भारतीय स्वरूप संवाददाता कानपुर 27 जनवरी सात दिवसीय राष्ट्रीय सेवा योजना शिविर के चतुर्थ दिन एस. एन. सेन बी. वी. पी. जी. कॉलेज, कानपुर की कादोम्बिनी देवी राष्ट्रीय सेवा योजना इकाई और अमर उजाला फाउंडेशन के संयुक्त तत्वावधान में उच्च प्राथमिक विद्यालय कम्पोजिट, ग्राम पंचायत-नेतुआ, जनपद- उन्नाव, में स्वास्थ्य परीक्षण शिविर लगाया गया जिसमें रक्तचाप, शुगर, नेत्र, रक्त आदि की मुफ़्त जाँच की गई| शिविर के आरंभ में एन.एस.एस. प्रभारी डॉ. श्वेता रानी, सह-प्रभारी डॉ. अनामिका, उपस्थित डॉक्टर्स और उनके सहयोगियों के द्वारा मां सरस्वती की प्रतिमा पर माल्यार्पण एवं पुष्प अर्पित किए गए
। शिविर में उजाला सिगनस के फिजिशियन डॉ. आर. के. तिवारी, नेत्र चिकित्सक डॉ. अभिषेक के द्वारा ग्रामीणों को मुफ़्त चिकित्सकीय परामर्श भी प्रदान किया गया। लगभग 200 ग्रामीणों ने मुफ़्त स्वास्थ्य परीक्षण शिविर का लाभ उठाय। शिक्षिकाओं और विद्यार्थियों ने भी अपने की जाँच करवाईं।
तृतीय दिवस की रिपोर्ट प्रस्तुत करने के पश्चात् स्वयंसेविकाओं ने बस्ती में जाकर ग्रामीणों को स्वास्थ्य शिविर की जानकारी दी और स्वास्थ्य परीक्षण के लिए प्रेरित किया| एन. एस. एस. की स्वयंसेविका नंदिका श्रीवास्तव, दिव्यांशी शर्मा, कोमल दिवाकर, मन्तशा, अंशिका, शिवानी, सिमरन, खुशी एवं चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी हरिनारायण ने शिविर के सफल आयोजन में विशेष योगदान दिया। शिविर में लगभग 50 राष्ट्रीय स्वयंसेविकाओं ने सहभागिता की।
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भारतीय स्वरूप संवाददाता कानपुर।
धरती का तापमान धीरे-धीरे नहीं, बल्कि खतरनाक गति से बढ़ रहा है। वैज्ञानिक अध्ययनों के अनुसार, बीसवीं सदी में भूमंडलीय औसत तापमान में लगभग 0.6 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि दर्ज की जा चुकी है। यदि तापमान वृद्धि की यही प्रवृत्ति जारी रही, तो 21वीं सदी के अंत तक वैश्विक तापमान में लगभग 6 डिग्री सेल्सियस तक की बढ़ोतरी हो सकती है। यह परिवर्तन केवल आँकड़ों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका प्रभाव मानव जीवन, प्राकृतिक संसाधनों और पारिस्थितिकी तंत्र पर प्रत्यक्ष रूप से दिखाई देने लगा है। ग्लोबल वार्मिंग के कारण हो रहे जलवायु परिवर्तन का सबसे गंभीर प्रभाव हिमालयी हिमनदों पर पड़ रहा है। अनुमान है कि यदि वर्तमान स्थिति बनी रही, तो सन् 2040 तक हिमाचल प्रदेश की अधिकांश हिमनदियाँ पिघलकर समाप्त हो सकती हैं। गंगोत्री हिमनद, जो गंगा नदी का प्रमुख स्रोत है, प्रतिवर्ष लगभग 23 मीटर की दर से संकुचित हो रही है। इस हिमनद का तीव्र क्षरण भविष्य में गंगा नदी के अस्तित्व के लिए गंभीर संकट उत्पन्न कर सकता है, जिससे करोड़ों लोगों का जीवन प्रभावित होगा।
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क्लाउड सीडिंग, यानी कृत्रिम वर्षा उत्पन्न करने की एक वैज्ञानिक तकनीक। जब बादल मौजूद होते हुए भी वर्षा नहीं होती, तब वैज्ञानिक उनमें कुछ रासायनिक तत्वों का छिड़काव करते हैं, जिससे जलवाष्प संघनित होकर वर्षा की बूंदों में बदल जाती है।आमतौर पर इसमें सिल्वर आयोडाइड, पोटेशियम आयोडाइड या ड्राई आइस जैसे पदार्थों का प्रयोग किया जाता है।आज बढ़ते तापमान, घटते जलस्तर, पिघलते ग्लेशियर और जल–विनाश की वजह से सूखे की स्थिति गंभीर होती जा रही है। ऐसे में क्लाउड सीडिंग को एक आशाजनक समाधान के रूप में देखा जा रहा है।यह तकनीक कई देशों में लंबे समय से सफलतापूर्वक अपनाई जा रही है, जबकि भारत में अभी यह सीमित स्तर पर ही प्रयोग में है।हाल के वर्षों में भारत सरकार और कई राज्य सरकारें सूखे से निपटने के लिए इस तकनीक को अपनाने की दिशा में कदम बढ़ा रही हैं।महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और उत्तर प्रदेश के कुछ क्षेत्रों में इसका प्रयोग हो चुका है।हालाँकि यह भी सच है कि हर जगह या हर मौसम में क्लाउड सीडिंग कारगर नहीं होती।अगर बादलों में नमी का स्तर या तापमान अनुकूल न हो, तो वर्षा की संभावना कम हो जाती है।इस प्रक्रिया के लिए वायुमंडलीय परिस्थितियाँ, ऊर्जा और नमी का सही संतुलन होना जरूरी है।इसी कारण बिना मौसम अनुमान के क्लाउड सीडिंग करना महंगा और व्यर्थ साबित हो सकता है।दिल्ली–एनसीआर, हरियाणा, उत्तर प्रदेश और गंगा के मैदानी इलाकों में यह तकनीक वायु प्रदूषण घटाने के उपाय के रूप में भी चर्चा में रही है।ठंड के मौसम में जब वायुमंडलीय परतें नीचे बैठ जाती हैं और प्रदूषक कण ऊपर नहीं जा पाते, तब हवा की गुणवत्ता “खराब” या “बहुत खराब” स्तर पर पहुँच जाती है।ऐसे में यदि मौसम अनुकूल हो तो क्लाउड सीडिंग प्रदूषण कम करने का एक संभावित उपाय हो सकता है।
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