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राजनीति

वर्ष 2030 तक की अवधि के लिए रूस-भारत आर्थिक सहयोग के रणनीतिक क्षेत्रों के विकास के संबंध में नेताओं का संयुक्त वक्तव्य

8-9 जुलाई, 2024 को मॉस्को में रूस और भारत के बीच आयोजित 22वें वार्षिक द्विपक्षीय शिखर सम्मेलन के बाद, रूसी संघ के राष्ट्रपति महामहिम श्री व्लादिमीर पुतिन और भारत गणराज्य के प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने,

द्विपक्षीय व्यावहारिक सहयोग और रूस-भारत विशेष एवं विशेषाधिकार प्राप्त रणनीतिक साझेदारी के विकास के वर्तमान मुद्दों पर विचारों का गहन आदान-प्रदान करके,

पारस्परिक सम्मान और समानता के सिद्धांतों का दृढ़ता से पालन करते हुए, पारस्परिक रूप से लाभप्रद एवं दीर्घकालिक आधार पर दोनों देशों के संप्रभु विकास,

रूस-भारत व्यापार और आर्थिक सहयोग को बढ़ावा देकर द्विपक्षीय बातचीत को गहरा करने हेतु अतिरिक्त प्रोत्साहन देने,

दोनों देशों के बीच वस्तुओं और सेवाओं में व्यापार की गतिशील वृद्धि के रूझान को बनाए रखने के इरादे और 2030 तक इसकी मात्रा में उल्लेखनीय वृद्धि सुनिश्चित करने की इच्छा से निर्देशित,

निम्नलिखित बातों की घोषणा की:

रूसी संघ और भारत गणराज्य, जिन्हें इसके आगे “दोनों पक्षों” के रूप में संदर्भित किया जाएगा, के बीच निम्नलिखित नौ प्रमुख क्षेत्रों को शामिल करते हुए द्विपक्षीय आर्थिक सहयोग विकसित करने की योजना है:

1. भारत और रूस के बीच द्विपक्षीय व्यापार से संबंधित गैर-शुल्क व्यापार बाधाओं को समाप्त करने की आकांक्षा। ईएईयू-भारत मुक्त व्यापार क्षेत्र की स्थापना की संभावना सहित द्विपक्षीय व्यापार के उदारीकरण के मामले में बातचीत जारी रखना। संतुलित द्विपक्षीय व्यापार के लक्ष्य को हासिल करने हेतु भारत से माल की आपूर्ति में वृद्धि सहित 2030 तक (पारस्परिक सहमति के अनुरूप) 100 बिलियन अमेरिकी डॉलर से अधिक के पारस्परिक व्यापार की उपलब्धि को हासिल करना। दोनों पक्षों की निवेश संबंधी गतिविधियों को पुनर्जीवित करना, यानी विशेष निवेश संबंधी व्यवस्थाओं के ढांचे के भीतर।

2. राष्ट्रीय मुद्राओं का उपयोग करके द्विपक्षीय निपटान प्रणाली का विकास। आपसी निपटान में डिजिटल वित्तीय साधनों का निरंतर समावेश।

3. उत्तर-दक्षिण अंतरराष्ट्रीय परिवहन गलियारे, उत्तरी समुद्री मार्ग और चेन्नई-व्लादिवोस्टक समुद्री लाइन के नए मार्गों के शुभारंभ के जरिए भारत के साथ कार्गो कारोबार में वृद्धि। माल की बाधा रहित आवाजाही हेतु कुशल डिजिटल प्रणालियों के अनुप्रयोग के जरिए सीमा शुल्क प्रक्रियाओं का अधिकतम उपयोग।

4. कृषि उत्पादों, खाद्य और उर्वरकों के क्षेत्र में द्विपक्षीय व्यापार की मात्रा में वृद्धि। पशु चिकित्सा, स्वच्छता और पादप स्वच्छता संबंधी प्रतिबंधों व निषेधों को हटाने के उद्देश्य से गहन संवाद को जारी रखना।

5. परमाणु ऊर्जा, तेल शोधन और पेट्रोकेमिकल सहित प्रमुख ऊर्जा क्षेत्रों में सहयोग तथा ऊर्जा संबंधी बुनियादी ढांचे, प्रौद्योगिकियों एवं उपकरणों के क्षेत्र में सहयोग व साझेदारी का विस्तारित रूप में विकास। वैश्विक ऊर्जा परिवर्तन की संभावनाओं को ध्यान में रखते हुए, पारस्परिक और अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा सुरक्षा को सुविधाजनक बनाना।

6. बुनियादी ढांचे के विकास, परिवहन इंजीनियरिंग, ऑटोमोबाइल उत्पादन एवं जहाज निर्माण, अंतरिक्ष तथा अन्य औद्योगिक क्षेत्रों में बातचीत को ठोस रूप देना। सहायक कंपनियों एवं औद्योगिक समूहों का निर्माण करके भारतीय और रूसी कंपनियों को एक-दूसरे के बाजारों में प्रवेश की सुविधा प्रदान करना। मानकीकरण, माप-पद्धति (मेट्रोलॉजी) और अनुरूपता मूल्यांकन के क्षेत्र में दोनों पक्षों के दृष्टिकोण का समन्वय।

7. डिजिटल अर्थव्यवस्था, विज्ञान एवं अनुसंधान, शैक्षिक आदान-प्रदान के विभिन्न क्षेत्रों में निवेश एवं संयुक्त परियोजनाओं और उच्च तकनीक वाली कंपनियों के कर्मचारियों के लिए इंटर्नशिप को बढ़ावा देना। अनुकूल राजकोषीय व्यवस्थाएं प्रदान करके नई संयुक्त (सहायक) कंपनियों के गठन को सुविधाजनक बनाना।

8. दवाओं और उन्नत चिकित्सा उपकरणों के विकास एवं आपूर्ति में व्यवस्थित सहयोग को बढ़ावा देना। रूस में भारतीय चिकित्सा संस्थानों की शाखाएं खोलने और योग्य चिकित्साकर्मियों की भर्ती के साथ-साथ चिकित्सा एवं जैविक सुरक्षा के क्षेत्र में समन्वय को मजबूत करने की संभावनाओं का अध्ययन करना।

9. मानवीय सहयोग का विकास, शिक्षा, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी, संस्कृति, पर्यटन, खेल, स्वास्थ्य संबंधी देखभाल और अन्य क्षेत्रों में बातचीत का निरंतर विस्तार।

रूसी संघ के राष्ट्रपति और भारत गणराज्य के प्रधानमंत्री ने व्यापार, आर्थिक, वैज्ञानिक, तकनीकी और सांस्कृतिक सहयोग से संबंधित रूसी-भारतीय अंतर-सरकारी आयोग को चिन्हित किए गए प्राथमिकता वाले क्षेत्रों का अध्ययन करने और अगली बैठक में इसकी प्रगति का आकलन करने का निर्देश दिया।

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भारत में रोजगार पर सिटीग्रुप की शोध रिपोर्ट का खंडन

कुछ प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया द्वारा उद्धृत भारत में रोजगार पर सिटीग्रुप की हालिया शोध रिपोर्ट, जिसमें अनुमान लगाया गया है कि भारत सात प्रतिशत की विकास दर के साथ भी पर्याप्त रोजगार के अवसर पैदा करने के लिए संघर्ष करेगा, उपलब्ध व्यापक और सकारात्मक रोजगार डेटा को ध्यान में रखने में विफल रही है। रिपोर्ट में आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण (पीएलएफएस) और भारतीय रिजर्व बैंक के केएलईएमएस डेटा जैसे आधिकारिक स्रोतों से जानकारी नहीं ली गई है तथा ये स्रोत रिपोर्ट का खंडन करते हैं। अत: श्रम और रोजगार मंत्रालय ऐसी रिपोर्टों का दृढ़ता से खंडन करता है जो सार्वजनिक डोमेन में उपलब्ध सभी आधिकारिक डेटा स्रोतों का विश्लेषण नहीं करती हैं।

भारत के लिए रोजगार डेटा

भारतीय रिजर्व बैंक का केएलईएमएस डेटा 2017-18 से 2021-22 तक आठ करोड़ से अधिक रोजगार के अवसरों का संकेत देता है, जिसका मतलब प्रति वर्ष औसतन दो करोड़ से अधिक रोजगार है। उल्लेखनीय है कि इस तथ्य के बावजूद कि 2020-21 के दौरान विश्व अर्थव्यवस्था कोविड-19 महामारी से प्रभावित हुई थी, इसके मद्देनजर पर्याप्त रोजगार पैदा करने में भारत की असमर्थता के सिटीग्रुप के दावे का खंडन हो जाता है। यह महत्वपूर्ण रोजगार सृजन विभिन्न क्षेत्रों में रोजगार को बढ़ावा देने के उद्देश्य से विभिन्न सरकारी पहलों की प्रभावशीलता को प्रदर्शित करता है।

पीएलएफएस डेटा

वार्षिक पीएलएफएस रिपोर्ट निम्नलिखित से संबंधित श्रम बाजार संकेतकों में 2017-18 से 2022-23 के दौरान सुधार की प्रवृत्ति दर्शाती है: (i) श्रम बल भागीदारी दर (एलएफपीआर), (ii) श्रमिक जनसंख्या अनुपात (डब्ल्यूपीआर) और (iii) 15 वर्ष की आयु के व्यक्तियों के लिए बेरोजगारी दर (यूआर)। तदनुसार डब्ल्यूपीआर 2017-18 में 46.8 प्रतिशत से बढ़कर 2022-23 में 56 प्रतिशत हो गया है। इसी तरह, देश में श्रम बल की भागीदारी भी 2017-18 में 49.8 प्रतिशत से बढ़कर 2022-23 में 57.9 प्रतिशत हो गई है। बेरोजगारी दर 2017-18 में 6.0 प्रतिशत से घटकर 2022-23 में 3.2 प्रतिशत के निचले स्तर पर आ गई है।

पीएलएफएस डेटा से पता चलता है कि पिछले पांच वर्षों के दौरान, श्रम बल में शामिल होने वाले लोगों की संख्या की तुलना में अधिक रोजगार के अवसर पैदा हुए हैं, जिसके परिणामस्वरूप बेरोजगारी दर में लगातार कमी आई है। यह रोज़गार पर सरकारी नीतियों के सकारात्मक प्रभाव का एक स्पष्ट संकेतक है। जहां रिपोर्ट में रोजगार परिदृश्य को गंभीर बताया गया है, वहीं आधिकारिक डेटा भारतीय रोजगार बाजार की अधिक आशावादी परिदृश्य प्रस्तुत करता है।

ईपीएफओ डेटा

व्यापार सुगमता, कौशल विकास को बढ़ाने और सार्वजनिक व निजी, दोनों क्षेत्रों में रोजगार सृजन के लिए प्रोत्साहन प्रदान करने के सरकारी प्रयासों से औपचारिक क्षेत्र के रोजगार आंकड़ों को भी बढ़ावा मिल रहा है। ईपीएफओ डेटा से पता चलता है कि अधिक से अधिक कर्मचारी औपचारिक नौकरियों में शामिल हो रहे हैं। वर्ष 2023-24 के दौरान, 1.3 करोड़ से अधिक सब्सक्राइबर ईपीएफओ में शामिल हुए, जो वर्ष 2018-19 के दौरान ईपीएफओ में शामिल हुए 61.12 लाख की तुलना में दोगुने से भी अधिक है। इसके अलावा, पिछले साढ़े छह वर्षों के दौरान (सितंबर, 2017 से मार्च, 2024 तक) 6.2 करोड़ से अधिक सब्सक्राइबर ईपीएफओ में शामिल हुए हैं।

एनपीएस के नए सब्सक्राइबर

राष्ट्रीय पेंशन प्रणाली (एनपीएस) के आंकड़ों से पता चलता है कि केंद्र और राज्य सरकारों के तहत 2023-24 के दौरान 7.75 लाख से अधिक नए सब्सक्राइबर एनपीएस में शामिल हुए हैं, जो 2022-23 के दौरान सरकारी क्षेत्र के तहत एनपीएस में शामिल होने वाले 5.94 लाख नए ग्राहकों से 30 प्रतिशत अधिक है। नए सब्सक्राइबरों में यह पर्याप्त वृद्धि सार्वजनिक क्षेत्र में रिक्तियों को समय पर भरने के लिए सरकार के सक्रिय उपायों को उजागर करती है।

फ्लेक्सी-स्टाफिंग क्षेत्र

श्रम और रोजगार मंत्रालय के सचिव के साथ इंडियन स्टाफिंग फेडरेशन (आईएसएफ) के सदस्यों की हालिया बातचीत में, आईएसएफ सदस्यों ने बताया कि वे लगभग 5.4 मिलियन औपचारिक अनुबंध श्रमिकों को रोजगार दे रहे हैं। प्रतिभा की कमी और श्रम गतिशीलता के कारण विनिर्माण, खुदरा, बैंकिंग क्षेत्र में लगभग 30 प्रतिशत मांग अधूरी बनी हुई है।

अनेक नए अवसर

भारत में रोजगार बाजार की भविष्य की संभावनाएं अत्यधिक उत्साहजनक हैं, जैसा कि विभिन्न स्रोतों से प्राप्त आंकड़ों से पता चलता है। भारत में वैश्विक क्षमता केंद्रों (जीसीसी) ने हाल के वर्षों में उल्लेखनीय वृद्धि दिखाई है। गिग अर्थव्यवस्था देश में कार्यबल में उल्लेखनीय वृद्धि का भी भरोसा दिलाती है। विशेष रूप से, गिग अर्थव्यवस्था पर नीति आयोग की रिपोर्ट में प्लेटफ़ॉर्म श्रमिकों में पर्याप्त वृद्धि का अनुमान लगाया गया है, जिसके वर्ष 2029-30 तक 2.35 करोड़ तक पहुंचने की उम्मीद है, जो गिग अर्थव्यवस्था के तेजी से विस्तार को रेखांकित करता है। वर्ष 2029-30 तक भारत में गिग श्रमिकों के गैर-कृषि कार्यबल का 6.7 प्रतिशत या कुल आजीविका का 4.1 प्रतिशत होने की उम्मीद है। ये विकास सामूहिक रूप से भारत की मजबूत आर्थिक स्थिति और विविध रोजगार के अवसर पैदा करने की क्षमता को दर्शाते हैं।

डेटा विश्वसनीयता

यह सर्वविदित है कि निजी डेटा स्रोत, जिन्हें रिपोर्ट/मीडिया अधिक विश्वसनीय बताता है, में कई कमियां हैं। ये सर्वेक्षण रोज़गार के संबंध में अपनी स्वयं की परिभाषा का उपयोग करते हैं-बेरोजगारी जो राष्ट्रीय या अंतर्राष्ट्रीय मानकों के अनुरूप नहीं है। पीएलएफएस जैसे आधिकारिक डेटा स्रोतों के समान मजबूत या प्रतिनिधि नहीं होने के कारण नमूना वितरण और कार्यप्रणाली की अक्सर आलोचना की जाती है। इसलिए, आधिकारिक आँकड़ों की तुलना में ऐसे निजी डेटा स्रोतों पर निर्भरता से भ्रामक निष्कर्ष निकल सकते हैं और इसलिए, इनका उपयोग सावधानी से किया जाना चाहिए।

इसके अलावा, कुछ लेखक चुनिंदा डेटा का उपयोग करते हैं जो उनके विश्लेषण की विश्वसनीयता को कमजोर करता है और भारत में रोजगार परिदृश्य की सटीक तस्वीर पेश नहीं करता है। ऐसी रिपोर्टें आधिकारिक स्रोतों से प्राप्त सकारात्मक रुझानों और व्यापक आंकड़ों पर विचार करने में विफल रहती हैं।

सारांश

पीएलएफएस, आरबीआई, ईपीएफओ आदि जैसे आधिकारिक डेटा स्रोत प्रमुख श्रम बाजार संकेतकों में लगातार सुधार दिखाते हैं, जिसमें श्रम बल भागीदारी दर (एलएफपीआर) और श्रमिक जनसंख्या अनुपात (डब्ल्यूपीआर) में वृद्धि और पिछले पांच वर्षों के दौरान बेरोजगारी दर में गिरावट शामिल है। ईपीएफओ और एनपीएस डेटा सकारात्मक रोजगार रुझानों का समर्थन करते हैं। विनिर्माण, सेवा क्षेत्र के विस्तार, बुनियादी ढांचे के विकास के अलावा अन्य रुझान, जिसमें गिग और प्लेटफॉर्म अर्थव्यवस्था और जीसीसी जैसे कई क्षेत्रों में उभरते अवसर शामिल हैं, भविष्य की मजबूत संभावनाओं का संकेत देते हैं।

श्रम और रोजगार मंत्रालय आधिकारिक डेटा की विश्वसनीयता और व्यापकता पर जोर देता है, निजी डेटा स्रोतों के चयनात्मक उपयोग के प्रति आगाह करता है जिससे भारत के रोजगार परिदृश्य के बारे में भ्रामक निष्कर्ष निकल सकते हैं।

सरकार एक मजबूत और समावेशी रोजगार बाजार बनाने के लिए प्रतिबद्ध है और मौजूदा स्थिति से साबित होता है कि इस दिशा में पर्याप्त प्रगति हो रही है।

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छावनी क्षेत्रों को अन्य नगर पालिकाओं के लिए अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत करना चाहिए: उपराष्ट्रपति

उपराष्ट्रपति श्री जगदीप धनखड़ ने आज छावनी क्षेत्रों में पर्यावरण की देखभाल करने और वनस्पतियों का पोषण करने की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने सुझाव दिया कि समाज के व्यापक लाभ के लिए रक्षा संपदा भूमि पर संरचित तरीके से औषधीय पौधों और बागवानी को बढ़ावा देकर इसे प्राप्त किया जा सकता है।

आज उपराष्ट्रपति के एन्क्लेव में भारतीय रक्षा संपदा सेवा के 2023 बैच के प्रशिक्षु अधिकारियों से बातचीत करते हुए श्री धनखड़ ने कहा कि छावनी क्षेत्रों को स्वच्छता, हरियाली और नागरिक सुविधाओं के मामले में अन्य निकायों (जैसे नगर पालिकाओं) के लिए एक उदाहरण बनना चाहिए। विकसित हो रहे तकनीकी और भू-राजनीतिक परिदृश्य का उल्लेख करते हुए, उपराष्ट्रपति ने युवा अधिकारियों को तेजी से बदलते परिदृश्य के साथ लगातार तालमेल बिठाने की सलाह दी। अधिकारियों से हमेशा राष्ट्र को सर्वोपरि रखने का आग्रह करते हुए उन्होंने इस बात पर जोर दिया, “रक्षा का सबसे अच्छा तरीका युद्ध के लिए सदैव तत्पर रहना है।” रक्षा भूमि को हमारी सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण बताते हुए उपराष्ट्रपति महोदय ने रक्षा भूमि के प्रबंधन में आने वाली कई चुनौतियों जैसे अतिक्रमण और उसके बाद कानूनी विवादों का उल्लेख किया। उन्होंने प्रशिक्षु अधिकारियों को भूमि प्रबंधन के लिए प्रौद्योगिकी का सर्वोत्तम उपयोग करने की सलाह दी। उन्होंने कहा कि इससे आप किसी भी घुसपैठ की निगरानी कर सकेंगे और दृढ़ संकल्प के साथ त्वरित उपचारात्मक कार्रवाई कर सकेंगे। उपराष्ट्रपति, जो प्रतिष्ठित अधिवक्ता भी रहे हैं, उन्होंने ऐसे मामलों में अदालती कार्रवाई के लिए तंत्र विकसित करने की आवश्यकता पर भी बल दिया।

उपराष्ट्रपति महोदय ने परिवीक्षार्थियों को कभी भी आसान रास्ता न अपनाने का आह्वान करते हुए कहा कि वे नैतिक आचरण का उदाहरण प्रस्तुत करें तथा दूसरों के लिए आदर्श बनें। उन्होंने अधिकारियों से कहा कि “जब आप दबावों और चुनौतियों का सामना करें, तब भी दृढ़ रहें।” उन्होंने अधिकारियों से वर्ष 2047 तक विकसित भारत के निर्माण के लिए काम करने का आग्रह किया। यह देखते हुए कि रक्षा संपदा का ऐतिहासिक और विरासत संबंधी महत्व बहुत अधिक है, उपराष्ट्रपति महोदय ने इसकी योजना और विकास में दीर्घकालिक दृष्टिकोण अपनाने का आह्वान किया। डॉ. सुदेश धनखड़, रक्षा मंत्रालय के सचिव श्री गिरिधर अरमाने, रक्षा संपदा के महानिदेशक श्री जी.एस. राजेश्वरन, राष्ट्रीय रक्षा संपदा प्रबंधन संस्थान के निदेशक श्री राजेंद्र पवार, प्रशिक्षु अधिकारी, भारतीय रक्षा संपदा सेवा और उपराष्ट्रपति सचिवालय के वरिष्ठ अधिकारी

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केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने महाराष्ट्र में जीका वायरस के मामलों को देखते हुए राज्यों को परामर्श जारी किया है

स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय के स्वास्थ्य सेवा महानिदेशक (डीजीएचएस) डॉ. अतुल गोयल ने महाराष्ट्र में जीका वायरस के कुछ दर्ज किए गए मामलों को देखते हुए राज्यों को एक परामर्श जारी किया है। इसमें देश में जीका वायरस की स्थिति पर निरंतर सतर्कता बनाए रखने की जरूरत पर प्रकाश डाला गया है।

चूंकि जीका संक्रमित गर्भवती महिला के भ्रूण में माइक्रोसेफली और न्यूरोलॉजिकल प्रभाव आ जाता है, इसलिए राज्यों को सलाह दी गई है कि वे चिकित्सकों को कड़ी निगरानी के लिए सचेत करें। राज्यों से आग्रह किया गया है कि वे संक्रमित क्षेत्रों में स्वास्थ्य सुविधाओं या प्रभावित क्षेत्रों से आने वाले मामलों की देखभाल करने वाले लोगों को निर्देश दें कि वे गर्भवती महिलाओं की जीका वायरस संक्रमण के लिए जांच करें, जीका से संक्रमित पाई गईं गर्भवती माताओं के भ्रूण के विकास की निगरानी करें और केंद्र सरकार के दिए गए दिशा-निर्देशों के अनुसार कार्य करें। राज्यों को यह भी निर्देश दिया गया है कि वे स्वास्थ्य सुविधाओं/अस्पतालों को एक नोडल अधिकारी की पहचान करने की सलाह दें जो अस्पताल परिसर को एडीज मच्छर से मुक्त रखने के लिए निगरानी और कार्य करें।

राज्यों को कीट विज्ञान निगरानी को मजबूत करने और आवासीय क्षेत्रों, कार्यस्थलों, स्कूलों, निर्माण स्थलों, संस्थानों और स्वास्थ्य सुविधा केंद्रों में वेक्टर नियंत्रण गतिविधियों को तेज करने के महत्व पर जोर देते हुए निर्देश दिया गया है। राज्यों से समुदाय के बीच घबराहट को कम करने के लिए सोशल मीडिया और अन्य प्लेटफार्मों पर एहतियाती आईईसी संदेशों के माध्यम से जागरूकता को बढ़ावा देने का भी आग्रह किया गया है, क्योंकि जीका किसी भी अन्य वायरल संक्रमण की तरह ही है जिसके अधिकांश मामले लक्षणहीन और हल्के होते हैं। हालांकि, इसे माइक्रोसेफली से जुड़ा मामला बताया जाता है, लेकिन 2016 के बाद से देश में जीका से जुड़े माइक्रोसेफली की कोई रिपोर्ट नहीं आई है।

किसी भी आसन्न उछाल/प्रकोप का समय पर पता लगाने और नियंत्रण के लिए, राज्य अधिकारियों को सतर्क रहने, तैयार रहने और सभी स्तरों पर उचित रसद की उपलब्धता सुनिश्चित करने की सलाह दी गई है। राज्यों से यह भी आग्रह किया गया है कि वे पहचान में आए जीका के किसी भी मामले के बारे में तुरंत एकीकृत रोग निगरानी कार्यक्रम (आईडीएसपी) और राष्ट्रीय वेक्टर जनित रोग नियंत्रण केंद्र (एनसीवीबीडीसी) को बताएं।

जीका परीक्षण सुविधा राष्ट्रीय विषाणु विज्ञान संस्थान (एनआईवी), पुणे; राष्ट्रीय रोग नियंत्रण केंद्र (एनसीडीसी), दिल्ली और भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) की कुछ चुनिंदा वायरस अनुसंधान और नैदानिक ​​प्रयोगशालाओं में उपलब्ध है। जीका संक्रमण के बारे में उच्च स्तर पर समीक्षा की जा रही है।

डीजीएचएस ने इस साल की शुरुआत में 26 अप्रैल को एक एडवाइजरी भी जारी की थी। एनसीवीबीडीसी के निदेशक ने भी फरवरी और अप्रैल, 2024 में दो एडवाइजरी जारी की हैं ताकि राज्यों को एक ही वेक्टर मच्छर से फैलने वाली जीका, डेंगू और चिकनगुनिया बीमारी के बारे में पहले से चेतावनी दी जा सके।

केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय स्थिति पर लगातार नज़र रख रहा है।

पृष्ठभूमि:

डेंगू और चिकनगुनिया की तरह जीका भी एडीज मच्छर जनित वायरल बीमारी है। यह एक गैर-घातक बीमारी है। हालांकि, जीका संक्रमित गर्भवती महिलाओं से पैदा होने वाले शिशुओं में माइक्रोसेफली (सिर का आकार कम होना) से जुड़ा है, जो इसे एक बड़ी चिंता का विषय बनाता है।

भारत में 2016 में गुजरात राज्य में जीका का पहला मामला सामने आया था। तब से, तमिलनाडु, मध्य प्रदेश, राजस्थान, केरल, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, दिल्ली और कर्नाटक जैसे कई अन्य राज्यों में भी बाद में जीका मामले दर्ज किए हैं।

वर्ष 2024 में (2 जुलाई तक), महाराष्ट्र के पुणे में 6, कोल्हापुर में 1 और संगमनेर 1 यानी पूरे आठ मामले दर्ज किए गए हैं।

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केरल में पंचायतों को (2020-21 से 2026-27 तक) 15वें वित्त आयोग के अनुदान के रूप में 5337.00 करोड़ रुपये जारी किए हैं

केरल मीडिया के कुछ वर्गों में आई रिपोर्टों का संदर्भ लें। केरल में ग्राम पंचायतों को 15वें वित्त आयोग द्वारा अनुदान जारी करने में केंद्र सरकार की कथित लापरवाही पर पंचायती राज मंत्रालय ने निम्नलिखित जानकारी दी हैं :

(i) भारत सरकार ने केरल में ग्राम पंचायतों को 14वें वित्त आयोग (2015-16 से 2019-20 तक) के अनुदान के रूप में 3,774.20 करोड़ रुपये और इन पंचायतों को 15वें वित्त आयोग (2020-21 से 2026-27 तक) के अनुदान के रूप में 5,337.00 करोड़ रुपये (28.06.2024 तक) जारी किए हैं।

(ii) 15वें वित्त आयोग की अवधि के लिए, केरल को ग्रामीण स्थानीय निकायों को बिना शर्त (बेसिक) और सशर्त अनुदान के रूप में धनराशि जारी की गई। 15वें वित्त आयोग के तहत आवंटन और धनराशि जारी करने का विस्तृत वर्षवार सारांश नीचे दी गई तालिका 1 में दिया गया है :

तालिका नंबर-एक

ग्रामीण स्थानीय निकायों के लिए केरल राज्य को पंद्रहवें वित्त आयोग की धनराशि के आवंटन और धनराशि जारी करने की स्थिति

(करोड़ रुपए में)

क्रम सं. वर्ष बिना शर्त (बेसिक) अनुदान राशि सशर्त अनुदान राशि कुल
आवंटन जारी करना आवंटन जारी करना आवंटन जारी करना
1 2020–21 814.00 814.00 814.00 814.00 1628.00 1628.00
2 2021–22 481.20 481.20 721.80 721.80 1203.00 1203.00
3 2022–23 498.40 498.40 747.60 747.60 1246.00 1246.00
4 2023–24 504.00 504.00 756.00 756.00 1260.00 1260.00

(iii) 15वें वित्त आयोग की सिफारिशों के अनुसार, राज्यों के लिए यह अनिवार्य शर्त है कि वे राज्य वित्त आयोग (एसएफसी) का गठन करें, उनकी सिफारिशों पर कार्य करें और मार्च 2024 तक या उससे पहले राज्य विधानमंडल के समक्ष की गई कार्रवाई के संबंध में स्पष्टीकरण प्रस्तुत करें। मार्च 2024 के बाद, उस राज्य को कोई अनुदान जारी नहीं किया जाएगा, जिसने राज्य वित्त आयोग और इन शर्तों के संबंध में संवैधानिक प्रावधानों का अनुपालन नहीं किया है।

(iv) मंत्रालय ने 11 जून, 2024 और 24 जून, 2024 के अपने पत्र के माध्यम से राज्यों से राज्य वित्त आयोग का विवरण उपलब्ध कराने का अनुरोध किया है।

(v) राज्य सरकार ने 7 जून 2024 के पत्र के माध्यम से वित्त वर्ष 2023-24 के लिए बिना शर्त अनुदान की दूसरी किस्त का अनुदान हस्तांतरण प्रमाणपत्र (जीटीसी) प्रस्तुत किया है। इसकी जांच पंचायती राज मंत्रालय कर रहा है और वित्त मंत्रालय को अगली किस्त (वित्त वर्ष 2024-25 के लिए पहली किस्त) जारी करने की सिफारिश की जा रही है। हालांकि, 28 जून 2024 तक मंत्रालय को केरल से राज्य वित्त आयोग पर विवरण प्रस्तुत करने से संबंध में जवाब प्राप्त होना बाकी है, जो मार्च 2024 के बाद अनुदान जारी करने के लिए एक अनिवार्य शर्त है।

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दोनों सदनों के अनिश्चित काल के लिए स्थगित होने के साथ संसद सत्र समाप्त

18वीं लोकसभा के लिए हुए आम चुनावों के बाद, लोकसभा का पहला सत्र और राज्यसभा का 264वां सत्र क्रमशः 24 और 27 जून से बुलाया गया था। लोकसभा को कल 2 जुलाई, 2024 को अनिश्चित काल के लिए स्थगित कर दिया गया, जबकि राज्यसभा को आज 3 जुलाई, 2024 को अनिश्चित काल के लिए स्थगित कर दिया गया है। आज नई दिल्ली में एक संवाददाता सम्मेलन को संबोधित करते हुए, केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री श्री किरेन रिजिजू ने संसद के इस सत्र की कार्यवाही का विवरण प्रस्तुत किया। लोकसभा में पहले दो दिन 18वीं लोकसभा के नवनिर्वाचित सदस्यों के शपथ/प्रतिज्ञान के उद्देश्य के लिए विशेष रूप से समर्पित थे। सत्र के दौरान कुल 542 सदस्यों में से 539 ने शपथ/प्रतिज्ञान लिया।

शपथ/प्रतिज्ञान की सुविधा के लिए, भारत की राष्ट्रपति ने संविधान के अनुच्छेद 95(1) के तहत श्री भर्तृहरि मेहताब को प्रोटेम स्पीकर नियुक्त किया तथा श्री सुरेश कोडिकुन्निल, श्री राधा मोहन सिंह, श्री फग्गन सिंह कुलस्ते, श्री टी.आर. बालू और श्री सुदीप बंद्योपाध्याय को ऐसे व्यक्तियों के रूप में नियुक्त किया, जिनके समक्ष सदस्य संविधान के अनुच्छेद 99 के तहत शपथ/प्रतिज्ञान ले सकते हैं और उन पर हस्ताक्षर कर सकते हैं।

26 जून, 2024 को लोकसभा के अध्यक्ष का चुनाव हुआ और लोकसभा के सदस्य श्री ओम बिरला को ध्वनि मत से अध्यक्ष चुना गया। इसी दिन, प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने लोकसभा में अपने मंत्रिपरिषद का परिचय कराया। 27 जून, 2024 को राष्ट्रपति ने संविधान के अनुच्छेद 87 के तहत संसद के दोनों सदनों के संयुक्त सत्र को संबोधित किया, जिसमें सरकार की पिछली उपलब्धियों का ब्यौरा दिया गया और साथ ही राष्ट्र के भविष्य के विकास के लिए रोडमैप का भी विवरण दिया गया।

27 जून, 2024 को प्रधानमंत्री ने अपने मंत्रिपरिषद का राज्यसभा में परिचय कराया। राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव पर चर्चा 28 जून, 2024 को दोनों सदनों में शुरू होनी थी।

लोकसभा में व्यवधानों के कारण इस विषय पर बहस 1 जुलाई, 2024 को ही शुरू हो सकी। श्री अनुराग ठाकुर, सांसद ने बहस की शुरुआत की, जबकि सुश्री बांसुरी स्वराज, सांसद ने लोकसभा में चर्चा का समर्थन किया। कुल 68 सदस्यों ने बहस में हिस्सा लिया, जबकि 50 से अधिक सदस्यों ने अपने भाषण सदन के पटल पर रखे। 2 जुलाई, 2024 को 18 घंटे से अधिक चली चर्चा के बाद प्रधानमंत्री द्वारा बहस का उत्तर दिया गया। लोकसभा में लगभग 34 घंटे की अवधि में 7 बैठकें हुईं और एक दिन के व्यवधान के बावजूद उत्पादकता 105 प्रतिशत रही। राज्यसभा में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव पर चर्चा 28 जून, 2024 को श्री सुधांशु त्रिवेदी, सांसद द्वारा शुरू की गई, जिसका समर्थन सुश्री कविता पाटीदार, सांसद द्वारा किया गया। कुल 76 सदस्यों ने 21 घंटे से अधिक चली बहस में भाग लिया, जिसका उत्तर प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी द्वारा 3 जुलाई, 2024 को दिया गया। राज्यसभा की कुल उत्पादकता 100 प्रतिशत से अधिक रही।

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भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण ने राष्ट्रीय राजमार्गों पर मानसून के दौरान प्रभावी प्रबंधन के लिए सक्रिय कदम उठाए

मानसून के मौसम के दौरान राष्ट्रीय राजमार्गों पर जल भाराव या बाढ़ जैसी स्थिति की समस्या से निपटने के लिए भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआई) ने विभिन्न उपाय किए हैं और देश भर में राष्ट्रीय राजमार्गों पर आपातकालीन राहत प्रदान की है।

भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआई) पहाड़ी और मैदानी दोनों क्षेत्रों में प्रभावी समाधान प्रदान करने के लिए बहु-आयामी दृष्टिकोण अपनाते हुए बाढ़/भूस्खलन प्रभावित स्थानों पर मशीनरी और जनशक्ति को शीघ्रता से पहुंचाने के लिए अन्य निष्पादन एजेंसियों, स्थानीय अधिकारियों और प्रशासन के साथ निकट समन्वय में काम कर रहा है। इसके अलावा, प्रभावी आपदा राहत तैयारियों के लिए संसाधनों की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए, भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआई) समय पर तैनाती के लिए प्रमुख मशीनरी की उपलब्धता की मैपिंग कर रहा है।

राष्ट्रीय राजमार्गों पर जल भाराव या बाढ़ जैसी स्थिति से बचने के लिए, भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआई) राज्य सिंचाई विभाग के साथ संयुक्त निरीक्षण कर रहा है ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि किसी भी चालू चैनल/धारा का प्रवाह नवनिर्मित राजमार्ग से बाधित न हो। हाल ही में दिल्ली-काटरा एक्सप्रेसवे और अन्य परियोजनाओं पर सिंचाई विभाग के परामर्श से विशेष अभियान चलाया गया।

इसके अलावा, शहरी क्षेत्रों से गुजरने वाले राष्ट्रीय राजमार्गों पर, जहां भी जल भाराव की संभावना है, वहां पर्याप्त पंपिंग की व्यवस्था की जाएगी। राष्ट्रीय राजमार्ग उपयोगकर्ताओं तक किसी भी बाधा के बारे में जानकारी प्रसारित करने के लिए प्रौद्योगिकी का लाभ लेते हुए उन्नत यातायात प्रबंधन प्रणाली (एटीएमएस) के साथ-साथ राजमार्ग यात्रा ऐप का उपयोग किया जाएगा।

पहाड़ी क्षेत्रों में, जिला प्रशासन के साथ निकट समन्वय में प्रत्येक भूस्खलन संभावित स्थल पर पर्याप्त जनशक्ति और मशीनरी से सुसज्जित समर्पित आपातकालीन राहत दल तैनात किया गया है। इससे चौबीसों घंटे और सातों दिन संपर्क को सक्षम बनाने और यातायात की सुरक्षित और सुचारू आवाजाही प्रदान करने के लिए राष्ट्रीय राजमार्ग से गंदगी को तुरंत हटाने में सहायता मिलेगी। सुरक्षित यातायात संचालन की सुविधा के लिए प्रत्येक भूस्खलन संभावित क्षेत्र में अस्थायी अवरोध और चेतावनी संकेत स्थापित किए गए हैं।

निवारक उपायों के कार्यान्वयन के लिए, संवेदनशील स्थानों की पहचान की जाती है जिनके गंभीर रूप से प्रभावित होने की संभावना है जैसे बाढ़/भूस्खलन/चट्टान गिरने की संभावना वाले क्षेत्र, धंसने वाले क्षेत्र आदि। भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआई) के अधिकारी विभिन्न संरचनाओं जोड/ पुलों के खम्भे आदि का भी निरीक्षण कर रहे हैं जिनका बाढ़ का इतिहास रहा है ताकि तटबंधों पर क्षति की पहचान की जा सके। सड़क उपयोगकर्ताओं को सावधान करने के लिए संवेदनशील स्थानों पर चेतावनी संकेत लगाए जाएंगे। 

जिन स्थानों पर भारी भूस्खलन के कारण राष्ट्रीय राजमार्ग यातायात के लिए अवरुद्ध हो सकता है, वहां जिला प्रशासन के साथ एक वैकल्पिक मार्ग परिवर्तन योजना तैयार की गई है। इसके अलावा, कुछ कमजोर ढलानों और सुरंगों पर वास्तविक समय की निगरानी सहित भू-तकनीकी उपकरण को प्रयोग के रूप में लागू किया गया है।

भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआई) ने पूरे भारत में मानसून की प्रगति के साथ बाढ़ जैसी स्थिति से निपटने की तैयारी सुनिश्चित करने और आपातकालीन राहत को सक्षम करने के लिए कई सक्रिय कदम उठाए हैं। ये उपाय मानसून के मौसम के दौरान राष्ट्रीय राजमार्ग उपयोगकर्ताओं को निर्बाध यात्रा की सुविधा प्रदान करने में काफी सहायता करेंगे।

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शिक्षा मंत्रालय समस्‍त कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालयों और छात्रावासों में आईसीटी लैब एवं स्मार्ट कक्षाएं उपलब्ध कराएगा  

भारत सरकार के शिक्षा मंत्रालय के स्कूली शिक्षा एवं साक्षरता विभाग ने समस्‍त कार्यात्‍मक कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालयों (केजीबीवी) और छात्रावासों में ‘समग्र शिक्षा’ मानदंडों के अनुसार आईसीटी (सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी) लैब एवं स्मार्ट क्लासरूम उपलब्ध कराने का निर्णय लिया है, ताकि बालिकाओं को सशक्त बनाया जा सके, उन्हें डिजिटल रूप से दक्ष बनाया जा सके, और उनके ज्ञान एवं कौशल को बढ़ाया जा सके। इससे डिजिटल ज्ञान में मौजूदा खाई को पाटना भी संभव हो जाएगा। लगभग 290 करोड़ रुपये की अनुमानित लागत वाली इस पहल से केजीबीवी की 7 लाख बालिकाएं लाभान्वित होंगी।

केजीबीवी दरअसल वंचित समूहों जैसे कि एससी, एसटी, ओबीसी, अल्पसंख्यक, और गरीबी रेखा से नीचे (बीपीएल) जीवनयापन करने वाली बालिकाओं के लिए कक्षा VI से लेकर कक्षा XII तक के आवासीय विद्यालय हैं। केजीबीवी शैक्षणिक रूप से पिछड़े ब्लॉकों में खोले जाते हैं, जिसका उद्देश्य इन बालिकाओं तक पहुंच एवं गुणवत्तापूर्ण या बेहतरीन शिक्षा सुनिश्चित करना है और इसके साथ ही स्कूली शिक्षा के सभी स्तरों पर बालकों एवं बालिकाओं के ज्ञान में अंतर को कम करना है। वर्तमान में देश के 30 राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों में 5116 केजीबीवी कार्यरत हैं।

केजीबीवी में बालिकाओं को आईसीटी लैब और स्मार्ट क्लासरूम उपलब्ध कराना अत्‍यंत आवश्‍यक है क्योंकि केजीबीवी की बालिकाएं वंचित पृष्ठभूमि से आती हैं और उन्‍हें शिक्षा की प्राप्ति में विभिन्न बाधाओं का सामना करना पड़ता है जिनमें घर से स्‍कूलों का काफी दूर होना, सांस्कृतिक मानदंड और सुरक्षा संबंधी चिंताएं भी शामिल हैं। डिजिटल साक्षरता सुलभ कराना उनके व्यक्तिगत और प्रोफेशनल या व्यावसायिक विकास के लिए अत्‍यंत आवश्‍यक है। इससे डिजिटल ज्ञान में मौजूदा खाई को पाटने में भी काफी मदद मिलेगी।

तेजी से विकास और हमारे जीवन एवं आजीविका के साथ आईसीटी के एकीकरण के मौजूदा युग में यह अत्‍यंत आवश्‍यक है कि जीवन के सभी क्षेत्रों से वास्‍ता रखने वाले बालकों- बालिकाओं को खुद को आधुनिक प्रौद्योगिकी से लैस करने का अवसर मिले। आईसीटी को स्कूली पाठ्यक्रम में एकीकृत किया गया है ताकि विद्यार्थियों, विशेषकर वंचित समूहों के विद्यार्थियों को पर्याप्त अनुभवात्मक जानकारियां मिल सकें।

आईसीटी सुविधाएं उपलब्‍ध कराने से यह सुनिश्चित होगा कि केजीबीवी की बालिकाओं को स्कूली शिक्षा और साक्षरता विभाग के विभिन्‍न डिजिटल प्लेटफॉर्मों/संसाधनों जैसे कि ‘स्वयं’, ‘स्वयं प्रभा’, राष्ट्रीय डिजिटल लाइब्रेरी, ई-पाठशाला, राष्ट्रीय मुक्त शैक्षणिक संसाधन भंडार, दीक्षा, इत्‍यादि तक बेहतर पहुंच सुलभ होगी। इससे इन बालिकाओं का ज्ञान एवं कौशल बढ़ेगा।   

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स्मार्ट सिटी मिशन मार्च 2025 तक बढ़ाया गया

स्मार्ट सिटी मिशन भारत के शहरी विकास में एक नया प्रयोग है। जून 2015 में अपनी शुरुआत के बाद से, मिशन ने कई नवीन विचारों को अमल में लाने का प्रयास किया है, जैसे कि 100 स्मार्ट शहरों के चयन के लिए शहरों के बीच प्रतिस्पर्धा, हितधारकों द्वारा संचालित परियोजना चयन, कार्यान्वयन के लिए स्मार्ट सिटी स्पेशल पर्पज व्हीकल्स का गठन, शहरी शासन में सुधार के लिए प्रौद्योगिकी और डिजिटल समाधानों का असरदार तरीके से इस्‍तेमाल, प्रमुख शैक्षणिक और व्यावसायिक संस्थानों द्वारा तीसरे पक्ष के प्रभाव का मूल्यांकन आदि।

100 शहरों में से प्रत्येक ने परियोजनाओं का एक विविध सेट विकसित किया है, जिनमें से कई बहुत ही अनोखी हैं और पहली बार लागू की जा रही हैं, जिससे शहरों की क्षमता और अनुभव में सुधार हुआ है और शहर के स्तर पर बड़े परिवर्तनकारी लक्ष्य हासिल हुए हैं। 100 शहरों द्वारा लगभग ₹ 1.6 लाख करोड़ की लागत से 8,000 से अधिक बहु-क्षेत्रीय परियोजनाएं विकसित की जा रही हैं।

03 जुलाई 2024 तक, 100 शहरों ने मिशन के हिस्से के रूप में ₹ 1,44,237 करोड़ की राशि की 7,188 परियोजनाएं (कुल प्रोजेक्ट का 90 प्रतिशत) पूरी कर ली हैं। ₹ 19,926 करोड़ की राशि की शेष 830 परियोजनाएं भी पूरा होने के अंतिम चरण में हैं। वित्तीय प्रगति के मामले में, मिशन के पास 100 शहरों के लिए ₹ 48,000 करोड़ का भारत सरकार का आवंटित बजट है। आज तक, भारत सरकार ने 100 शहरों को ₹ 46,585 करोड़ (भारत सरकार के आवंटित बजट का 97 प्रतिशत) जारी किए हैं। शहरों को जारी किए गए इन फंडों में से, अब तक 93 प्रतिशत का उपयोग किया जा चुका है। मिशन ने 100 में से 74 शहरों को मिशन के तहत भारत सरकार की पूरी वित्तीय सहायता भी जारी कर दी है।

मिशन को कुछ राज्यों/शहरों की सरकार के प्रतिनिधियों से कई अनुरोध प्राप्त हो रहे हैं, ताकि शेष 10 प्रतिशत परियोजनाओं को पूरा करने के लिए कुछ और समय दिया जा सके। शेष चल रही ये परियोजनाएं कार्यान्वयन के अंतिम चरण में हैं और विभिन्न स्थितियों के कारण विलंबित हो गई हैं। यह लोगों के हित में है कि ये परियोजनाएं पूरी हों और उनके शहरी क्षेत्रों में जीवन को आसान बनाने में योगदान दें। इन अनुरोधों का संज्ञान लेते हुए, भारत सरकार ने इन शेष 10 प्रतिशत परियोजनाओं को पूरा करने के लिए मिशन की अवधि 31 मार्च 2025 तक बढ़ा दी है। शहरों को सूचित किया गया है कि यह विस्तार मिशन के तहत पहले से स्वीकृत वित्तीय आवंटन से परे किसी भी अतिरिक्त लागत के बिना होगा। सभी चल रही परियोजनाओं के अब 31 मार्च 2025 से पहले पूरा होने की उम्मीद है।

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भारतीय खाद्य निगम ने रबी विपणन सीजन (आरएमएस) 2024-25 के दौरान 266 लाख मीट्रिक टन (एलएमटी) गेहूं खरीदा

भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) ने चालू रबी विपणन सीजन (आरएमएस) 2024-25 के दौरान 266 लाख मीट्रिक टन (एलएमटी) गेहूं की सफलतापूर्वक खरीद की है, जो पिछले साल के 262 एलएमटी के आंकड़े को पार कर गया है और देश में खाद्यान्न को सुनिश्चित किया है। आरएमएस 2024-25 के दौरान गेहूं की खरीद के लिए 22 लाख से अधिक भारतीय किसान लाभान्वित हुए हैं। न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) के तहत गेहूं की खरीद पर लगभग 0.61 लाख करोड़ रुपये सीधे इन किसानों के बैंक खातों में जमा किए गए हैं।

आरएमएस के तहत गेहूं की खरीद आम तौर पर हर साल 1 अप्रैल को शुरू होती है। हालांकि, किसानों की सुविधा के लिए, इस साल अधिकांश खरीद करने वाले राज्यों में इसे लगभग एक पखवाड़े पहले कर दिया गया था। यह उपलब्धि किसानों के हितों की रक्षा और सभी के लिए खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए सरकार की निरंतर प्रतिबद्धता को दर्शाती है।

विभिन्न गेहूं खरीद करने वाले राज्यों से एकत्र किए गए अनंतिम आंकड़ों के अनुसार, आरएमएस 2024-25 के दौरान कुल गेहूं खरीद 266 एलएमटी है, जो आरएमएस 2023-24 के 262 एलएमटी के आंकड़े और आरएमएस 2022-2023 के दौरान दर्ज 188 एलएमटी से अधिक है। उत्तर प्रदेश और राजस्थान राज्यों ने अपनी गेहूं खरीद की मात्रा में उल्लेखनीय सुधार दिखाया है। उत्तर प्रदेश ने पिछले साल 2.20 एलएमटी की तुलना में 9.31 एलएमटी की खरीद दर्ज की है, जबकि राजस्थान ने पिछले सीजन के 4.38 एलएमटी से 12.06 एलएमटी हासिल किया है।

पर्याप्त मात्रा में गेहूं की खरीद ने भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) को सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) में खाद्यान्न का निरंतर प्रवाह सुनिश्चित करने में मदद की है। यह पूरी खरीद प्रक्रिया पीएमजीकेएवाई सहित विभिन्न कल्याणकारी योजनाओं के तहत लगभग 184 एलएमटी गेहूं की वार्षिक आवश्यकता को पूरा करने में महत्वपूर्ण रही है।

भारत सरकार ने आरएमएस 2024-25 के लिए गेहूं के लिए 2275 रुपये प्रति क्विंटल का न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) घोषित किया। एमएसपी एक सुरक्षा कवच के रूप में कार्य करता है, यह सुनिश्चित करता है कि किसानों को उचित मूल्य मिले। इसके अलावा, अगर किसानों को बेहतर कीमत मिलती है, तो वे खुले बाजार में अपना अनाज बेचने के लिए स्वतंत्र हैं, जिससे प्रतिस्पर्धी बाजार का माहौल बनता है। एमएसपी का आश्वासन और खुले बाजार में बेचे जाने के उतार-चढ़ाव से सामूहिक रूप से किसानों के लिए बेहतर आय सुरक्षा हुई है।

गेहूं के अलावा, खरीफ विपणन सीजन 2023-24 के दौरान इन किसानों के बैंक खातों में एमएसपी पर धान की खरीद के लिए 1.74 लाख करोड़ रुपये भेजे गए। ये किसान ज्यादातर देश भर में फैले सीमांत किसान हैं। धान की वर्तमान खरीद ने केंद्रीय पूल चावल के स्टॉक को 490 एलएमटी से अधिक कर दिया है, जिसमें मिलिंग के बाद प्राप्त होने वाला 160 एलएमटी चावल भी शामिल है। चावल की वार्षिक आवश्यकता लगभग 400 एलएमटी है, जबकि 1 जुलाई के लिए भारत सरकार द्वारा निर्धारित बफर मानदंड 135 एलएमटी है। चावल के वर्तमान स्टॉक स्तर के साथ, देश न केवल अपने बफर स्टॉक मानदंडों को बल्कि अपनी पूरी वार्षिक आवश्यकता को भी पार कर गया है। इसके अलावा अगले खरीफ विपणन सीजन (केएमएस) 2024-25 के तहत खरीद भी अक्टूबर 2024 में शुरू होने की संभावना है।

इस सीजन में गेहूं और धान की पर्याप्त खरीद सरकार, एफसीआई, राज्य एजेंसियों, किसानों और अन्य हितधारकों के संयुक्त प्रयासों का परिणाम है, जिनमें कमीशन एजेंट, हैंडलिंग और परिवहन ठेकेदार और सड़क परिवहन ठेकेदार शामिल हैं। यह उपलब्धि एफसीआई की खरीद और भंडारण संबंधी सुविधाओं की मजबूती पर भी जोर देती है, जो देश में खाद्य सुरक्षा बनाए रखने के लिए महत्वपूर्ण है। एफसीआई पूरे भारत में खाद्यान्न की उपलब्धता सुनिश्चित करने, कृषक समुदाय का समर्थन करने और राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा के बड़े लक्ष्य को प्राप्त करने के अपने मिशन के प्रति प्रतिबद्ध है।

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