भारतीय स्वरूप संवाददाता कानपुर: क्राइस्ट चर्च कॉलेज, कानपुर में आज बॉलीवुड के स्वर्णिम युग पर आधारित नाट्य प्रस्तुति “सपने (मिडिल क्लास)” का भव्य आयोजन हुआ। यह कार्यक्रम Sameeksha Creations Mumbai के सहयोग से आयोजित किया गया, जिसका लेखन और निर्देशन प्रो. विभांशु वैभव ने किया।
यह नाटक 70 और 80 के दशक के बॉलीवुड सिनेमा को समर्पित एक भावनात्मक और मनोरंजक प्रस्तुति रही, जिसमें मध्यम वर्गीय परिवारों के संघर्ष, सपने और सामाजिक यथार्थ को हास्य, भावनाओं और नाटकीयता के माध्यम से मंच पर जीवंत किया गया।
कार्यक्रम का आरंभ दीप प्रज्ज्वलन (Lighting of the Lamp) से हुआ, जिसके पश्चात अतिथियों का स्वागत किया गया। कॉलेज के प्राचार्य प्रो. विनय जॉन सेबेस्टियन ने उद्घाटन संबोधन में कहा —“हमें गर्व है कि क्राइस्ट चर्च कॉलेज कला और संस्कृति को प्रोत्साहन देने के लिए ऐसे विशेष आयोजनों की मेज़बानी करता है। ‘सपने (मिडिल क्लास)’ ने हमारे छात्रों और शहर के दर्शकों को स्वर्णिम युग की यादों से जोड़ा।” इसके पश्चात मुख्य अतिथि प्रो. विभांशु वैभव ने अपने संबोधन में कहा कि यह नाटक उस वर्ग की कहानी है जो सपनों के साथ जीता है, संघर्ष करता है, और हर परिस्थिति में आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है।
संयोजक प्रो. मीत कमल ने बताया —“हमारा उद्देश्य इस नाटक के माध्यम से 70s–80s के बॉलीवुड युग और उस दौर की संवेदनाओं को दर्शकों तक पहुँचाना था।”
कार्यक्रम का समापन डॉ. एरिक विल्सन द्वारा प्रस्तुत वोट ऑफ थैंक्स से हुआ, जिसमें उन्होंने सभी अतिथियों, अध्यापकगण, विद्यार्थियों और सहयोगी संस्थाओं का आभार व्यक्त किया।
इस अवसर पर कॉलेज के विभागों के शिक्षकगण, छात्र-छात्राएँ तथा गणमान्य अतिथि बड़ी संख्या में उपस्थित रहे।
नाटक का सारांश : ‘सपने (मिडिल क्लास)’
नाटक की शुरुआत 70–80 के दशक की फ़िल्मों के मशहूर गीतों और संवादों से होती है, जिन्हें सूत्रधार कांची ने अपने अभिनय और भावपूर्ण प्रस्तुति से जीवंत किया।
इसके बाद कहानी एक ही मोहल्ले के तीन मध्यमवर्गीय परिवारों के इर्द-गिर्द घूमती है —
पहले परिवार में अम्मा (वैष्णवी) अपने तीन बेटों और एक बेटी के साथ रहती हैं —
• पहलवान (हर्षित), जो कुश्ती में गोल्ड मेडल जीतकर माँ का सपना पूरा करना चाहता है।
• चंदू (डॉक्टर), जो अपने ठाट-बाट और घमंड में रहता है।
• रवि, जो धर्मेंद्र जैसा अभिनेता बनने का सपना देखता है।
रवि का साथी पप्पू पान वाला (सुंदरम) उसका सच्चा मित्र है, जबकि फोटोग्राफर (बृजेश) उसकी हर अदा का दीवाना है।
रवि का प्रेम संबंध मोहल्ले के श्रीवास्तव जी (आदर्श) की बेटी बिब्बो (तनिष्का) से है।
बिब्बो का भाई अमर (उमर) अमिताभ बच्चन का प्रशंसक है और खुद अभिनेता बनना चाहता है। उसका प्रेम संबंध चतुर्वेदी की बिटिया सिब्बो (तन्वी) से है।
अमर का साथी मुन्ना कट्टेवाला (विक्रांत) उसके हर कारनामे में साथ देता है।
घर में छोटू (हर्ष) और रामभक्त (प्रणव) अपनी मासूमियत और हास्य से दर्शकों को बाँधे रखते हैं।
माँ (अनुष्का) चिंतित रहती है कि बड़ी बेटी बिन्नो (अंजलि) की शादी अब तक नहीं हुई।
तीसरा परिवार बिन्नो को देखने आता है — उनका बेटा (अब्दुल) बिना कुछ कहे लौट जाता है, लेकिन बाद में बिन्नो की शादी उसी युवक से करा दी जाती है और वह “घरजमाई” बन जाता है। इसी बीच मोहल्ले में बिब्बो और रवि की प्रेमकहानी चाची (कांची) और पंडिताइन (ओजस्विनी) के ज़रिए फैल जाती है। फिर मोंटी बदमाश (शिवा) द्वारा बिन्नो से छेड़छाड़ की घटना होती है। जब यह बात अमर तक पहुँचती है, तो वह रवि, मुन्ना और पप्पू पानवाले के साथ मिलकर मोंटी की हत्या कर देता है।
इसके बाद गुल्लो प्रधान (अंकित) सभी पुरुषों को दोषी ठहराकर जेल भिजवा देता है, जिससे पूरा मोहल्ला मर्दविहीन हो जाता है।
अंतिम दृश्य में पहलवान की पत्नी बड़की बहू (सानिया) का बेटा बड़ा होकर दीवार पर लगे धर्मेंद्र के पोस्टर को फाड़ देता है — जो प्रतीक है अमिताभ के नए युग और नए सपनों की शुरुआत का।
इसी दृश्य के साथ नाटक का समापन होता है — पुराने युग की समाप्ति और नई पीढ़ी के संघर्षशील सपनों की शुरुआत के प्रतीक के रूप में।
दर्शकों ने कलाकारों के अभिनय, संवादों और मंच सज्जा की जोरदार सराहना की।
नाटक ने यह सशक्त संदेश दिया —
“हर वर्ग के अपने सपने होते हैं, जो संघर्षों के बावजूद जीवित रहते हैं — और यही जीवन की असली सुंदरता है।”
कार्यक्रम में कॉलेज के विद्यार्थी, शिक्षकगण और दर्शक बड़ी संख्या में उपस्थित रहे और सभी ने नाटक की भूरि-भूरि प्रशंसा की।
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