवैज्ञानिक समस्या से जूझ रहा है। दरअसल आधुनिक जीवनशैली में लोगों की व्यस्तता इतनी बढ गई है कि वे हमेशा जल्दबाजी में रहते हैं और उन पर काम का दबाव भी बहुत ज्यादा है। इसी वजह से उनमें चिडचिडापन और आक्रोश बढता जा रहा है। इसके अलावा आधुनिक समाज में हर व्यक्ति अकेला है। किसी के भी पास दूसरे की बातें सुनने की फुर्सत नहीं है। इसलिए अब लोगों में शेयरिंग की भावना ख्ात्म हो रही है। शहरी समाज इतना व्यक्तिवादी और आत्मकेंद्रित हो चुका है कि अब पहले की तरह रिश्तेदारों या पास-पडोस का कोई सपोर्ट सिस्टम नहीं रह गया है। लगातार तनाव, अकेलेपन और उदासी में जीने की वजह से ही लोग एंग्जायटी डिसॉर्डर के शिकार हो रहे हैं।

अध्ययनों के अनुसार गंभीर या लंबे समय तक चलने वाले तनाव की वजह से अनिद्रा की समस्या होती है। इससे मस्तिष्क से निकलने वाले हॉर्मोस के बीच असंतुलन पैदा हो जाता है, जो एंग्जायटी डिसॉर्डर का कारण बन सकता है। आनुवंशिकता भी इसकी प्रमुख वजह है।

#एंग्जायटी #डिसॉर्डर के #प्रकार

प्रमुख लक्षणों के आधार पर इस मनोवैज्ञानिक समस्या के कई अलग-अलग प्रकार निर्धारित किए जाते हैं, जो इस प्रकार हैं :

#जनरलाइज्ड एंग्जायटी डसॉर्डर : इस समस्या से पीडित लोग बेवजह बहुत ज्यादा चिंतित रहते हैं। इनकी चिंता का कोई तार्किक आधार नहीं होता। हमेशा चिंता में रहना इनकी आदत होती है। सकारात्मक परिस्थितियों में भी ऐसे लोग चिंतित होने की कोई न कोई वजह ढूंढ लेते हैं।

#ऑब्सेसिव कंपल्सिव डिसॉर्डर : इससे पीडित लोग लगातार चिंतित या भयभीत रहते हैं। ऐसे में वे कुछ अजीब आदतें विकसित कर लेते हैं। मिसाल के तौर पर कुछ लोगों को सफाई की सनक हो जाती है और वे साफ-सुथरी चीजों को भी बार-बार धोते-पोछते रहते हैं।

#पैनिक डिसॉर्डर : इस समस्या से जूझ रहे लोगों को अकसर ऐसा महसूस होता है कि जैसे उनकी सांस रुक रही है या उन्हें हार्ट अटैक आ रहा है। ऐसे लोगों को बेवजह मौत का भय सताता रहता है।

#सोशल एंग्जाइटी डिसॉर्डर : ऐसी समस्या से पीडित व्यक्ति अपने सामाजिक जीवन में अत्यंत सतर्क रहता है। उसे हरदम ऐसा लगता है कि लोग उसे ही घूर रहे हैं। वह भीड वाली जगहों और सामाजिक समारोहों में जाने से बचने की कोशिश करता है क्योंकि ऐसे माहौल में उसे बहुत घबराहट महसूस होती है।

#क्या है नुकसान

एंग्जायटी डिसॉर्डर से पीडित व्यक्ति की पर्सनल और प्रोफेशनल लाइफ पर बहुत बुरा असर पडता है। इससे उसकी रोजमर्रा की दिनचर्या अस्त-व्यस्त हो जाती है। वह किसी भी काम पर ध्यान केंद्रित नहीं कर पाता। ऐसे लोगों की स्मरण-शक्ति कमजोर पड जाती है और इनका दांपत्य जीवन भी तनावग्रस्त रहता है। अध्ययनों में यह भी पाया गया है कि अगर स्त्रियों में एंग्जायटी डिसॉर्डर हो तो वे जल्द ही इससे बाहर निकल आती हैं, लेकिन पुरुषों में यह समस्या गंभीर रूप धारण कर लेती है, क्योंकि उनका अहं समस्या को आसानी से स्वीकार नहीं पाता। इसलिए वे उसका हल ढूंढने की कोशिश भी नहीं करते। अगर लंबे समय तक समस्या हो तो वह डिप्रेशन का रूप ले सकती है। ज्यादा गंभीर स्थिति होने पर व्यक्ति में आत्महत्या की प्रवृत्ति बढ जाती है। प्रमुख लक्षण

-शारीरिक दुर्बलता

-याद्दाश्त में कमी

-लगातार चिंतित रहना

-एकाग्रता में कमी आना, आंख के आगे तैरते हुए बिंदु दिखाई देना

-घबराहट, डर और बेचैनी

-नकारात्मक विचारों पर काबू न होना व डरावने सपने दिखना

-अनिद्रा

-शरीर के तापमान में असंतुलन, कभी हाथ-पैरों का ठंडा पड जाना तो कभी बुखार जैसा महसूस होना

-दिल की धडकन तेज होना

-मांसपेशियों में तनाव होना

-पेट में दर्द

#कैसे करें #बचाव

-नियमित दिनचर्या अपनाएं क्योंकि नींद की कमी से मस्तिष्क पूरी क्षमता के साथ काम नहीं कर पाता। अनिद्रा से एंग्जायटी और डिप्रेशन का खतरा बढ जाता है।

-शरीर की तरह मस्तिष्क को भी पौष्टिक आहार की जरूरत होती है। इसलिए अपने भोजन में फलों और हरी सब्जियों को प्रमुखता से शामिल करना चाहिए।

-नियमित एक्सरसाइज और योगाभ्यास करें। इस समस्या से बचने के लिए ध्यान भी फायदेमंद होता है। इससे सेरिब्रल कोरटेक्स को मजबूती मिलती है, मस्तिष्क का यही हिस्सा स्मरण-शक्ति, एकाग्रता और तर्क शक्ति के लिए जिम्मेदार होता है।

-अगर जीवन में कभी कोई मुश्किल आए तब भी आत्मविश्वास बनाए रखें।

-लोगों के साथ दोस्ती बढाएं और खुलकर अपनी भावनाएं शेयर करें।

-अपनी क्षमताओं का आकलन करके व्यावहारिक लक्ष्य बनाएं। कार्यो की प्राथमिकता तय करें। एक साथ कई काम करने से बचें।

-अगर कभी किसी बात को लेकर एंग्जायटी हो तो उसका सामना करने की आदत डालें। उससे बचने की कोशिश कभी न करें, क्योंकि व्यक्ति ऐसी मनोदशा से जितना अधिक बचने की कोशिश करता है, समस्या उतनी ही तेजी से बढती जाती है।

-ऐसी समस्याओं को छोटे-छोटे टुकडों में बांट कर हल करने की कोशिश करें। एक ही दिन में इनका समाधान संभव नहीं है। इसलिए धैर्य के साथ प्रयास करें।

-नियमित रूप से एंग्जायटी डायरी मेंटेन करना भी फायदेमंद साबित होगा। रोजाना रात को सोने से पहले अपनी डायरी में विस्तृत रूप से लिखें कि आज दिन भर में आपको किस चिंता या भय ने सबसे ज्यादा परेशान किया और उसे दूर करने के लिए आपकी ओर से क्या कोशिश की गई। -मन को तार्किक ढंग से समझाने की कोशिश करें कि यह आशंका निराधार है।

-एंग्जायटी दूर करने के लिए अपने मन से कोई दवा न लें।
-कैफीन और एल्कोहॉल से दूर रहें, क्योंकि ऐसी चीजों के सेवन से एंग्जायटी बढती है! सलाह, ” प्राकृतिक चिकित्सा को अपनाये जहाँ तक सम्भव हो क्योंकि ये हमारे शरीर से जुड़ी हुई चिकित्सा है, जिस प्रकति ने हमें बनाने में सहयोग किया है वही हमारे अस्वस्थ हुए शरीर को स्वस्थ करने में पूर्ण सहयोग करेगी”………
Dr. Shruti kaushik  

लेख में प्रकाशित सामग्री लेखिका की अपनी राय है

 

 

 

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जिलाधिकारी जिला निर्वाचन अधिकारी श्रीमती नेहा शर्मा ने आज जनपद कानपुर नगर की दसों विधानसभाओं की फ्लाइंग स्कॉट टीम के साथ कलेक्ट्रेट सभागार में समीक्षा बैठक

lकानपुर नगर। जिलाधिकारी जिला निर्वाचन अधिकारी श्रीमती नेहा शर्मा ने आज जनपद कानपुर नगर की दसों विधानसभाओं की फ्लाइंग स्कॉट टीम के साथ कलेक्ट्रेट सभागार में समीक्षा बैठक की। जिलाधिकारी/ जिला निर्वाचन अधिकारी श्रीमती नेहा शर्मा ने फ्लाइंग स्कॉट टीम को स्पष्ट निर्देश देते हुए कहा कि आदर्श आचार संहिता का कड़ाई से अनुपालन सुनिश्चित किया जाए ,इसके लिए आपकी पैनी निगाह 24 घंटे रहनी चाहिए। बिना अनुमति के कोई भी होडिंग, बैनर, पोस्टर ,झंडे इत्यादि को तत्काल हटाया जाए ।किसी भी वाहन पर यदि कोई झण्डा मिलता तो तत्काल उसकी परमिशन मांगी जाए यदि बिना परमिशन के कोई भी झंडा किसी भी वाहन में लगा मिले तो तत्काल उसे हटाया जाए। उन्होंने स्पष्ट करते हुए कहा कि फ्लाइंग स्कॉट टीमें पैनी निगाह रखते हुए निर्भीक होकर प्रभावी कार्यवाही करें ।उन्होंने निर्देशित करते हुए कहा कि समस्त फ्लाइंग स्कॉट टीमें अपनी- अपनी विधानसभाओं में भ्रमण शील रहते हुए आदर्श आचार संहिता का उल्लंघन करने वाले लोगों पर कठोरतम कार्यवाही सुनिश्चित करें, किसी भी स्थिति में आदर्श आचार संहिता का उल्लंघन नही होना चाहिए। बैठक में अपर जिलाधिकारी वित्त राजस्व , उप निदेशक कृषि कंट्रोल रूम प्रभारी उपस्थित रहे।

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स्वतंत्रता के अमृत महोत्सव के अंतर्गत एस ऍन सेन बी वी पी जी कॉलेज के ऍन एस एस यूनिट कादम्बिनी देवी द्वारा ऑनलाइन वेबिनार और पोस्टर कम्पीटीशन आयोजित

कानपुर 24 जनवरी स्वतंत्रता के अमृत महोत्सव के अंतर्गत राष्ट्रीय बालिका दिवस एस ऍन सेन बी वी पी जी कॉलेज के ऍन एस एस यूनिट कादम्बिनी देवी के द्वारा एक ऑनलाइन वेबिनार और पोस्टर कम्पीटीशन का आयोजन किया गया,कार्यक्रम का शुभ आरम्भ महाविद्यालय की प्राचार्य डॉ निशा अग्रवाल के स्वागत भाषण से हुआ । प्राचार्य ने छात्राओं का आवाहन करते हुए कहा की आज के परिदृश्य में बालिकाओं को बालकों से काम न आंक कर उन्हें आगे बढ़ने के सामान अवसर प्रदान करने चाहिए । ऍन एस एस की कार्यक्रम अधिकारी तथा संयोजिका डॉ चित्रा सिंह तोमर ने कहा की बालिकाओं को न सिर्फ सामान अवसर प्रदान करना सर्कार का दायित्व है वरन समाज का भी, इस दिशा में सहयोग होना इस दिशा में आव्यशक है । १०० से अधिक छात्राओं ने इस कार्यक्रम में अपनी उपस्तिथि दर्ज कराई । कार्यक्रम की मुख्य वक्ता, महिला जाग्रति संस्था की अध्यक्षा, श्रीमती विजेता श्रीवास्तव ने छात्राओं का मार्गदर्शन करते हुए कहा के समाज में फैली कुरीतिओं के प्रति कार्य करने से पहले समाज में बालिकाओं एवम महिलाओं को अपने अधिकारों के प्रति जागरूक करना आव्यशक है । कार्यक्रम की सेह-प्रभारी डॉ प्रीति सिंह ने ऍन एस एस यूनिट द्वारा किये गए कार्यों की आख्या प्रस्तुत की । शिक्षा शास्त्र की असिस्टेंट प्रोफेसर, श्रीमती ऋचा सिंह और श्रीमती रीता ने भी कार्यक्रम में अपने विचार रखे। धन्यवाद ज्ञापन कार्यक्रम अधिकारी डॉ चित्रा सिंह तोमर ने किया ।

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साथी

नंदा लेट हो रहा है जल्दी चलो हम वैसे ही लेट हो गये हैं। मूवी निकल जाएगी

नंदा:- “हां! बस आ रही लॉक लगाकर।”

नितिन जल्दी-जल्दी गाड़ी ड्राइव कर रहा थे ताकि समय पर पहुंच कर मूवी शुरू से देख सके।
नितिन:- “तुम्हारी भी बड़ी खराब आदत है एकआध काम छोड़ दिया करो, बाद में कर लेना था। जब पता था कि मूवी जाना है तो समय से काम निपटा लेना था। इस तरह से भाग दौड़ तो नहीं होती।”
नंदा:- “अब तुम मुझे ही दोष दो, सुबह से लगी हुई हूं काम में। जल्दी-जल्दी सब काम निपटा तो रही थी। घर में पचासों काम होते हैं। वापस आने में देर हो जाएगी तो बाद के काम भी निपटा रही थी।”
नितिन:- “अच्छा छोड़ो! इस बहस में मूड खराब हो रहा है। निकले हैं मूवी देखने और इस बहस से मूवी देखने के मूड का सत्यानाश हो रहा है।”
नंदा कुछ बोली नहीं लेकिन उसका मूड खराब हो गया था यह बात नितिन ने भांप लिया था। पार्किंग में गाड़ी खड़ी रखकर दोनों जल्दी-जल्दी थिएटर हॉल में पहुंचे। आधी मूवी नंदा ने अनमने ढंग से देखी। ब्रेक में नितिन दो कॉफी और पॉपकॉर्न ले आया। थोड़ी देर बाद नंदा नॉर्मल हो गई। दोनों मूवी देख कर बाहर निकले तो नितिन बोला, “चलो डोसा खाने चलते हैं।”
नंदा:- “और जो घर पर बनाया है वह?”
नितिन:- “अरे बाबा वह सुबह खा लेंगे, अभी डोसा खाने का मन है तो बोलो।”
नंदा:- ” ठीक है! चलो।”
एक साउथ इंडियन रेस्त्रां में दोनों गए और डोसे का आर्डर दिया। आर्डर आने में समय था तो नितिन ने पूछा, “नीलू का कुछ फोन आया क्या ?”
नंदा:- “हां आया था तो मैंने कह दिया था कि तेरे जीजा जी से बात करके बताऊंगी। क्या सोचा आपने उस बारे में?”
नितिन:- “तुम बताओ जैसा कहोगी हो जाएगा।”
नंदा:- “दो लाख मांग रहा है नीलू, इस कोविड में काम धंधा पूरी तरह चौपट हो गया है। मदद तो करनी ही चाहिए लेकिन पैसे जल्दी वापस नहीं आएंगे यह बात तय है।”
नितिन:- “ठीक है। वह कोई चिंता नहीं। देखता हूं कि क्या कर सकता हूं मैं।”
दोनों डोसा खाकर घर आ गये। दूसरे दिन सुबह नाश्ते की टेबल पर नंदा ने नितिन से कहा कि, “तुम सोच समझकर ही पैसे देना, बाद में परेशान मत होना।”
नितिन:- “वह मैं देख लूंगा, तुम परेशान मत हो उसके लिए। मैं नीलू से बात करके उसे रुपए भिजवा देता हूं।” नंदा सिर हिला कर किचन में चली गई।
घर के काम निपटा कर नंदा अपने मायके चली गई। नंदा:- “मम्मी नीलू कहां है? मुझे उससे बात करनी है।” मां:- “ऊपर कमरे में है। क्या हुआ?”
नंदा:- “कुछ नहीं! बस ऐसे ही। आती हूं उससे मिलकर।” और वह ऊपर जाने लगी।
नंदा:- ” नीलू तुम्हें तुम्हारे जीजा जी का फोन आया था क्या?”
नीलू:- “हां दीदी आया था। उन्हीं के पास जाने के लिए तैयार हो रहा हूं लेकिन तुम इस वक्त यहां? कुछ काम था क्या?”
नंदा:- “नहीं! कुछ काम नहीं था, बस तुमसे यही कहने आई थी कि कोशिश करना कि समय से पैसे वापस कर दो ताकि भविष्य में वह फिर से मदद कर सके।” नीलू:- “हां दीदी कोशिश तो पूरी रहेगी बाकी देखते हैं।” और नीलू चला जाता है।
नंदा भी मम्मी, भाभी से मिलकर घर वापस आ जाती है।
कुछ समय बाद नितिन नंदा से पूछता है, “अरे नंदा! नीलू का काम कैसा चल रहा है? इस बीच उसका कोई फोन भी नहीं आया और मैं भी जरा काम में व्यस्त रहा तो बात ही नहीं हो पाई।”
नंदा:- “हां…. ठीक है। अब गाड़ी पटरी पर तो आ गई है। फिर से काम जमा रहा है तो थोड़ा वक्त तो लगेगा ही।”
नितिन:-  “हम्म। अरे कभी अपने जीजा जी को भी याद कर लिया करे। सिर्फ काम के समय ही याद करेगा क्या?”
बात सही थी लेकिन यह व्यंग्य नंदा को चुभ गया वह मुस्कुरा कर बोली, “सही है। अब मेहनत कर रहा है तो समय नहीं मिलता होगा उसे लेकिन उसे बोलूंगी कि आप से बात कर ले।”
नितिन:- “अरे नहीं! मैंने तुमसे मजाक में कही यह बात। अब क्या तुमसे मस्ती भी नहीं कर सकता।” नंदा हंसकर रह गई।
दिवाली का त्यौहार करीब आ रहा था और मेरा काम भी बढ़ता जा रहा था। एक पैर घर में तो एक बाजार में रहता। दिन कैसे जा रहे थे मालूम ही नहीं पढ़ रहा था। दोपहर में आराम करने लेटी तो ध्यान आया कि इस बीच घर से कोई फोन नहीं आया। मम्मी का भी नहीं। भाभी भी शायद काम में बिजी होंगी। शाम को चाय पीते हुए घर पर फोन लगाया।
मैं:- “हेलो, हां भाभी कैसी हो? क्या बात है बहुत व्यस्त हो? एक फोन भी नहीं!”
भाभी:- “हां… नंदा दीवाली करीब आ रही है तो घर की साफ सफाई चल रही है। साथ में घर के पचासों और काम तो रहते ही है। बच्चों को भी ट्यूशन छोड़ने जाना लाने जाना यह भी तो एक काम ही रहता है। कितनी बार तुम्हारे भैया से कहा है कि एक गाड़ी दिला दो बच्चों को। बच्चे अपने आप ट्यूशन आना जाना कर लेंगे, मगर वह सुनते ही नहीं। अब देखो कल अम्मा की तबीयत भी खराब हो गई। डॉक्टर के पास ले गए थे चेकअप चल रहा है, पैरों में दर्द बहुत था। उनके घुटने में सूजन थी चल ही नहीं पा रही थी। तुम्हारे भैया गए हैं एक्सरे निकलवाने फिर डॉक्टर के पास जाएंगे। देखो रिपोर्ट में क्या आता है?
मैं:- “अरे ! आपने कुछ बताया ही नहीं! रिपोर्ट आए तो मुझे भी बताना। मैं कल आती हूं।”
भाभी:- “हां ठीक है।”
फोन काट कर मैं सोचने लगी कि एक ना एक परेशानी लगी रहती है। अब यह नई परेशानी और मैं अपने काम में बिजी हो गई। रात के खाने पर मैंने नितिन से कहा, “सुनो! मम्मी की तबीयत ठीक नहीं है उन्हें पैरों में तकलीफ है तो मैं कल उनसे मिलने घर जा रही हूं।”  नितिन:- “हां ठीक है।”
सुबह होते ही घर के सारे काम जल्दी जल्दी निपटा कर मैं मम्मी के पास जाने के लिए तैयार होने लगी। बच्चे स्कूल से दोपहर तक आएंगे तो निश्चिंत थी मैं।
घर पहुंच कर मैं मां के पास गई। मम्मी लेटी हुई थी और उनके कराहने की आवाज आ रही थी।
मैं:- “मम्मी अचानक घुटने में दर्द क्यों होने लगा?”
मम्मी:- “अरे बेटा, बुढ़ापा है तो कुछ ना कुछ तो लगा ही रहेगा। एक घुटना घिस गया हैं इसी से बहुत दर्द है। डॉक्टर ने ऑपरेशन बताया है। अब डॉक्टर को कैसे बोलूं कि अभी ऑपरेशन नहीं करवा सकते। पास में इतने पैसे नहीं है। तीन लाख का खर्चा बता रहा है। कैसे हो पाएगा यह सब। मैं भी यह सब सुनकर परेशान हो गई लेकिन मां को तसल्ली दी, “सब हो जाएगा परेशान मत हो।” घर वापस आते समय रास्ते भर यही सोचती रही कि भैया कैसे कर पाएंगे ये सब? नीलू ने नितिन से अभी-अभी आर्थिक मदद ली थी, अब वापस नितिन को कैसे बोलूं?
रात में खाना परोसते समय नितिन ने पूछा, “घर गई थी क्या?”
मैं:- “हां गई थी। मम्मी के घुटने में दर्द है। डॉक्टर ने ऑपरेशन बताया है आपरेशन का खर्चा भी बहुत ज्यादा है।”
नितिन:- “हम्म…. कितना बताया है?”
नंदा:- “तीन लाख बोल रहा डॉक्टर।”
नितिन कुछ बोले नहीं और सोचनीय मुद्रा में बैठे रहते हैं। हम दोनों ही कुछ कह नहीं पा रहे थे। सुबह नितिन ने भैया से बात की।
नितिन:- “हेलो! नीलू अरे भाई कैसे हो? बिल्कुल भूल ही गए? अरे कुछ खोज खबर अपने जीजा जी की भी ले लिया करो।
नीलू:- “अरे जीजा जी! प्रणाम! सब ठीक है। बस ऑफिस ही जा रहा था। नंदा ने बताया होगा कि मम्मी के बारे में, बस उसी में परेशान लगा पड़ा हूं।”
नितिन:- “हां बताया मुझे। कितनी रकम है तुम्हारे पास?
नीलू:- “पौने दो लाख तक जैसे-तैसे अरेंज कर लूंगा। बाकी का देखता हूं कि कैसे अरेंज होता है।”
नितिन:- “ठीक है। ऑपरेशन कब करवाना है।”
नीलू:- “डाक्टर महीने के आखिर में बोला है तभी तारीख भी देंगे।”
नितिन:- “ठीक है।”
अगले दिन सुबह नंदा भाभी से पूछती है।
नंदा:- “भाभी! मम्मी कैसी है? और भैया ने कितना जमा कर लिया है?”
भाभी:- “मम्मी ऐसे तो ठीक है, बस चलना फिरना दूभर है। तुम्हारे भैया टेंशन में दुबले हुए जा रहे हैं इस बीमारी और पैसे के कारण। अभी तक कुछ भी व्यवस्था नहीं हो पाई है।”
नंदा:- “देखती हूं इनसे बात करके लेकिन हिम्मत नहीं होती, इतनी बड़ी रकम जो है।”
भाभी:- “हां यह बात तो है। जमाई बाबू पहले ही इतनी मदद कर चुके हैं कि अब और कैसे कहें मदद के लिए फिर भी एक बार बात करके देखो।”
नंदा:- “हां भाभी देखती हूं।”
नंदा:- “एक हफ्ता बचा है मम्मी के ऑपरेशन को और भैया अभी तक पूरा पैसा नहीं जमा कर सके हैं। भैया भाभी दोनों बहुत परेशान लग रहे थे।”
नितिन:- “तुम परेशान मत हो वह जो डेढ़ लाख की एफडी पड़ी है उसे तोड़ दो और नीलू को दे दो। पैसा जमा ही इसीलिए किया जाता है कि वक्त पर काम आ सके। रखे रखे तो कुछ काम आएगा नहीं।”
नंदा रोने लगती है। नितिन का हाथ अपने हाथ में लेकर कहा कि, “मैं कितनी खुशनसीब हूं कि आप जैसा पति मिला। मेरे पीहर के दुख को अपना दुख समझकर मेरा साथ देते हैं और मुझे समझते हैं।”
नितिन:- “तुम मेरी अर्धांगिनी हो मतलब आधा अंग हो तो मैं मेरे आधे अंग को कष्ट में कैसे देख सकता हूं। तुम्हारा दुख मेरा दुख है और यह जरूरी नहीं कि बेटी की शादी हो गई तो वह मायके से संबंध तोड़ दे या मायके की तकलीफ में काम ना आये या मायके के लोग बेटी से मदद की अपेक्षा नहीं रख सकते। तुम वह पैसे ले जाओ और नीलू को दे दो तो उसे राहत मिलेगी। नंदा खुशी-खुशी घर जाने के लिए तैयार होने लगी। उसके चेहरे पर संतोष था।

प्रियंका वर्मा महेश्वरी

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