कानपुर 17 मार्च, भारतीय स्वरूप संवाददाता, जी-20 के विशेष संदर्भ में “सतत विकास में महिलाओं की अग्रणी भूमिका” विषय पर एक गोष्ठी का आयोजन किया गया।
जिसमें मुख्य वक्ता पूर्व भारतीय वायु सेना अधिकारी, पर्वतारोही (एवरेस्ट पर्वतारोही), अंतर्राष्ट्रीय प्रेरक वक्ता (TEDx), लेखिका, शिक्षाविद, उत्तर प्रदेश की G–20 ब्रांड एंबेसडर, स्क्वाड्रन लीडर सुश्री तुलिका रानी रही। उन्होंने अपने वक्तव्य में कहा कि महिलाएं परिवार बनाती है, परिवार घर बनाता है, घर समाज बनाता है और समाज ही देश बनाता है। अतः महिलाओं की अनदेखी करके हम किसी विकसित राष्ट्र का सपना नहीं संजो सकते। कार्यक्रम की अध्यक्षता महाविद्यालय प्राचार्या प्रो. अर्चना वर्मा ने की। उन्होंने अपने वक्तव्य में कहा कि भारत के लिए जी-20 अध्यक्षता अमृत काल की शुरुआत है जो हमें “वसुधैव कुटुंबकम” के आधार पर समावेशी विकास की ओर उन्मुख करता है। संचालन डॉ मनीष पांडे ने किया। संयोजिका डॉक्टर संगीता सिरोही ने बताया कि गोष्ठी में पर्यावरण, जलवायु परिवर्तन, लैंगिक समानता व समावेशी विकास आदि मुद्दों पर विचार विमर्श किया गया। कार्यक्रम में मुख्य रूप से चीफ प्रॉक्टर प्रो अर्चना श्रीवास्तव, महाविद्यालय जी–20 समिति के सभी सदस्य, समस्त विभागाध्यक्ष व प्राध्यापिकाएं, छात्राएं व शिक्षणेत्तर कर्मचारी उपस्थित रहे।
महिला जगत
दिल तोड़ने से पहले सोच लेना …इसमें तू ही रहता है
तोड दे तू चाहे ..मुझे हर तरह से … पर मेरा दिल तोड़ने से पहले ज़रा सोच लेना …इसमें मैं नही तू रहता है
आप का सारा पूजा पाठ का फल निष्फल हो जाता है जब कोई भगवान के भक्त को या किसी भोले इन्सान के मन को दुख पहुँचाता है बात पुरानी मगर सच है। मैं जानती थी पूरो बीजी को , सब उन्हें बीज़ी कहा करते थे। पूरो एक अच्छे घराने की लड़की ,मगर कम पढ़ी लिखी थी ।उसकी शादी एक सुन्दर पढे लिखे नौजवान से हो जाती है। पूरो सोचा करती, उसका पति इतना सुन्दर ,और उसका अपना रंग साँवला सा,क्या उस का पति उसको प्यार दे पायेगा। मगर कहती कुछ नहीं। ख़ुशी से अपनी गृहस्थी चला रही थी।वक़्त बीता ..पूरो के दो बेटियाँ और एक बेटा हुआ। पूरो के पति का राजाओं की तरह रहन सहन था।लखनऊ में होटल था।इक अपनी ड्रामा कंपनी थी और उनका बहुत अच्छा कपड़ों का कारोबार भी था। अक्सर पूरो से कहा करते कि मैं अपनी बेटियों को जयपुर के महाराजाओं के बच्चों के साथ पढ़ाई करवाऊँगा। अपने बच्चों को होटलों में ले ज़ाया करते और इंगलिश तौर तरीक़े सिखाते। बैडमिंटन क्रिकेट और पोलो खेलना तो शौक था उनका। उनका बेटा बढ़ा था ,बेटियाँ छोटी थी अभी।पूरो की छोटी बेटी रतना अभी तीन साल की थी तो पूरो के पति को हैज़ा हो गया। हैज़ा ही उनके गुज़रने की वजह बन गई।पूरो को पढ़ी लिखी न होने की वजह से अपने ससुर और देवर देवरानी के साथ रहना पढ़ा।देवरानी बहुत झगड़ालू क़िस्म की औरत थी।हर बात में पूरो को नीचा दिखाने की कोशिश में रहती।आप ऊपर मकान में रहती थी और नीचे मकान में छोटे से कमरे में पूरो के परिवार को रख दिया। जहां पूरो की रसोई हुआ करती थी वहाँ इक नाली निकला करती जो ऊपर के आया करती थी, जहां उसकी देवरानी का गुसलखाना था,जैसे पहले वक़्तों में हुआ करता था जब भी पूरो धूप बती करके अपने बच्चों को खाना खिला रही होती ,अक्सर उसी वकत उस नाली को शौच की तरह भी इस्तेमाल करती।रब को मानने वाली पूरो ,मुँह से तो कुछ नहीं कह पाती ,मगर अपने रब से शिकायत रोकर कर दिया करती। दिन बितने लगे ,पूरो की बेटियाँ बढ़ी हो गई। अच्छे घरों में शादी करके चली गई। पूरो के बेटे की भी शादी हो गई। फिर पूरो बेटे और बहू के साथ किसी दूसरे घर में चली गई। दोस्तों! जो जैसा करता है ,उसको फल वैसा ही मिलता है मगर इन्सान सोचता है।कर लो ,जो भी करना है आगे किस ने देखा है । मगर भूल जाता है कि चाहे अगर कोई भगवान के मंदिर मस्जिद को तोड़ दे ,भगवान उसे तो माफ़ कर देगा मगर जो कोई उसके भक्त को रूला दे,या उसका दिल दुखा दे या फिर उससे कोई बल छल करे तो रब उसे कभी माफ़ नहीं करता।
ये इक ऐसा सच है जो आज नहीं तो कल ..देखने को मिल ही जाता है। और यहाँ भी कुछ ऐसा ही हुआ। पूरो तो वहाँ से अपने बेटे के साथ चली गई,और उधर पूरो की देवरानी के घर ग़रीबी और दुखों का बसेरा हो गया। पूरो की छोटी बेटी रतना सब पुरानी बातें भुला कर अपनी चाचा चाची को मिलने ज़ाया करती। जो भी अपनी माँ पूरो को देती ,वही अपनी चाची को भी देती।चाचा चाची के घर ग़रीबी देख कर ,कभी पैसों से ,कभी दवाइयों से उनकी मदद कर दिया करती,क्यूँकि रतना का पति डाक्टर था। इक रोज़ चाची रतना के सामने रो पड़ी और माफ़ी माँगने लगी कि मैंने तुम्हारी माँ के साथ बहुत बुरा बर्ताव किया है और तुम मुझे अपनी सगी माँ तरह प्यार करती हो और इस पर रतना अपनी चाची और चाचा को गले लगा लेती। वक़्त का पहिया चल रहा था तो इक रोज़ पता चला कि देवरानी की एक बेटी को कैंसर हो गया और वो भरी जवानी में चल बसी और दूसरी बेटी कमला का पति इंग्लैंड चला गया और वहाँ उसने खुद को सैटल करने लिए दूसरी शादी कर ली।
इक रोज़ सास ससुर ने कमला को घर से निकाल दिया।किसी ने कहा कि कमला की भी दूसरी शादी कर दो।जल्दी ही एक 70 साल के आदमी से उसकी भी शादी इंग्लैंड में कर दी गई जो इक शराबी था। वहाँ इंग्लैंड में मेहनत करके कमला ने अपनी बेटियों की शादी कर दी ।दो साल बाद कमला का दूसरा पति भी गुज़र गया,फिर अकेली अपने दूसरे पति के बच्चों के पास रहने लगी।वहाँ उसे तिरस्कार मिलता ,बातें सुननी पड़ती। कभी कभी बैठे बैठे अपनी माँ को कोसती कि जैसे अब मैं तंग हो रही हूँ ठीक ऐसे ही उसकी माँ ने पूरो ताई को तंग किया था, मगर वक़्त निकल चुका है। दोस्तों बात यहाँ भी ख़त्म नहीं हुई इक रोज़ रतना अपनी चाची चाचा को मिलने गई तो देखा चाचा को स्ट्रोक हो गया था और चाची चल नहीं सकती थी रेंग रेंग कर ज़मीन पर चला करती। ये दुर्दशा देख कर रतना को बहुत दुख हुआ था। चाचा चाची का बेटा भी गुज़र गया था। सो सोचो दोस्तों ! क्या खटा चाचा चाची ने ? जितना बुरा किया था पूरो के साथ ,उससे कही अधिक बुरा उसे वापस मिला।
बात आज की हो, या पुरानी।भुगतना तो पड़ेगा ही सबको कभी न कभी।ये सोच ग़लत है कि शायद उनके साथ हुआ है हमारे साथ नहीं होगा। सब की बारी आती हैं ,जो बोया है वही काटने की। जब समझ में आयेगा ,तो वक़्त निकल चुका होता है। उधर पूरो ने अपनी सारी उम्र पूजा पाठ में लगा दी । मरते दम तक गुरू के घर में सेवा करती रही ….🙏स्मिता केंथ
गंधर्व विवाह
पता नहीं यह मंदिर मुझे क्यों अच्छा लगता था मुझे और यह भी नहीं जानती थी कि यहां बैठकर मुझे शांति क्यों मिलती है? यहीं पर गीत गुनगुनाते हुए भगवान के लिए फूलों की माला बनाना मुझे अच्छा लगता है। मां बाबूजी सुबह – सुबह आकर मंदिर की साफ सफाई में लग जाते हैं। आंगन साफ करना, पौधों में पानी डालना, फूलों का कचरा समेटना उनका यही काम था। मैं भी मां के साथ-साथ मंदिर चली आती थी। पहले पहल तो यूं ही साथ में आ जाती थी लेकिन अब यह बोलकर साथ आती हूं कि तुम्हारे काम में हाथ बंटा दूंगी तो काम जल्दी निपट जाएगा। यहीं पर काम करते-करते मैं छोटी से बड़ी हो गई थी। सभी से मेरी अच्छी जान पहचान हो गई थी। मंदिर में पुजारी मेरे हाथ की बनी माला सामने से मुझसे मांग कर चढ़ाते थे क्योंकि मैं माला बहुत सुंदर बनाती थी। मैं माला की टोकरी मंदिर के सीढ़ियों के पास रख देती थी। पंडित जी पानी के छींटे मारकर टोकरी अंदर ले लेते थे और भगवान को चढ़ा देते थे। यह मंदिर मुझे अब अपना घर जैसा ही लगने लगा था। एक दिन ना आऊं तो कुछ अधूरा सा लगता था।
मां:- “मीता, चलो जल्दी चलना है मंदिर में नए पुजारी आए हैं। अपना काम समय पर हो जाना चाहिए।
मीता:- “ठीक है, मैं नहा कर आती हूं, फिर चलती हूं।” कुछ देर बाद मैं, मां और बाबू जी मंदिर पहुंच गए। बाबू जी पौधों में पानी डालने लगे और मां आंगन की साफ सफाई करने लगी और मैं फूल तोड़ने में व्यस्त हो गई। तभी नए पुजारी ने आवाज दी।
नया पुजारी:- “ऐ लड़की यहां क्या कर रही हो? चलो दूर जाओ मंदिर से।”
मीता:- “जी! भगवान के लिए फूल तोड़ रही थी। वह पुराने पंडित जी मेरी बनाई माला भगवान को चढ़ाते हैं तो…।”
नया पुजारी:- “नहीं! कोई जरूरत नहीं है तुम्हारी माला की। भगवान अपवित्र हो जायेंगे।”
पुराने पुजारी:- अरे शंकर क्या बात है जो मीता को डांट रहे हो? जात की मालन है, फूल तो तोड़ कर दे ही सकती है। कोई बात नहीं भीतर रख दो मैं ले लूंगा बाद में।”
मीता:- “पंडित जी प्रणाम !
शंकर:- “आपकी वजह से ही यह लड़की सर चढ़ी हुई है तभी उसकी इतनी हिम्मत बढ़ जाती है।”
बात आई गई हो गई। मीता बचपन से आगे किशोरावस्था की ओर बढ़ रही थी। वो रोज फूल तोड़कर, मालाएं बनाकर मंदिर की सीढ़ियों पर रख देती थी। जिसे पंडित जी धोकर भगवान को चढ़ा देते थे। आज मीता को मंदिर पहुंचने में देर हो गई थी।
पंडित जी:- “अरे मीता फूल कहां है ? मालाएं भी नहीं बनाई? आज भगवान को बिना श्रृंगार के ही रखने का इरादा है क्या?”
मीता:- “जी! आज देर हो गई, सिर धोना था इसलिए।”
पंडित जी:- “अच्छा… अच्छा ! जाओ जल्दी से फूल लेकर आओ।”
मीता:- “जी!”
आज सुबह मीता फूल तोड़ते हुए गुनगुना रही थी। शंकर पंडित मीता को एकटक देखे जा रहा था। खुले घुंघराले बाल जो हवा के कारण उसके चेहरे पर बार-बार आ रहे थे और जिन्हें वह बार-बार अपने चेहरे से हटा रही थी। शंकर को यह देखकर बड़ा सुखद अहसास हो रहा था। अब वो मीता के प्रति जरा नरम व्यवहार रखने लगा था। कभी कभार बातचीत भी कर लेता था। मीता जरा आश्चर्यचकित थी कि पंडित जी में यह बदलाव कैसे और क्यों आ गया था लेकिन वो खुश थी कि चलो अब इनका स्वभाव अच्छा हो गया है तो अब डांट नहीं पड़ेगी।
शंकर:- “देखो मीता तू सब काम किया कर मगर मुझसे दूर रहा कर। पूजा-पाठ के समय तू छू लेगी तो मुझे फिर से नहाना पड़ेगा और पूजा में देर हो जाएगी फिर और बड़े पंडित जी मुझे डांटेंगे।”
मीता:- “अरे पंडित जी यह बातें अब कौन मानता है? यह भेद तो अब खत्म हो गया है।”
शंकर पंडित:- “मुझे नहीं पता और मुझसे मुंह मत लड़ा। मुझे भगवान को अपवित्र नहीं करना है। तुम छोटी जात के हो तो तुम्हें अपनी सीमा में रहना चाहिए।”
मीता कुछ बोली नहीं क्योंकि कुछ भी बोलने पर उसे डांट पड़ सकती थी फिर बाबूजी भी उसे ही डांटते यह सोचकर वो चुप रही। शंकर को मीता न जाने कबसे अच्छी लगने लगी थी। उसकी नजर जब तब मीता को खोजते रहती। मीता इन बातों से अनजान अपने काम में व्यस्त मस्त रहती थी।
शंकर:- “मीता! आज फूल कुछ कम लग रहे हैं ! थोड़े तुलसी के पत्ते और फूल लेकर आओ।”
मीता:- “जी !”
फूल और तुलसी के पत्ते देते हुए मीता का हाथ शंकर के हाथों को छू गया।
शंकर:- “यह क्या किया ? अब फिर से नहाना पड़ेगा! सब खराब कर दिया!” मीता घबरा गई और दो कदम पीछे हट गई।
मीता का स्पर्श शंकर को रोमांचित कर गया। वह खुद को बहुत पुलकित महसूस कर रहा था और उसकी नजरें मीता को तलाश रही थी। इधर मीता डांट के डर से शंकर के सामने जाने से डर रही थी। अब शंकर किसी ना किसी बहाने से मीता को छूने का प्रयास करता और फिर उसे झिड़की देकर नहाने चला जाता। मीता अब उसके सामने जाने से बचती। उसके आने के पहले ही फूल सीढ़ियों पर रख कर चली जाती। एक दिन शंकर ने मीता को बुलाया और पूछा, “क्यों मीता आजकल दिखाई नहीं देती हो? जल्दी फूल रखकर चली जाती हो? फूल मुरझा जाते हैं ऐसे फूल भगवान को कैसे चढ़ाऊं?”
मीता कुछ बोली नहीं बस अपने पैर के अंगूठे को देखती रही।
शंकर:- “कल से ताजे फूल लाकर देना समझी।”
मीता ने सुकून की सांस ली कि पंडित जी ने डांटा नहीं।
अब रोज की दिनचर्या हो गई थी मीता फूल लाकर सीढ़ियों पर रख देती और शंकर फूल लेने के बहाने उससे बातें करता।
सुबह बगीचे में से फूल चुनकर सीढ़ियों पर रखते हुए मीता ने पंडित जी को आवाज लगाई लेकिन प्रत्युत्तर में कोई जवाब नहीं आया। वो सोच में पड़ गई कि फूल ऐसे रख कर जाऊंगी तो पंडित जी नाराज होंगे। वह कुछ देर तक रुकी रही फिर आवाज लगाई लेकिन कोई प्रतिक्रिया नहीं आई। थोड़ी देर में पुराने पंडित जी दिखाई दिए।
पंडित जी:- “अरे मीता! यहां क्या कर रही हो इस समय?”
मीता:- “जी, फूल देने आई थी मगर महाराज जी दिखे नहीं तो रुक गई।”
पंडित जी:- “अच्छा ठीक है, तुम जाओ मैं फूल ले लेता हूं।”
मीता:- “आज वह महाराज नहीं आये हैं क्या?”
पंडित जी:- “हां, शंकर को बुखार हो गया है, वो घर पर आराम कर रहा है।”
मीता:- “जी !”
पंडित जी:- ” तेरी मां को शंकर के यहां भेज देना। घर गंदा पड़ा है तो वह साफ सफाई कर देगी।
मीता:- “जी !”
मीता:- “मां! बड़े पुजारी जी कह रहे थे कि आपको शंकर महाराज के घर की साफ सफाई के लिए जाना है।”
मां:- “नहीं, मैं नहीं जा पाऊंगी। आज काम के बाद बाजार से सब्जी और राशन लाना है और गैस का बाटला खत्म हो गया है तो वो भी लाना है। आज मेरे पास बिल्कुल भी समय नहीं है। ऐसा कर आज तू ही काम करके आ जा।”
मीता:- “ठीक है।”
मीता शंकर के घर की ओर निकल जाती है। घर पहुंचते ही मीता शंकर को कंबल ओढ़े हुए देखती है।शंकर:- “कौन है?”
मीता:- “महाराज जी मैं हूं मीता। घर की सफाई करने आई हूं।”
शंकर:- “ठीक है कर लो” और शंकर उसे काम करते हुए देखता रहता है। उसकी नजरें उसके चेहरे से हटकर उसके पूरे शरीर का मुआयना कर रही थी। मीता का ध्यान नहीं था शंकर पर। वह अपने काम में व्यस्त थी। शंकर के लिए अपने ऊपर नियंत्रण रख पाना मुश्किल हो गया था। वह उठा और मीता को पीछे से पकड़कर उठा लिया। मीता घबरा गई।
मीता:- “पंडित जी ! आप मुझे क्यों छू रहे हैं? ऐसे क्यों पकड़ रहे हैं?”
शंकर:- “कुछ नहीं, घबराओ मत! मैं कुछ नहीं कर रहा। तुम बहुत सुंदर हो, थक गई होगी लो पानी पियो” और उसने मीता को पानी दिया। मीता ने डरते हुए, सकुचाते हुए पानी का ग्लास हाथ में लिया।
शंकर:- “देखो! तुम मुझे बहुत अच्छी लगती हो लेकिन लोकलाज के डर से मैं तुम्हें कुछ नहीं कहता और इसी डर से मैं तुम्हें अपना भी नहीं सकता। क्या ही अच्छा हो कि तुम मेरी पत्नी बन जाओ। क्या तुमने गंधर्व विवाह का नाम सुना है?”
मीता:- “वो क्या होता है?”
शंकर:- “जिसमें दो लोग अपनी इच्छा से ईश्वर को साक्षी मानकर विवाह कर लेते हैं।”
मीता:- “जी, नहीं सुना है”।
शंकर:- “आओ हम दोनों गंधर्व विवाह कर लें।”
मीता कुछ सोच समझ नहीं पा रही थी। वह बाहर जाने के लिए मुड़ी तो शंकर उसका हाथ पकड़ लिया और उसके कान के पास जाकर फुसफुसा कर कहा, “आज से तुम मेरी पत्नी हो और महाराज की आज्ञा तुम्हें माननी पड़ेगी।”
मीता कुछ समझ नहीं पा रही थी और डर से विरोध भी नहीं कर पा रही थी। शंकर उसे अपने बाहुपाश में लेकर अपने जाल में फंसा रहा था और मूक जानवर की तरह मीता का वध हो रहा था। कुछ दिनों तक यही सिलसिला चलता रहा। वह उसे घर की साफ सफाई के बहाने बुलाते रहता और उसका शोषण करता रहा। कुछ दिनों बाद मीता के पैर भारी हो गए। उसे उल्टियां आने लगी और जी मिचलाने लगा। मां को चिंता हुई तो वह उसे डॉक्टर के पास ले गई।
डॉक्टर:- “आपकी बेटी की शादी हो गई है?
मीता की मां:- “नहीं! क्यों? आप ऐसा क्यों पूछ रही हैं?”
डॉक्टर:- “उम्र काफी कम है इसकी लेकिन आप लोगों में बेटियों की शादी जल्दी कर देते हैं इसीलिए पूछा। यह पेट से है।”
मीता की मां:- “क्या!”
मीता की मां के पैरों तले जमीन सरक गई। मां – बेटी दोनों घर लौट कर आ गईं।
मां:- “बता कौन है वह? कहां मुंह काला करती फिर रही है? बता! नहीं तो मार डालूंगी?
मीता:- “मां, वह मंदिर के पुजारी… उन्होंने मुझसे शादी की है।”
मां के तन बदन में आग लग गई और दो चार थप्पड़ रसीद दिये मीता को और सर पकड़ कर बैठ गई। दुख और क्रोध के कारण आंसू निकलने लगे। जब पिता को सब बात पता चली तो वह तनाव में आ गए। उन्हें कुछ सूझ नहीं रहा था कि क्या करें। दोनों पति – पत्नी ने शंकर पंडित के पास जाने का निश्चय किया। अगले दिन दोनों पति-पत्नी डरते हुए बड़े पुजारी के पास गये और उन्हें सारी बातें बताईं। पंडित जी को बहुत गुस्सा आया और उन्होंने मीता को बुलवाया।
बड़े पुजारी:- “क्यों मीता यह तेरे मां बाऊजी जो कह रहे हैं क्या वह सही है?”
(मीता सिर झुकाए हुए) “जी!”
पंडित जी:- “तुम्हें शर्म नहीं आती ऐसी ओछी बात करते हुए? तुम्हें अंदाजा है कि इसका नतीजा क्या होगा?”
मीता कुछ नहीं बोली। वह नीचे बैठ कर रोने लगी। पंडित जी ने शंकर को बुलवाया और उससे सारी हकीकत जाननी चाही।
बड़े पंडित:- “शंकर! मीता कह रही है कि तुमने उससे शादी की है? वह गर्भवती है, क्या यह सही है?”
शंकर:- “नहीं महाराज ! यह सरासर झूठ बोल रही है। मैं तो इसके हाथ का छुआ पानी भी नहीं ले सकता। इसके हाथ से फूल माला भी नहीं लेता। मैं तो इससे दूरी बनाकर रहता हूं फिर इससे शादी की बात कैसे सोच सकता हूं?”
मीता अवाक सी शंकर का मुंह देखती रह गई। मीता के माता-पिता दुखी हो गये। उन्हें पता था कि यही होने वाला है।
पंडित जी:- “देखो! शंकर झूठ नहीं बोल सकता, मैं उसे जानता हूं। तुम लोग मीता से ही पूछताछ करो कि कौन है वह व्यक्ति और मीता तुम मंदिर आना बंद कर दो अभी तुम्हारी जरूरत नहीं है।”
तीनों व्यक्ति दुखी मन से घर वापस आ गए। मीता की मां ने मीता को फिर से भला बुरा कहा और मारा। दुख और क्रोध कम नहीं हो रहा था और कुछ उपाय भी नहीं दिख रहा था। पिता ने बहुत सोच-विचार कर बड़ी हिम्मत करके अगले दिन पुलिस में शिकायत दर्ज करवाने की ठानी।
अगले दिन वह पुलिस चौकी पहुंच गए।
मीता के पिता:- “साब शिकायत लिखवानी है।” इंस्पेक्टर:- “किसके खिलाफ? क्या केस है?”
पिता:- “जी, मंदिर के पुजारी के खिलाफ।” इंस्पेक्टर चौंक गया फिर उसने पूछा कि क्या मामला है।
पिता:- “जी, शंकर पंडित ने बहला-फुसलाकर मेरी लड़की के साथ दुराचार किया है और अब वह अपनी बात से मुकर रहा है” और सारी घटना की जानकारी इंस्पेक्टर को दी।
इंस्पेक्टर जानता था कि पुजारी से पंगा लेना ठीक नहीं है। उसने मीता के पिता को डांट कर भगा दिया और शिकायत दर्ज नहीं की साथ ही धमकी भी दी यदि चुप नहीं रहे तो इसका नतीजा बुरा होगा।
इंस्पेक्टर:- “तुम जैसे लोग पैसा बनाने के लिए कितना नीचे गिर जाते हो! जाओ यहां से नहीं तो अंदर कर दूंगा। तुम्हें भी और तुम्हारे पूरे परिवार को भी।
मीता का पिता अपमानित होकर घर आ गय। कुछ ना कर पाने का दुख और माथे पर कलंक लेकर और बेटी के जीवन का सत्यानाश होते देख कर रोने लगा। कुछ ही दिनों में सबके सामने यह बात खुल जाने वाली थी। यह सोचकर वह अपना सामान बांधने लगा और दूसरे शहर जाने की तैयारी करने लगा क्योंकि इसके सिवा उसके पास कोई चारा नहीं था। – प्रियंका वर्मा महेश्वरी
अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के उपलक्ष में डी जी कॉलेज में विभिन्न कार्यक्रम आयोजित
कानपुर 7 मार्च भारतीय स्वरूप संवाददाता, अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर डी जी कॉलेज, कानपुर में राष्ट्रीय सेवा योजना इकाई तथा सेंचुरी क्लब के संयुक्त तत्वाधान में डॉ संगीता सिरोही के कुशल निर्देशन में छात्राओं ने भारत में सितंबर, 2023 में होने जा रहे जी-20 के सम्मेलन में W20 के अंतर्गत *महिला सशक्तिकरण* की थीम को केंद्रित करते हुए फैशन शो, रैंप वॉक, बॉलीवुड डांस व गानों के द्वारा समा बांधा। कु दीक्षा को बेस्ट साड़ी, कु सौम्या को ऑल राउंडर अवार्ड दिया गया।
कार्यक्रम की अध्यक्षता प्राचार्या प्रो अर्चना वर्मा जी ने की। उन्होंने अपने वक्तव्य मैं छात्राओं के द्वारा किए गए प्रयासों की भूरी-भूरी प्रशंसा करते हुए कार्यक्रम अधिकारी को शुभकामनाएं व बधाई दी। इस अवसर पर डॉ अंजना श्रीवास्तव, डॉ श्वेता गोंड भी उपस्थित रही। कार्यक्रम को सफल बनाने के लिए सभी छात्राओं ने बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया। आकांक्षा अस्थाना, दीपा आदि का सहयोग सराहनीय रहा।
एस एन सेन बालिका महाविद्यालय की छात्रा कु सुनीता पाल को मिला मिनी मैराथन में प्रथम स्थान
कानपुर 1 मार्च भारतीय स्वरूप संवाददाता, 17वीं बटालियन यू. पी. गर्ल्स (एन.सी.सी) द्वारा आयोजित मिनी मैराथन प्रतियोगिता जिसमें विभिन्न कॉलेजों से आए लगभग 400 प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया,
इसमें कड़ी टक्कर देकर प्रथम स्थान एस एन सेन बालिका महाविद्यालय की छात्रा कु सुनीता पाल ने अपने नाम किया व महाविद्यालय का नाम पूरे प्रदेश में रोशन किया।राष्ट्रीय विज्ञान दिवस के आयोजन पर महाविद्यालय की एन.सी.सी. यूनिट से जुड़ी छात्रा कैडेट सुनीता पाल को प्राचार्या द्वारा प्रोत्साहन राशि देकर सम्मानित किया गया।
मीडिया प्रसार प्रभारी डॉ प्रीति सिंह ने बताया महाविद्यालय की प्राचार्या डॉ सुमन ने घोषणा की कि इस प्रकार की मेधावी छात्रावों की पढ़ायी में महाविद्यालय उनकी फ़ीस , पुस्तकों आदि की भरपूर मदद करेगा….. बस तुम दौड़ो नहीं उड़ो अब
एस. एन. सेन बी. वी. पी. जी. कॉलेज में विज्ञान दिवस मनाया गया
कानपुर 28 फरवरी भारतीय स्वरूप संवाददाता, एस. एन. सेन बी. वी. पी. जी. कॉलेज के विज्ञान संकाय द्वारा विज्ञान दिवस पूर्ण हर्षोल्लास के साथ मनाया गया। इस अवसर पर एक दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया जिसका शीर्षक कला एवं विज्ञान में संबंध रहा।संगोष्ठी का शुभारम्भ प्राचार्या डॉ सुमन की औपचारिक घोषणा के साथ हुआ ।रोहैलखंड विश्वविद्यालय के बिजनौर में स्थित आर बी डी कॉलेज से आई डॉ शताक्षी चौधरी मुख्य अतिथि रहीं।उन्होंने अपने व्याख्यान “कला और विज्ञान में सम्बन्ध”में विज्ञान और कला के सम्बन्ध को उजागर करते हुए कहा कला और विज्ञान एक दूसरे के पूरक हैं एक के बिना दूसरे की कल्पना भी नहीं की जा सकती । डॉ रचना निगम ने अपने व्याख्यान में भी विज्ञान के साथ कला को जोड़ा ।मंच संचालन जंतु विज्ञान की प्रवक्ता कुमारी जेबा अफ़रोज़ ने किया ।विज्ञान संकाय की प्रोफेसर डॉ गार्गी यादव,डॉ प्रीति सिंह डॉ शिवांगी यादव डॉ शैल बाजपेयी डॉ अमिता सिंह डॉ समीक्षा सिंह ने सक्रिय सहभाग किया इस अवसर पर संपूर्ण महाविद्यालय परिवार उपस्थित रहा।
पर्यावरण संस्कृति एवं संरक्षण में तकनीकी का प्रयोग विषय पर व्याख्यान आयोजित
कानपुर 24 फरवरी भारतीय स्वरूप संवाददाता, दयानंद गर्ल्स पी जी कॉलेज द्वारा पर्यावरण संरक्षण को ध्यान में रखते हुए *पर्यावरण संस्कृति एवं संरक्षण में तकनीकी का प्रयोग* विषय पर एक व्याख्यान का आयोजन किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता प्राचार्या प्रो. अर्चना वर्मा जी ने तथा संचालन डॉ अंजना श्रीवास्तव ने किया।
कार्यक्रम की मुख्य वक्ता डॉ अनिता निगम ने छात्राओं को अपना व्याख्यान देते हुए उन्हें ‘इको मित्रम’ ऐप डाउनलोड कराया एवम् बीजारोपण का महत्व व संस्कृति तथा पर्यावरण संरक्षण से संबंधित अति महत्वपूर्ण जानकारियां दी। विभागाध्यक्ष, भूगोल , डॉ. संगीता सिरोही ने बताया कि इस अवसर पर एक “इको क्लब” भी बनाया गया जिसमें छात्राओं को “पर्यावरण मित्र” के रूप में नियुक्त किया गया है। आज इस अवसर पर 25 पौधे भी इको क्लब के द्वारा लगाए गए। धन्यवाद प्रस्ताव डॉ शशि बाला सिंह के द्वारा दिया गया। कार्यक्रम को सफल बनाने में डॉक्टर श्वेता, कृष्णेंद्र श्रीवास्तव, आकांक्षा अस्थाना, रामचंद्र, पारस व शिवनाथ, लक्ष्मी, पूनम और कु. पवित्रा का विशेष योग योगदान रहा। सभी छात्राओं ने सक्रियता के साथ व्याख्यान में भाग लिया।
एस एन सेन बालिका विद्यालय पीजी कॉलेज में विश्व चिंतन दिवस(वर्ल्ड थिंकिंग डे )मना
कानपुर भारतीय स्वरूप संवाददाता, एसएन सेन बालिका विद्यालय पीजी कॉलेज की वैष्णवी रेंजर टीम ने विश्व चिंतन दिवस(वर्ल्ड थिंकिंग डे )मनाया जो कि प्रत्येक वर्ष विश्व भर में 22 फरवरी को मनाया जाता है। इस दिन स्काउटिंग एवं गाइडिंग के संस्थापक ल लॉयड पावेल एवं उनकी बहन लेडी ऑलवे पावेल की जन्मदिवस के रूप में उनकी याद में मनाया जाता है। 2023 इस वर्ष की थीम है “हमारी दुनिया हमारा शांतिपूर्ण भविष्य”। इस समारोह में विशिष्ट अतिथि माननीय श्री संतोष दिक्षित ( लीडर ट्रेनर ) एवं महाविद्यालय के प्राचार्य प्रोफेसर सुमन (लीडर ट्रेनर ) रहे। श्री संतोष दिक्षित जी ने रेंजर्स को प्रत्येक दिन सेवा भाव में कार्य करने के लिए प्रेरित किया एवं उससे होने वाली खरी कमाई को एक नोटबुक में एकत्र कर उसका विश्लेषण करने के लिए छात्राओं को प्रेरित किया। प्राचार्य प्रोफेसर सुमन ने रेंजर्स को एडवांस कोर्स करने के लिए एवं राज्यपाल और राष्ट्रपति पुरस्कार के लिए आगे बढ़े और रेंजर्स में सेवा भाव के साथ देश की सेवा करने के लिए प्रोत्साहित किया। डॉ प्रीति पांडे जोकि महाविद्यालय की रेंज टीम की प्रभारी हैं ने पूरे कार्यक्रम को आयोजित एवं संचालित किया एवं उनकी सहयोगी डॉक्टर रोली मिश्रा भी कार्यक्रम में उपस्थित रहे। वर्ल्ड थिंकिंग डे पर भारी संख्या में छात्राएं एवं रेंजर्स उपस्थित रहे और इस समारोह को खुशी और उल्लास के साथ वर्चुअल प्लेटफार्म पर मनाया गया।
Read More »डी जी कॉलेज में मनाया गया अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस
कानपुर 21 फरवरी भारतीय स्वरूप संवाददाता, दयानंद गर्ल्स पी जी कॉलेज में आज सेंचुरी क्लब कोऑर्डिनेटर डॉ संगीता सिरोही के कुशल निर्देशन में अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस मनाया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता प्राचार्या प्रो अर्चना वर्मा जी ने की। उन्होंने अपने संबोधन में छात्राओं को अवगत कराया कि अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस 21 फरवरी को मनाया जाता है। UNESCO द्वारा यह दिवस फरवरी, 2000 से प्रतिवर्ष भाषायी और सांस्कृतिक विविधता और बहुभाषावाद को बढ़ावा देने के लिए मनाया जाता है।
अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस मनाया जाने के उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए ही कानपुर विजन @2047 तथा G-20 के अंतर्गत यह दिवस मनाया गया। इस अवसर पर छात्राओं के द्वारा एक भाषण व पोस्टर प्रेजेंटेशन का आयोजन भी किया गया। कु. दीपांशु धीमान ने कहा कि आजादी के 100 सालों में अपने कानपुर में ‘वसुधैव कुटुंबकम्’, ‘सर्वधर्म समभाव’ व ‘विविधता में एकता’ हम सभी का महत्वपूर्ण लक्ष्य है। डॉ अर्चना दीक्षित ने बताया कि महाविद्यालय में छात्राओं के व्यक्तित्व का चहुंमुखी विकास करने के लिए समय-समय पर राष्ट्रीय, अंतरराष्ट्रीय दिवस और समसामयिक मुद्दों पर निबंध लेखन, भाषण, संगोष्ठी व सेमिनार, कविता पाठ, रैली आदि का आयोजन इनके व्यापक प्रचार-प्रसार एवम् जन-जागरूकता को ध्यान में रखते हुए किया जाता है। कार्यक्रम को सफल बनाने में चीफ प्रॉक्टर प्रो अर्चना श्रीवास्तव, प्रो सुगंधा तिवारी, प्रो वंदना निगम, प्रो अलका श्रीवास्तव, डॉ मंजुला, डॉ अंजना श्रीवास्तव, डॉ स्वेता तथा डॉ कृष्णेंद्र समेत महाविद्यालय की समस्त प्रवक्ताओं व छात्राओं का सराहनीय योगदान रहा।
डी जी कॉलेज में मनाया गया सामाजिक न्याय दिवस
कानपुर भारतीय स्वरूप संवाददाता, दयानंद गर्ल्स पी जी कॉलेज, राष्ट्रीय सेवा योजना इकाई के द्वारा आज 20 फरवरी को कार्यक्रम अधिकारी डॉ संगीता सिरोही के निर्देशन में विश्व सामाजिक न्याय दिवस मनाया गया। प्राचार्या डॉ अर्चना वर्मा ने अपने उद्बोधन में बताया कि इसे मनाने का मुख्य उद्देश्य सामाजिक अन्याय के खिलाफ आवाज उठाना और गरीबी, लिंग, शारीरिक भेदभाव, अशिक्षा, धार्मिक भेदभाव को खत्म करने के लिए विभिन्न समुदायों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक साथ लाना है। इस अवसर पर एनएसएस वॉलिंटियर्स अर्पिता, दीक्षा, आस्था आदि ने भी अपने विचार प्रस्तुत किए। कार्यक्रम को सफल बनाने में की असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ अंजना श्रीवास्तव, डॉ अर्चना दीक्षित, डॉ श्वेता, आकांक्षा अस्थाना, दीक्षा मालवीया तथा सभी छात्राओं का सराहनीय योगदान रहा।
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