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प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा एमपॉक्स को अंतर्राष्ट्रीय चिंता के रूप में सार्वजनिक स्वास्थ्य आपातकाल घोषित किए जाने के मद्देनजर एमपॉक्स की स्थिति पर लगातार नजर बनाए हुए हैं

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी एमपॉक्स की स्थिति पर लगातार नजर बनाए हुए हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सलाह के अनुसार, प्रधानमंत्री के प्रधान सचिव डॉ. पी.के. मिश्रा ने देश में एमपॉक्स को लेकर तैयारियों की स्थिति और सार्वजनिक स्वास्थ्य संबंधी उपायों की समीक्षा के लिए एक उच्चस्तरीय बैठक की अध्यक्षता की।

ध्यान देने योग्य बात यह है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने अफ्रीका के कई हिस्सों में इसके व्यापक प्रसार को देखते हुए 14 अगस्त, 2024 को एमपॉक्स को फिर से अंतर्राष्ट्रीय चिंता और सार्वजनिक स्वास्थ्य आपातकाल (पीएचईआईसी) घोषित किया है। डब्ल्यूएचओ के एक पूर्व वक्तव्य के अनुसार, 2022 से वैश्विक स्तर पर 116 देशों से एमपॉक्स के कारण 99,176 मामले और 208 मौतें दर्ज की गई थीं। इसके बाद, उन्होंने बताया है कि कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य में एमपॉक्स के मामले लगातार बढ़ रहे हैं। पिछले साल, रिपोर्ट किए गए मामलों में काफी वृद्धि हुई और इस साल अब तक दर्ज किए गए मामलों की संख्या पिछले साल की कुल संख्या से अधिक हो गई है, जिसमें 15, 600 से अधिक मामले और 537 मौतें शामिल हैं। डब्ल्यूएचओ द्वारा 2022 में अंतर्राष्ट्रीय चिंता से जुड़ा सार्वजनिक स्वास्थ्य आपातकाल घोषित किए जाने के बाद से भारत में 30 मामले सामने आए हैं। एमपॉक्स का आखिरी मामला मार्च 2024 में पता चला था।

उच्चस्तरीय बैठक में बताया गया कि अभी तक देश में एमपॉक्स का कोई मामला सामने नहीं आया है। वर्तमान आकलन के अनुसार, निरंतर संक्रमण के साथ बड़े प्रकोप का जोखिम कम है।

प्रधानमंत्री के प्रधान सचिव को बताया गया कि एमपॉक्स संक्रमण आम तौर पर अपने-आप में 2-4 सप्ताह तक चलने वाला संक्रमण है; एमपॉक्स के मरीज आमतौर पर सहायक चिकित्सा देखभाल और प्रबंधन से ठीक हो जाते हैं। एमपॉक्स से संक्रमित मरीज के साथ लंबे समय तक और निकट संपर्क के माध्यम से इसका संक्रमण होता है। यह मुख्य रूप से यौन मार्ग, मरीज के शरीर/घाव द्रव के साथ सीधे संपर्क या संक्रमित व्यक्ति के दूषित कपड़ों/लिनन के माध्यम से होता है।

स्वास्थ्य सचिव ने बताया कि पिछले एक सप्ताह में निम्नलिखित कदम उठाए जा चुके हैं:

o भारत के लिए जोखिम का आकलन करने के लिए 12 अगस्त, 2024 को राष्ट्रीय रोग नियंत्रण केंद्र (एनसीडीसी) द्वारा विशेषज्ञों की एक बैठक बुलाई गई थी।

o एनसीडीसी द्वारा पहले जारी किए गए एमपॉक्स पर एक संक्रामक रोग (सीडी) अलर्ट को नए घटनाक्रमों का पता लगाने के लिए अद्यतन किया जा रहा है।

o अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डों (प्रवेश के बंदरगाहों) पर स्वास्थ्य टीमों को संवेदनशील बनाया गया है।

यह भी बताया गया कि आज सुबह महानिदेशक स्वास्थ्य सेवा (डीजीएचएस) द्वारा 200 से अधिक प्रतिभागियों के साथ एक वीडियो कॉन्फ्रेंस बुलाई गई थी। इस संबंध में राज्यों में एकीकृत रोग निगरानी कार्यक्रम (आईडीएसपी) इकाइयों और प्रवेश के बंदरगाहों आदि सहित राज्य स्तर पर स्वास्थ्य अधिकारियों को संवेदनशील बनाया गया।

प्रधानमंत्री के प्रधान सचिव डॉ. पी. के. मिश्रा ने निर्देश दिया कि निगरानी बढ़ाई जाए और मामलों का शीघ्र पता लगाने के लिए प्रभावी उपाय किए जाएं। उन्होंने यह भी निर्देश दिया कि प्रारंभिक निदान के लिए परीक्षण प्रयोगशालाओं के नेटवर्क को तैयार किया जाना चाहिए। वर्तमान में 32 प्रयोगशालाएं परीक्षण के लिए सुसज्जित हैं।

डॉ. पी.के. मिश्रा ने निर्देश दिया कि बीमारी की रोकथाम और उपचार के लिए प्रोटोकॉल बड़े पैमाने पर प्रसारित किए जा सकते हैं। इसके बाद उन्होंने स्वास्थ्य सेवा प्रदाताओं के बीच बीमारी के संकेतों और लक्षणों के बारे में जागरूकता अभियान एवं निगरानी प्रणाली को समय पर सूचित करने की आवश्यकता पर जोर दिया।

नीति के सदस्य डॉ. वी.के. पॉल, सचिव (स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण) श्री अपूर्व चंद्रा, सचिव (स्वास्थ्य अनुसंधान) डॉ. राजीव बहल, सदस्य सचिव (राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण) श्री कृष्ण एस वत्स, सचिव (सूचना एवं प्रसारण) श्री संजय जाजू और मनोनीत गृह सचिव श्री गोविंद मोहन और अन्य मंत्रालयों के अधिकारियों ने बैठक में हिस्सा लिया।

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अंगदान मानव स्वभाव का सर्वोच्च नैतिक उदाहरण है – उपराष्ट्रपति

भारत के उपराष्ट्रपति, श्री धनखड़ ने आज अंगदान की गहन महत्वपूर्णता को उजागर करते हुए इसे “एक आध्यात्मिक गतिविधि और मानव स्वभाव की सर्वोच्च नैतिक अभिव्यक्ति” के रूप में वर्णित किया। उन्होंने कहा कि अंगदान केवल शारीरिक उदारता से परे जाता है और करुणा और निःस्वार्थता के गहरे गुणों को दर्शाता है।

जयपुर में आज जैन सोशल ग्रुप्स (JSG) सेंट्रल संथान और दधीचि देहदान समिति द्वारा आयोजित कार्यक्रम में अंगदाता परिवारों को सम्मानित करते हुए उपराष्ट्रपति ने नागरिकों से अंगदान की दिशा में सचेत प्रयास करने का आह्वान किया, इसे मानवता की सेवा की महान परंपरा से जोड़ते हुए एक मिशन बनाने की बात की।
विश्व अंगदान दिवस की थीम “Be the Reason for Someone’s Smile Today” पर प्रकाश डालते हुए श्री धनखड़ ने सभी से आह्वान किया है कि वे अपने समाज की परंपरा को कायम रखते हुए अंगदान को भी इसी भावना से जोड़ें। उन्होंने कहा, “आप ऐसे समाज के सदस्य हैं जो हर मौके पर हर किसी की मुस्कान का कारण बनते हैं। इस अवसर को भी इस भावना से जोड़ें और संकल्प लें कि हर सप्ताह आप कुछ ऐसा करेंगे जिससे आपका व्यक्तिगत और पारिवारिक योगदान अंगदान के इस पवित्र कारण में शामिल हो सके।”

प्राचीन ज्ञान, “इदम् शरीरम् परमार्थ साधनम्!” का उद्धरण देते हुए, श्री धनखड़ ने मानव शरीर की महत्ता को व्यापक सामाजिक भलाई के साधन के रूप में रेखांकित किया और कहा कि यह शरीर समाज के व्यापक कल्याण के लिए एक उपकरण बन सकता है।
प्रतिभाशाली व्यक्तियों की ओर ध्यान आकर्षित करते हुए जो योगदान करने की मजबूत इच्छा से प्रेरित हैं लेकिन एक महत्वपूर्ण अंग की कमी के कारण पीछे रह जाते हैं, उपराष्ट्रपति ने कहा, “जब आप उनकी मदद करते हैं, तो हम उन्हें समाज के लिए एक बोझ से बदलकर एक संपत्ति बना देंगे,” जो अंग दान के महत्व को रेखांकित करता है।

अंग दान में बढ़ते ‘व्यावसायीकरण के वायरस’ पर चिंता व्यक्त करते हुए, श्री धनखड़ ने जोर दिया कि अंगों को आर्थिक लाभ के लिए नहीं, बल्कि समाज के लिए सोचकर दान किया जाना चाहिए। चिकित्सा पेशे को “दैवीय व्यवसाय” के रूप में संदर्भित करते हुए और कोविड महामारी के दौरान ‘स्वास्थ्य योद्धाओं’ की निःस्वार्थ सेवा को उजागर करते हुए, उन्होंने कहा कि चिकित्सा पेशे में कुछ व्यक्ति अंग दान के महान स्वभाव को कमजोर करते हैं। उन्होंने कहा, “हम अंग दान को कमजोर लोगों के शोषण का क्षेत्र नहीं बनने दे सकते जो चालाक तत्वों के व्यावसायिक लाभ के लिए हो।”
उपराष्ट्रपति ने भारत की समृद्ध सांस्कृतिक और ऐतिहासिक धरोहर की याद दिलाते हुए, सभी से आग्रह किया कि वे हमारे शास्त्रों और वेदों में निहित ज्ञान पर विचार करें, जो ज्ञान और मार्गदर्शन का विशाल भंडार हैं।
लोकतंत्र में राजनीतिक भिन्नताओं को मान्यता देने के महत्व को रेखांकित करते हुए, श्री धनखड़ ने चेतावनी दी कि ये भिन्नताएँ राष्ट्रीय हित पर कभी भी हावी नहीं होने चाहिए। उन्होंने युवाओं को लोकतंत्र के प्रति पिछले खतरों, विशेषकर आपातकाल के दौरान, और ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति से बचने के लिए सतर्कता की आवश्यकता पर भी प्रकाश डाला।
उपराष्ट्रपति ने आज कहा कि कुछ लोग मानते हैं कि आपातकाल का काला अध्याय चुनावों के बाद समाप्त हो गया है, लेकिन ऐसा नहीं है। उन्होंने जोर देकर कहा, “आपातकाल के दौरान हुए अत्याचारों को याद रखना आवश्यक है। इसी उद्देश्य से भारत सरकार ने ‘संविधान हत्या दिवस’ की पहल की है, ताकि हमारी नई-पीढ़ी को यह पता चल सके कि एक ऐसा कालखंड था जब उनके मौलिक अधिकार नहीं थे और सर्वोच्च न्यायालय ने भी अपने हाथ खड़े कर दिए थे।”
अपने संबोधन में, श्री धनखड़ ने विशेष रूप से कॉर्पोरेट्स, व्यापार संघों, और व्यापार नेताओं से स्थानीय उत्पादों को बढ़ावा देने और आयात को केवल उन वस्तुओं तक सीमित करने का आह्वान किया जो अत्यावश्यक हैं।

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प्रज्ञा परिवार द्वारा कुटुम्ब प्रबोधन गतिविधि एवं IMA के सहयोग से स्वैच्छिक रक्तदान शिविर आयोजित

भारतीय स्वरूप संवाददाता, प्रज्ञा परिवार द्वारा कुटुम्ब प्रबोधन गतिविधि, कानपुर पूर्व भाग एवं IMA के सहयोग से स्वैच्छिक रक्तदान शिविर का आयोजन
आज IMA, कानपुर के सहयोग से प्रज्ञा परिवार (संबद्ध अखिल विश्व गायत्री परिवार) श्याम नगर कानपुर द्वारा लगाए गए रक्तदान शिविर में कुल 56 यूनिट रक्तदान हुआ। सर्वप्रथम भारत माता के चित्र एवं परम पूज्य गुरुदेव पंडित श्रीराम शर्मा के चित्र पर माल्यार्पण एवम दीपक प्रज्वलन कर गायत्री परिवार के उप जोन समन्वयक आर सी गुप्ता, जिला समन्वयक आर पी लाल ने रक्तदान शिविर का शुभारंभ किया। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, कुटुंब प्रबोधन के सह प्रांत संयोजक, विनोद शंकर दीक्षित(विशिष्ट अतिथि) ने रक्तदान के फायदे बताकर लोगों का मार्गदर्शन एवं उत्साहवर्धन किया।
प्रज्ञा परिवार ने सभी रक्तदानियों को “रक्तदानी कर्ण” की उपाधि वाला प्रमाण पत्र दिया। कर्ण ने कभी भी अपने दरवाजे से किसी को खाली हाथ नहीं जाने दिया। प्रज्ञा परिवार भी जरूरत पड़ने पर जरूरतमंद के लिए रक्तदान की व्यवस्था करता है।
IMA की ओर से सभी रक्तदानियों को उपहार स्वरूप मिल्टन की बोतल एवं प्रमाण पत्र दिया गया।राष्ट्र सेवा के अंतर्गत प्रज्ञा परिवार प्रत्येक 15 अगस्त एवं 26 जनवरी या पास के रविवार को रक्तदान शिविर का आयोजन करता रहता है। रक्तदान शिविर में सहयोग करने वालों में प्रमुख रूप से चेयरमैन अशोक कुमार पांडे, अध्यक्ष आर जे मिश्रा, अजय अग्रवाल, सुनील विश्वकर्मा, दिवाकर दीक्षित , शिवानंद गुप्ता, अच्छेलाल, सुरेश चंद्र जोशी, प्रमोद मिश्रा, लाल प्रताप सिंह, अनिल त्रिपाठी आदि थे।
लोहिया भवन के ट्रस्टी अमित कुमार जैन को रक्तदान शिविर हेतु निशुल्क स्थान देने पर धन्यवाद एवं आभार व्यक्त किया।

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सम्पादक, मुद्रक, स्वामी ~अतुल दीक्षित 

संपर्क सूत्र ~ 9696469699

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महानिदेशक प्रान्तीय रक्षक दल/विकास दल एवं युवा कल्याण उ0प्र0 ने जनपद कानपुर नगर में 28वें युवा उत्सव 2024 के आयोजन हेतु दिशा- निर्देश जारी किए

कानपुर नगर (सू0वि0)* मुख्य विकास अधिकारी दीक्षा जैन ने बताया कि महानिदेशक प्रान्तीय रक्षक दल/विकास दल एवं युवा कल्याण उ0प्र0 के द्वारा जनपद कानपुर नगर में 28वें युवा उत्सव 2024 के आयोजन हेतु दिशा- निर्देश दिये गये है।
राष्ट्रीय युवा उत्सव- 2024 हेतु युवा कार्यक्रम एवं खेल मंत्रालय भारत सरकार द्वारा राज्यों एवं केन्द्रशासित प्रदेशों को Innovation in Science and Technology की थीम आवंटित की गयी है। जिसमें निम्न प्रतियोगिताओं का आयोजन जनपद स्तर से लेकर राज्य स्तर तक किया जायेगा।
उन्होंने बताया कि थीमेटिक अवयव के अन्तर्गत प्रतिभागियों द्वारा Innovation in Science and Technology की थीम पर आधारित प्रोजेक्ट का प्रदर्शन किया जायेगा, जिसमें एकल एवं समूह दोनों अलग-अलग रूप में प्रतियोगिता आयोजित की जायेगी।
सांस्कृतिक अवयव के अन्तर्गत 04 प्रतियोगिताओं Group Folk Dance, Group Folk Song, Solo Folk Dance, Solo Folk Song का आयोजन जनपद से राज्य स्तर पर कराया जायेगा। इसके अतिरिक्त जीवन कौशल अवयव के अन्तर्गत 04 प्रतियोगिताओं Story Writing, Poetry, Declamation, Painting का आयोजन जनपद स्तर से लेकर राज्य स्तर तक किया जायेगा।
उन्होंने बताया कि युवा उत्सव 2024 के आयोजन के सम्बन्ध में भारत सरकार की गाईड लाइन के अनुसार प्रतियोगिता में प्रतिभागियों की आयु 12 जनवरी, 2025 को 15 वर्ष से 29 वर्ष होनी अनिवार्य है एवं जनपद स्तर पर विजेता प्रतिभागी मण्डल स्तर पर प्रतिभाग करेंगें। जनपद स्तर के युवा उत्सव का आयोजन माह सितम्बर, 2024 में कराया जाना प्रस्तावित है।
उन्होंने बताया कि जनपद में आयोजित होने वाले युवा उत्सव में आयोजित होने वाली विधाओं का व्यापक प्रचार-प्रसार अपने स्तर से कराकर अधिक से अधिक युवाओं की प्रतिभागिता आपसे अपेक्षित है। युवा उत्सव में प्रतिभागिता हेतु प्रतिभागियों के आवेदन दिनांक 10 सितम्बर, 2024 तक कार्यालय जिला युवा कल्याण एवं प्रा०वि०द० अधिकारी, विकास भवन, कानपुर नगर अथवा dywokanpurnagar@gmail.com पर प्रेषित कराना सुनिश्चित करें। जिससे कि इच्छुक प्रतिभागी जनपद स्तरीय युवा उत्सव कार्यक्रम में प्रतिभाग कर सकें।

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अत्यधिक छिद्रपूर्ण (हाइली पोरस) ज़ेरोजेल ड्रेसिंग रक्त का तेजी से थक्का (क्लोटिंग) बनाकर जीवन बचा सकती है

शोधकर्ताओं ने सिलिका नैनोकणों और कैल्शियम को शामिल करते हुए एक छिद्रपूर्ण समग्र ज़ेरोजेल ड्रेसिंग विकसित की है जो रक्त को तेजी से जमने में मदद कर सकती है और अनियंत्रित रक्तस्राव से राहत प्रदान कर सकती है। व्यावसायिक ड्रेसिंग की तुलना में इस मिश्रण ने रक्त के थक्के जमने (ब्लड क्लोटिंग) की दर में महत्वपूर्ण सुधार दिखाया है । अनियंत्रित रक्तस्राव दुर्घटनाओं या चोटों और सैन्य या सर्जिकल ऑपरेशन के दौरान होने वाली दर्दनाक मृत्यु  के प्रमुख कारणों में से एक है। आघात से होने वाली 40% से अधिक मौतें गंभीर रक्त हानि के कारण होती हैं। रूई  (गॉज), सामान्यतः प्रयोग की जाने  वाली रूई (गॉज)  अथवा ऐसी ही अन्य  प्राथमिक चिकित्सा सामग्री या चोट वाली जगह पर रक्त के प्रवाह में कमी, फाइब्रिन सक्रियण द्वारा प्लेटलेट के थक्के प्लग) का  गठन और रक्त के अन्य थक्के मार्गों के सक्रियण के माध्यम से काम करने वाली मानव शरीर की प्राकृतिक सुरक्षा गंभीर रक्तस्राव को रोकने के लिए अपर्याप्त है।  इसलिए, रक्त  की कमी को घटाने  के लिए बेहतर हेमोस्टैटिक सामग्रियों की तत्काल आवश्यकता है। विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग (डीएसटी) के एक स्वायत्त संस्थान, अगरकर रिसर्च इंस्टीट्यूट (एआरआई) पुणे ने एक अत्यधिक छिद्रपूर्ण (हाइली पोरस) स्पंजी ज़ेरोजेल हेमोस्टैटिक ड्रेसिंग विकसित की है जो सिलिका नैनोकणों (सिलिकॉन नैनोपार्टिकल्स –  एसआईएनपीएस) और कैल्शियम जैसे सेल (एगोनिस्ट) के अंदर एक प्राप्तकर्ता (रिसेप्टर) से बंधने वाले पदार्थों के साथ पूरक है। संस्थान के वैज्ञानिकों ने मिश्रित सामग्री का अध्ययन किया और पाया कि इसने व्यावसायिक ड्रेसिंग क्लॉटिंग क्षमता की तुलना में रक्त के थक्के बनने के सूचकांक को 13 गुना बढ़ा दिया। अच्छी तरह से विशेषता वाले ज़ेरोजेल ने लगभग 30 माइक्रोन आकार के कई छिद्रों की उपस्थिति दिखाई जो ड्रेसिंग की उच्च अवशोषण क्षमता में योगदान करती है। इन पूरकों ने थक्के जमने की क्षमता में सुधार किया और परिणामस्वरूप रक्त का त्वरित अवशोषण (क्विक अब्सोर्बेंस) हुआ। प्लेटलेट्स रक्त का एक महत्वपूर्ण घटक हैं और रक्त के थक्के बनने की प्रक्रिया में योगदान करते हैं। प्लेटलेट आकार में परिवर्तन, कैल्शियम का स्राव और प्लेटलेट सतह पर रिसेप्टर्स की सक्रियता जैसे कई कारक रक्त के थक्के जमने की  जटिल प्रक्रिया  में महती भूमिका निभाते हैं। ज़ेरोजेल हेमोस्टैटिक ड्रेसिंग ने सक्रिय प्लेटलेट्स में अच्छी तरह से निर्मित  स्यूडोपोडिया के विकास के कारण प्लेटलेट एकत्रीकरण को बढ़ाया, जिसके परिणामस्वरूप एग्लूटिनेशन हुआ जो थक्के बनने की प्रक्रिया में प्रमुख भूमिका निभाता है। इसके अलावा, इस मिश्रित पदार्थ   ने कैल्शियम उत्सर्जन  और इसके निष्कासन को बढ़ाया। इसके अलावा, मानव प्लेटलेट्स में प्रोटीज सक्रिय (एक्टिव) रिसेप्टर जीन (प्लेटलेट झिल्ली में मौजूद पीएआर 1 जीन – थ्रोम्बिन सिग्नलिंग की सुविधा देता है) के सक्रिय रूप में उल्लेखनीय वृद्धि देखी गई।  प्लेटलेट कैल्शियम रिलीज और प्लेटलेट सतह पर पीएआर 1 का उन्नत होना (अपग्रेडेशन) प्लेटलेट के  आकार परिवर्तन और एकत्रीकरण के लिए महत्वपूर्ण है। जर्नल ऑफ एप्लाइड पॉलिमर साइंस में प्रकाशित एक अध्ययन से संकेत मिलता है कि पीएआर 1 जीन सक्रियण और कैल्शियम स्टोर रिलीज के माध्यम से प्लेटलेट सक्रियण के अंतरकोशिकीय आणविक तंत्र (इंट्रासेल्युलर मॉलिक्यूलर मैकेनिज्म) – प्लेटलेट्स के सक्रियण (एक्टिवेशन) में एक महत्वपूर्ण घटना, ज़ेरोगेल कंपोजिट की हेमोस्टैटिक दक्षता के लिए उत्तरदायी हैं। ऐसी ड्रेसिंग सर्जरी और आघात देखभाल के दौरान रक्त की हानि, विकलांगता और मृत्यु दर को कम करने के लिए एक संभावित हेमोस्टैटिक समाधान प्रदान कर सकती है।

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मुख्य चिकित्सा अधिकारी डा0 आलोक रंजन ने कहा जिला दिव्यांग बोर्ड, कानपुर के समक्ष शारीरिक परीक्षण हेतु उपस्थित हों

कानपुर 13 अगस्त  (सू0वि0) मुख्य चिकित्सा अधिकारी डा0 आलोक रंजन ने जन साधारण को सूचित किया है कि कानपुर नगर के ऐसे दिव्यांगजन लाभार्थी, जिन्होंने अपना पंजीकरण https://swavlambancard.gov.in/ पर तो करा लिया है, किन्तु जिला दिव्यांग बोर्ड, कानपुर नगर के समक्ष शारीरिक परीक्षण हेतु उपस्थित नहीं हुए हैं।
उन्होंने ऐसे समस्त सम्मानित पंजीकृत दिव्यांगजनों से यह अपेक्षा की है कि आप यथाशीघ्र किसी भी कार्यदिवस के सोमवार को जिला दिव्यांग बोर्ड, कार्यालय मुख्य चिकित्सा अधिकारी, कानपुर नगर एवं किसी भी बृहस्पतिवार को जिला दिव्यांग बोर्ड यू०एच०एम० चिकित्सालय कैम्पस कानपुर नगर में पूर्व में कराये जा चुके ऑनलाइन आवेदन के साथ 02 फोटो एवं आधार कार्ड की छायाप्रति लेकर शारीरिक परीक्षण हेतु उपस्थित हों, ताकि सम्बन्धित लाभार्थियों का यू०डी०आई०डी० निर्गत किया जा सके।

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भारतीय मानक ब्यूरो ने आयुष क्षेत्र में मानकीकरण के लिए विभाग का गठन किया

भारत के राष्ट्रीय मानक निकाय का भारतीय मानक ब्यूरो (बीआईएस) आयुष क्षेत्र में मानकीकरण को आगे बढ़ाने की दिशा में तत्‍पर है। ब्यूरो ने एक समर्पित मानकीकरण विभाग की स्थापना के साथ-साथ इस क्षेत्र में मानकीकरण गतिविधियों को गति दी है। नया विभाग आयुर्वेद, योग, प्राकृतिक चिकित्सा, यूनानी, सिद्ध, सोवा-रिग्पा और होम्योपैथी जैसी पारंपरिक भारतीय चिकित्सा प्रणालियों को शामिल करते हुए आयुष उत्पादों और कार्य प्रणालियों की सुरक्षा, प्रभावकारिता और गुणवत्ता को प्रोत्‍साहन देने पर केंदित है।

आयुष के लिए मानकीकरण गतिविधि की प्रक्रिया और संरचना की जानकारी देते हुए, बीआईएस के महानिदेशक श्री प्रमोद कुमार तिवारी ने कहा कि प्रसिद्ध विशेषज्ञों के नेतृत्व में, बीआईएस में आयुष विभाग ने सात अनुभागीय समितियों का गठन किया है, जिनमें से प्रत्येक एक विशिष्ट आयुष प्रणाली की देखरेख करती है। ये समितियाँ राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय दिशा-निर्देशों के अनुरूप व्यापक, साक्ष्य-आधारित मानकों को सुनिश्चित करने के लिए विशेषज्ञों, वैज्ञानिक और तकनीकी संस्थानों, उद्योग प्रतिनिधियों एवं नियामक निकायों सहित विभिन्न हितधारकों के साथ मिलकर कार्य करती है।

अद्यतन बीआईएस ने एकल जड़ी-बूटियों, आयुर्वेद और योग शब्दावली, पंचकर्म उपकरणों, योग सहायक उपकरणों और जड़ी-बूटियों में कीटनाशक अवशेषों के परीक्षण विधियों जैसे विविध विषयों को शामिल करते हुए 91 मानक प्रकाशित किए हैं। उल्लेखनीय रूप से, पारंपरिक चिकित्सा में उपयोग की जाने वाली आषधियों के लिए 80 स्वदेशी भारतीय मानकों का प्रकाशन उनके सुरक्षित और प्रभावी उपयोग को बढ़ावा देता है, जिससे उपभोक्ताओं और उद्योग दोनों को लाभ होता है। इसके अतिरिक्त, पंचकर्म उपकरणों के लिए पहले राष्ट्रीय मानक रोगनिरोधी और चिकित्सीय प्रक्रियाओं में एकरूपता सुनिश्चित करते हैं, जिससे आयुष स्वास्थ्य सेवा प्रथाओं की गुणवत्ता में वृद्धि होती है।

पर्यावरणीय स्थिरता की दिशा में पहल करते हुए, बीआईएस ने घरेलू निर्माताओं और किसानों का समर्थन करने के साथ कॉटन योगा मैट के लिए एक स्वदेशी भारतीय मानक तैयार किया है। विभाग ने भविष्य के मानकीकरण क्षेत्रों की भी पहचान की है, जिसमें शब्दावली, एकल औषधियां, योग पोशाक, सिद्धा निदान और होम्योपैथिक तैयारियाँ शामिल हैं।

बीआईएस की पहल की सराहना करते हुए आयुष सचिव वैद्य राजेश कोटेचा ने कहा कि जैसे-जैसे अधिकतर लोगों की रूचि पारंपरिक स्वास्थ्य सेवा प्रणालियों के प्रति बढ़ रही है, आयुष उत्पादों और सेवाओं में निरंतर गुणवत्ता, सुरक्षा और प्रभावकारिता की आवश्यकता अनिवार्य है। बीआईएस ने इस क्षेत्र में इस समर्पित विभाग की स्थापना करते हुए आईएस: 17873 ‘कॉटन योगा मैट’ जैसे महत्वपूर्ण मानकों को विकसित करके अपनी प्रतिबद्धता को दर्शाया है। ये पारंपरिक भारतीय चिकित्सा को बढ़ावा देने और विकसित करने में महत्वपूर्ण उपलब्धि है। कठोर मानकों और नवाचार के माध्यम से, बीआईएस राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आयुष प्रणालियों की स्वीकृति और विकास को बढ़ाने के लिए प्रतिबद्ध है।

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योग गठिया के रोगियों को राहत पहुंचा सकता है

अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स), नई दिल्ली के एक नए अध्ययन से पता चलता है कि योगाभ्यास से गठिया (रूमेटाइड अर्थराइटिस-आरए) के रोगियों के स्वास्थ्य में काफी सुधार आ सकता है।

आरए एक पुरानी ऑटोइम्यून बीमारी है जो जोड़ों में सूजन का कारण बनती है। यह जोड़ों को नुकसान पहुंचाती है और इस रोग में दर्द होता है। इसके कारण फेफड़े, हृदय और मस्तिष्क जैसे अन्य अंग प्रणालियां भी प्रभावित हो सकती हैं। परंपरागत रूप से, योग शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य लाभों के लिए जाना जाता है।

डीएसटी द्वारा समर्थित, मोलेक्यूलर री-प्रोडक्शन एंड जेनेटिक्स प्रयोगशाला, एनाटॉमी विभाग और रुमेटोलॉजी विभाग एम्स, नई दिल्ली द्वारा एक सहयोगी अध्ययन ने गठिया के रोगियों में सेलुलर और मोलेक्यूलर स्तर पर योग के प्रभावों की खोज की है। इससे पता चला है कि कैसे योग पीड़ा से राहत देकर गठिया के मरीजों को लाभ पहुंचा सकता है।

पता चला है कि योग सेलुलर क्षति और ऑक्सीडेटिव तनाव (ओएस) को नियंत्रित करके सूजन को कम करता है। यह प्रो- और एंटी-इंफ्लेमेटरी साइटोकिन्स को संतुलित करता है, एंडोर्फिन के स्तर को बढ़ाता है, कोर्टिसोल और सीआरपी के स्तर को कम करता है तथा मेलाटोनिन के स्तर को बनाए रखता है। इसके जरिये सूजन और अतिसक्रिय प्रतिरक्षा प्रणाली चक्र का विघटन रुक जाता है।

मोलेक्यूलर स्तर पर, टेलोमेरेज़ एंजाइम और डीएनए में सुधार तथा कोशिका चक्र विनियमन में शामिल जीन की गतिविधि को बढ़ाकर, यह कोशिकाओं की उम्र बढ़ने की प्रक्रिया को धीमा कर देता है। इसके अतिरिक्त, योग माइटोकॉन्ड्रियल फ़ंक्शन को बेहतर बनाता है, जो ऊर्जा चयापचय को बढ़ाकर और ऑक्सीडेटिव तनाव को कम करके टेलोमेर एट्रिशन व डीएनए क्षति से बचाता है।

डीएसटी द्वारा समर्थित, एम्स के एनाटॉमी विभाग के मोलेक्यूलर री-प्रोडक्शन एंड जेनेटिक्स प्रयोगशाला में डॉ. रीमा दादा और उनकी टीम द्वारा किए गए एक अध्ययन में दर्द में कमी, जोड़ों की गतिशीलता में सुधार, चलने-फिरने की कठिनाई में कमी और योग करने वाले रोगियों के लिए जीवन की समग्र गुणवत्ता में वृद्धि दर्ज की गई। ये समस्त लाभ योग की प्रतिरक्षात्मक सहनशीलता और मोलेक्यूलर रेमिशन स्थापित करने की क्षमता में निहित हैं।

साइंटिफिक रिपोर्ट्स, 2023 में प्रकाशित अध्ययन https://www.nature.com/articles/s41598-023-42231-w से पता चलता है कि योग तनाव को कम करने में मदद कर सकता है, जो गठिया  के लक्षणों के लिए एक ज्ञात कारण है। कोर्टिसोल जैसे तनाव हार्मोन को कम करके, योग अप्रत्यक्ष रूप से सूजन को कम कर सकता है, माइटोकॉन्ड्रियल फ़ंक्शन में सुधार कर सकता है, जो ऊर्जा उत्पादन और सेलुलर स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकता है और -एंडोर्फिन, मस्तिष्क-व्युत्पन्न न्यूरोट्रॉफ़िक कारक (बीडीएनएफ), डीहाइड्रोएपियनड्रोस्टेरोन (डीएचईए), मेलाटोनिन और सिरटुइन-1 (एसआईआरटी-1) के बढ़े हुए स्तरों से को-मॉर्बिड डिप्रेशन की गंभीरता को कम कर सकता है। योग न्यूरोप्लास्टिसिटी को बढ़ावा देता है और इस प्रकार रोग निवारण रणनीतियों में सहायता करता है तथा को-मॉर्बिड डिप्रेशन की गंभीरता को कम करता है।

इस शोध से गठिया रोगियों के लिए पूरक चिकित्सा के रूप में योग की क्षमता का प्रमाण मिलता है। योग न केवल दर्द और जकड़न जैसे लक्षणों को कम कर सकता है, बल्कि रोग नियंत्रण और जीवन की बेहतर गुणवत्ता में भी योगदान दे सकता है। दवाओं के विपरीत, योग के कोई दुष्प्रभाव नहीं हैं और यह गंभीर ऑटोइम्यून स्थितियों के प्रबंधन के लिए एक सस्ता व प्रभावी तथा स्वाभाविक विकल्प प्रदान करता है।

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फाइलेरिया उन्मूलन कार्यशाला आयोजित

भारत सरकार के युवा कार्यक्रम और खेल मंत्रालय के एनएसएस क्षेत्रीय निदेशालय लखनऊ और एनएसएस प्रकोष्ठ उच्च शिक्षा विभाग उत्तर प्रदेश शासन लखनऊ द्वारा पी सी आई तथा ग्लोबल हेल्थ स्ट्रेटजीज के सहयोग से फाइलेरिया उन्मूलन के लिए युवाओं की प्रतिभागिता के उद्देश से एक दिवसीय कार्यशाला आयोजित की गई । कार्यक्रम का शुभारंभ राज्य सम्पर्क अधिकारी प्रो. मंजू सिंह और युवा अधिकारी समरदीप सक्सेना एवं राजेश तिवारी  के साथ स्वास्थ्य मंत्रालय, पी सी आई एवम् जी एच एस के अधिकारियो द्वारा किया गया । इस कार्यक्रम में प्रदेश के 10 विश्वविद्यालयों के 27 जनपदों से 70 से अधिक कार्यक्रम अधिकारियों ने प्रतिभाग किया । इस कार्यक्रम में कानपुर विश्वविद्यालय के कार्यक्रम समन्वयक डॉ श्याम मिश्रा जी के नेतृत्व में सर्वाधिक 13 कार्यक्रम अधिकारियों ने प्रतिभाग किया । जनपद कानपुर नगर से जिला नोडल अधिकारी डॉ संगीता सिरोही के साथ डी ए वी कॉलेज से डॉ चंद्र सौरभ एवम् बी एन डी कॉलेज से डॉ प्रमोद ने प्रतिभाग किया।

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केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने महाराष्ट्र में जीका वायरस के मामलों को देखते हुए राज्यों को परामर्श जारी किया है

स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय के स्वास्थ्य सेवा महानिदेशक (डीजीएचएस) डॉ. अतुल गोयल ने महाराष्ट्र में जीका वायरस के कुछ दर्ज किए गए मामलों को देखते हुए राज्यों को एक परामर्श जारी किया है। इसमें देश में जीका वायरस की स्थिति पर निरंतर सतर्कता बनाए रखने की जरूरत पर प्रकाश डाला गया है।

चूंकि जीका संक्रमित गर्भवती महिला के भ्रूण में माइक्रोसेफली और न्यूरोलॉजिकल प्रभाव आ जाता है, इसलिए राज्यों को सलाह दी गई है कि वे चिकित्सकों को कड़ी निगरानी के लिए सचेत करें। राज्यों से आग्रह किया गया है कि वे संक्रमित क्षेत्रों में स्वास्थ्य सुविधाओं या प्रभावित क्षेत्रों से आने वाले मामलों की देखभाल करने वाले लोगों को निर्देश दें कि वे गर्भवती महिलाओं की जीका वायरस संक्रमण के लिए जांच करें, जीका से संक्रमित पाई गईं गर्भवती माताओं के भ्रूण के विकास की निगरानी करें और केंद्र सरकार के दिए गए दिशा-निर्देशों के अनुसार कार्य करें। राज्यों को यह भी निर्देश दिया गया है कि वे स्वास्थ्य सुविधाओं/अस्पतालों को एक नोडल अधिकारी की पहचान करने की सलाह दें जो अस्पताल परिसर को एडीज मच्छर से मुक्त रखने के लिए निगरानी और कार्य करें।

राज्यों को कीट विज्ञान निगरानी को मजबूत करने और आवासीय क्षेत्रों, कार्यस्थलों, स्कूलों, निर्माण स्थलों, संस्थानों और स्वास्थ्य सुविधा केंद्रों में वेक्टर नियंत्रण गतिविधियों को तेज करने के महत्व पर जोर देते हुए निर्देश दिया गया है। राज्यों से समुदाय के बीच घबराहट को कम करने के लिए सोशल मीडिया और अन्य प्लेटफार्मों पर एहतियाती आईईसी संदेशों के माध्यम से जागरूकता को बढ़ावा देने का भी आग्रह किया गया है, क्योंकि जीका किसी भी अन्य वायरल संक्रमण की तरह ही है जिसके अधिकांश मामले लक्षणहीन और हल्के होते हैं। हालांकि, इसे माइक्रोसेफली से जुड़ा मामला बताया जाता है, लेकिन 2016 के बाद से देश में जीका से जुड़े माइक्रोसेफली की कोई रिपोर्ट नहीं आई है।

किसी भी आसन्न उछाल/प्रकोप का समय पर पता लगाने और नियंत्रण के लिए, राज्य अधिकारियों को सतर्क रहने, तैयार रहने और सभी स्तरों पर उचित रसद की उपलब्धता सुनिश्चित करने की सलाह दी गई है। राज्यों से यह भी आग्रह किया गया है कि वे पहचान में आए जीका के किसी भी मामले के बारे में तुरंत एकीकृत रोग निगरानी कार्यक्रम (आईडीएसपी) और राष्ट्रीय वेक्टर जनित रोग नियंत्रण केंद्र (एनसीवीबीडीसी) को बताएं।

जीका परीक्षण सुविधा राष्ट्रीय विषाणु विज्ञान संस्थान (एनआईवी), पुणे; राष्ट्रीय रोग नियंत्रण केंद्र (एनसीडीसी), दिल्ली और भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) की कुछ चुनिंदा वायरस अनुसंधान और नैदानिक ​​प्रयोगशालाओं में उपलब्ध है। जीका संक्रमण के बारे में उच्च स्तर पर समीक्षा की जा रही है।

डीजीएचएस ने इस साल की शुरुआत में 26 अप्रैल को एक एडवाइजरी भी जारी की थी। एनसीवीबीडीसी के निदेशक ने भी फरवरी और अप्रैल, 2024 में दो एडवाइजरी जारी की हैं ताकि राज्यों को एक ही वेक्टर मच्छर से फैलने वाली जीका, डेंगू और चिकनगुनिया बीमारी के बारे में पहले से चेतावनी दी जा सके।

केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय स्थिति पर लगातार नज़र रख रहा है।

पृष्ठभूमि:

डेंगू और चिकनगुनिया की तरह जीका भी एडीज मच्छर जनित वायरल बीमारी है। यह एक गैर-घातक बीमारी है। हालांकि, जीका संक्रमित गर्भवती महिलाओं से पैदा होने वाले शिशुओं में माइक्रोसेफली (सिर का आकार कम होना) से जुड़ा है, जो इसे एक बड़ी चिंता का विषय बनाता है।

भारत में 2016 में गुजरात राज्य में जीका का पहला मामला सामने आया था। तब से, तमिलनाडु, मध्य प्रदेश, राजस्थान, केरल, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, दिल्ली और कर्नाटक जैसे कई अन्य राज्यों में भी बाद में जीका मामले दर्ज किए हैं।

वर्ष 2024 में (2 जुलाई तक), महाराष्ट्र के पुणे में 6, कोल्हापुर में 1 और संगमनेर 1 यानी पूरे आठ मामले दर्ज किए गए हैं।

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