वर्ष 2025 के दौरान भारतीय रेलवे ने महा कुंभ के लिए अपने सबसे बड़े विशेष ट्रेन अभियानों में से एक का संचालन किया। 13 जनवरी से 28 फरवरी 2025 के बीच तीर्थयात्रियों की अत्यधिक संख्या की आवाजाही को सुगम बनाने के लिए 17,340 विशेष ट्रेन यात्राएँ संचालित की गईं। इसी तरह, होली 2025 के अवसर पर 1 मार्च से 22 मार्च 2025 के बीच 1,144 विशेष ट्रेन यात्राएँ संचालित की गईं, जो होली 2024 की तुलना में लगभग दोगुनी थीं। इससे यात्रियों को बेहतर उपलब्धता मिली और त्योहार के दौरान यात्रा अधिक सहज और सुव्यवस्थित रही।

समर ट्रैवल सीज़न, 2025 यानि गर्मी की छुट्टियों के दौरान, जो 1 अप्रैल से 30 जून तक रहा, यात्रियों की बढ़ी हुई आवाजाही को ध्यान में रखते हुए 12,417 समर स्पेशल ट्रेन यात्राओं का संचालन किया गया, जिससे छुट्टियों के पीक महीनों में भी उच्च स्तर की सेवा बनाए रखी जा सकी। इसके अलावा, छठ पूजा 2025 के लिए विशेष इंतज़ामों को और मज़बूत किया गया। 1 अक्टूबर से 30 नवंबर 2025 के बीच 12,383 विशेष ट्रेन यात्राएँ चलाई गईं, जो पिछले वर्ष की तुलना में एक उल्लेखनीय वृद्धि को दर्शाता है।
साल 2025 में किए गए ये विस्तारित इंतज़ाम 2024 में तैयार किए गए मज़बूत परिचालन आधार पर आधारित थे। 30 जनवरी से 11 मार्च 2024 के बीच संचालित आस्था स्पेशल सेवाओं के दौरान तीर्थयात्रियों की आवाजाही को सुगम बनाने के लिए 326 विशेष सर्कुलर ट्रेन यात्राएँ चलाई गईं थी। इसी तरह, होली 2024 के अवसर पर 12 मार्च से 2 अप्रैल 2024 के बीच त्योहारों के दौरान बढ़ने वाली भीड़ को संभालने के लिए भारतीय रेलवे ने 604 विशेष ट्रेन यात्राओं का संचालन किया था।
गर्मियों की छुट्टियों 2024 के दौरान 12,919 समर स्पेशल ट्रेन यात्राएँ संचालित की गईं थी। वहीं, छठ पूजा 2024 के लिए 1 अक्टूबर से 31 दिसंबर 2024 के बीच 7,990 विशेष ट्रेन यात्राओं का संचालन किया गया था।
वर्ष 2025 में विशेष ट्रेन परिचालन में हुई उल्लेखनीय वृद्धि यह दर्शाती है कि भारतीय रेलवे यात्रियों की सुविधा, प्रभावी भीड़ प्रबंधन और अधिक मांग वाले समय में विश्वसनीय तथा सुचारु यात्रा व्यवस्था सुनिश्चित करने के प्रति लगातार प्रतिबद्ध है।
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धरती का तापमान धीरे-धीरे नहीं, बल्कि खतरनाक गति से बढ़ रहा है। वैज्ञानिक अध्ययनों के अनुसार, बीसवीं सदी में भूमंडलीय औसत तापमान में लगभग 0.6 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि दर्ज की जा चुकी है। यदि तापमान वृद्धि की यही प्रवृत्ति जारी रही, तो 21वीं सदी के अंत तक वैश्विक तापमान में लगभग 6 डिग्री सेल्सियस तक की बढ़ोतरी हो सकती है। यह परिवर्तन केवल आँकड़ों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका प्रभाव मानव जीवन, प्राकृतिक संसाधनों और पारिस्थितिकी तंत्र पर प्रत्यक्ष रूप से दिखाई देने लगा है। ग्लोबल वार्मिंग के कारण हो रहे जलवायु परिवर्तन का सबसे गंभीर प्रभाव हिमालयी हिमनदों पर पड़ रहा है। अनुमान है कि यदि वर्तमान स्थिति बनी रही, तो सन् 2040 तक हिमाचल प्रदेश की अधिकांश हिमनदियाँ पिघलकर समाप्त हो सकती हैं। गंगोत्री हिमनद, जो गंगा नदी का प्रमुख स्रोत है, प्रतिवर्ष लगभग 23 मीटर की दर से संकुचित हो रही है। इस हिमनद का तीव्र क्षरण भविष्य में गंगा नदी के अस्तित्व के लिए गंभीर संकट उत्पन्न कर सकता है, जिससे करोड़ों लोगों का जीवन प्रभावित होगा।



